मन, मान और धन
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
मन में उच्च विचार हों,
सोच ऊँची हो,
तो सभी उसका सम्मान करते हैं।
परंतु वास्तविकता यह भी है कि
धनियों के दरबार में
मान मिले या न मिले,
धन का अपना प्रभाव रहता है।
फिर भी उच्च विचार,
अथक परिश्रम,
समाज-कल्याण की भावना,
निष्काम एवं निस्वार्थ सेवा
मनुष्य को महान बनाती है।
लालबहादुर शास्त्री जी
अपने निरंतर परिश्रम,
सादगी और देशसेवा के बल पर
प्रधानमंत्री बने।
देश ही उनके लिए सर्वस्व था।
स्वच्छ भारत की घोषणा के साथ
चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी जी
भी देश के प्रधानमंत्री बने।
इससे एक संदेश मिलता है—
मनुष्य की पहचान
उसके धन से नहीं,
उसके कर्म और विचारों से होती है।
मन प्रधान है, धन नहीं।
मन में उच्च विचार रखो,
निष्काम एवं निस्वार्थ सेवा करो।
धन को ही सर्वस्व मत समझो।
मन की आवाज सुनो,
सत्य के पथ पर चलते रहो।
भले ही अकेले चलना पड़े,
ईश्वर के प्रतिनिधियों के माध्यम से
एक दिन तुम्हें सम्मान अवश्य मिलेगा।
औवैयार की कविता और धन का प्रभाव
तमिल की प्रसिद्ध कवयित्री औवैयार ने
धनी कवियों को मिलने वाले सम्मान
और उनकी कविताओं की प्रशंसा के विषय में
एक व्यंग्यपूर्ण कविता कही है।
விரகர் இருவர் புகழ்ந்திட வேண்டும்
प्रशंसा करने वाले दो चतुर खुशामदी लोग चाहिए।
விரல்நிறைய மோதிரங்கள் வேண்டும்
उँगलियों में अनेक बहुमूल्य अंगूठियाँ होनी चाहिए।
அரையதனில் பஞ்சேனும் பட்டேனும் வேண்டும்
कमर पर मुलायम सूती या रेशमी वस्त्र होना चाहिए।
அவர்வித்தை நஞ்சேனும் வேம்பேனும் நன்று
उनकी विद्या अथवा कविता भले ही विष के समान हो या नीम की तरह कड़वी, फिर भी उसे अच्छी ही कहा जाएगा!
कितना तीखा व्यंग्य है!
एक कवि समाज को बिगाड़ने वाली,
विषैली और बुरी कविता भी लिखे,
फिर भी उसे सम्मान मिल सकता है।
क्यों?
क्योंकि उसके चारों ओर
खुशामद करने वाले लोग हैं।
हर कविता के बाद
'वाह! वाह!' कहने वाले लोग हैं।
उँगलियों में रत्नजड़ित अंगूठियाँ पहनने वाले
धनी कवि की कविता अच्छी हो या बुरी,
मधुर हो या कड़वी,
उसकी प्रशंसा करने वाले
हमेशा मिल ही जाएँगे।
औवैयार ने धनी कवियों को मिलने वाले
ऐसे सम्मान पर व्यंग्य करते हुए
कवि कंबन के सामने
राजदरबार में यह कविता सुनाई थी।
साहित्य और अमरत्व
आजकल काम-वासना से भरे
चलचित्रों के गीत
मौसमी हवा की तरह आते-जाते रहते हैं।
लेकिन सच्चे साहित्यकारों की
अमर कृतियाँ,
उनके उच्च विचार और जीवन-दर्शन
युगों-युगों तक स्मरणीय
और अनुकरणीय बने रहते हैं।
धन से प्रशंसा खरीदी जा सकती है,
लेकिन सच्चा सम्मान
उच्च विचारों और श्रेष्ठ कर्मों से ही मिलता है।
मन को ऊँचा रखो,
मान अपने आप मिलेगा।
धन को प्रधान मत समझो,
मानवता को प्रधान समझो।
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एस. अनंतकृष्णन
चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक
स्वरचित भावाभिव्यक्ति — अपने विचार, अपनी हिंदी, अपनी शैली।