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Friday, July 3, 2026

प्लास्टिक बैग मुक्त दिवस

 प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस।


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-7-26

++++++++++++

नमस्ते वणक्कम् 

++++++++++++

मानव जीवन वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण 

 मानव की तबीयत 

स्वास्थ्य में 

कमी होती  रहती है।

 दिन ब दिन वह यंत्र के गुलाम होता रहता है।

  संगणिक और मोबाइल के कारण 

उसकी स्मरण शक्ति 

कम होती रहती है।

 अंग्रेज़ी माध्यम और स्कूल वेन के कारण 

 बचपन से पैदल 

चला नहीं करते।

 स्वास्थ्य की वृद्धि

 भी जिम जैसे कृत्रिम व्यवहार ही प्रधान।

 वैसे ही मानव के लिए 

हानिकारक है प्लास्टिक ‌

प्लास्टिक युग है

 बगैर प्लास्टिक के

चलना फिरना मुश्किल।

प्लास्टिक को इधर उधर फेंका करने से

 नाले में समुद्र में 

नदियों की धारा में 

 फेंकने से  

धारा की गति

 मंद हो जाती।

 बाढ को रोकने से

 पानी के बहाव का मार्ग 

बदल जाता है।

 पशु, पक्षी , मछलियाँ

 प्लास्टिक के खाने से

 उनके प्राण खतरे हो जाते हैं।

 उपजाऊ भूमि में 

 गाढ़े जाने से वनस्पति के पलने में,

 भूतल पानी 

जड चूसने से  

हानियाँ ही हानियाँ।

इनसे मुक्ति पाने के लिए 

प्लास्टिक थैलियाँ,

प्लास्टिक बोतल,

 आदि के बदले

 जूट की थैलियां,

कागज़ की थैलियां

 रूई की थैलियाँ,

 काँच , मिट्टी,ताम्र के बर्तन का  उपयोग करना चाहिए।

 गणेश चतुर्थी की गणेश की मूर्तियाँ  रसायनिक मिश्रण से नहीं,

 चिक्नी मिट्टी से

 बनानी चाहिए।

 उसमें कृत्रिम रसायनिक रंग चढ़ाना  हानिकारक है।

 रसायनिक मिश्रित मूर्तियों को समुद्र नदी झील में फेंकना

 जल जीवों के विनाश के कारण होते हैं।

यथाशक्ति तथा संभव 

 प्लास्टिक का उपयोग 

रोकना ही जनकल्याणकारी है।

++++++++++++++

 

आपकी रचना में विचार बहुत सार्थक हैं। मैंने भाषा को अधिक प्रवाहपूर्ण, काव्यात्मक और प्रभावशाली रूप दिया है, जबकि आपके मूल भाव और संदेश को यथावत रखा है।

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आज की चुनौती

प्लास्टिक मुक्त दिवस / प्लास्टिक बैग मुक्ति दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 4-7-2026

