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Tuesday, July 14, 2026

गुरु-शिष्य

 

आज की चुनौती

गुरु–शिष्य




गुरु शिष्य 

एस. अनंतकृष्णन,चेन्नै, तमिलनाडु

15-7-26

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संत कबीर ने गुरु के महत्व को अपने दोहे में लिखा है,

गुरु  और भगवान दोनों एक साथ आने पर

गुरु के चरणों पर गिर पडूँगा,जिनके कारण ब्र्म दर्शन का मार्ग ज्ञात हुआ।


गुरु गोविंद दोऊँ खडे, काके लागै पाय।

बली हारी गुरु आपना,गोविंद दियो बताय।


गुरु केवल ज्ञान दाता नहीं,

चरित्र निर्माता।

ज्ञान शून्य मनुष्य को

ज्ञान देनेवाले गुरु।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् ।


मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।


अर्थात् ध्यान का मूल गुरु मूर्ति है,

एकलव्य ने गुरु के बुत के सामने तीर चलाने का अभ्यास किया।

द्रोण उनके मानसिक गुरु बने।

गुरु पूजनीय हैं, मंत्र का आधार गुरु वाक्य है। 

गुरु  की कृपा से ही मोक्ष मिलता है।

कबीर का मानसिक गुरु रामानंद।

भक्त प्रह्लाद नारद के उपदेश के कारण

नारायण नाम जप करके आदर्श भक्त बने।

श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्श शिष्य स्वामी विवेकानंद।

सत्संग, सद् ग्रंथ भी गुरु होते हैं।

ज्ञान तो जन्मजात प्रवृत्ति है,

शिष्य की बुद्धि लब्दी ईश्वरीय देन है।

स्वाध्याय से ज्ञान बनते हैं।

सिद्धार्थ को तपोबल से ज्ञान मिला।

शिष्य चार प्रकार के होते हैं।

प्रतिभाशाली छात्र.

औसत् बुद्धिवाले छात्र।

मंद बुद्धिवाले छात्र।

पुराने जमाने में आजकल के समान

सर्वशिक्षा अभियान नहीं।

गुरु  कठोर परीक्षा लेकर योग्य  शिष्य के चुनते हैं।


गुरु उपदेश और गुरु की दीक्षा का अपना महत्व हैं

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नै, तमिलनाडु
15-7-2026

संत कबीर ने अपने प्रसिद्ध दोहे में गुरु के महत्व का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।
 वे कहते हैं कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों,
तो पहले गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए,
क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।

गुरु गोविंद दोऊँ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय॥

गुरु केवल ज्ञानदाता ही नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माता भी होते हैं।
वे अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजामूलं गुरोः पदम्।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥

अर्थात् ध्यान का आधार गुरु की मूर्ति है,
पूजा का आधार गुरु के चरण हैं,
मंत्र का आधार गुरु का वचन है
और मोक्ष का आधार गुरु की कृपा है।

एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा के सामने अभ्यास करके
 अद्वितीय धनुर्धर बनने का प्रयास किया।
यद्यपि उन्हें प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं मिली, फिर भी द्रोणाचार्य उनके मानसिक गुरु रहे।

कबीर के आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामानंद थे।
भक्त प्रह्लाद ने देवर्षि नारद के उपदेश से नारायण-भक्ति का मार्ग अपनाया
और आदर्श भक्त बने।
श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्श शिष्य स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु के संदेश को विश्वभर में पहुँचाया।

सत्संग, सद्ग्रंथ और श्रेष्ठ विचार भी मनुष्य के गुरु बन सकते हैं।
ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता ईश्वर की देन है,
परंतु उसका विकास गुरु, स्वाध्याय और सतत अभ्यास से होता है।
गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) ने कठोर तप और आत्मचिंतन से ज्ञान प्राप्त किया।

शिष्य भी विभिन्न प्रकार के होते हैं—प्रतिभाशाली, औसत बुद्धि वाले तथा मंद बुद्धि वाले।
 प्राचीन गुरुकुलों में गुरु योग्य शिष्यों का चयन कठोर परीक्षा के बाद करते थे।
उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्या देना नहीं, बल्कि उत्तम चरित्र का निर्माण करना था।

अतः गुरु के उपदेश, गुरु की दीक्षा और गुरु का आशीर्वाद मानव जीवन की अमूल्य निधि हैं।
गुरु ही शिष्य के जीवन को ज्ञान, संस्कार और सदाचार से प्रकाशित करते हैं।

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