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Thursday, July 16, 2026

भ्रम का जाल

 आज की चुनौती

भ्रमजाल (भ्रम का जाल)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
17-7-26

भ्रम में
नकली को असली समझकर
मनुष्य धोखा खा जाता है,
भयभीत हो जाता है।

रस्सी को साँप समझ लेना,
मृगमरीचिका को पानी मान लेना—
यही भ्रम का जाल है।

भ्रम से जन्म लेती हैं
गलतफ़हमियाँ,
गलत कदम,
गलत निर्णय और
गलत कार्यवाही।

झूठी खबरें,
अधूरी बातें और
अफ़वाहें
मानव जीवन को
दुविधा और संकट में डाल देती हैं।

रात्रि के अंधकार में
भूत की कल्पना करना,
नश्वर जगत को
अनश्वर समझ बैठना,
क्षणिक लाभ के लिए
गलत मार्ग अपनाना—
ये भी भ्रम के ही रूप हैं।

महाभारत में
"अश्वत्थामा हतः" सुनकर
आचार्य द्रोण
अपने पुत्र के मोह में पड़ गए।
"कुंजरः" शब्द धीमे स्वर में कहा गया,
और वे शस्त्र त्यागकर
निहत्थे हो गए।

दानवीर कर्ण ने
वेशधारी ब्राह्मण बने इन्द्र को
अपना कवच-कुण्डल दान दे दिया।

महाबली ने
वामन रूपधारी
भगवान विष्णु को न पहचानकर
तीन पग भूमि दान कर दी।

अज्ञातवास में
पाण्डवों ने
अपने नाम, रूप और कार्य बदलकर
जीवन बिताया।

दमयंती के स्वयंवर में
देवताओं ने
नल का रूप धारण कर
उसे भ्रमित करना चाहा।

मारीच का स्वर्ण-मृग रूप
और रावण का संन्यासी वेश
राम और सीता को
भ्रम के जाल में ले गया।

पौधों की समान आकृति वाली
पत्तियों को देखकर भी
मनुष्य कई बार
पहचानने में भूल कर बैठता है।

संक्षेप में—
भ्रम का जाल
मानव जीवन में
दुःख, संकट और संताप का
एक बड़ा कारण है।

इसलिए
सत्य, विवेक और धैर्य से ही
भ्रम का निवारण संभव है।

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