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Monday, March 16, 2026

 देव और दानव 

ऍस. अनंतकृष्णन, चेन्नै
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देव तो सर्वशक्तिमान है, 
सर्वज्ञ है,
फ़िर भी पुरानों में  
दानवों से डरते थे।
दानव देवों को कारावास की सजा देते थे।
कठोर तपस्या मनमाना वर पाकर
असुरों के अत्याचार चरमसीमा पार हो जाते।
हिरण्य कश्यप असुर राजा, अहंकारी,
ब्रह्मा से अजेय होने का वरदान पाया। 
वह खुद अपने को भगवान घोषित किया।
जनता को आज्ञा दी कि हिरण्याय नमः का ही जप करना है। 
नारद के उपदेश के कारण हिरण्यकश्यप् का बेटा प्रह्लाद
भगवान का अटल भक्त बना।
यह भी दानव और देव का संघर्ष। 
हिरण्य का वध करने विष्णु को नरसिंह का अवतार लेना पडा।
भस्मासुर ने शिव से वर पाया कि
जिसके सिर पर वह हाथ रखता, वह सिर चूर्ण चूर्ण हो जाय।
तब विष्णु को मोहिनि अवतार लेना पडा। 
देव असुरों को हरा न सकें तो
तपस्विनि महर्षि मानव दधिची के सामने 
अनुनय विनय करके उनकी रीढ की हड्डि दान लेकर
असुरों को हराना पडा। 
महिषासुर को वध करके देवी महिषासुर वर्द्धिनि बनी।
समुद्र मंथन में शिव को विष पीना पडा।
अत्याचारी दानव और सद्गुणी देव का संबंध
साँप-छछुंदर की गति होती है।













समय का पर्दा

 समय का पर्दा

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३-१२-२५.

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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 समय का पर्दा डालकर 

 हर पल को व्यर्थ करनेवाले 

 अलसी/सुस्ती/निष्क्रिय 

 अज्ञानी जीव/

 यों ही जुआ, संगणिक खेल, गपशप,  

विलासिता,ऐश आराम में 

 बिताता रहता है।

 वही समय का पर्दा

 मानव डाल रखा है।

 तड़के उठना वैज्ञानिक धर्म, 

पर समय पर पर्दा डालकर मीठी नींद सोना, 

पर्दा तो है ही,पर

सम पर्दे के पीछे बंधे नहीं,

समय को नकेल से सीधे जाओ, 

नहीं बता सकते।

रुको का पर्दा नहीं डाल सकते।


 अनमोल समय,

पर्दा मानव डाल अपने

 समय गँवाकर बुढ़ापे में 

 तड़पते पछताते रहते हैं।

 समय की परवाह न करने पर

 वह किसी की परवाह नहीं करता।

 रात दिन का चक्र रोक नही़ं सकता।

कल करै तो आज कर,

 आज करै़ तो अभी।

पल में होगा प्रलय।।

 अच्छे दिन पाछे गये

 अब पछताने से होता क्या,

जब चिड़िया चुग गई खेत।

समय का पर्दा हटता नहीं 

 वह तो चलन शील।



 




अजब दौर

 अजीब दौर 

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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17-3-26

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सर्वेश्वर की सृष्टि में अजीब दौर अनुदिन देखते रहते हैं।

