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Wednesday, October 7, 2026

प्राकृतिक चेतावनी

 प्रकृति का संदेश


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

8-10-2026


हे मानव!

सावधान! सावधान!


क्षणिक लाभ के लिए

तुम जंगलों को काट रहे हो,

पर्वतों को चूर्ण कर रहे हो,

नदियों की रेत को समाप्त कर रहे हो।


अपनी मातृभाषा में भी

अनावश्यक अंग्रेज़ी की मिलावट कर रहे हो।


नगर-विस्तार और नगरीकरण के नाम पर

झीलों को गायब कर रहे हो,

हरे-भरे खेतों पर

कंक्रीट के भवन खड़े कर रहे हो,

धरती के भूजल को

अंधाधुंध चूस रहे हो।


कारखानों के अपशिष्ट से

नदियों को प्रदूषित कर रहे हो,

वायु को विषैला बना रहे हो।


याद रखो—

तुम प्रकृति को जितना नष्ट करोगे,

उतना ही उसका दुष्परिणाम भोगोगे।


ग्रीष्म की तपती लहरें,

अनियंत्रित निर्माण,

वनों का विनाश—

इन सबके दुष्परिणाम

एक दिन तुम्हारे सामने खड़े होंगे।


जब प्रकृति अपनी

सहनशक्ति की सीमा पार करेगी,

तब उसके प्रकोप को रोकना

मानव-ज्ञान और शक्ति से

असंभव हो सकता है।


ज्वालामुखी को देखा है,

भूकंप को देखा है,

सुनामी को देखा है,

अत्यधिक गर्मी का प्रकोप देखा है।


वायु-प्रदूषण

अनेक रोगों का कारण बन रहा है।


कोरोना का संकट देखा,

सुनामी की विभीषिका देखी,

नेपाल में आए विनाश को देखा।


फिर भी—

क्या हम जागेंगे?


सोचो!

समझो!

जागो!


प्रकृति हमारी शत्रु नहीं,

हमारी जीवनदायिनी माता है।


उसका संरक्षण करो,

उसका सम्मान करो,

आने वाली पीढ़ियों के लिए

धरती को सुरक्षित रखो।


अन्यथा प्रकृति का मौन

जब चेतावनी में बदलेगा,

तब मनुष्य के पास

पश्चात्ताप के अतिरिक्त

कुछ भी शेष न रहेगा।


सावधान!

सावधान!!

सावधान!!!

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