Search This Blog

Saturday, July 4, 2026

समय और कर्म

 समय और कर्म

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

6-7-26

------++-++++++

कर्म ईश्वरीय सृष्टियों में 

 एक समान नहीं।

 आहार विषय में,

 आकार विषय में 

 स्वास्थ्य विचार में 

 बुद्धि लब्धि में 

 अलग अलग।

धन ,तन,मन

में भी भिन्न-भिन्न।

 पानी में भी भिन्नता।

 अतः सभ्यता असभ्यता के कर्म  ,कृषि में पोशाक में, खाद्यान्न में भी फर्क।

अतः सद्कर्म बद्कर्म  सत्संग बद्संग का फल।

अनपढ़ कबीर का ज्ञान 

वाणी का डिक्टेटर बनना

 सत्संग का फल।

 मंगत मिश्र के तोते का

 वेद मंत्र बोलना,

 डाकू के तोते का 

 पकड़ो,मारो,लूटो कहना

 सत्संग और बदचलन का संग।

 अतः कर्म में फ़र्क।

 समय 

 समय तो सब के लिए बराबर।

 राजा हो या रंक

 समय तो किसी की परवाह नहीं करता।

 

संत कबीर का यह प्रसिद्ध दोहा 

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।पल में प्रलय होएगी,

 बहुरि करेगा कब।।

 समय को खोना,

मरण समान।

  कर्म  समय पर न 

करने पर 

पछताना पड़ेगा।

 समय का घाटा भरना

ईश्वर से भी असंभव।

 

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।

अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

 सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी प्रेमी सेवक अनुवादक 

 



 

 

 


 

 



 


 




अंग्रेज़ी

 अंग्रेज़ी स्कूल न तो हम कमा नहीं सकते।

 हिंदी  या तमिल दरिद्रता है, भाषा माधुर्य  ही  प्रधानता हो तो संस्कृत क्यों मृत भाषा।

 अंग्रेज़ी क्यों जन प्रिय भाषा।

 धन धन धन

 बाद में ही धर्म।

‌धन न तो मंदिर नहीं,

 ईश्वर के सिर पर हीरे का मुकुट नहीं।

 ऊँचे ऊँचे गोपुरम नहीं,

 धन के सामने धर्म नहीं।

सत्य नहीं, अहिंसा नहीं 

 शिक्षितों में ईमानदारी नहीं। 

 न्यायाधीश में न्याय नहीं,

  ऐसी हालत में भाषा किस खेत की मूली।

 हजारों भाषाओं का लापता। 

 अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल और जीविकोपार्जन न तो  भारतीय भाषाओं का अंत ज़रूर।

भक्ति

 भक्ति भारतीय भक्ति,

 याद रखिए,

 समझिए 

 समझाइए

 सनातन धर्म है,

 मजहब नहीं।

 मत-मतांतर 

अद्वैत द्वैत 

विशिष्टाद्वैत नहीं,

वह हवा है, तटस्थ हैं

 मानवता के आधार पर है।समदर्शी है,

व ओवर चढ़

Friday, July 3, 2026




 नव नारी कुंजर

பாரத நாட்டு சனாதன தர்மம்

மனித வாழ்க்கையின் துன்பங்கள் இன்பங்கள்

ஆகியவற்றை

சிற்பங்கள் மூலம் கதைகளாக விளக்கி

மனதை ஆன்மாவில் ஒன்று படுத்தி

ஆனந்தமாக வாழ வழிகாட்டுகிறது.

அவ்வாறு சிற்பக்கலையில் பல கதைகள்

வழிகாட்டி மனதை அடக்கி

ஆன்மீக வழியில் எடுத்துச் செல்கிறது.

அவ்வாறான ஒரு சிற்பமே

நவநாரி குஞ்சரம்.

நலம் என்றால் ஒன்பது.

ஒன்பது பெண் களைக் கொண்ட யானை சிற்பம்.

