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Monday, September 21, 2026

नीति का पथ

 नीति का पथ।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-9-26

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नीति का पथ,

 तटस्थ पथ।

 उस पथ पर चलने में 

 अड़चनें हैं ज्यादा।

हिम बड़े गौरीशंकर की 

चोटी पर चढ़ने के समान साँस घुटेगा।

ठंड से   राहत नहीं।

दूसरा  मार्ग भी नहीं।

काँटों से भरे पेड़ पर के

 फल निकलने के समान।

राम भी तटस्थ न रहे,

कृष्ण भी न रहे,

मंदिर के पुजारी भी नहीं।

 भगवान तटस्थ हैं क्या?

 शासकों और धन 

के अधीन  नीति पथ।

अवकाश प्राप्त न्यायाधीश का कहना है कि

सत्य न्याय शासकों  और धन के आगे डांवाडोल।।

 70% मत मिलते हैं 

४०% मत लेने पर जीत।

अल्पसंख्यकों का शासन।

 पंच तत्व ही  नीति के पथ  पर दृढ़।

[ आज की चुनौती


नीति के पथ


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

22-9-26


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नीति का पथ,

तटस्थता का पथ—

उस पथ पर चलना

आसान नहीं।


अड़चनें हैं बहुत,

जैसे हिम से ढकी

गौरीशंकर की चोटी पर

चढ़ते समय

हर कदम पर साँस घुटती हो।


कड़ाके की ठंड,

राहत का कोई साधन नहीं,

और पीछे लौटने का

कोई दूसरा मार्ग भी नहीं।


काँटों से भरे वृक्ष से

फल तोड़ने जैसा

कठिन है

नीति के पथ पर चलना।


राम भी हर परिस्थिति में

तटस्थ नहीं रहे,

कृष्ण भी तटस्थ नहीं रहे,

तो फिर

मंदिर का पुजारी

कैसे तटस्थ रह पाएगा?


प्रश्न उठता है—

क्या भगवान भी तटस्थ हैं?


आज नीति का पथ

कहीं-कहीं

शासन और धन

के प्रभाव में

डगमगाता दिखाई देता है।


एक अवकाशप्राप्त न्यायाधीश का कहना है—

सत्य और न्याय भी

कभी-कभी

शासन और धन के प्रभाव के सामने

डाँवाडोल हो जाते हैं।


सत्तर प्रतिशत मत

किसी एक पक्ष को मिलें,

पर चालीस प्रतिशत मतों से

जीत हो जाए—

तो प्रश्न उठता है,

क्या यह

बहुमत का शासन है

या अल्पमत की सत्ता?


फिर भी

नीति का पथ

छोड़ना नहीं चाहिए।


पंचतत्व की तरह

जो अपने स्वभाव पर

दृढ़ रहते हैं,

वैसे ही मनुष्य को भी

सत्य, न्याय और नीति पर

दृढ़ रहना चाहिए।


नीति का पथ कठिन हो सकता है,

पर वही पथ

मनुष्य को

सच्चा मनुष्य बनाता है।

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