पितृपक्ष — कृतज्ञता का पर्व
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
2-10-2026
पितृपक्ष आया,
पितरों को याद कराया,
जिनके कारण
हमने यह जीवन पाया।
माँ-बाप ने पाला,
पूर्वजों ने सँवारा,
उनके त्याग और संस्कारों ने
जीवन को उजियारा।
श्राद्ध हो या तर्पण,
पिंडदान हो या प्रार्थना,
रूप भले अलग-अलग हों,
भाव एक—
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता।
हिंदू पितृपक्ष मनाते हैं,
बौद्ध पूर्वजों को याद करते हैं,
ईसाई मृत आत्माओं के लिए
प्रार्थना करते हैं।
मुस्लिम दुआ करते हैं,
सदक़ा और नेक कर्म करते हैं,
सिख गुरु-वाणी और सेवा से
ईश्वर को स्मरण करते हैं।
धर्मों की राहें अलग सही,
मानव हृदय तो एक है;
पूर्वजों के प्रति श्रद्धा
मानवता का नेक संदेश है।
जिसने हमें जन्म दिया,
जिसने हमें ज्ञान दिया,
जिसने अपना सुख त्यागकर
हमारा जीवन सँवार दिया—
उसे भूलकर
हम कैसे सुखी रहें?
पितृपक्ष केवल
एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,
यह अपनी जड़ों को याद करने का
एक पवित्र अवसर है।
आज हम पूर्वजों को याद करें,
कल हमारी संतान
हमें याद करेगी।
जीवन क्षणभंगुर है,
पर संस्कार अमर होते हैं।
मनुष्य चला जाता है,
उसके उपकार रह जाते हैं।
पितरों को नमन,
माता-पिता को नमन,
समस्त पूर्वजों को नमन।
कृतज्ञता ही सच्चा श्राद्ध,
सद्कर्म ही सच्चा तर्पण,
और मानव-सेवा ही
सबसे सुंदर श्रद्धांजलि।
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