சிவனின் மாயா தேவி வடிவம் பெண்கள்.

மனித வாழ்வின் இன்பங்கள் துன்பங்கள்

அனைத்து மாயா தேவி பெண் உருவமாக படைத்துள்ளார்.

அதனால் ஆன்மீக வழி காட்டுவோர்

பெண்ணாசை மின்னி ஆன்மீக பக்தி வழியில் செல்ல வேண்டும்.

அதற்கு பாரத சனாதன தர்ம

ஆசாரியர்கள்

பிரம்மச்சாரிகளாக வாழ்ந்தனர்.

புத்தர் மகாவீரர்

ஆதி சங்கரர்

விவேகானந்தர்

அனைவரும் துறவிகள்.

ஆனால் அனைவரும் துறவிகள் ஸ்ல ஆக வேண்டும் என எந்த மதமும் கூறவில்லை.

கிறிஸ்தவ மதத்தில் பாதரியார்

கன்னியாஸ்திரிகள் திருமணவாழ்க்கை ஏற்பதில்லை.

மக்களை நல்வழிப்படுத்த

பெண் மண் பொன் ஆசையில் இருந்து

மனதைக் கட்டுப்படுத்த

புலனடக்கம் தேவை என்பதை வலியுறுத்தினர்.

இப்பொழுது நவநாரி குஞ்சரம்

என்றால்

வாழ்க்கை நவரச மனோபாவங்களால் ஆனது.

இதில் சிருங்கார ரசம் என்பது ஆண் பெண் காதலுக்கு முக்கியத்துவம் அளிப்பது.

இதில் கட்டுப்பாடு தேவை.

இது தான் பூலோக வாழ்க்கை யின்

இன்றைய துன்பங்கள் போட்டி பொறாமை பேராசை காமம்

ஆகியவை உள்ளடக்கியது.

இதனால் ஏற்படும் ரசங்கள் தான் கருணை

பயம்

வீரம்

குரோதம் ஆச்சரியம்

வெறுப்பு

இன்னல்.

இந்த நவரசங்களுக்கு

ஆதாரமாக இருப்பது பெண்கள்.

இந்த நவநாரிகள் கொண்ட யானை சிற்பம் ஏன் என்றால் யானை நிதானத்துடன் செயல் படும் குணம் கொண்டது.

அதிக நினைவாற்றல் அறிவு மிக்கது.

கூட்டமாக வாழும் சமூக உணர்வு.

வலிமை.

தன் மாவுத்தனுக்கு கட்டுப்பட்டது.

வளர்ப்பு மிருகம்..

இந்த அனைத்து குணங்கள் கொண்டவர்கள்

பெண்கள்.

ஆவதும் பெண்ணாலே அழிவதும் பெண்ணாலே.

ஆகையால் நவரசங்கள் தரும் பெண்கள்

அந்த சிற்பம் காணும் ஆண்கள்

யானை போல்

நிதானமாக செயல் படவேண்டும்.


பழநி சே.அனந்தகிருஷ்ணன்,ஓய்வு பெற்ற தலைமை ஆசிரியர், ஹிந்து மேல் நிலைப் பள்ளி,திருவல்லிக்கேணி,சென்னை