 शबनम दीखन ओझल होना,

 सूर्योदय और सूर्यास्त 

 रात -दिन का

 आना जाना।

  पक्षियों का कलरव।

 मौसमी परिवर्तन,

 वर्षा में मेंढक का टरटराना।

 मोर का नाच।

  पतझड़ में ठूँठ।

 वसंत में पनपना।

 वर्षा में बाढ।

 गर्मी में  चिलचिलाती धूप।

  ग्रीष्म वासस्थल में  बादलों के कोहरा।

 सूर्योदय सूर्यास्त की लालिमा।

 नक्षत्रों का जगमगाना।

 समुद्र की लहरों का शोर।

 मध्य सागर में शांति 

 समुद्र की विचित्र मछलियाँ।

रंग बिरंगे सीपियाँ,

 सीपी मे मोती।

 मौसमी फलों के

 विभिन्न स्वभाव, सुगंध।

 मौसमी फूलों का सौंदर्य

 बड़े आकार के छोटे आकार के

 विभिन्न रंगों के सुगंध के फूल 

 अजीब दौर प्रकृति का।

 तितलियों के विभिन्न आकार 

 कीड़ों का घृणित रूप।

तितलियों का लुभावना रूप।

 अति आकर्षक अजीब दौर 

 प्रकृति का।

 कण कण में अजीब दौर।

 मकड़ी के जाल,

 उस में फँसकर तड़पते जीव।

 भ्रूण अवस्था से बुढ़ापे तक का

 मानव जीवन के अजीब दौर।

 ज्ञान चक्षु प्राप्त मनुष्य की तुलना जानवरों है,

 चींटियों के कतार,

 दीमक के बिल 

 बयां के मजबूत घोंसले।

 रात के अंधेरे में 

 उल्लू बिल्लियों की देखने की शक्ति।

 अति अद्भुत चमत्कार सृष्टियाँ

 अजीबोगरीब दौर भूमंडल का।

 



 

 




 

 


Saturday, March 14, 2026

मौसम मानव

 मौसम और  मनुष्य।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

सौहार्द  सम्मान प्राप्त तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक  द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

15-3-26

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मौसम एक साल में 

 छे ऋतुएँ।

 मानव जीवन में 

 छे अवस्थाएँ,

 भ्रूण, बचपन, किशोरावस्था,

जापानी, प्रौढ़ावस्था 

 बुढापा।

 हर ऋतु  एक ऋतु से  विपरीत।

 यों ही मानवीय अवस्था भी।

 ऋतु में गुण सहज कृत्रिम नहीं,

 वह प्राकृतिक देन।

 मानव गुण परिवर्तन शील।

 संगति के अनुसार,

 मानव गुण में परिवर्तन।

शिक्षित मानव गुण।

  अनपढ़ मानव गुण,

 आदिवासी मानव गुण 

 स्वार्थ निस्वार्थ गुण

 लोभ के गुरु ईर्ष्यालु गुण

 अहंकारी गुण।

 नायक गुण, खलनायक गुण, विदूषक गुण 

 पतिव्रता के गुण 

 लंबी के गुण

 वीरांगना के गुण 

 विषकन्या वारांगना गुण

 वैसे ही वर्षा की बूंदों में 

 गुण परिवर्तन।

 एक बूंद मोती तो एक बूंद मोरे में मिलर बदबू।

स्वाती नक्षत्र वर्षा के गुण 

 सर्प में विष् कदली में स्वाद, सीपी में मोती।

  मौसम और मनुष्य में 

 मनुष्य में इन्सानियत,

 प्रकृति में भी शांत प्रकृति, हिंसात्मक प्रकृति।

 वसंतकाल पतझड़।

 मलय पवन,

 आंधी तूफ़ान

दावानल

मोसम और मानव 

 दोनों दयालू और निर्दयी।

मानव प्रदूषण प्रकृति को बिगाड़ता तो

 प्रकृति मौसम दुख प्रद ही।



 







 

 

 

 

 




 



 

 

Thursday, March 12, 2026

व्यथा

 मन की व्यथा

ऍस. अनंतकृष्णन, चेन्नै, तिलनाडु 13-3-26.

मानव जीवन में मन की व्यथा,

जन्म से लेकर जीवन पर्यंत।

मनुष्य का जन्म अंधकारमय गर्भ से,

उजाले की ओर रोते हुए होता है।

भूख लगने पर रोना,

पेट भरते ही हँसना यही शैशवावस्था।

आधुनिक शिशु की व्यथा,

तीन साल की उम्र से प्रारंभ।

तभी वह प्रि के.जी।

शिशु को हरफनमौला बनाने

तकाजा, पाठशाला से आते ही

ट्यूशन का तकाजा,

सोलह साल की उम्र तक 

परीक्षा और अंक की चिंता।

तब शारीरिक परिवर्तन,

स्वर परिवर्तन,

काम वासनाएँ,

अश्लील चित्रपट के चित्र,नाचगान।

जितेंद्र रहना अति मुश्किल।

लडके -लडकियों के संयमित जीवन की चिंता।

उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरी की चिंता।

योग्य पात्र से विवाह की चिंता।

संतान की चिंता,

संतान न होने की चिंता।

आर्थिक अभाव की चिंता.