नमस्ते। वणक्कम्।

मानव जीवन में

वैज्ञानिक आविष्कारों ने

सुविधाओं का विस्तार किया,

पर कहीं न कहीं

स्वास्थ्य और प्रकृति पर

उनका दुष्प्रभाव भी बढ़ा।

यंत्रों का बढ़ता आकर्षण,

संगणक और मोबाइल का उपयोग—

स्मरण-शक्ति को क्षीण करता है।

अंग्रेज़ी माध्यम,

स्कूल वैन की आदत,

बचपन से पैदल चलने की संस्कृति

धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

स्वास्थ्य के लिए

खुले मैदान कम,

जिम की कृत्रिम दुनिया अधिक

प्रधान बन गई है।

इसी प्रकार

प्लास्टिक भी

मानव और प्रकृति—दोनों के लिए

घातक सिद्ध हो रहा है।

आज का युग

प्लास्टिक का युग है,

पर इसके बिना जीवन कठिन होने का अर्थ

यह नहीं कि

हम इसका अंधाधुंध उपयोग करें।

जब प्लास्टिक

नालों, नदियों, झीलों और समुद्र में

फेंक दिया जाता है,

तो जलधाराएँ रुकती हैं,

पानी का स्वाभाविक प्रवाह बदल जाता है,

और बाढ़ जैसी आपदाएँ

विकराल रूप धारण कर लेती हैं।

पशु, पक्षी और मछलियाँ

भोजन समझकर प्लास्टिक निगल लेते हैं,

जिससे उनके प्राण संकट में पड़ जाते हैं।

भूमि में दबा प्लास्टिक

मिट्टी की उर्वरता घटाता है,

पौधों की जड़ों को प्रभावित करता है,

और भूजल तक को दूषित करता है।

इस संकट से मुक्ति के लिए

प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों के स्थान पर

जूट, कागज़ और सूती थैलियों का,

तथा काँच, मिट्टी और ताम्र के बर्तनों का

अधिकाधिक उपयोग करें।

गणेश चतुर्थी पर भी

रासायनिक पदार्थों से बनी मूर्तियों के स्थान पर

चिकनी मिट्टी की

पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाएँ स्थापित करें।

कृत्रिम रंगों से सजी मूर्तियाँ

जब जल में विसर्जित होती हैं,

तो जलजीवों और पर्यावरण को

गंभीर हानि पहुँचाती हैं।

आइए,

यथाशक्ति और यथासंभव

प्लास्टिक का उपयोग घटाएँ,

प्रकृति को बचाएँ,

और आने वाली पीढ़ियों को

स्वच्छ, स्वस्थ और सुंदर धरती का उपहार दें।

प्लास्टिक मुक्त भारत—

स्वस्थ भारत,

स्वच्छ भारत,

सुरक्षित भविष्य। :::

Thursday, July 2, 2026

न्याय की गूँज

 सत्य की गूँज।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई 

3-7-26.

+++++++++-

नमस्ते वणक्कम्।

  भारतीय सनातन वेद में 

  सत्य की गूँज यों

प्रकट करता है

सत्य मेव जयते।

 सत्य ही जीतता है,

असत्य की जीत,

 असत्य राजनैतिक समर्थन देश हित के लिए नहीं,

सत्य गूँजता है,

जब सत्य ज़ोर से

चीखता चिल्लाता है।

 पर सत्य की शोर उठने के पहले ही 

उसका गला घोंटा 

जाता है।

 कुंती ने कर्ण जन्म छिपाया,

 उसका बदनाम 

 शाश्वत।

 हरिश्चन्द्र के कष्ट अंत तक।

 कुरुक्षेत्र के युद्ध

‌सत्य के दबाने से

 एकलव्य की नाकामयाबी।

युद्ध कला के विरुद्ध 

जाँघ में मारने से दुर्योधन की मृत्यु।

सत्य के छिपाने से

 कर्म को शाप।

 छल से  भलें ही भगवान हो वामन अवतार लेकर 

 विराट क्षय अवतार लेना,

आजकल चुनाव में 

वोट के लिए नोट।

रुग्णावस्था में 

वृद्धों की इलाज में 

 वेंटिलेटर रखकर लूटना।

 न्यायालय  में 

अपराधियों के पक्ष में 

 वकील अपनी चालाकी 

तर्क से छुड़ाना,

 सी . ए. के द्वारा आयकर बचाने का सलाह।

ये सब चित्रपट ,

समाचार पत्र

 कहानी सब में गूँजता है,

पर बेकार।

 मृत्यु ही सत्य की गूँज

करोड़ पति हो या वस्त्र हीन भिखारी,

करोड़ों के भ्रष्टाचार नेता

रिश्वत खोर अधिकारी,

न्यायाधिपति हो

‌अन्यायाधि पति,

सब को तटस्थ दंड

 मृत्यु दंड।

 तभी सत्यधर्म गूँजता है।

+++++++++++





आज की चुनौती — सत्य की गूँज


सत्य की गूँजएस. अनंत कृष्णन, चेन्नई03-07-2026


नमस्ते! वणक्कम्।


भारतीय सनातन संस्कृति का उद्घोष है—"सत्यमेव जयते।"सत्य ही अंततः विजयी होता है,असत्य की विजयक्षणिक भ्रम मात्र होती है।


सत्य जब गूँजता है,तो अंतरात्मा को झकझोर देता है।किन्तु अक्सरउसकी गूँज उठने से पहले हीउसका गला घोंट दिया जाता है।


कुंती ने कर्ण का जन्म-रहस्य छिपाया,उसका परिणाम जीवनभर की पीड़ा बना।राजा हरिश्चन्द्र नेसत्य के लिएअंतिम क्षण तक कष्ट सहे।


कुरुक्षेत्र का महायुद्ध भीदबे हुए सत्य का परिणाम था।एकलव्य का त्याग,दुर्योधन का अंत,छल और नीति का संघर्ष—इतिहास आज भी प्रश्न करता है।


