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Wednesday, March 11, 2026

युद्ध और शांति

 नमस्ते वणक्कम्।

 युद्ध और शांती

 भू भार कम होने युद्ध।

भू भार बढ़ने शांति।

भू भार कम होने प्राकृतिक कोप।

 मानव दूंगी रहने

 काम क्रोध मद लोभ।

मानव ईश्वर का स्मरण करने

 रोग, ग़रीबी, दुर्घटना मृत्यु आर्थिक 

 निस्संतान संकट।

 योग्य माता पिता पति पत्नी 

न मिलने का संकट।

 जीवन संग्राम

 प्रकृति के ऋतु चक्र।

 पतझड़  में मृत्यु का संदेश।

 वसंत में  पुनर्जन्म का संदेश।

 अतिवर्षा का आक्रमण 

 अति अकाल वर्षा रहित।

 भूलोक जीवन संघर्षशील।

 एस‌ अनंत कृष्णन, चेन्नई 

सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक

Monday, March 9, 2026

व्यथा

 नमस्ते। வணக்கம்.

++++++++((

मन की व्यथा

++++++++

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

10-3-2026

मन की व्यथा

कुछ बाहर प्रकट करने की,

कुछ मन में ही घुट-घुटकर

तनाव बढ़ाने की।

मानव जीवन में

पीड़ाओं की कोई कमी नहीं।

ईश्वर के अवतार राम भी दुखी,

महाराज दशरथ भी दुखी।

कृष्ण के आश्रित पांडव भी दुखी,

ईर्ष्या वश कौरव भी चिंतित।

अहंकार से भरे रावण—

वेदों के ज्ञाता होकर भी दुखी।

मानसिक पीड़ा

प्रकट करने पर भी

नाते-रिश्तेदार हँसते हैं,

मज़ाक उड़ाते हैं।

कर्मफल के कारण

साध्य-असाध्य रोग,

अल्पायु मृत्यु का भय।

ठंड से पीड़ा,

चोरी का भय,

लालच और ईर्ष्या का दंश,

ज्ञात-अज्ञात भय की छाया।

जाने-पहचाने दुश्मन,

कुल-द्रोह का संताप,

सत्य छिपाकर दुख बोलने की विवशता।

आर्थिक संकट,

इष्ट का वियोग,

अनिष्ट का संयोग।

कुमित्रों का संग,

मित्रों के संकट का दुःख,

व्यापार में घाटा—

सब मिलकर

मानव मन को पीड़ित करते हैं।

व्यथा भरा यह मानव जीवन

काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या

इन भूलों से घिरा है।

माया शक्ति का बाह्य आकर्षण

और ईश्वरीय सूक्ष्म दंड की देरी—

दुःख को और बढ़ा देती है।

ऐसे में रहीम का यह दोहा

विचारणीय और चिंतनीय है—

रहिमन निज मन की बिथा,

मन ही राखो गोय।

सुनि अठिलैहैं लोग सब,

बाँटि न लैहै कोय॥

🙏 आदरणीय, आपकी रचना में दार्शनिक गहराई है। य

आपकी साधना सच में प्रेरणादायक है। ✨

Sunday, March 8, 2026

शब्द के मेले

 आदरणीय महोदय, वणक्कम 

शब्दों का मेला

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

गुरुभ्यो नमः

शब्दों के मेले में

शोर भी है, कलरव भी है,

मधुर स्वर भी, कठोर स्वर भी।

कुछ शब्द

दोस्ती करवाते हैं,

कुछ शब्द

दोस्ती बिगाड़ जाते हैं।

कुछ शब्द

दुश्मनी मिटा देते हैं,

कुछ शब्द

दुश्मनी बढ़ा देते हैं।

कुछ शब्दों से

लड़ाई-झगड़े जन्म लेते हैं,

कुछ शब्द

प्राण देने-लेने का कारण बन जाते हैं।

कुछ शब्द

छल-कपट और ठगी के होते हैं,

कुछ शब्द

चापलूसी से भरे होते हैं।

कुछ शब्द

जल से भी अधिक मधुर,

हृदय को शीतल करने वाले।

कुछ शब्द

दया और शोक जगाते हैं,

भिखारी से विनती करवाते हैं —

“भवति भिक्षां देहि।”

