ज्ञान दर्पण
आज का ललकार : ज्ञान दर्पण
ज्ञान दर्पण
एस. अनन्तकृष्णनसौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारकस्वरचित भावाभिव्यक्ति16-07-2026
ज्ञान दर्पण
दर्पण हमारे बाहरी रूप को
ज्यों का त्यों दिखाता है—सुंदर या असुंदर।
पर ज्ञान का दर्पण
अज्ञात को ज्ञात कराता है,
भले-बुरे,सत्य-असत्य का विवेक कराता है।
वह खंड-अखंड का बोध देता है,
मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है
,ज्ञान-चक्षु प्रदान कर
सभ्य, संस्कारित, आदर्श और संयमित जीवन
जीना सिखाता है।
आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि,
नश्वर संसार में रहते हुए भी
सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।
जो माया-मोह में फँसकर
भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या और कामनाओं के
वशीभूत हो जाते हैं,
वे यह भूल जाते हैं कि कर्मों का फल
एक दिन अवश्य मिलता है।
बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,
अपराधियों को बचाने वाले वकील,
काले धन का समर्थन करने वाले
भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—
यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,तो
ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।
ज्ञान के दर्पण में सत्य,
ईमानदारी,तटस्थता और परोपकार सर्वोपरि हैं।
माया ईश्वर की शक्ति का अंश है।
उसका आकर्षण
ज्ञानी मनुष्य को भी
भ्रमित कर सकता है।
मन और बुद्धि की चंचलता
कुकर्मों को जन्म देती है,
और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।
इसलिए अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग
अपनाने हेतु ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।
समाज में जैसे मच्छर, मक्खियाँ और दीमक
हानि पहुँचाते हैं,
वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं
सर्व ज्ञानी रावण भी
नारी-मोह में पड़कर
विवेक खो बैठा।
धर्म का त्याग कर,
भक्ति के नाम पर धन-संग्रह करने वाले
पाखंडी मानव-एकता के बाधक हैं।
ज्ञान के दर्पण में भोग नहीं,
त्याग, बलिदान और विश्व-कल्याण का स्थान है।
महर्षि वाल्मीकि,गोस्वामी तुलसीदास और सम्राट अशोक ने। ज्ञान के प्रकाश से
विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।
आदि शंकराचार्य जैसे आत्मज्ञानी महापुरुषों ने
मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।
"सर्वे भवन्तु सुखिनः
","वसुधैव कुटुम्बकम्"और "जय जगत" का संदेश
ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।
वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—सभी
मानवता को सत्य, सदाचार और कल्याण का
मार्गदर्शन दिखानेवाले। ज्ञान के दर्पण हैं।
एस. अनन्तकृष्णन, सौहार्द सम्मान प्राप्त चेन्नै तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।
16-1-26.
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ज्ञान दर्पण
दर्पण हमारे रूप को
ज्यों का त्यों
दिखाता है।
सुंदर असुंदर
बाहरी रूप।
ज्ञान दर्पण
अज्ञात ज्ञात
भला बुरा
सत्य असत्य
अनेक बातों को
सोचने समझने
खंड अखंड बोध
जानने,
मानव पशु में
मानवता देकर
ईश्वर सृष्टियों में
ज्ञान चक्षु प्राप्त
सभ्य जीवन,
संस्कृत जीवन
आदर्श जीवन
संयमित जीवन
जीने के लिए
ज्ञान दर्पण
केवल मनुष्य के लिए।
आत्मज्ञान प्राप्त दिव्य पुरुष ऋषि मुनि
नश्वर जगत,
अनश्वर धर्म में दृढ़ रहते हैं।
लौकिक माया मोह
आस्थाई जानकर भी
भ्रष्टाचारी रिश्वत खोरी
लोभी ईर्ष्यालु कामी पुरुष अलग जीवन
वे नहीं जानते कि
कर्म फल के अनुसार
दंड मिलता ही है।
बड़े बड़े स्नातक स्नातकोत्तर बनकर
अपराधी को छुड़ानेवाले वकील,
काले धन के समर्थक सी.ए,
भ्रष्टाचार करोडपति मंत्री, सांसद, विधायक
ज्ञानी होकर भी अज्ञानी।
ज्ञान के दर्पण में
सत्य प्रधान।
ईमानदारी प्रधान
तटस्थता प्रधान
परोपकार प्रधान।
मायादेवी ईश्वर का एक अंश,
