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Wednesday, March 18, 2026

ममता की बारिश

 ममता की बारिश।

 एस.अनंतकृष्णन , चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

19-3-26

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ममता क्या है?

जानने के पहले ममता  बारिश हुईकी प्रतीक्षा कितने  उत्साह वर्धन है,

कर्ण को मालूम है,

 भरत को मालूम है

कबीर को मालूम है 

ममता की बारिश कैसी है?

माँ की ममता की बारिश 

 अनुपम और अतुलनीय।

  सम्राट शिवाजी जानता है,

माँ की ममता की बारिश।

 ध्रुव जानता है,

सौतेली माँ की निर्ममता।

 प्रह्लाद की कहानी हिरण्य कश्यप की निर्ममता का प्रमाण।

 हर कोई जानता है 

 माँ की ममता की बारिश की शीतलता।

ममता की बारिश नहीं तो

मानव जीवन में समृद्धि नहीं।

देशप्रेम की बारिश न तो

 देश की प्रगति नहीं।

 भाषा प्रेम की वर्षा न तो 

‌भाषा का विकास नहीं।

देश भक्त शासक के प्रेम की वर्षा न तो देश में 

 अमन चैन नहीं।

ममता की बारिश 

 सर्वे संपन्न और सर्वांगीण विकास के‌विलक्षण प्रतिभा।


 


Tuesday, March 17, 2026

बेटियाँ

 बिटिया की किलकारी


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

18-3-26.

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बिटिया महालक्ष्मी की देन।

 भारतीय रूढ़िवादी 

 देवी स्वरूपा की प्रशंसा 

 करते करते

 उनकी आराधना के साथ साथ,

बेगार भी बनाती थी।

 भ्रूण हत्या करने में 

 ज़रा भी हिचकती नहीं।

 पति के मरते ही जिंदा जलाना।

 बालविवाह शादी क्या है

 जानने के पहले ही शादी।

 विधि की विडंबना से

 पति मर जाएगा,तो

 असीमित वेदनाएँ,

 अमंगल रूप,

 अपशकुन का पात्र।

 जवाहर व्रत न जाने 

 कितनी परेशानियां।

 आज भी शिक्षित युवतियाँ,

 ससुराल में किलकारियां न कर सकती।

 किलकारी मायके के साथ नौ दो ग्यारह हो जाती।

सीता से लेकर मीरा लक्ष्मीबाई तक 

 उर्मिला  तक

 मंदोदरी तक शादी के बाद किलकारी नहीं।

 दमयंती शकुंतला चंद्रमणि तक कितने संकट

 मानसिक पीडाएँ।

 मुमताज के पति को 

 मारकर शाहजहां के अपहरण और  प्रेम महल का नाटक ताजमहल।

 शेरखाँ की हत्या

  बुढ़ापे में शाहजहाँ ने ताजमहल को छेद के द्वारा  देखा।

 आधुनिक 

काल में  बेटियों का 

 समान अधिकार,

  भ्रूण हत्या को दंड

 पोक्सो कानून ,

 जो भी हो 

बेटियों की ‌किलकारियाँ

 अब तक  अंतर्मन में नहीं।

 अधिकांश बेटियाँ,

 छे साल की उम्र में भी

 डर की संभावनाएँ

 पाठशालाओ में 

 अच्छा स्पर्श बुरा स्पर्श 

 की सीख,

 अब शिक्षा, नौकरी।

 पर पुरुष सत्तात्मक 

 दमन नीति कम नहीं हुई।

 नौकरी करके 

घर आते ही

 सब काम,

 दफ़्तर  जाने के पहले

 रसोई, पति की सेवा,

 सास ससुर का डर,

 सामाजिक अफ़वाहें 

 बेटियों की किलकारी 

 अंतर्मन से नहीं,

 दिल में रोती हुई बाहर की किलकारी।

  बेटियाँ बहुएँ बनते ही

  मायके के प्रेम दिखाने में भी पूरी स्वतंत्रता नहीं।


 


 

 




 


 

