[14/09, 10:13 pm] sanantha.50@gmail.com: परोपकार का दीप
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।
15-9-26.
वृक्ष कबहूँ न फल है,
नदी न संचै नीर।
परोपकार के कारणे साधुने धरा शरीर।।
कबीर के यह दोहे
समझाता है कि
वृक्ष और नदी के समान मानव को अपने लिए धन न जोड़कर
दूसरों के लिए काम आना चाहिए।
परोपकार के लिए ही
साधु लोग इस जग में
जन्म लेते हैं।
धनी का मतलब है,
दान करना,
दीन दुखियों की सेवा करना।
शिक्षा और चिकित्सा के लिए पाठशाला खोलना।
शिक्षितों का फ़र्ज़ है,
अशिक्षितों को
शिक्षा देना।
वीरों का कर्तव्य है
देश की सुरक्षा।
जन्म मरण निश्चित है।
ब्रह्मचर्य जीवन में शिक्षा काल 20-25.
गृहस्थ जीवन 26-60.
वृद्धावस्था साठ के बाद।
जिंदगी कमाने परोपकार करने
34साल ही।
इतने में जितना हो सके, पुण्य कार्य ,
दूसरों की मदद करनी चाहिए।
वही मनुष्य है जो दूसरों के लिए जीता है और मरता है।
तमिऴ कवि वळ्ळुवर ने कहा है,
दूसरों को मदद करनेवाले और देनेवालों के कारण ही
अग जग स्थिर है।
[14/09, 10:13 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती
परोपकार का दीप
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई — हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
15-9-26
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वृक्ष कभी फल नहीं खाते,
नदी न संचय नीर।
परोपकार के कारण ही,
साधु ने धरा शरीर॥
कबीर के इस दोहे का
संदेश हमें समझाता है—
वृक्ष और नदी के समान
मानव को भी अपने लिए
धन का संचय न करके,
दूसरों के काम आना चाहिए।
परोपकार के लिए ही
साधुजन इस जग में
जन्म लेते हैं।
धनवान होने का अर्थ केवल
धन का संग्रह करना नहीं,
बल्कि दान करना,
दीन-दुखियों की सेवा करना
और जरूरतमंदों की सहायता करना है।
शिक्षा और चिकित्सा के लिए
विद्यालय और चिकित्सालय खोलना,
अशिक्षितों को शिक्षा देना—
यह शिक्षितों का कर्तव्य है।
वीरों का कर्तव्य है
देश की रक्षा करना।
जिसके पास जो सामर्थ्य है,
उसे उसी के द्वारा
समाज और देश की सेवा करनी चाहिए।
जन्म और मरण निश्चित है।
मानव जीवन के विभिन्न चरण हैं—
ब्रह्मचर्य में शिक्षा का काल,
गृहस्थ जीवन में कर्म का काल,
और साठ वर्ष के बाद
वानप्रस्थ तथा वृद्धावस्था का काल।
जीवन में कमाने और
परोपकार करने के लिए
जो समय मिलता है,
वह बहुत सीमित है।
इस सीमित जीवन में
जितना संभव हो,
पुण्य कार्य करने चाहिए
और दूसरों की सहायता करनी चाहिए।
वही सच्चा मनुष्य है,
जो दूसरों के लिए जीता है
और दूसरों के लिए मरता है।
तमिल कवि तिरुवल्लुवर ने भी कहा है—
दूसरों को देने वाले
और दूसरों की सहायता करने वाले
मनुष्यों के कारण ही
यह संसार स्थिर और सुचारु रूप से चलता है।
परोपकार का दीप जलाएँ,
अपने जीवन को सार्थक बनाएँ।