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Thursday, September 24, 2026

बेटियाँ

 

बेटियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

भारतीय इतिहास में
बेटियाँ और नारियाँ
पूजनीय रही हैं।

फिर भी इतिहास के पन्नों में
कुछ कड़वी सच्चाइयाँ भी हैं—

सती-प्रथा,
जौहर-व्रत,
बाल-विवाह,
विधवा को अपशकुन मानना,
गर्भ में शिशु लड़की हो
तो उसे मार देना,
दहेज-प्रथा—

इन कुप्रथाओं ने
नारी जीवन को
कितना पीड़ित किया!

बाल-विवाह और
अनमेल विवाह की पीड़ा
कितनी बेटियों ने सही।

धन्य हैं
समाज-सुधारक
राजा राममोहन राय जैसे महापुरुष,
जिन्होंने कुप्रथाओं के विरुद्ध
आवाज़ उठाई।

कितनी बहुएँ
दहेज के कारण
जिंदा जला दी गईं!

इतिहास में
ऐसे अनेक प्रसंग हैं
जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।

रामायण में भी
सीता जैसी पतिव्रता पत्नी को
वन में छोड़ने का प्रसंग
आज भी अनेक प्रश्न खड़े करता है।

ये हैं
भारतीय समाज में
बेटियों और नारियों के
कुछ शंकालु और पीड़ादायक पक्ष।

पर कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

आज की नारी के
सकारात्मक पक्ष भी हैं—
शिक्षा, आत्मनिर्भरता,
साहस, अधिकार और सम्मान।

आज की बेटियाँ
ज्ञान के आकाश में उड़ रही हैं,
विज्ञान, खेल, कला, प्रशासन
और अंतरिक्ष तक
अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं।
वे चुनौतियों को अवसर बनाकर
अपने सपनों को साकार कर रही हैं
और समाज को नई दिशा दे रही हैं।

यह परिवर्तन
नारी की असीम शक्ति,
दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास की
प्रेरक कहानी है।

अगले भाग में
हम उन साहसी और सफल नारियों की
उपलब्धियों से परिचित होंगे,
जिन्होंने अपने संघर्षों से
नई राह बनाई और
अनगिनत बेटियों के लिए
आशा का दीप जलाया।

बेटियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

आधुनिक युग में बेटियाँ
शिक्षित हैं,
अपने पैरों पर खड़ी हैं।

स्नातक, स्नातकोत्तर होकर
डॉक्टर, इंजीनियर,
शिक्षिका, प्राध्यापिका,
पायलट और
उच्च पदों पर आसीन होकर
अपने दायित्वों को
सुचारु रूप से निभा रही हैं।

मायके और ससुराल—
दोनों परिवारों की
आमदनी और उन्नति का
महत्त्वपूर्ण आधार बन रही हैं।

पति के बराबर शिक्षा,
पति के बराबर योग्यता,
पति के बराबर आत्मविश्वास—
आज की बेटी
भयभीत होकर जीना नहीं चाहती।

फिर भी
भारतीय संस्कृति के संस्कारों से
पति-परायणता,
ससुराल की सेवा
और परिवार के प्रति समर्पण
आज भी उसके जीवन का
महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

लेकिन प्रश्न अभी भी है—
क्या बेटी सचमुच सुरक्षित है?

छह वर्ष की बच्ची से लेकर
साठ वर्ष की वृद्धा तक,
महिलाओं के विरुद्ध होने वाले
यौन अपराधों की खबरें
समाज की अंतरात्मा को
झकझोर देती हैं।

युग बदल गया,
शिक्षा बढ़ गई,
तकनीक बढ़ गई,
लेकिन नारी की सुरक्षा का प्रश्न
अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

आज विवाह के साथ
‘तलाक’ और ‘डिवोर्स’ जैसे शब्द भी
सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन गए हैं।
कहीं विवाह का बंधन कमजोर पड़ता है,
कहीं पति-पत्नी के संबंधों में
तनाव बढ़ता है।

कभी वृद्ध कन्याओं की चिंता थी,
आज अनेक पुरुष और महिलाएँ
विवाह के बिना भी
अपना जीवन जी रहे हैं।

कहीं परिवार में
नारी का प्रभाव बढ़ा है,
तो कहीं पुरुष स्वयं को
पत्नी के निर्णयों पर निर्भर पाता है।

पर प्रश्न यह नहीं कि
कौन किसके अधीन है।

सच्चा प्रश्न यह है—
क्या पति-पत्नी एक-दूसरे के
सहयोगी हैं?

बेटियाँ आज चतुर हैं,
शिक्षित हैं,
जागरूक हैं,
आत्मनिर्भर हैं।

फिर भी
भारतीय संस्कृति के
आचार-विचार और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच
कई बेटियाँ
आज भी मानसिक दबाव और
असमानता का सामना करती हैं।

इस स्थिति को बदलने के प्रयास
साहित्य, समाज, शिक्षा और
चित्रपट—हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं।

आज माता-पिता भी
बेटियों को बोझ नहीं,
परिवार की शक्ति मानने लगे हैं।

बेटी पढ़ती है—
तो परिवार आगे बढ़ता है।
बेटी आत्मनिर्भर होती है—
तो परिवार मजबूत होता है।
बेटी सुरक्षित रहती है—
तो समाज सुरक्षित होता है।

सुंदर निष्कर्ष

बेटी केवल किसी की बेटी नहीं,
वह किसी की बहन है,
किसी की पत्नी है,
किसी की माँ है—
और सबसे पहले
वह स्वयं एक स्वतंत्र मनुष्य है।

बेटी को दया नहीं,
सम्मान चाहिए।
बेटी को बंधन नहीं,
सुरक्षा चाहिए।
बेटी को केवल शिक्षा नहीं,
निर्भय होकर जीने का अधिकार चाहिए।

जिस घर में बेटी मुस्कुराती है,
वहीं सच्ची खुशहाली बसती है।
जिस समाज में बेटी सुरक्षित है,
वही समाज वास्तव में सभ्य है।

बेटी बचाना ही नहीं—
बेटी को पढ़ाना,
बेटी को सम्मान देना,
बेटी को समान अवसर देना
और बेटी को निर्भय जीवन देना—
यही आधुनिक भारत की
सच्ची पहचान होनी चाहिए।

बेटी बोझ नहीं,
बेटी भविष्य है।
बेटी परिवार की शान नहीं केवल—
बेटी राष्ट्र की पहचान है।


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