Monday, March 16, 2026

 देव और दानव 

ऍस. अनंतकृष्णन, चेन्नै
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देव तो सर्वशक्तिमान है, 
सर्वज्ञ है,
फ़िर भी पुरानों में  
दानवों से डरते थे।
दानव देवों को कारावास की सजा देते थे।
कठोर तपस्या मनमाना वर पाकर
असुरों के अत्याचार चरमसीमा पार हो जाते।
हिरण्य कश्यप असुर राजा, अहंकारी,
ब्रह्मा से अजेय होने का वरदान पाया। 
वह खुद अपने को भगवान घोषित किया।
जनता को आज्ञा दी कि हिरण्याय नमः का ही जप करना है। 
नारद के उपदेश के कारण हिरण्यकश्यप् का बेटा प्रह्लाद
भगवान का अटल भक्त बना।
यह भी दानव और देव का संघर्ष। 
हिरण्य का वध करने विष्णु को नरसिंह का अवतार लेना पडा।
भस्मासुर ने शिव से वर पाया कि
जिसके सिर पर वह हाथ रखता, वह सिर चूर्ण चूर्ण हो जाय।
तब विष्णु को मोहिनि अवतार लेना पडा। 
देव असुरों को हरा न सकें तो
तपस्विनि महर्षि मानव दधिची के सामने 
अनुनय विनय करके उनकी रीढ की हड्डि दान लेकर
असुरों को हराना पडा। 
महिषासुर को वध करके देवी महिषासुर वर्द्धिनि बनी।
समुद्र मंथन में शिव को विष पीना पडा।
अत्याचारी दानव और सद्गुणी देव का संबंध
साँप-छछुंदर की गति होती है।













समय का पर्दा

 समय का पर्दा

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३-१२-२५.

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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 समय का पर्दा डालकर 

 हर पल को व्यर्थ करनेवाले 

 अलसी/सुस्ती/निष्क्रिय 

 अज्ञानी जीव/

 यों ही जुआ, संगणिक खेल, गपशप,  

विलासिता,ऐश आराम में 

 बिताता रहता है।

 वही समय का पर्दा

 मानव डाल रखा है।

 तड़के उठना वैज्ञानिक धर्म, 

पर समय पर पर्दा डालकर मीठी नींद सोना, 

पर्दा तो है ही,पर

सम पर्दे के पीछे बंधे नहीं,

समय को नकेल से सीधे जाओ, 

नहीं बता सकते।

रुको का पर्दा नहीं डाल सकते।


 अनमोल समय,

पर्दा मानव डाल अपने

 समय गँवाकर बुढ़ापे में 

 तड़पते पछताते रहते हैं।

 समय की परवाह न करने पर

 वह किसी की परवाह नहीं करता।

 रात दिन का चक्र रोक नही़ं सकता।

कल करै तो आज कर,

 आज करै़ तो अभी।

पल में होगा प्रलय।।

 अच्छे दिन पाछे गये

 अब पछताने से होता क्या,

जब चिड़िया चुग गई खेत।

समय का पर्दा हटता नहीं 

 वह तो चलन शील।



 




अजब दौर

 अजीब दौर 

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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17-3-26

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सर्वेश्वर की सृष्टि में अजीब दौर अनुदिन देखते रहते हैं।