आज भी चुनावों में वोट के बदले नोट का खेल,

बीमार वृद्धों के उपचार के नाम पर लूट,

न्यायालयों में 

तर्क-कौशल से 

अपराधियों का बच निकलना,

और कर बचाने की युक्तियाँ—

समाचारों, 

कथाओं और चलचित्रों में प्रतिदिन गूँजती रहती हैं।


फिर भी एक सत्य अटल है—मृत्यु।


करोड़पति हो या निर्धन भिखारी,भ्रष्ट नेता हो या रिश्वतखोर अधिकारी,न्यायाधीश हो या सामान्य जन—मृत्यु सबको

एक समान न्याय देती है।


अंततः सत्य की गूँज समय के पार सुनाई देती है,

और वही मानव को सत्य धर्म का स्मरण कराती है।

Tuesday, June 30, 2026

जंगल में संवाद।

 जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

+++++++++++

 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



जंगल में संवाद 

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-6-26.

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 पेड़  दूसरे पेड़ से

 पहला पेड--हम मनुष्य को  छाया देते हैं।फल देते हैं। लकड़ी देते हैं।

  दूसरा पेड़ --

साँस लेने आक्सिज़न देते हैं। मिटृटी के कटाव से बचाते हैं।

जानवर --हम तो घने जंगल में रहते हैं,

मनुष्य ढूँढ ढूँढकर 

 शिकार करता है।

हिरन --ऋषि मुनि हमारे चमड़े पर बैठना ,

पवित्र मानते हैं। 

   मानव सोचता है कि

 ईश्वर की सब सृष्टियों पर 

 उसका अधिकार है।

 सिंह --मानव की गंभीर चाल को मुझसे तुलना  करते हैं। 

सियार --मानव की  चालाकी  की तुलना मुझसे करते हैं।

 बाघ --मेरे छलांग मारने की तुलना मुझसे करते हैं।

   हाथी -मेरी भी तुलना करते हैं।

 सिंह --मानव तो  सर्वगुण संपन्न स्वार्थी हैं।

उसमें कुत्ते जैसे कृतज्ञता नहीं हैं।

आदमी में नमकहरामी होते हैं।  ईर्ष्यालु होते हैं।

 ठग होते हैं।  देशद्रोही होते हैं। त्यागी होते हैं, भोगी होते हैं।कंजूसी होते हैं। बेचैनी होते हैं।

  खरगोश --

मानव के रूप रंग व्यवहार से उसकी असलियत का पता न लगेगा।

 अतः हर व्यवहार में, गुण प्रकट करते समय 

 हमारे अलग अलग गुणों 

 जानने से  उसको हमारी तुलना करके कहते हैं।

 सिंह --ठीक है खरगोश की बात।

 मानव भी

मिश्रित गुणवाला है।

एक ही गुण से उसका पता न लगेगा।

 पेड़ ---जो भी हो भलाई के बदले बुराई करने में

मनुष्य की तुलना मनुष्य ही है।


 









 




 


आज की चुनौती – जंगल में संवादएस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्तिदिनांक: 30-06-2026


जंगल में संवाद


पहला पेड़:हम मनुष्य को छाया देते हैं,फल देते हैं,लकड़ी देते हैं।


दूसरा पेड़:हम प्राणवायु (ऑक्सीजन) देते हैं,मिट्टी के कटाव को रोकते हैं,धरती का संतुलन बनाए रखते हैं।


जानवर:हम तो घने जंगलों में रहते हैं,फिर भी मनुष्य हमेंढूँढ़-ढूँढ़कर शिकार करता है।


हिरन:ऋषि-मुनि मेरे चर्म कोपवित्र मानकर आसन बनाते थे,पर आज मेरा जीवन ही संकट में है।


सिंह:मनुष्य अपनी गंभीर चाल कीतुलना मुझसे करता है।


सियार:अपनी चालाकी की तुलनामुझसे करता है।


बाघ:मेरी फुर्ती और छलांग काउदाहरण देता है।


हाथी:मेरी शक्ति और विशालता कीभी तुलना करता है।


सिंह:मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है।उसमें त्याग भी है, भोग भी है।कृतज्ञता भी है, नमकहरामी भी।ईर्ष्या भी है, प्रेम भी।स्वार्थ भी है, परोपकार भी।वह अनेक गुणों और अवगुणों का मिश्रण है।