प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस

 प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस।


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-7-26

++++++++++++

नमस्ते वणक्कम् 

++++++++++++

मानव जीवन वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण 

 मानव की तबीयत 

स्वास्थ्य में 

कमी होती  रहती है।

 दिन ब दिन वह यंत्र के गुलाम होता रहता है।

  संगणिक और मोबाइल के कारण 

उसकी स्मरण शक्ति 

कम होती रहती है।

 अंग्रेज़ी माध्यम और स्कूल वेन के कारण 

 बचपन से पैदल 

चला नहीं करते।

 स्वास्थ्य की वृद्धि

 भी जिम जैसे कृत्रिम व्यवहार ही प्रधान।

 वैसे ही मानव के लिए 

हानिकारक है प्लास्टिक ‌

प्लास्टिक युग है

 बगैर प्लास्टिक के

चलना फिरना मुश्किल।

प्लास्टिक को इधर उधर फेंका करने से

 नाले में समुद्र में 

नदियों की धारा में 

 फेंकने से  

धारा की गति

 मंद हो जाती।

 बाढ को रोकने से

 पानी के बहाव का मार्ग 

बदल जाता है।

 पशु, पक्षी , मछलियाँ

 प्लास्टिक के खाने से

 उनके प्राण खतरे हो जाते हैं।

 उपजाऊ भूमि में 

 गाढ़े जाने से वनस्पति के पलने में,

 भूतल पानी 

जड चूसने से  

हानियाँ ही हानियाँ।

इनसे मुक्ति पाने के लिए 

प्लास्टिक थैलियाँ,

प्लास्टिक बोतल,

 आदि के बदले

 जूट की थैलियां,

कागज़ की थैलियां

 रूई की थैलियाँ,

 काँच , मिट्टी,ताम्र के बर्तन का  उपयोग करना चाहिए।

 गणेश चतुर्थी की गणेश की मूर्तियाँ  रसायनिक मिश्रण से नहीं,

 चिक्नी मिट्टी से

 बनानी चाहिए।

 उसमें कृत्रिम रसायनिक रंग चढ़ाना  हानिकारक है।

 रसायनिक मिश्रित मूर्तियों को समुद्र नदी झील में फेंकना

 जल जीवों के विनाश के कारण होते हैं।

यथाशक्ति तथा संभव 

 प्लास्टिक का उपयोग 

रोकना ही जनकल्याणकारी है।

++++++++++++++

 

आपकी रचना में विचार बहुत सार्थक हैं। मैंने भाषा को अधिक प्रवाहपूर्ण, काव्यात्मक और प्रभावशाली रूप दिया है, जबकि आपके मूल भाव और संदेश को यथावत रखा है।

:::writing{variant="document" id="56381"}

आज की चुनौती

प्लास्टिक मुक्त दिवस / प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 4-7-2026