 शबनम दीखन ओझल होना,

 सूर्योदय और सूर्यास्त 

 रात -दिन का

 आना जाना।

  पक्षियों का कलरव।

 मौसमी परिवर्तन,

 वर्षा में मेंढक का टरटराना।

 मोर का नाच।

  पतझड़ में ठूँठ।

 वसंत में पनपना।

 वर्षा में बाढ।

 गर्मी में  चिलचिलाती धूप।

  ग्रीष्म वासस्थल में  बादलों के कोहरा।

 सूर्योदय सूर्यास्त की लालिमा।

 नक्षत्रों का जगमगाना।

 समुद्र की लहरों का शोर।

 मध्य सागर में शांति 

 समुद्र की विचित्र मछलियाँ।

रंग बिरंगे सीपियाँ,

 सीपी मे मोती।

 मौसमी फलों के

 विभिन्न स्वभाव, सुगंध।

 मौसमी फूलों का सौंदर्य

 बड़े आकार के छोटे आकार के

 विभिन्न रंगों के सुगंध के फूल 

 अजीब दौर प्रकृति का।

 तितलियों के विभिन्न आकार 

 कीड़ों का घृणित रूप।

तितलियों का लुभावना रूप।

 अति आकर्षक अजीब दौर 

 प्रकृति का।

 कण कण में अजीब दौर।

 मकड़ी के जाल,

 उस में फँसकर तड़पते जीव।

 भ्रूण अवस्था से बुढ़ापे तक का

 मानव जीवन के अजीब दौर।

 ज्ञान चक्षु प्राप्त मनुष्य की तुलना जानवरों है,

 चींटियों के कतार,

 दीमक के बिल 

 बयां के मजबूत घोंसले।

 रात के अंधेरे में 

 उल्लू बिल्लियों की देखने की शक्ति।

 अति अद्भुत चमत्कार सृष्टियाँ

 अजीबोगरीब दौर भूमंडल का।

 



 

 




 

 


Saturday, March 14, 2026

मौसम मानव

 मौसम और  मनुष्य।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

सौहार्द  सम्मान प्राप्त तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक  द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

15-3-26

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मौसम एक साल में 

 छे ऋतुएँ।

 मानव जीवन में 

 छे अवस्थाएँ,

 भ्रूण, बचपन, किशोरावस्था,

जापानी, प्रौढ़ावस्था 

 बुढापा।

 हर ऋतु  एक ऋतु से  विपरीत।

 यों ही मानवीय अवस्था भी।

 ऋतु में गुण सहज कृत्रिम नहीं,

 वह प्राकृतिक देन।

 मानव गुण परिवर्तन शील।

 संगति के अनुसार,

 मानव गुण में परिवर्तन।

शिक्षित मानव गुण।

  अनपढ़ मानव गुण,

 आदिवासी मानव गुण 

 स्वार्थ निस्वार्थ गुण

 लोभ के गुरु ईर्ष्यालु गुण

 अहंकारी गुण।

 नायक गुण, खलनायक गुण, विदूषक गुण 

 पतिव्रता के गुण 

 लंबी के गुण

 वीरांगना के गुण 

 विषकन्या वारांगना गुण

 वैसे ही वर्षा की बूंदों में 

 गुण परिवर्तन।

 एक बूंद मोती तो एक बूंद मोरे में मिलर बदबू।

स्वाती नक्षत्र वर्षा के गुण 

 सर्प में विष् कदली में स्वाद, सीपी में मोती।

  मौसम और मनुष्य में 

 मनुष्य में इन्सानियत,

 प्रकृति में भी शांत प्रकृति, हिंसात्मक प्रकृति।

 वसंतकाल पतझड़।

 मलय पवन,

 आंधी तूफ़ान

दावानल

मोसम और मानव 

 दोनों दयालू और निर्दयी।

मानव प्रदूषण प्रकृति को बिगाड़ता तो

 प्रकृति मौसम दुख प्रद ही।



 







 

 

 

 

 




 



 

 

Thursday, March 12, 2026

व्यथा

 मन की व्यथा

ऍस. अनंतकृष्णन, चेन्नै, तिलनाडु 13-3-26.

मानव जीवन में मन की व्यथा,

जन्म से लेकर जीवन पर्यंत।

मनुष्य का जन्म अंधकारमय गर्भ से,

उजाले की ओर रोते हुए होता है।

भूख लगने पर रोना,

पेट भरते ही हँसना यही शैशवावस्था।

आधुनिक शिशु की व्यथा,

तीन साल की उम्र से प्रारंभ।

तभी वह प्रि के.जी।

शिशु को हरफनमौला बनाने

तकाजा, पाठशाला से आते ही

ट्यूशन का तकाजा,

सोलह साल की उम्र तक 

परीक्षा और अंक की चिंता।

तब शारीरिक परिवर्तन,

स्वर परिवर्तन,

काम वासनाएँ,

अश्लील चित्रपट के चित्र,नाचगान।

जितेंद्र रहना अति मुश्किल।

लडके -लडकियों के संयमित जीवन की चिंता।

उच्च शिक्षा और अच्छी नौकरी की चिंता।

योग्य पात्र से विवाह की चिंता।

संतान की चिंता,

संतान न होने की चिंता।

आर्थिक अभाव की चिंता.

