[02/10, 8:13 am] sanantha.50@gmail.com: शास्त्री जी,
लालबहादुर,
जय जवान जय किसान का नारा।
दोनों ही एक राष्ट्र के लिए प्रधान।
धन न तो जी सकते हैं।
धान न तो जीना दुश्वार।
देश के इतिहास में
भारत ही ऐसे देश हैं,
जिन पर मंगोल, मुगल, डच,पोर्चकीस, चीन,फ्राँस, अंग्रेज़, न जाने आक्रमण करते रहे, शासक भी बने।
ऐसी स्थिति में सैनिक बल और उनके चैन और निश्चिंत पहरा।
एक सुरक्षा और दूसरा
हर जीव की प्राकृतिक माँग।
जय जवान जय किसान।
कितनी दूरदर्शी नेता।
धन्य है लाल बहादुर शास्त्री।
[02/10, 8:16 am] sanantha.50@gmail.com: जय जवान, जय किसान
लालबहादुर शास्त्री जी—
भारत के इतिहास में
एक सरल, सादगीपूर्ण
और दूरदर्शी नेता।
उनका दिया नारा—
“जय जवान, जय किसान”
केवल दो शब्द नहीं,
राष्ट्र-जीवन के
दो मजबूत स्तंभ हैं।
जवान देश की सीमा पर
जागकर पहरा देता है,
तभी देश का नागरिक
चैन और निश्चिंतता से सोता है।
किसान धरती पर पसीना बहाकर
अन्न उपजाता है,
तभी हर जीव की
प्राकृतिक आवश्यकता—
भोजन—पूरी होती है।
धन आवश्यक है,
पर धन से जीवन नहीं चलता;
अन्न के बिना
जीना ही दुश्वार है।
भारत के इतिहास में
न जाने कितने आक्रमण हुए—
मंगोल, मुगल, पुर्तगाली, डच,
फ्रांसीसी और अंग्रेज़ आए;
पड़ोसी देशों से भी
संघर्ष होते रहे।
ऐसी परिस्थितियों में
देश की सीमाओं की सुरक्षा
और देशवासियों के लिए अन्न—
दोनों समान रूप से प्रधान हैं।
एक देता है सुरक्षा,
दूसरा देता है जीवन।
इसी सत्य को पहचानकर
लालबहादुर शास्त्री जी ने कहा—
**जय जवान!
जय किसान!**
कितनी सरल वाणी,
कितनी गहरी सोच,
कितनी दूरदर्शिता!
धन्य हैं लालबहादुर शास्त्री जी।
धन्य है उनका राष्ट्र-चिंतन।
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