पदोन्नति की चिंता।

ईर्ष्या के कारण चिंता,

लोभ के कारण चिंता।

काम की चिंता,

तलाक की चिंता।

महँगाई की चिंता,

भ्रष्टाचार की चिंता

मन में व्यथा की लहरें।

ज्वारभाटा कभी शांत नहीं होता।

पल पल में नयी नयी व्यथाएँ।

प्राकृतिक प्रकोप की चिंताएँ।

कुशासन के कारण चिंता।

मच्छरों के कारण.

पत्नी और माँ के बीच

साँप छचूंदर की गति होना।

कौन सी भगवान श्रेष्ठ है की व्यथा।

मन की व्यथा का अंत नहीं।

Wednesday, March 11, 2026

अनमोल रत्न

 अनमोल रत्न।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना।

11-3-26

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ज्ञान चक्षु प्राप्त 

मानव के लिए

 भ्रष्टाचार और घूस से

 ठगाकर  चल अचल 

 संपत्ति जोड़ना,

अमूल्य

हीरे,चाँदी,सोना 

ढेर  जमाना,

 अनमैल रत्न नहीं जान।

 बड़े बड़े राजमहल,

 राज सुख  

 अश्वमेध यज्ञ की वीरता,

 कमजोरों से धन कमाना,

 एक वीर राजा तो

उसी वंशज के कमजोरी 

 अब उनके अमूल्य 

 मजबूत किले

 कोई काम नहीं।

 कर्म ही अनमोल रत्न।

 अंग्रेज़ चले गये,

 पर उनकी भाषा ज्ञान से

 तकनिकी विकास,

  चिकित्सा,

 संगणिक ज्ञान 

 जीविकोपार्जन के साधन।

 आवागमन के साधन,

 रेल पट्रियाँ,

 प्राण रक्षक नैदानिक यंत्र

 गर्मी में ठंडा,

 सर्दी में गर्म।

 रक्त दान, नेत्र दान,। किडनी दान, केंसर की दवाएँ,

 वेदों, पुराणों, उपनिषदों

 के  अमूल्य शास्त्र,

जितेंद्रिय की प्रधानता

 योग, प्राणायाम, और

 स्वास्थ्य प्रद मुद्राएँ।

कबीर की अमृतवाणी,

‌तुलसी ,सूर के भक्ति मार्ग।

 मानव एकता के लिए 

 जाति न पूछो साधु की,

पूछ लीजिए ज्ञान।

काम क्रोध मद लोभ

गुण के कारण 

 पंडित भी मूर्ख समान। 

 ये नहीं भक्त।

जिस कृष्ण की कृपा

लंगड़ा चल सकता है,

 गूँगा बोल सकता है,

 बहरा सुन  सकता है,

 उसकी वंदना करता हूँ।

ये कवि वचन अनमोल रत्न।

विश्व कल्याण, एकता, शांति के अमोल वचन।

 स्वतंत्रता जन्म सिद्ध अधिकार।

अहिंसा परमो धर्मः 

 जय जगत,

 वसुधैव कुटुंबकम्।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

 जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य ये सब अमूल्य 

अनमोल रत्न।

 अमर रत्न विश्वकल्याण के लिए।

 

तिरुमंत्र — पद १–१०

(सुसंपादित हिंदी रूप)

1. विश्व में सर्वत्र शिव

समस्त विश्व को एक ही सत्य में देखो —
वह सत्य शिव है।

शिव और शक्ति दो रूपों में प्रकट होकर
सभी प्राणियों पर कृपा करते हैं।

“मैं”, “तुम” और “वह” —
इन सबका मूल वही परम सत्य है।

वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष —
इन चारों पुरुषार्थों का मार्ग बताता है।

पंचेन्द्रियों को वश में करने की शक्ति देता है।
मूलाधार से सहस्रार तक
सभी चक्रों में वही विद्यमान है।