पदोन्नति की चिंता।

ईर्ष्या के कारण चिंता,

लोभ के कारण चिंता।

काम की चिंता,

तलाक की चिंता।

महँगाई की चिंता,

भ्रष्टाचार की चिंता

मन में व्यथा की लहरें।

ज्वारभाटा कभी शांत नहीं होता।

पल पल में नयी नयी व्यथाएँ।

प्राकृतिक प्रकोप की चिंताएँ।

कुशासन के कारण चिंता।

मच्छरों के कारण.

पत्नी और माँ के बीच

साँप छचूंदर की गति होना।

कौन सी भगवान श्रेष्ठ है की व्यथा।

मन की व्यथा का अंत नहीं।

Wednesday, March 11, 2026

अनमोल रत्न

 अनमोल रत्न।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना।

11-3-26

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ज्ञान चक्षु प्राप्त 

मानव के लिए

 भ्रष्टाचार और घूस से

 ठगाकर  चल अचल 

 संपत्ति जोड़ना,

अमूल्य

हीरे,चाँदी,सोना 

ढेर  जमाना,

 अनमैल रत्न नहीं जान।

 बड़े बड़े राजमहल,

 राज सुख  

 अश्वमेध यज्ञ की वीरता,

 कमजोरों से धन कमाना,

 एक वीर राजा तो

उसी वंशज के कमजोरी 

 अब उनके अमूल्य 

 मजबूत किले

 कोई काम नहीं।

 कर्म ही अनमोल रत्न।

 अंग्रेज़ चले गये,

 पर उनकी भाषा ज्ञान से

 तकनिकी विकास,

  चिकित्सा,

 संगणिक ज्ञान 

 जीविकोपार्जन के साधन।

 आवागमन के साधन,

 रेल पट्रियाँ,

 प्राण रक्षक नैदानिक यंत्र

 गर्मी में ठंडा,

 सर्दी में गर्म।

 रक्त दान, नेत्र दान,। किडनी दान, केंसर की दवाएँ,

 वेदों, पुराणों, उपनिषदों

 के  अमूल्य शास्त्र,

जितेंद्रिय की प्रधानता

 योग, प्राणायाम, और

 स्वास्थ्य प्रद मुद्राएँ।

कबीर की अमृतवाणी,

‌तुलसी ,सूर के भक्ति मार्ग।

 मानव एकता के लिए 

 जाति न पूछो साधु की,

पूछ लीजिए ज्ञान।

काम क्रोध मद लोभ

गुण के कारण 

 पंडित भी मूर्ख समान। 

 ये नहीं भक्त।

जिस कृष्ण की कृपा

लंगड़ा चल सकता है,

 गूँगा बोल सकता है,

 बहरा सुन  सकता है,

 उसकी वंदना करता हूँ।

ये कवि वचन अनमोल रत्न।

विश्व कल्याण, एकता, शांति के अमोल वचन।

 स्वतंत्रता जन्म सिद्ध अधिकार।

अहिंसा परमो धर्मः 

 जय जगत,

 वसुधैव कुटुंबकम्।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

 जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य ये सब अमूल्य 

अनमोल रत्न।

 अमर रत्न विश्वकल्याण के लिए।

 

तिरुमंत्र — पद १–१०

(सुसंपादित हिंदी रूप)

1. विश्व में सर्वत्र शिव

समस्त विश्व को एक ही सत्य में देखो —
वह सत्य शिव है।

शिव और शक्ति दो रूपों में प्रकट होकर
सभी प्राणियों पर कृपा करते हैं।

“मैं”, “तुम” और “वह” —
इन सबका मूल वही परम सत्य है।

वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष —
इन चारों पुरुषार्थों का मार्ग बताता है।