खरगोश:मनुष्य का रूप, रंग और व्यवहार देखकरउसकी असलियत का पता नहीं चलता।इसीलिए उसके अलग-अलग गुणों की तुलनाहम अलग-अलग जीवों से की जाती है।


सिंह:ठीक कहा मित्र!मनुष्य को किसी एक गुण से नहीं पहचाना जा सकता।वह अनेक स्वभावों का संगम है।


पेड़ (सब मिलकर):जो भी हो,भलाई के बदले बुराई करने मेंमनुष्य की तुलनामनुष्य ही कर सकता है।


— संदेश —प्रकृति का सम्मान करें,जीव-जंतुओं की रक्षा करें,और मानवता को अपने श्रेष्ठ कर्मों से सिद्ध करें।



आज की चुनौती – जंगल में संवाद

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

दिनांक: 30-06-2026

जंगल में संवाद

पहला पेड़ बोला—

हम शीतल छाया बिखराते हैं,

मीठे फल मानव को खिलाते हैं।

अपने तन की लकड़ी देकर,

जीवन का हर भार उठाते हैं।

दूसरा पेड़ मुस्काया—

प्राणवायु का दान हमारा,

धरती का श्रृंगार हमारा।

मिट्टी का कटाव रोककर,

हरियाली का संसार हमारा।

वन के पशु बोले—

हम तो वन की शान हैं,

प्रकृति की मधुर पहचान हैं।

फिर भी मानव लोभ में आकर,

करता हमारा अवसान है।

हिरन बोला—

कभी ऋषियों का पावन आसन,

आज बना हूँ शिकार का कारण।

निर्दोष होकर भी मैं सहता,

मानव का निष्ठुर आचरण।

सिंह गर्जा—

मेरी चाल की देता मिसाल,

मुझको कहता वन का काल।

पर साहस यदि सच में चाहिए,

छोड़ दे छल और हर जंजाल।

सियार हँसकर बोला—

अपनी चतुराई मुझ पर डाले,

दोष हमारे सिर पर टाले।

अपने छल को भूल स्वयं ही,

दर्पण से भी नज़रें टाले।

बाघ बोला—

मेरी फुर्ती, मेरी छलाँग,

बन जाती उसकी पहचान।

पर हिंसा का दोष भी अक्सर,

दे देता मेरे ही नाम।

हाथी बोला—

बल, धैर्य और बुद्धि मेरी,

कहते हैं सब अनुपम ढेरी।

काश! मानव भी सीख सके,

विनम्रता की राह सुनहरी।

खरगोश बोला—

मानव को पहचानना कठिन,

उसका मन है बड़ा गहन।

कभी देव समान दिखाई दे,

कभी बन जाए घोर शत्रुजन।

सिंह ने कहा—

सत्य यही है, मित्र हमारे,

मानव में हैं रूप हजार।

गुण-अवगुण का अद्भुत संगम,

वही रचता अपना संसार।

तभी सब पेड़ एक स्वर बोले—

हम तो देते प्रेम निरंतर,

बिना किसी प्रतिदान की चाह।

फिर भी भलाई के बदले बुराई,

क्यों चुनता मानव की राह?

संदेश

प्रकृति माँ का मान बढ़ाओ,

हर प्राणी से प्रेम निभाओ।

धरती तभी स्वर्ग बनेगी,

जब मानव मानव बन जाओ।


Sunday, June 28, 2026

ज्ञान की यात्रा

 ज्ञान की यात्रा।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

29-6-26.

