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Saturday, October 3, 2026

शास्त्री और गाँधीजीज्ञ

 [02/10, 8:16 am] sanantha.50@gmail.com: जय जवान, जय किसान

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।


लालबहादुर शास्त्री जी—

भारत के इतिहास में

एक सरल, सादगीपूर्ण

और दूरदर्शी नेता।


उनका दिया नारा—

“जय जवान, जय किसान”

केवल दो शब्द नहीं,

राष्ट्र-जीवन के

दो मजबूत स्तंभ हैं।


जवान देश की सीमा पर

जागकर पहरा देता है,

तभी देश का नागरिक

चैन और निश्चिंतता से सोता है।


किसान धरती पर पसीना बहाकर

अन्न उपजाता है,

तभी हर जीव की

प्राकृतिक आवश्यकता—

भोजन—पूरी होती है।


धन आवश्यक है,

पर धन से जीवन नहीं चलता;

अन्न के बिना

जीना ही दुश्वार है।


भारत के इतिहास में

न जाने कितने आक्रमण हुए—

मंगोल, मुगल, पुर्तगाली, डच,

फ्रांसीसी और अंग्रेज़ आए;

पड़ोसी देशों से भी

संघर्ष होते रहे।


ऐसी परिस्थितियों में

देश की सीमाओं की सुरक्षा

और देशवासियों के लिए अन्न—

दोनों समान रूप से प्रधान हैं।


एक देता है सुरक्षा,

दूसरा देता है जीवन।


इसी सत्य को पहचानकर

लालबहादुर शास्त्री जी ने कहा—


**जय जवान!


जय किसान!**


कितनी सरल वाणी,

कितनी गहरी सोच,

कितनी दूरदर्शिता!


धन्य हैं लालबहादुर शास्त्री जी।

धन्य है उनका राष्ट्र-चिंतन।

[02/10, 8:43 am] sanantha.50@gmail.com: धन्य महात्मा गांधी


राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी जी—

यही है उनका व्यक्तिवाचक नाम।


उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को

जन-जन का आंदोलन बना दिया।

नरम दल के प्रमुख नेताओं में

उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


सत्य और अहिंसा,

सत्याग्रह और उपवास—

यही उनके प्रमुख अस्त्र-शस्त्र थे।


उनकी प्रेरणा से

स्वतंत्रता संग्राम को

एक नई दिशा और

जनसामान्य की व्यापक भागीदारी मिली।


धन्य हैं महात्मा गांधी!


उनकी दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष

हिंदी के प्रचार और प्रसार से भी जुड़ा था।


भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में

एक ऐसी संपर्क भाषा की आवश्यकता को

उन्होंने अनुभव किया,

जो विभिन्न प्रदेशों के लोगों को

आपस में जोड़ सके।


इसी भावना से

सन् 1918 में मद्रास में

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा

की स्थापना उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से हुई।


दक्षिण भारत में हिंदी सीखने और

हिंदी प्रचार के लिए इस संस्था ने

लंबे समय तक महत्वपूर्ण कार्य किया।


गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों में

हिंदी-प्रचार भी प्रमुख रहा।


उनकी कल्पना में

भाषा केवल भाषा नहीं थी—

वह जन-जन को जोड़ने का माध्यम थी।


एक संपर्क भाषा,

राष्ट्र की एकता की भावना,

और भारत की अपनी भाषाओं के प्रति सम्मान—

इन सबको साथ लेकर चलना

उनकी दूरदर्शी सोच का हिस्सा था।


आज भी उनके हिंदी संबंधी विचारों पर

विचार करना प्रासंगिक है।


धन्य मोहनदास करमचंद गांधी जी!


धन्य महात्मा गांधी जी!

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