नमस्ते। वणक्कम्।

मानव जीवन में

वैज्ञानिक आविष्कारों ने

सुविधाओं का विस्तार किया,

पर कहीं न कहीं

स्वास्थ्य और प्रकृति पर

उनका दुष्प्रभाव भी बढ़ा।

यंत्रों का बढ़ता आकर्षण,

संगणक और मोबाइल का उपयोग—

स्मरण-शक्ति को क्षीण करता है।

अंग्रेज़ी माध्यम,

स्कूल वैन की आदत,

बचपन से पैदल चलने की संस्कृति

धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

स्वास्थ्य के लिए

खुले मैदान कम,

जिम की कृत्रिम दुनिया अधिक

प्रधान बन गई है।

इसी प्रकार

प्लास्टिक भी

मानव और प्रकृति—दोनों के लिए

घातक सिद्ध हो रहा है।

आज का युग

प्लास्टिक का युग है,

पर इसके बिना जीवन कठिन होने का अर्थ

यह नहीं कि

हम इसका अंधाधुंध उपयोग करें।

जब प्लास्टिक

नालों, नदियों, झीलों और समुद्र में

फेंक दिया जाता है,

तो जलधाराएँ रुकती हैं,

पानी का स्वाभाविक प्रवाह बदल जाता है,

और बाढ़ जैसी आपदाएँ

विकराल रूप धारण कर लेती हैं।

पशु, पक्षी और मछलियाँ

भोजन समझकर प्लास्टिक निगल लेते हैं,

जिससे उनके प्राण संकट में पड़ जाते हैं।

भूमि में दबा प्लास्टिक

मिट्टी की उर्वरता घटाता है,

पौधों की जड़ों को प्रभावित करता है,

और भूजल तक को दूषित करता है।

इस संकट से मुक्ति के लिए

प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों के स्थान पर

जूट, कागज़ और सूती थैलियों का,

तथा काँच, मिट्टी और ताम्र के बर्तनों का

अधिकाधिक उपयोग करें।

गणेश चतुर्थी पर भी

रासायनिक पदार्थों से बनी मूर्तियों के स्थान पर

चिकनी मिट्टी की

पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाएँ स्थापित करें।

कृत्रिम रंगों से सजी मूर्तियाँ

जब जल में विसर्जित होती हैं,

तो जलजीवों और पर्यावरण को

गंभीर हानि पहुँचाती हैं।

आइए,

यथाशक्ति और यथासंभव

प्लास्टिक का उपयोग घटाएँ,

प्रकृति को बचाएँ,

और आने वाली पीढ़ियों को

स्वच्छ, स्वस्थ और सुंदर धरती का उपहार दें।

प्लास्टिक मुक्त भारत—

स्वस्थ भारत,

स्वच्छ भारत,

सुरक्षित भविष्य। :::

Thursday, July 2, 2026

न्याय की गूँज

 सत्य की गूँज।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई 

3-7-26.

+++++++++-

नमस्ते वणक्कम्।

  भारतीय सनातन वेद में 

  सत्य की गूँज यों

प्रकट करता है

सत्य मेव जयते।

 सत्य ही जीतता है,

असत्य की जीत,

 असत्य राजनैतिक समर्थन देश हित के लिए नहीं,

सत्य गूँजता है,

जब सत्य ज़ोर से

चीखता चिल्लाता है।

 पर सत्य की शोर उठने के पहले ही 

उसका गला घोंटा 

जाता है।

 कुंती ने कर्ण जन्म छिपाया,

 उसका बदनाम 

 शाश्वत।

 हरिश्चन्द्र के कष्ट अंत तक।

 कुरुक्षेत्र के युद्ध

‌सत्य के दबाने से

 एकलव्य की नाकामयाबी।

युद्ध कला के विरुद्ध 

जाँघ में मारने से दुर्योधन की मृत्यु।

सत्य के छिपाने से

 कर्म को शाप।

 छल से  भलें ही भगवान हो वामन अवतार लेकर 

 विराट क्षय अवतार लेना,

आजकल चुनाव में 

वोट के लिए नोट।

रुग्णावस्था में 

वृद्धों की इलाज में 

 वेंटिलेटर रखकर लूटना।

 न्यायालय  में 

अपराधियों के पक्ष में 

 वकील अपनी चालाकी 

तर्क से छुड़ाना,

 सी . ए. के द्वारा आयकर बचाने का सलाह।

ये सब चित्रपट ,

समाचार पत्र

 कहानी सब में गूँजता है,

पर बेकार।

 मृत्यु ही सत्य की गूँज

करोड़ पति हो या वस्त्र हीन भिखारी,

करोड़ों के भ्रष्टाचार नेता

रिश्वत खोर अधिकारी,

न्यायाधिपति हो

‌अन्यायाधि पति,

सब को तटस्थ दंड

 मृत्यु दंड।

 तभी सत्यधर्म गूँजता है।

+++++++++++





आज की चुनौती — सत्य की गूँज


सत्य की गूँजएस. अनंत कृष्णन, चेन्नई03-07-2026


नमस्ते! वणक्कम्।


भारतीय सनातन संस्कृति का उद्घोष है—"सत्यमेव जयते।"सत्य ही अंततः विजयी होता है,असत्य की विजयक्षणिक भ्रम मात्र होती है।


सत्य जब गूँजता है,तो अंतरात्मा को झकझोर देता है।किन्तु अक्सरउसकी गूँज उठने से पहले हीउसका गला घोंट दिया जाता है।