++++++++++++++

 ज्ञान  संपूर्ण ज्ञान 

 आत्मज्ञान 

आध्यात्मिक ज्ञान 

अखंडबोध

 अध्ययन से,

अनुभव से

 सत्संग से

गुरु के अभ्यास के द्वारा,

  करत करत अभ्यास करत जड मति होता सुजान।

बुद्धि जन्मजात होती है।

बुद्धि लब्धि प्रतिभाशाली,

औसत बुद्धि,

मंदबुद्धि  

यह बुद्धि काम न करेगा तो ज्ञान से 

कोई प्रयोजन नहीं।

 बुद्धि बुरे समय में 

  भ्रष्ट हो जाती है।

 बुद्धि और ज्ञान की सफलता विवेक पर निर्भर है।

स्वार्थ निस्वार्थ लोभ, ईर्ष्या क्रोध काम भय  

 कंजूसी त्याग भोग

 जुआ खेलना, शराब पीना, चोरी डकैती

कुली हत्यारे

 इन सब में 

 तटस्थ, न्याय, त्यागी, धर्मी, वीर साहसी,

शुभ चिंतक,

 देशप्रेम 

निस्वार्थ बुद्धि,

 ईश्वरीय भय,

आध्यात्मिक चिंतन 

 आदि श्रेष्ठ ज्ञानियों के कारण अनश्वर संसार में 

 ज्ञान की वृद्धि होते हैं।

 ज्ञानी सुख दुख को समान मानता है।

 संसार के माया मोह से

 दूर रहता है।

 बड़े बड़े ज्ञानी दार्शनिक आज भी दूर ही रहते हैं।

माया/शैतान/शनि के प्रभाव से केवल आत्मज्ञानी ही बचता है।

 ज्ञान  की यात्रा

 ऋषियों मुनियों ने

ध्यान तपस्या योग साधना से पाते हैं।

आदि शंकराचार्य घुमक्कड़ रहे।

 सिद्धार्थ को तपस्या के बल पर मिले।

 रैदास  का ज्ञान भक्ति से,

 कबीर का ज्ञान सत्संग से

 एकलव्य की क्षमता निरंतर अभ्यास से,

आजकल अंतर्जाल संगणिक काफ़ी

  ज्ञान देते हैं।

बुद्धि और विवेक से काम करना है।

तभी ज्ञान का सही उपयोग है।



आपकी रचना का विषय व्यापक और चिंतनशील है। आपने ज्ञान के अनेक स्रोत—अध्ययन, अनुभव, सत्संग, गुरु, अभ्यास, भक्ति, तपस्या और आधुनिक तकनीक—को एक साथ जोड़ने का अच्छा प्रयास किया है। भाषा में कुछ स्थानों पर प्रवाह और व्याकरण सुधारने से रचना और प्रभावशाली बन सकती है।

संशोधित रूप:

ज्ञान की यात्रा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

29-6-2026

ज्ञान की यात्रा,

संपूर्ण ज्ञान,

आत्मज्ञान,

आध्यात्मिक ज्ञान,

अखंड बोध।

ज्ञान मिलता है

अध्ययन से,

अनुभव से,

सत्संग से,

गुरु के मार्गदर्शन से,

और निरंतर अभ्यास से।

"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।"

बुद्धि जन्मजात होती है।

कोई प्रतिभाशाली,

कोई औसत,

कोई मंदबुद्धि होता है।

पर यदि बुद्धि का सदुपयोग न हो,

तो ज्ञान भी निष्फल हो जाता है।

बुरे समय में

बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है।

ज्ञान की सफलता

विवेक पर निर्भर करती है।

स्वार्थ, लोभ, ईर्ष्या,

क्रोध, भय और मोह से ऊपर उठकर,

त्याग, न्याय, धर्म, साहस,

देशप्रेम, निस्वार्थ सेवा

और ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाना ही

सच्चे ज्ञान की पहचान है।

ज्ञानी

सुख-दुःख को समान मानता है,

माया-मोह से दूर रहता है।

ऋषि-मुनियों ने

ध्यान, तप, योग और साधना से

आत्मज्ञान प्राप्त किया।

Adi Shankaracharya ने भारत-भ्रमण कर ज्ञान का प्रचार किया।

Gautama Buddha को तप और ध्यान से बोध प्राप्त हुआ।

Ravidas ने भक्ति का मार्ग अपनाया।

Kabir ने सत्संग और अनुभव से सत्य का संदेश दिया।

Ekalavya ने निरंतर अभ्यास से अद्भुत क्षमता प्राप्त की।

आज अंतर्जाल और संगणक भी

ज्ञान के महत्वपूर्ण साधन हैं,

किन्तु ज्ञान तभी सार्थक है

जब उसका उपयोग

बुद्धि और विवेक के साथ किया जाए।

ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती;

सीखते रहना ही जीवन का सच्चा पथ है।

विशेष टिप्पणी: आपकी रचना में विचारों की समृद्धि है। यदि प्रत्येक पद्य में 2–4 पंक्तियों का संतुलन रखा जाए और कुछ स्थानों पर शब्दों की पुनरावृत्ति कम की जाए, तो यह कविता प्रतियोगिता के लिए और भी प्रभावशाली बन सकती है।

Saturday, June 27, 2026

नानी का घर

 नानी का घर 

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

28-6-26.