पंचेन्द्रियों को वश में करने की शक्ति देता है।
मूलाधार से सहस्रार तक
सभी चक्रों में वही विद्यमान है।

भूमि, वायु, अग्नि, आकाश,
सूर्य, चंद्र, आत्मा —
इन सभी में वही शिव व्याप्त है।

ऐसे सर्वव्यापी शिव को
मैं प्रणाम करता हूँ।


2. पवित्र और मधुर शक्ति

वह शाश्वत और पवित्र शक्ति
हमारे भीतर मधुर रूप में निवास करती है।

चारों दिशाओं के स्वामी,
पराशक्ति के अधिपति,
दक्षिण दिशा के यम को भी पराजित करने वाले
महादेव शिव की मैं स्तुति करता हूँ।


3. परमशिव के समीप

परमशिव सर्वत्र विद्यमान हैं।

वे ब्रह्मांड के प्रत्येक जीव में
अमर स्वरूप से बसे हुए हैं।

वे आसक्ति से रहित,
परम स्वतंत्र और शाश्वत हैं।

ऐसे भगवान शिव की
मैं प्रतिदिन प्रार्थना करता हूँ।


4. प्राणों के प्राण

सभी प्राणियों के प्राणों के भी प्राण
वही परम सत्य हैं।

सृष्टि के सभी बीज
उनमें ही स्थित हैं।

उन परमेश्वर की
दिन-रात वंदना करके
मैं अपनी अज्ञानता को दूर करता हूँ।


5. अतुलनीय शिव

शिव के समान
इस जगत में कोई अन्य नहीं।

उन परमात्मा की तुलना
किसी मनुष्य से नहीं हो सकती।

यह सम्पूर्ण जगत
जिसमें स्वर्ण के समान प्रकाश है,
वह उसी शिव की ज्योति है।

लाल जटाओं से सुशोभित
वह शिव कमल के समान पवित्र हैं।


6. शिव ही सब कुछ

शिव के बिना
इस संसार में कुछ भी नहीं।

शिव से बढ़कर
कोई श्रेष्ठ देव नहीं है।

शिव को लक्ष्य बनाकर की गई तपस्या से
श्रेष्ठ कोई तपस्या नहीं।

शिव की कृपा के बिना
सृष्टि, पालन और संहार भी संभव नहीं।

शिव के अतिरिक्त
मुक्ति का कोई मार्ग मैं नहीं जानता।


7. आदिदेव शिव

आदि काल से पहले भी
शिव ही थे।

वे अति प्राचीन और
सर्वोच्च ब्रह्म हैं।

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र से भी
श्रेष्ठ वही शिव हैं।

उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती।

जो उन्हें “पिता” कहकर पुकारते हैं,
वे सबके पिता हैं।


8. मातृवत् स्नेह

शिव में अग्नि से अधिक उष्णता है
और जल से अधिक शीतलता है।

पर उनकी कृपा को
बहुत कम लोग जान पाते हैं।

वे शिशु से भी अधिक सरल,
माता से भी अधिक स्नेहमयी
और भक्तों के सच्चे सहायक हैं।


9. शिव का कोई स्वामी नहीं

मेरे आराध्य ब्रह्म — नंदीश्वर हैं।

स्वर्ण के समान ज्योति से युक्त
जटाधारी शिव
स्वयं में पूर्ण हैं।

उनके ऊपर कोई अन्य
स्वामी या देव नहीं है।


10. सर्वस्व शिव

यह विशाल ब्रह्मांड
शिव पर ही आधारित है।

अग्नि वही है,
सूर्य वही है,
चंद्र वही है,
वर्षा वही है।

माता भी वही है,
ऊँचे पर्वत भी वही हैं,
और गहरे सागर भी वही हैं।

सर्वत्र केवल
शिव ही शिव हैं।



तिरुमंत्र — पद ११–२०

(सुसंपादित हिंदी रूप)

11. प्रयास और उसका फल

इस प्राचीन संसार के रहस्य का
जब हम गहराई से विचार करते हैं,
तो ज्ञात होता है कि
शिव के समान महान ईश्वर कोई नहीं।