भूमि, वायु, अग्नि, आकाश,
सूर्य, चंद्र, आत्मा —
इन सभी में वही शिव व्याप्त है।

ऐसे सर्वव्यापी शिव को
मैं प्रणाम करता हूँ।


2. पवित्र और मधुर शक्ति

वह शाश्वत और पवित्र शक्ति
हमारे भीतर मधुर रूप में निवास करती है।

चारों दिशाओं के स्वामी,
पराशक्ति के अधिपति,
दक्षिण दिशा के यम को भी पराजित करने वाले
महादेव शिव की मैं स्तुति करता हूँ।


3. परमशिव के समीप

परमशिव सर्वत्र विद्यमान हैं।

वे ब्रह्मांड के प्रत्येक जीव में
अमर स्वरूप से बसे हुए हैं।

वे आसक्ति से रहित,
परम स्वतंत्र और शाश्वत हैं।

ऐसे भगवान शिव की
मैं प्रतिदिन प्रार्थना करता हूँ।


4. प्राणों के प्राण

सभी प्राणियों के प्राणों के भी प्राण
वही परम सत्य हैं।

सृष्टि के सभी बीज
उनमें ही स्थित हैं।

उन परमेश्वर की
दिन-रात वंदना करके
मैं अपनी अज्ञानता को दूर करता हूँ।


5. अतुलनीय शिव

शिव के समान
इस जगत में कोई अन्य नहीं।

उन परमात्मा की तुलना
किसी मनुष्य से नहीं हो सकती।

यह सम्पूर्ण जगत
जिसमें स्वर्ण के समान प्रकाश है,
वह उसी शिव की ज्योति है।

लाल जटाओं से सुशोभित
वह शिव कमल के समान पवित्र हैं।


6. शिव ही सब कुछ

शिव के बिना
इस संसार में कुछ भी नहीं।

शिव से बढ़कर
कोई श्रेष्ठ देव नहीं है।

शिव को लक्ष्य बनाकर की गई तपस्या से
श्रेष्ठ कोई तपस्या नहीं।

शिव की कृपा के बिना
सृष्टि, पालन और संहार भी संभव नहीं।

शिव के अतिरिक्त
मुक्ति का कोई मार्ग मैं नहीं जानता।


7. आदिदेव शिव

आदि काल से पहले भी
शिव ही थे।

वे अति प्राचीन और
सर्वोच्च ब्रह्म हैं।

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र से भी
श्रेष्ठ वही शिव हैं।

उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती।

जो उन्हें “पिता” कहकर पुकारते हैं,
वे सबके पिता हैं।


8. मातृवत् स्नेह

शिव में अग्नि से अधिक उष्णता है
और जल से अधिक शीतलता है।

पर उनकी कृपा को
बहुत कम लोग जान पाते हैं।

वे शिशु से भी अधिक सरल,
माता से भी अधिक स्नेहमयी
और भक्तों के सच्चे सहायक हैं।


9. शिव का कोई स्वामी नहीं

मेरे आराध्य ब्रह्म — नंदीश्वर हैं।

स्वर्ण के समान ज्योति से युक्त
जटाधारी शिव
स्वयं में पूर्ण हैं।

उनके ऊपर कोई अन्य
स्वामी या देव नहीं है।


10. सर्वस्व शिव

यह विशाल ब्रह्मांड
शिव पर ही आधारित है।

अग्नि वही है,
सूर्य वही है,
चंद्र वही है,
वर्षा वही है।

माता भी वही है,
ऊँचे पर्वत भी वही हैं,
और गहरे सागर भी वही हैं।

सर्वत्र केवल
शिव ही शिव हैं।



तिरुमंत्र — पद ११–२०

(सुसंपादित हिंदी रूप)

11. प्रयास और उसका फल

इस प्राचीन संसार के रहस्य का
जब हम गहराई से विचार करते हैं,
तो ज्ञात होता है कि
शिव के समान महान ईश्वर कोई नहीं।