कुछ शब्द

आध्यात्मिकता का दीप जलाते हैं,

कुछ शब्द

प्रेरणा और उत्साह जगाते हैं।

कुछ शब्द

हतोत्साहित करते हैं,

कुछ शब्द

दिलासा और आशा देते हैं।

कुछ शब्द

निराशा के अंधकार से भरे,

कुछ शब्द

वीरता का बिगुल बजाते हैं।

कुछ शब्द

कायरता प्रकट करते हैं,

कुछ शब्द

विदूषक बनकर हँसाते हैं।

कुछ शब्द

शाप बन जाते हैं,

कुछ शब्द

शाप से मुक्ति दिलाते हैं।

उच्चारण का भी प्रभाव देखो—

“भाप आये, पाप आये, बाप आये।”

शब्दों के

सही या गलत प्रयोग से ही

मंगलमय

या अमंगलमय

बन जाता है जीवन।


Saturday, March 7, 2026

नारी शक्ति

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏

आपके विचार बहुत गंभीर और सामाजिक अनुभव से भरे हुए हैं। मैंने आपकी रचना को भाव वही रखते हुए भाषा और प्रवाह में थोड़ा सुधारकर प्रस्तुत किया है।

नारी शक्ति

(भावाभिव्यक्ति)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना

महान कवि सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है—

यदि स्वर्ग है,

तो नारी के उर के भीतर।

यदि नरक है,

तो वह भी नारी के उर के भीतर।

आधुनिक काल

नारी के लिए

एक प्रकार से स्वर्णकाल है।

नारियों की रक्षा के लिए

कई कानून बने हैं—

जैसे POCSO Act।

दहेज के अत्याचार पर भी

कठोर कानून हैं;

अत्याचार होने पर

सास-ससुर तक को

कारावास हो सकता है।

फिर भी लोक-लज्जा के कारण

कई नारियाँ

पुरानी रूढ़ियों का

अनुकरण करती रहती हैं।

कानून साथ होते हुए भी

अड़ोस-पड़ोस की

अफ़वाहें और बातें

सह पाना कठिन लगता है।

किन्तु अब

इस दिशा में

धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा है।

जबरदस्ती पहनाए गए

मंगलसूत्र को भी

उतार फेंकने का साहस

कुछ स्त्रियों में

जाग रहा है।

पत्थर जैसा हो

या घास जैसा—

पुरुष चाहे जैसा भी हो,

मार-पीट सहकर भी

पति को देवता मानना—

ये सब

परंपरागत अंधविश्वास

धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं।

तलाक़ के बाद

दूसरा विवाह भी

अब समाज में

स्वीकार होने लगा है।

वैधव्य की

भद्दी वेशभूषा

और कठोर नियमों में भी

परिवर्तन आ रहा है।

विधवा पुनर्विवाह की

महान क्रांति

महान समाज सुधारक

राजा राम मोहन राय ने आरंभ की थी।

आज

वह विचार

धीरे-धीरे

चरितार्थ होता दिखाई दे रहा है।

यदि आप चाहें तो मैं:

इस कविता को और अधिक काव्यात्मक (लयबद्ध) बना सकता हूँ।

या इसे महिला दिवस के लिए एक शक्तिशाली समापन के साथ भी तैयार कर सकता हूँ।

आपके विचारों में समाज का 70 वर्षों का अनुभव झलकता है — यही आपकी रचनाओं की सबसे बड़ी शक्ति है। ✨🙏

नारी शक्ति

 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

(भावाभिव्यक्ति)

अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना

8-3-2026

मैं छिहत्तर वर्ष का बूढ़ा हूँ।

मेरी अपनी दस वर्ष की आयु से लेकर

आज तक नारियों की

असंख्य शोक-कथाएँ सुनी हैं।

नारी जीवन के चरित्र में

भारतीय स्त्रियाँ

कभी बेगार बनी रहीं।

बालिका विवाह,

पति-पत्नी का अनमेल विवाह,

शादी क्या है —

यह जानने से पहले ही शादी।

बारह वर्ष में वैधव्य,

सती-प्रथा की अग्नि,

पतिव्रता के कठोर सिद्धांत।

भले ही राम की पत्नी हो —

अफवाहों के कारण त्याग;