---+----+++++

नाना नानी मामा के

 प्यार का केंद्र।

बचपन में मेरी इच्छाएँ

मेरी माँगें सब पूरी होती ।

नानी  मेरे आध्यात्मिक ज्ञान का आधार।

नाना मेरे शिक्षक।

 मामा मेरे आर्थिक सहायक।।

मैं नानी की देखरेख में पला।

मेरी हर कदम की प्रगति में मामा ही प्रधान।

मामाने साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही अम्मा बुलाया करता।

माँ को उसके नाम से

ही पुकारा करता जैसे 

 मामा बुलाया करते।

प्रेम मिला।

 आदर्श गुण मिले।

जीवन  की हर प्रगति में 

 नाना नानी मामा के साथ।

 उनके ऋण कभी चुका न पाता।

+++++++++++


आपकी रचना भावपूर्ण है और नाना-नानी व मामाओं के प्रति आपकी कृतज्ञता स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है। भाषा को थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण बनाकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

नानी का घर

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-6-2026

नाना-नानी, मामाओं के

प्यार का था वह केंद्र।

बचपन की मेरी हर इच्छा,

हर माँग पूरी होती थी।

नानी थीं

मेरे आध्यात्मिक ज्ञान की आधारशिला।

नाना थे

मेरे प्रथम शिक्षक।

मामा बने

मेरे आर्थिक सहायक।

मैं नानी की गोद में पला,

उनकी ममता में बड़ा हुआ।

जीवन के हर कदम पर

मामाओं का ही साथ मिला।

उन्होंने ही मुझे

साइकिल चलाना सिखाया।

मैं नानी को ही

"अम्मा" कहकर पुकारता था,

और अपनी माँ को

उन्हीं के नाम से पुकारता,

जैसे मामा पुकारते थे।

उनसे मिला प्रेम,

संस्कार और आदर्श।

मेरे जीवन की हर प्रगति में

नाना, नानी और मामाओं का

अमूल्य योगदान रहा।

उनका यह ऋण

मैं जीवन भर

कभी नहीं चुका पाऊँगा।

यह समापन आपकी कृतज्ञता को और अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।

Friday, June 26, 2026

मेरी अमिट चिंता

 मेरी पत्नी मरना नहीं चाहती।

इलाज गलत डाक्टर के यहाँ

 डाक्टर पर विश्वास है ही नहीं 

 पर विधि की विडंबना 

 नालायक डाक्टर के साथ फँसना पड़ा।

 दिलासा दे सकता हूँ,

 अपने आप को

 उसके अंत का समय मनुष्य के‌ वश में नहीं।

पर मेरा अपना दुख,

अनेक कारण होते हैं,

क्या मैंने इलाज में कमी रखी है?

 मेरे व्यवहार  चोट की है?

उसके अंतिम शब्द 

 मैं नालायक।

 मेरे शब्द में कटुकशब्द।

 अंतिम घड़ी में मेरे स्वर सुनना पसन्द नहीं किया।

 पास जाने पर पसंद नहीं किया।

 उसकी अस्पष्ट बातें,इशारे समझ न सका।

 दुखी थी  कि पति मेरी बात समझ न सके।

उसके संकेत समझने में असमर्थ था।

अपने मन को चैन नहीं,

न जाने मैं कितने साल जिंदा रहूँगा।

 नयी पीढ़ी के लोग,

 मेरी बातें , मेरे विचार, मेरी सोच,

मेरी ध्वनि सुनने तैयार नहीं।

 मेरी माँगें,

 मेरी ज़रूरतें 

पत्नी जानती थी।

 पूरी करती थी।

उससे कहने की ज़रूरतें नहीं।

आवश्यकता जानकर   पूरी करती थी।

 कहने पूछने की आवश्यकता नहीं।

 अब माँगने कहने पर भी सुनने कोई नहीं।

अब दिवंगत पत्नी की आत्मा से

निवेदन है कि मेरे चलते फिरते 

रहने की शक्ति दें और नींद ही में 

मेरे प्राण पखेरू उड़ सके।








 






 

 



 









Thursday, June 25, 2026

मधु निषेधक दिवस

 



राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 


एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 


विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,


अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।


शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।


दिनांक -26-6-26


+++++++++++++++


 भारत में एक ही दिवस 


 साल में एक बार 


 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।


 पाश्चात्य प्रभाव 


 एक दिन मनाकर 


 जिसके लिए मनाते हैं 


 उसका पार्टी मनाना।


 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 


 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।


सरकार चाहती है


 आमदनी के लिए 


 मधुशाला आवश्यक है।


  तमिलनाडु के भूतपूर्व 


 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.


