प्रकृति का संदेश।
एस. अनंतकृष्णन चेन्नई तमिलनाडु।
8-10-26
हे मानव।
सावधान!
तुम सद्यःफल के लिए
जंगलों को काट रहे हो।
पर्वतों को चूर्ण कर रहे हो।
नदियों के रेतों है को समाप्त कर रहे हो।
अपनी मातृभाषा में
अंग्रेज़ी मिलावट कर रहे हो।
नगर विस्तार नगरीकरण के नाम से,
झीलों को गायब कर रहे हो।
हरे-भरे खेतों में इमारतें बनाई रहे हो।
भूतल पानी चूस रहे हो।
कारखानों के उच्छिष्ट से
नदियों को प्रदूषण कर रहे हो।
तुम प्रकृति को जितना नष्ट करोगे,
उतना ही कष्ट भोगोगे।
ग्रीष्म वासस्थल में मनमाना इमारतें।
इन सबका दुष्परिणाम देखोगे
जब हम अपनी सहन शक्ति को बैठेंगे।
प्राकृतिक क्रोध संभालना
तेरे ज्ञान से असंभव।
ज्वालामुखी देखते हो।
भूकंप देखते हो।
हवा के प्रदूषण अनेक बीमारियों के मूल कारण।
सोचो समझो जागो।
कोराना देखा, सुनामी देखा।
देखा नेपाल का सर्वनाश।
गर्मी का प्रकोप।
सही नहीं पाओगे।
सावधान। सावधान। सावधान।
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