वे न दूर हैं, न निकट —
वे सर्वत्र विद्यमान हैं।

हमारा प्रयास भी वही हैं,
और उस प्रयास का फल भी वही हैं।

वर्षा के बादल भी वही हैं —
उनका नाम नंदी है।


12. तीसरी आँख का रहस्य

शिव की तीसरी आँख
आज्ञा चक्र का प्रतीक है।

जब वह कृपा से खुलती है,
तो असंख्य देव अमरत्व प्राप्त करते हैं।

किन्तु अज्ञानवश लोग कहते हैं कि
शिव की दृष्टि से लोग नष्ट हो जाते हैं।

वास्तव में वे नष्ट नहीं होते —
वे देवत्व को प्राप्त कर
अमर हो जाते हैं।


13. शिव का विराट स्वरूप

भगवान विष्णु और ब्रह्मा ने
शिव के विराट स्वरूप को देखने का प्रयास किया,
पर वे उसे पूर्णतः न देख सके।

शिव आकाश से भी अधिक व्यापक हैं।
उनके गुणों को कोई पूरी तरह समझ नहीं सकता।

उनसे बड़ा कोई नहीं है।

वह सर्वत्र व्याप्त हैं —
ऐसा कोई स्थान नहीं
जहाँ शिव उपस्थित न हों।


14. चक्रों में स्थित शिव

स्वाधिष्ठान चक्र में शिव
ब्रह्मा से भी परे हैं।

मणिपूर चक्र में
वे विष्णु से भी श्रेष्ठ हैं।

अनाहत चक्र में
वे इंद्र से भी ऊपर हैं।

इन सबके शिखर पर स्थित होकर
शिव सम्पूर्ण जगत की
देखभाल करते हैं।


15. आदि भी वही, अंत भी वही

शिव ही सृष्टि के कर्ता हैं
और वही संहार के भी कर्ता हैं।

जन्म और मृत्यु के मध्य
शरीर को चलाने वाली शक्ति भी वही हैं।

उनकी कृपा-ज्योति कभी क्षीण नहीं होती।

वे शाश्वत और अमर हैं।
न्याय देने वाले वही हैं।

वे ही आदि हैं,
वे ही अंत हैं,
और बीच की सारी गति भी वही हैं।


16. अर्द्धनारीश्वर

घुँघराले जटाओं से सुशोभित,
अमलतास के पुष्पों से विभूषित
सुंदर स्वरूप शिव भगवान

अपने अर्धांग में
देवी उमा को धारण करते हैं।

इस प्रकार वे
अर्द्धनारीश्वर के रूप में विराजमान हैं।

देवता अपने दोषों को दूर करने
और सद्गुण प्राप्त करने के लिए
उनके चरणों की वंदना करते हैं।


17. ईश्वर से संबंध

इस संसार में
हमारे अनेक संबंध होते हैं,
किन्तु ईश्वर से जुड़ा संबंध
सबसे श्रेष्ठ है।

सूक्ष्म शरीर में स्थित
दिव्य चेतना से
जब हम जुड़ते हैं,

तब ईश्वर से हमारा
अटूट संबंध स्थापित होता है।


18. कुबेर बनने का मार्ग

अलका पुरी के राजा
कुबेर धन के अधिपति बने
क्योंकि उन्होंने शिव की तपस्या की।

यदि हम भी उसी प्रकार
भक्ति और तप का मार्ग अपनाएँ,
तो जीवन में समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसा मार्ग बताने वाले
शिव को मैं प्रणाम करता हूँ।


19. सच्चे तपस्वी के निकट शिव

शिव ने सुगंधित
सात लोकों की सृष्टि की है।

वे ही उनके संहारक भी हैं।

चंद्रकलाधारी, सर्वज्ञ शिव
सच्चे तपस्वियों के मन में
अपना निवास बनाते हैं।


20. ईश्वर का विधान

हमारे जन्म से पहले ही
शिव हमारे जीवन और मृत्यु
दोनों का विधान कर देते हैं।

जो भक्त उनके चरणों को पकड़ लेते हैं,
उनके लिए
वज्र की गर्जना भी
ईश्वर की वाणी जैसी लगती है।