त्योहारों के दिन 


 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।


 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 


 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।


 छोटे अक्षरों में लिखा है


 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।


परिवार के लिए  हानिकारक।


एक दिवस मनाकर 


 फिर सरकार द्वारा 


दूकान खोलना।


 यह दिवस मनाना बेकार।


 हानिकारक है तो


 कारखाना बंद करना 


दूकाने न खोलना


 सरकार का काम।


 वह निज लाभ के लिए 


 दूकानें खोलकर 


 मधु निदेशक प्रचार,


विश्व मधु निषेधक दिवस


 मनाना दिखावे के लिए।


जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।


 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आपकी रचना में सामाजिक विडंबना और व्यवस्था पर प्रश्न उठाने का स्पष्ट भाव है। यदि इसे काव्य प्रतियोगिता के लिए थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली बनाया जाए, तो यह इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है:

विश्व मधु निषेधक दिवस

भारत में एक ही दिवस,

साल में एक बार,

स्वर्गीय पूर्वजों के नाम

श्रद्धा का होता व्यवहार।

पाश्चात्य प्रभाव में आकर,

एक दिवस हम मनाते हैं,

जिनके हित की बात करें,

उन्हीं को फिर भूल जाते हैं।

विश्व मधु निषेधक दिवस,

नाम मात्र का आयोजन है,

दिखावे की इस परंपरा में

कहाँ वास्तविक चिंतन है?

सरकार कहती—

राजस्व के लिए मधुशाला आवश्यक है,

त्योहारों पर करोड़ों की बिक्री

मानो उपलब्धि विशेष है।

सजी-धजी आकर्षक दुकानें,

रात ग्यारह बजे तक खुली रहती हैं,

छोटे अक्षरों में लिख देती हैं—

"मदिरापान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है,

परिवार के लिए भी घातक है।"

यदि सचमुच हानिकारक है,

तो कारखाने क्यों चलते हैं?

मदिरा की दुकानें क्यों

हर गली-मोहल्ले में पलते हैं?

एक दिवस निषेध का संदेश,

शेष वर्ष उसका प्रचार;

यह कैसी नीति, कैसा न्याय,

कैसा यह विरोधाभास अपार?

जनहित यदि सर्वोपरि है,

तो ठोस कदम उठाना होगा;

केवल दिवस मनाने से नहीं,

व्यसन-मुक्त समाज बनाना होगा।

— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

राजश्री राष्ट्रीय साहित्य अकादमी 

एक दिवसीय काव्य प्रतियोगिता 

विधा --अपनी हिंदी,अपने‌ विचार,

अपनी शैली भावाभिव्यक्ति।

शीर्षक --विश्व मधु निषेधक दिवस।

दिनांक -26-6-26

+++++++++++++++

 भारत में एक ही दिवस 

 साल में एक बार 

 स्वर्गीय पुर्वजों के लिए।

 पाश्चात्य प्रभाव 

 एक दिन मनाकर 

 जिसके लिए मनाते हैं 

 उसका पार्टी मनाना।

 एक विश्व मधु निषेधक दिवस 

 दिखावे के लिए,नाम मात्र के लिए।

सरकार चाहती है

 आमदनी के लिए 

 मधुशाला आवश्यक है।

  तमिलनाडु के भूतपूर्व 

 मुख्यमंत्रियों के शराब कारखाने  11.

त्योहारों के दिन 

 अमुक करोड़ रूपयों की बिक्री की योजना।

 सजी धजी  आकर्षक दूकानें 

 स्वागत करते हैं रात ग्यारह बजे तक।

 छोटे अक्षरों में लिखा है

 मधु पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक।

परिवार के लिए  हानिकारक।

एक दिवस मनाकर 

 फिर सरकार द्वारा 

दूकान खोलना।

 यह दिवस मनाना बेकार।

 हानिकारक है तो

 कारखाना बंद करना 

दूकाने न खोलना

 सरकार का काम।

 वह निज लाभ के लिए 

 दूकानें खोलकर 

 मधु निदेशक प्रचार,

विश्व मधु निषेधक दिवस

 मनाना दिखावे के लिए।

जैसे सत्तर साल से हिंदी दिवस मनाना।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना