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Friday, July 17, 2026

इच्छाओं का अंत

 



इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

18-7-26

+++++++++++++

 इच्छाओं का अंत कहाँ?

  राजपाट त्यागकर 

  सिद्धार्थ  इस आकांक्षा लेकर 

 जंगल में गये

 कि मानव जीवन

 को रोग, मृत्यु, बुढ़ापे से मुक्ति कर सकें।

 अंत में ज्ञान मिला 

 इच्छा ही दुखों का मूल।

 कबीर ने लिखा है

 चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।जिनको कछु न चाहिए, 

वे साहन के साह ॥

 उज्जैन के राजा

 भर्तृहरि संन्यासी बने।

 उनके लगाव एक कुतिया में लगा।

 कुतिया के बच्चे हुए।

 तब संत पट्टिनत्तार ने उनसे कहा ,"तुम बड़े कुटुंबी हो गये।

एक हिंदी कहानी है

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्यागा। संन्यासी बना,

 पर उनके एक बढ़िया घोड़ा था। उस पर का प्यार तज न सका।

  इच्छा रहित  जीवन

  जीना अंत तक असंभव।

 जीवन पर्यन्त 

 ईश्वर के ध्यान में 

 लगना भी

 ऊँची अभिलाषा पाने के लिए।

 ईश्वर में विलीन होने के लिए।

 इच्छाएँ ज्वार भाटे के समान।

 समुद्र की तरंगों के समान।

 हवा के समान।

 जब तक साँस,तब तक आस।




इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” 


इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” :::**




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