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Wednesday, May 23, 2018

भक्ति भाव भूमि


आज के विचार.

भारत में   मजहब नहीं,
धर्म है. मजहबी  स्वार्थ  होते हैं.
स्वार्थता दूर होने
 मजहब  का पैगाम या संदेश
ईश्वर से मिलते हैं.
पर  जिस महान के द्वारा
जग में शांति ,प्रेम,
 इनसानियत  की
स्थापना  हुई,
 उनके स्वर्ग वास या जीवन  मुक्ति  के होते ही
उनके  चेले  नये सुधार  लाना चाहते हैं,
मूल  गुरु  के उपदेश से कुछ लोग
 जरा भी परिवर्तन  लाना  नहीं चाहते.
जो परिवर्तन लाना चाहते हैं,
वे नया संप्रदाय
 नया मार्ग या नयी शाखा
बनाने में सफल हो जाते हैं.
हिंदु धर्म एक सागर है.
इसमें अघोरी को देखते हैं.
सिद्ध  पुरुषों  के देखते हैं,
आचार्यों के देखते हैं,
नाना प्रकार के संप्रदाय  देखते हैं.
 भोगी धनी आश्रमों को देखते  हैं,
पागल सा फुटपाथ  पर
भटकनेवाले
 ईश्वर तुल्य भविष्यवाणी
 बतानेवाले
दैविक पुरुष देखते हैं,
लोगों में फूट पैदा करनेवाले
विरोध  भाव उत्पन्न करनेवाले,
शैव- वैष्णव संप्रदाय  देखते हैं.
 अंध विश्वासों को दूरकर
मानव मानव में एकता, प्रेम, परोपकार,
सहानुभूति  ,हमदर्दी आदि शाश्वत भाव
की ओर चलनेवाला कबीर जैसे
वाणी का डिक्टेटर देखते हैं.
मनको कलुषित रखने से
 आदर्श  सेवा या
ईश्वरत्व  नहीं के बराबर  का
भाव  ही होगा.
 भगवान विराट रुपी,
 जन्म मरण
 ही सत्य हैं
पाप कर्म का दंड,
पुण्य कर्म का पुरस्कार.
पर जग में किसी को शांति नहीं,
आत्म संतोष  नहीं
बडे बडे  राजा- महाराजाभी दुखी,
गरीब भी दुखी,
 अधिकारी भी दुखी.
राम कहानी  सुनाना तो
 केवल दुख का वृत्तांत सुनाना है.
महाभारत  तो बदला लेने के लिए ,
 दुखांत ही है.
  कबीर की वाणी स्मरणीय  है.
मिथ्या संसार में  सुख ही सुख का भोगी
कोई भी नहीं है.
हमें जितना सुख मिला ,
वह हमारे सद्करम का फल है.
जितना दुख मिला, हमारे दुष्कर्म  का फल है.
 ईश्वरावतार राम, कृष्ण सभी दुखी ही रहे.
 मुहम्मद नबी को पत्थर का चोट लगी तो
ईसामसीह  को रक्त बहाना पडा.
 हिंदू भाव भूमि सगुण निर्गुण  को मानता है.
अहम् ब्रह्मास्मि  खुद को
 भगवान मान कर चलने का
अद्वैत सिद्धांत.
हर आदमी ईश्वर है.
वही स्पष्ट है.
 पर मृत्यु उसके हाथ  में नहीं.
तब मनुष्य अपने से परे,
दूसरी शक्ति वही ईश्वर मानता है.
द्वैत भावना जगती है.
मनुष्य मनुष्य में  जाति संप्रदायों से दूर

मानव सेवा अपनाने विशिष्टाद्वैत  .
 इन सब में गोता लगाकर,
 खोदकर तराशकर
मोती, हीरा लाना
मानव धर्म है.
*














Tuesday, May 22, 2018

துர் கா. दुर्गा

दुर्गा  दुष्ट संहारिणी , து ர்  கா  து ஷ்ண ஸம் ஹா ரி  ணி.
इष्ट वर दायिनी   இஷ்ட வர தா யி னி

ईश्वरी अखिललोक रक्षकी,
ஈஸ்வரி  அகில லோக  ரக்ஷகி
अखिलांडेश्वरी,   அ கி லா ண் டே ஷ்வரி

अगजग  संताप निवारिणी  அகில ஸத் தா ன் நிவா ரி ணி
सिंहवाहिनी,  சி ம்ம வா ஹி னி

शीघ्र असुर संहारिणी.  சீ க் கி ர அ சு ர ஸம் ஹா ரி ணி

महिषासरवर्द्धिनी,  மகி ஷா சு ர மர்த் திணி
महेश्वर पत्नी.  மஹே ஷ் வர பத் னி
भक्ताकर्षिणी.  க்க தா க ர் ஷனி
लोकनायकी, லோ க நா யகி.


Sunday, May 20, 2018

प्रेम

எப்படி,  कैसे?
இப்படி. ऐसे?
அப்படி  वैसे?
என்றா லு ம்  जो भी हो,
நம்  எண்ண ப்படி   हमारे विचारानुसार,
மன சாட்சி ப் படி  मनःसाक्षी के अनुसार
நடந்தா லு ம்  चलने पर भी
வி தி ப்படி   विधि के मुताबिक  ही
பலன். फल  मिलेगा.
இறை வன்..  ईश्वर
தரு ம்  பலன்.  जो  फल देता है,
ஒன் றே    वह एक ही है.
இன்னல்  தீ ர் த்து  संताप मिटाकर
 இன்பம  தரு ம்.  सुखप्रद है.
இறை வ னு க் கு ம் ईश्वर और
இறையன்ப னு க்கு ம்  भकत के बीच
கா தல் ஏற் பட வே ண்டும்.  प्यार होना चाहिए.
காதலர்கள் நடு வி ல்   प्रेमियों के बीच
இடை த்தரகர்  வே ண் டு மா? क्या दलाल की आवश्यकता  है?  नहीं.

Saturday, May 19, 2018

बंधन

इसका हिंदी  अनुवाद.
माता पिता  रखे सुंदर नाम भी,
प्राण पखेरू उडने  के बाद
शव को नाम भी पाता.
नये पसंद के कपडे भी
 फटे कपडे का नाम पाता.
मेहनत की संपत्ति  भी
वारिस का बन जाता.
मिलकर रही पत्नी या पति
 क्या मरने के बाद साथ ही मरते?
मेहनती शरीर लाश बनकर पडा है .जिन लोगों ने कहा-प्राण दूँगा,
लाश के सामने गूँगा बन खडा है.
जिनको  अपना माना, वे पराये बन गये.
नाता रिश्ता सब अब छोड गये बंधन.
भगवान के दिये शरीर में न कोई नाता रिश्ता. हम सब केवल
चंद समय के राहगीर मात्र.
ऊँ नमः शिवाय नमः शिवाय नमः 

पानी

पानी  बिना सब सून.
मनुष्य जीवन अंत,
वनस्पति जीवन अंत
पशु पक्षी  अंत.
नदी वाला शून्य

धरती में फरारें पड जाती.
पानी देना ,पानी फेरना, पानी  रखना
पानी चले जाना, जीभ में पानी का लार टपकना,
 बिन पानी  सब सून
पानी गये न भरे मोती मानुस सून

भक्ति

भले ही भगवान हो,
 ज्ञान  के प्रकाश  फैलाता है.
भरोसा श्रद्धा -भक्ति
अपने आप  जगना है.
भगवान असुर  को भी वर देता है.
भक्तों के भी.
पागल, अंधे,बहरे, लूले- लंगडे
इत्तिफाक से मनुष्य  को बुद्धि  दी है,
 एक  छापेखाने के मालिक  ने अपने  लाभ के लिए  अफवाहें फैलाई कि 200नोटिस  छपकर बाँटो,
मालामाल हो जाओगे,  भगवान के
प्रत्यक्ष दर्शन मिलेंगे.
देखा, छापाखाने का मालिक
मालामाल बन गया.
 भक्त प्रहलाद, ध्रुव, भक्त त्याग राज, रमण महर्षि, महावीर, बुद्ध, नानक, मुहम्मद, ईसा देखिए.
केवल भक्ति की, धर्म कर्म अपनाया.भगवान का नाम जपो,
मनो कामनाएँ पूरी होंगी. बाकी सब मिथ्याडंबर  की भक्ति है.

Friday, May 18, 2018

नव लेखक शिबिर का प्रभाव


पुदुच्चेरी  में   पुदुच्चेरी हिंदी साहित्य  अकादमी ,

  केन्द्रीय निदेशालय दोनों

मिलकर    नव  लेखक शिबिर  का  प्रबंध किया.

उसमें    भाग  लेने  का सुअवसर  मिला.