कुंती ने कर्ण का जन्म-रहस्य छिपाया,उसका परिणाम जीवनभर की पीड़ा बना।राजा हरिश्चन्द्र नेसत्य के लिएअंतिम क्षण तक कष्ट सहे।


कुरुक्षेत्र का महायुद्ध भीदबे हुए सत्य का परिणाम था।एकलव्य का त्याग,दुर्योधन का अंत,छल और नीति का संघर्ष—इतिहास आज भी प्रश्न करता है।


आज भी चुनावों में वोट के बदले नोट का खेल,

बीमार वृद्धों के उपचार के नाम पर लूट,

न्यायालयों में 

तर्क-कौशल से 

अपराधियों का बच निकलना,

और कर बचाने की युक्तियाँ—

समाचारों, 

कथाओं और चलचित्रों में प्रतिदिन गूँजती रहती हैं।


फिर भी एक सत्य अटल है—मृत्यु।


करोड़पति हो या निर्धन भिखारी,भ्रष्ट नेता हो या रिश्वतखोर अधिकारी,न्यायाधीश हो या सामान्य जन—मृत्यु सबको

एक समान न्याय देती है।


अंततः सत्य की गूँज समय के पार सुनाई देती है,

और वही मानव को सत्य धर्म का स्मरण कराती है।

Tuesday, June 30, 2026

जंगल में संवाद।

 जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

+++++++++++

 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

+++++++++++

 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



आज की चुनौती – जंगल में संवाद

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 30-06-2026

जंगल में संवाद

पहला पेड़ बोला—

हम शीतल छाया बिखराते हैं,

मीठे फल मानव को खिलाते हैं।

अपने तन की लकड़ी देकर,

जीवन का हर भार उठाते हैं।

दूसरा पेड़ मुस्काया—

प्राणवायु का दान हमारा,

धरती का श्रृंगार हमारा।

मिट्टी का कटाव रोककर,

हरियाली का संसार हमारा।

वन के पशु बोले—

हम तो वन की शान हैं,

प्रकृति की मधुर पहचान हैं।

फिर भी मानव लोभ में आकर,

करता हमारा अवसान है।

हिरन बोला—

कभी ऋषियों का पावन आसन,

आज बना हूँ शिकार का कारण।

निर्दोष होकर भी मैं सहता,

मानव का निष्ठुर आचरण।

सिंह गर्जा—

मेरी चाल की देता मिसाल,

मुझको कहता वन का काल।

पर साहस यदि सच में चाहिए,

छोड़ दे छल और हर जंजाल।

सियार हँसकर बोला—

अपनी चतुराई मुझ पर डाले,

दोष हमारे सिर पर टाले।

अपने छल को भूल स्वयं ही,

दर्पण से भी नज़रें टाले।

बाघ बोला—

मेरी फुर्ती, मेरी छलाँग,

बन जाती उसकी पहचान।

पर हिंसा का दोष भी अक्सर,

दे देता मेरे ही नाम।

हाथी बोला—

बल, धैर्य और बुद्धि मेरी,

कहते हैं सब अनुपम ढेरी।

काश! मानव भी सीख सके,

विनम्रता की राह सुनहरी।

खरगोश बोला—

मानव को पहचानना कठिन,

उसका मन है बड़ा गहन।

कभी देव समान दिखाई दे,

कभी बन जाए घोर शत्रुजन।

सिंह ने कहा—

सत्य यही है, मित्र हमारे,

मानव में हैं रूप हजार।

गुण-अवगुण का अद्भुत संगम,

वही रचता अपना संसार।

तभी सब पेड़ एक स्वर बोले—

हम तो देते प्रेम निरंतर,

बिना किसी प्रतिदान की चाह।

फिर भी भलाई के बदले बुराई,

क्यों चुनता मानव की राह?

संदेश

प्रकृति माँ का मान बढ़ाओ,

हर प्राणी से प्रेम निभाओ।

धरती तभी स्वर्ग बनेगी,

जब मानव मानव बन जाओ।