वे न दूर हैं, न निकट —
वे सर्वत्र विद्यमान हैं।

हमारा प्रयास भी वही हैं,
और उस प्रयास का फल भी वही हैं।

वर्षा के बादल भी वही हैं —
उनका नाम नंदी है।


12. तीसरी आँख का रहस्य

शिव की तीसरी आँख
आज्ञा चक्र का प्रतीक है।

जब वह कृपा से खुलती है,
तो असंख्य देव अमरत्व प्राप्त करते हैं।

किन्तु अज्ञानवश लोग कहते हैं कि
शिव की दृष्टि से लोग नष्ट हो जाते हैं।

वास्तव में वे नष्ट नहीं होते —
वे देवत्व को प्राप्त कर
अमर हो जाते हैं।


13. शिव का विराट स्वरूप

भगवान विष्णु और ब्रह्मा ने
शिव के विराट स्वरूप को देखने का प्रयास किया,
पर वे उसे पूर्णतः न देख सके।

शिव आकाश से भी अधिक व्यापक हैं।
उनके गुणों को कोई पूरी तरह समझ नहीं सकता।

उनसे बड़ा कोई नहीं है।

वह सर्वत्र व्याप्त हैं —
ऐसा कोई स्थान नहीं
जहाँ शिव उपस्थित न हों।


14. चक्रों में स्थित शिव

स्वाधिष्ठान चक्र में शिव
ब्रह्मा से भी परे हैं।

मणिपूर चक्र में
वे विष्णु से भी श्रेष्ठ हैं।

अनाहत चक्र में
वे इंद्र से भी ऊपर हैं।

इन सबके शिखर पर स्थित होकर
शिव सम्पूर्ण जगत की
देखभाल करते हैं।


15. आदि भी वही, अंत भी वही

शिव ही सृष्टि के कर्ता हैं
और वही संहार के भी कर्ता हैं।

जन्म और मृत्यु के मध्य
शरीर को चलाने वाली शक्ति भी वही हैं।

उनकी कृपा-ज्योति कभी क्षीण नहीं होती।

वे शाश्वत और अमर हैं।
न्याय देने वाले वही हैं।

वे ही आदि हैं,
वे ही अंत हैं,
और बीच की सारी गति भी वही हैं।


16. अर्द्धनारीश्वर

घुँघराले जटाओं से सुशोभित,
अमलतास के पुष्पों से विभूषित
सुंदर स्वरूप शिव भगवान

अपने अर्धांग में
देवी उमा को धारण करते हैं।

इस प्रकार वे
अर्द्धनारीश्वर के रूप में विराजमान हैं।

देवता अपने दोषों को दूर करने
और सद्गुण प्राप्त करने के लिए
उनके चरणों की वंदना करते हैं।


17. ईश्वर से संबंध

इस संसार में
हमारे अनेक संबंध होते हैं,
किन्तु ईश्वर से जुड़ा संबंध
सबसे श्रेष्ठ है।

सूक्ष्म शरीर में स्थित
दिव्य चेतना से
जब हम जुड़ते हैं,

तब ईश्वर से हमारा
अटूट संबंध स्थापित होता है।


18. कुबेर बनने का मार्ग

अलका पुरी के राजा
कुबेर धन के अधिपति बने
क्योंकि उन्होंने शिव की तपस्या की।

यदि हम भी उसी प्रकार
भक्ति और तप का मार्ग अपनाएँ,
तो जीवन में समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसा मार्ग बताने वाले
शिव को मैं प्रणाम करता हूँ।


19. सच्चे तपस्वी के निकट शिव

शिव ने सुगंधित
सात लोकों की सृष्टि की है।

वे ही उनके संहारक भी हैं।

चंद्रकलाधारी, सर्वज्ञ शिव
सच्चे तपस्वियों के मन में
अपना निवास बनाते हैं।


20. ईश्वर का विधान

हमारे जन्म से पहले ही
शिव हमारे जीवन और मृत्यु
दोनों का विधान कर देते हैं।

जो भक्त उनके चरणों को पकड़ लेते हैं,
उनके लिए
वज्र की गर्जना भी
ईश्वर की वाणी जैसी लगती है।

ऐसे भक्त
ईश्वर के प्रेम में स्थित होकर
जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करते हैं।