यह  मेरे लिए  पहला  शिबिर  था.

मैं      सोच  रहा  था कि  ६८ साल की उम्र  का

दिलतल     का युवक  मैं ही हूँगा.

पर वहां   श्रीमती चेल्लं, चंद्रा ,वासुदेवन , कल्याणी  जैसे
मुझसे    बड़े बहनों का ,  वासुदेवन जैसे साठ साल  के छोटे भाई का
मधुर      मिलन  हुआ.

आये नवयुवकों  में से  श्रीमती चेल्लम जी, चंद्राजी  के सक्रिय  भाग ,
 परिश्रम ,उत्साह देख मुझे लगा , मैं तो निष्क्रिय  हूँ.
उन्होंने  हिंदी किताब आर्थिक लाभार्थ नहीं ,
साधक     के  रूप  में    प्रकाशित किया  है.

मेरे     ब्लॉग लेखन  का  उन्हें  पता  ही नहीं.

 शिबिर   की प्रतिक्रिया :-
 
भला      मेरी   उम्र  बड़ी ,
मन में   जो  विचार  आते,
जिन्हें  मेरा  मन  माना ,
उन्हें    अपनी हिंदी ,अपनी शैली , अपने विचार
अपना     स्वतंत्र   प्रकाशन
यों      ही  लेखनी  दौडाई.
उनमें    कितनों  ने  प्रशंसा  की ,
कितनों   निंदा की ,
कित्नोने ने समझा  पागल ,
कितनों   ने  समझा चतुर
पता       नहीं ,
मेरे     ब्लॉग  नव  भारत टाइम्स  में
आ  सेतु  हिमाचल, मतिनंत  के  नाम  से ,
राम्क्री  सेतुक्री.ब्लॉग स्पॉट  के  नाम से ,
तमिल-    हिंदी संपर्क ,anandgomu.ब्लॉग स्पॉट .कॉम
स्पीकिंग ट्री  इण्डिया टाइम्स  में
अनूदित,   स्वरचित ,नकल की  रचनाएँ
लिखता     रहा हूँ ,
किसी      का  बंधन  नहीं ,
विश्व    भर के एक लाख लोग
न जाने   सरसरी नजर  से    देख  रहे  हैं ,
या  पढ़   रहें   हैं  पता  नहीं ,
चाहक     की  संख्या  से ,
संतुष्ट  रहा,
११-५-  १८   से  १८.५ .१८  तक के   आठों  दिनों  में
मेरे     अष्ट वक्र  विचार,
लेखन      शैली  में  ,
कितनी    गलतियां  हैं ,
कितनी    श्रद्धा  हीनता  है,
 यह       सोचकर  लज्जित  हूँ.

शिबिर    की   प्रक्रिया  जो   कहूं ,
जितना    भाई   चारा   बंधुत्व  मिला,
जितनी    अधिक  प्रेरणा   मिली ,
प्रोत्साहन मिला ,
वे       वर्णनातीत  और शब्दों  से  परे
अनुभूतियात्मक   हैं.
 पुदुच्चेरी   हिंदी  साहित्य  अकादमी  के  अध्यक्ष
श्री      श्रीनिवास गुप्त जी, ,श्री जयशंकर बापू जी , सचिव    चेंदिलकुमरन जी ,
 व्यवस्थापिका समिति के सदस्या मुरली जी , राधिकाजी

केन्द्रीय निदेशालय  के    निदेशक  अश्विनी कुमार  जी ,
सहायक निदेशक
 गांधारी पांके जी, , मार्गदर्शक  त्रिदेव   डाक्टर  श्यामसुंदर पांडे जी ,
प्रत्युष गुलेरी जी ,डाक्टर   राधाकृष्णन जी   आदि  का मार्ग   दर्शन  मिला.

शिबिर    की   यादें हमेशा  हरा रहेगा,

मैंने     कहा -- यह हरियाली  हमेशा हरी  रहेगी .
तब -गुलेरीजी  ने  कहा --  घरवाली ,
मैंने    कहा -
वसंत     वसंत   है    सदा ,
सताने    की  गर्मी  है कभी -कभी ,
वर्षा     है , शीतल  है, पतझड़  है ,
छह  ऋ तुओं  का चक्कर   है

सुनकर    पांडे  जी  ने   कहा ,
यह  तो   यह   कविता   बन   गयी.

इन   मधुर  स्मृतियों   के   साथ
चेन्नई   पहुंचा.  सधन्यवाद.