ऐसे भक्त
ईश्वर के प्रेम में स्थित होकर
जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करते हैं।

युद्ध और शांति

 नमस्ते वणक्कम्।

 युद्ध और शांती

 भू भार कम होने युद्ध।

भू भार बढ़ने शांति।

भू भार कम होने प्राकृतिक कोप।

 मानव दूंगी रहने

 काम क्रोध मद लोभ।

मानव ईश्वर का स्मरण करने

 रोग, ग़रीबी, दुर्घटना मृत्यु आर्थिक 

 निस्संतान संकट।

 योग्य माता पिता पति पत्नी 

न मिलने का संकट।

 जीवन संग्राम

 प्रकृति के ऋतु चक्र।

 पतझड़  में मृत्यु का संदेश।

 वसंत में  पुनर्जन्म का संदेश।

 अतिवर्षा का आक्रमण 

 अति अकाल वर्षा रहित।

 भूलोक जीवन संघर्षशील।

 एस‌ अनंत कृष्णन, चेन्नई 

सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक

Monday, March 9, 2026

व्यथा

 नमस्ते। வணக்கம்.

++++++++((

मन की व्यथा

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एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

10-3-2026

मन की व्यथा

कुछ बाहर प्रकट करने की,

कुछ मन में ही घुट-घुटकर

तनाव बढ़ाने की।

मानव जीवन में

पीड़ाओं की कोई कमी नहीं।

ईश्वर के अवतार राम भी दुखी,

महाराज दशरथ भी दुखी।

कृष्ण के आश्रित पांडव भी दुखी,

ईर्ष्या वश कौरव भी चिंतित।

अहंकार से भरे रावण—

वेदों के ज्ञाता होकर भी दुखी।

मानसिक पीड़ा

प्रकट करने पर भी

नाते-रिश्तेदार हँसते हैं,

मज़ाक उड़ाते हैं।

कर्मफल के कारण

साध्य-असाध्य रोग,

अल्पायु मृत्यु का भय।

ठंड से पीड़ा,

चोरी का भय,

लालच और ईर्ष्या का दंश,

ज्ञात-अज्ञात भय की छाया।

जाने-पहचाने दुश्मन,

कुल-द्रोह का संताप,

सत्य छिपाकर दुख बोलने की विवशता।

आर्थिक संकट,

इष्ट का वियोग,

अनिष्ट का संयोग।

कुमित्रों का संग,

मित्रों के संकट का दुःख,

व्यापार में घाटा—

सब मिलकर

मानव मन को पीड़ित करते हैं।

व्यथा भरा यह मानव जीवन

काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या

इन भूलों से घिरा है।

माया शक्ति का बाह्य आकर्षण

और ईश्वरीय सूक्ष्म दंड की देरी—

दुःख को और बढ़ा देती है।

ऐसे में रहीम का यह दोहा

विचारणीय और चिंतनीय है—

रहिमन निज मन की बिथा,

मन ही राखो गोय।

सुनि अठिलैहैं लोग सब,

बाँटि न लैहै कोय॥

🙏 आदरणीय, आपकी रचना में दार्शनिक गहराई है। य

आपकी साधना सच में प्रेरणादायक है। ✨

Sunday, March 8, 2026

शब्द के मेले

 आदरणीय महोदय, वणक्कम 

शब्दों का मेला

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

गुरुभ्यो नमः

शब्दों के मेले में

शोर भी है, कलरव भी है,

मधुर स्वर भी, कठोर स्वर भी।

कुछ शब्द

दोस्ती करवाते हैं,

कुछ शब्द

दोस्ती बिगाड़ जाते हैं।

कुछ शब्द

दुश्मनी मिटा देते हैं,

कुछ शब्द

दुश्मनी बढ़ा देते हैं।

कुछ शब्दों से

लड़ाई-झगड़े जन्म लेते हैं,

कुछ शब्द

प्राण देने-लेने का कारण बन जाते हैं।

कुछ शब्द

छल-कपट और ठगी के होते हैं,

कुछ शब्द

चापलूसी से भरे होते हैं।

कुछ शब्द

जल से भी अधिक मधुर,

हृदय को शीतल करने वाले।

कुछ शब्द

दया और शोक जगाते हैं,

भिखारी से विनती करवाते हैं —

“भवति भिक्षां देहि।”