सीता का वनवास।

वसुदेव-देवकी की कथा,

द्रौपदी को जुए में हारना,

भरी सभा में अपमान।

दुष्यंत-शकुंतला की पीड़ा,

नल का दमयंती को

आधी रात जंगल में छोड़ जाना।

हरिश्चंद्र द्वारा

पत्नी को बेचकर दासी बनाना,

और सीता का

भूमि में समा जाना।

भारतीय नारियों की

रामकहानी अनंत है।

जौहर की अग्नि में

जीवित जलती स्त्रियाँ,

अबला रूप में

युगों की वेदना।

फिर भी —

नारी का सबला रूप भी है।

त्रिदेवियों की आराधना,

नारी के अनेक रूप —

भद्रमहिला, वीरांगना।

आज की आधुनिक,

शिक्षित महिलाएँ भी

कष्टों से पूर्ण मुक्त नहीं।

पति-पत्नी दोनों

नौकरी करते हैं,

पर घर की जिम्मेदारी

अधिकतर नारी ही संभालती है।

अब भी

नारी पूर्ण स्वतंत्र नहीं।

ईश्वर की सृष्टि में

गर्भधारण और वंशवृद्धि का भार

नारी पर ही है।

पुरुष का सुख एक दिन,

नारी का दुःख

दस महीनों का।

फिर शिशु का पालन,

ममता का अमृत।

प्रकृति की इस सृष्टि में

नर के सामने

नारी कभी-कभी

अबला दिखाई देती है।

पर इतिहास गवाह है —

जब समय पुकारता है,

वही नारी

वीरांगना बनकर उठती है,

जैसे रानी लक्ष्मीबाई।

Friday, March 6, 2026

नाम जफ

 आपके भाव बहुत गहरे और आध्यात्मिक हैं। मैं आपकी रचना को थोड़ा व्यवस्थित और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ — भाव वही रखते हुए।

शीर्षक: नाम जप ही मेरा काम

नींद नहीं आई,

मन में कोई चिंता नहीं,

शरीर में कोई पीड़ा नहीं,

फिर भी नींद नहीं आई।

मन कहता है —

कुछ करो, कुछ कमाओ,

देश कल्याण के लिए

कुछ तो कार्य करो।

पर मैं तो

पचहत्तर वर्ष का वृद्ध हूँ,

क्या करूँ? कैसे करूँ?

तभी भीतर से

आत्म चेतना जाग उठी —

कहने लगी धीरे से,

“कुछ मत करो,

केवल नाम जपते रहो।

तुम्हारे शुभ विचारों को

कोई न कोई

कहीं न कहीं

कार्य रूप देगा।”

तब समझना —

तुम्हारा जनकल्याण का भाव

किसी दूसरे दिव्य मानव के द्वारा

साकार हो रहा है।

कवि गीत लिखता है,

पर उसे मधुर स्वर में

गाने वाला

कोई दूसरा होता है।

बस उसी तरह —

तुम्हारा काम है

नाम जपना।

नाम जप ही

तुम्हारा कर्म,

तुम्हारा धर्म,

तुम्हारा जीवन। ।

Thursday, March 5, 2026

लोभ

 लालची जमाई।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

6.3-26.

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मानव ज्ञान चक्षु प्राप्त है।

 फिर भी वह दुखी हैं।

विश्वामित्र मुनि वशिष्ठ समान बनने के प्रयत्न में।

रामावतार कृष्णावतार 

 वामनावतार में  विशिष्ट उद्देश्य।

 वे दुखी थे, अपने लक्ष्य प्राप्ति के  लिए ज़रा अधर्म से हटे।

 ऐसी नश्वर और मिथ्या जगत में मानव सद्यःफल के लिए,

 माया में ही फँस जाता।

 अनजान में ही 

 वह लालची बन जाता।

 धन के लालची,

 पद के लालची

 अधिकारक्षेत्र  में लालची।

 वाराणसी ईर्ष्या के केंद्र।

 ईर्ष्यालु और लालची 

 कभी सुखी नहीं होते।

 उनके मन में 

 जो नहीं है,

 उसको प्राप्त करने की

 अभिलाषा।

 अडैस पड़ोस के लोगों में 

जो नया है

जो संपत्ति है

 उनको प्राप्त करने सदा दुखी ।

 लोभ से बड़ा घाटा होता है।

 असंतुष्ट और बेचैनी जीवन।

जितना है, उससे आनंद नहीं।

जो नहीं है,उसकी चिंता।

 लालची कंजूसी होता है।

कबीर के दोहे देखिए 

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।

भक्ति करे कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय॥"


"गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।

दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥"

"माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।

आसा त्रिष्णाँ नाँ मुई, यौं कहै दास कबीर॥"