अति आकार्षक
ज्ञानी मनुष्य को
अज्ञानी मूर्ख बना देता है।
बुद्धि में चंचलता
मन की चंचलता
अज्ञानी के कुकर्म
अशांति असंतोष का मूल।
अहिंसा परमो धर्म का विरोध।
इन सब को तजने
ज्ञान का दर्पण चाहिए।
समाज में मच्छर, मक्खियाँ दीमक
संख्या के समान
आसुरी शक्तियाँ
ज्ञान के दर्पण नहीं देखते।
सर्वज्ञानी रावण
नारी आकर्षण से
अज्ञानी बन गया।
धर्म तजकर
आश्रम में चाँदी के सिंहासन में बैठकर
भक्ति के नाम
धन संग्रह करनेवाले
पाखंडी मजहबी लोग
मानव एकता के बाधक ज्ञानी नहीं।
ज्ञान के दर्पण में
भोग का स्थान नहीं।
त्याग , बलिदान,
विश्व जन कल्याण ही प्रधान।
तुलसीदास , वाल्मीकि
ज्ञान के दर्पण के बाद
विश्ववंद्य बने।
अत्याचारी अशोक
ज्ञान के दर्पण के बाद
विश्व विख्यात आदर्श
सम्राट बने।
आत्मज्ञानी जन्मजात होते हैं
जैसे
आदि शंकराचार्य।
वेदों के रचयिता।
सर्वे जना सुखिनो भवन्तु
वसुधैव कुटुंबकम्
जय जगत के
विश्वगुरु।
वेद उपनिषद कुरान बाइबिल ही ज्ञान के दर्पण।
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आज का ललकार : ज्ञान दर्पण
ज्ञान दर्पण
एस. अनन्तकृष्णन
सौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारक
स्वरचित भावाभिव्यक्ति
16-07-2026
ज्ञान दर्पण
दर्पण हमारे बाहरी रूप को
ज्यों का त्यों दिखाता है—
सुंदर या असुंदर।
पर ज्ञान का दर्पण
अज्ञात को ज्ञात करता है,
भले-बुरे,
सत्य-असत्य का विवेक कराता है।
वह खंड-अखंड का बोध देता है,
मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है,
ज्ञान-चक्षु प्रदान कर
सभ्य, संस्कारित, आदर्श
और संयमित जीवन जीना सिखाता है।
आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि
नश्वर संसार में रहते हुए भी
सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।
जो माया-मोह में फँसकर
भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या
और कामनाओं के वशीभूत हो जाते हैं,
वे यह भूल जाते हैं कि
कर्मों का फल
एक दिन अवश्य मिलता है।
बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,
अपराधियों को बचाने वाले वकील,
काले धन का समर्थन करने वाले,
भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—
यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,
तो ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।
ज्ञान के दर्पण में
सत्य, ईमानदारी,
तटस्थता और परोपकार
सर्वोपरि हैं।
माया ईश्वर की शक्ति है।
उसका आकर्षण
ज्ञानी मनुष्य को भी
भ्रमित कर सकता है।
मन और बुद्धि की चंचलता
कुकर्मों को जन्म देती है,
और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।
इसलिए
अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग अपनाने हेतु
ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।
समाज में जैसे
मच्छर, मक्खियाँ और दीमक
हानि पहुँचाते हैं,
वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ
ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं।
सर्वज्ञानी रावण भी
नारी-मोह में पड़कर
विवेक खो बैठा।
धर्म का त्याग कर,
भक्ति के नाम पर
धन-संग्रह करने वाले पाखंडी
मानव-एकता के बाधक हैं।
ज्ञान के दर्पण में
भोग नहीं,
त्याग, बलिदान
और विश्व-कल्याण का स्थान है।
महर्षि वाल्मीकि,
गोस्वामी तुलसीदास
और सम्राट अशोक ने
ज्ञान के प्रकाश से
विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।
आदि शंकराचार्य जैसे
आत्मज्ञानी महापुरुषों ने
मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।
"सर्वे भवन्तु सुखिनः",
"वसुधैव कुटुम्बकम्"
और "जय जगत" का संदेश
ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।
वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—
सभी मानवता को
सत्य, सदाचार और कल्याण का मार्ग दिखाने वाले
ज्ञान के दर्पण हैं।
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