कुछ शब्द

आध्यात्मिकता का दीप जलाते हैं,

कुछ शब्द

प्रेरणा और उत्साह जगाते हैं।

कुछ शब्द

हतोत्साहित करते हैं,

कुछ शब्द

दिलासा और आशा देते हैं।

कुछ शब्द

निराशा के अंधकार से भरे,

कुछ शब्द

वीरता का बिगुल बजाते हैं।

कुछ शब्द

कायरता प्रकट करते हैं,

कुछ शब्द

विदूषक बनकर हँसाते हैं।

कुछ शब्द

शाप बन जाते हैं,

कुछ शब्द

शाप से मुक्ति दिलाते हैं।

उच्चारण का भी प्रभाव देखो—

“भाप आये, पाप आये, बाप आये।”

शब्दों के

सही या गलत प्रयोग से ही

मंगलमय

या अमंगलमय

बन जाता है जीवन।


Saturday, March 7, 2026

नारी शक्ति

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏

आपके विचार बहुत गंभीर और सामाजिक अनुभव से भरे हुए हैं। मैंने आपकी रचना को भाव वही रखते हुए भाषा और प्रवाह में थोड़ा सुधारकर प्रस्तुत किया है।

नारी शक्ति

(भावाभिव्यक्ति)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना

महान कवि सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है—

यदि स्वर्ग है,

तो नारी के उर के भीतर।

यदि नरक है,

तो वह भी नारी के उर के भीतर।

आधुनिक काल

नारी के लिए

एक प्रकार से स्वर्णकाल है।

नारियों की रक्षा के लिए

कई कानून बने हैं—

जैसे POCSO Act।

दहेज के अत्याचार पर भी

कठोर कानून हैं;

अत्याचार होने पर

सास-ससुर तक को

कारावास हो सकता है।

फिर भी लोक-लज्जा के कारण

कई नारियाँ

पुरानी रूढ़ियों का

अनुकरण करती रहती हैं।

कानून साथ होते हुए भी

अड़ोस-पड़ोस की

अफ़वाहें और बातें

सह पाना कठिन लगता है।

किन्तु अब

इस दिशा में

धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा है।

जबरदस्ती पहनाए गए

मंगलसूत्र को भी

उतार फेंकने का साहस

कुछ स्त्रियों में

जाग रहा है।

पत्थर जैसा हो

या घास जैसा—

पुरुष चाहे जैसा भी हो,

मार-पीट सहकर भी

पति को देवता मानना—

ये सब

परंपरागत अंधविश्वास

धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं।

तलाक़ के बाद

दूसरा विवाह भी

अब समाज में

स्वीकार होने लगा है।

वैधव्य की

भद्दी वेशभूषा

और कठोर नियमों में भी

परिवर्तन आ रहा है।

विधवा पुनर्विवाह की

महान क्रांति

महान समाज सुधारक

राजा राम मोहन राय ने आरंभ की थी।

आज

वह विचार

धीरे-धीरे

चरितार्थ होता दिखाई दे रहा है।

यदि आप चाहें तो मैं:

इस कविता को और अधिक काव्यात्मक (लयबद्ध) बना सकता हूँ।

या इसे महिला दिवस के लिए एक शक्तिशाली समापन के साथ भी तैयार कर सकता हूँ।

आपके विचारों में समाज का 70 वर्षों का अनुभव झलकता है — यही आपकी रचनाओं की सबसे बड़ी शक्ति है। ✨🙏

नारी शक्ति

 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

(भावाभिव्यक्ति)

अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना

8-3-2026

मैं छिहत्तर वर्ष का बूढ़ा हूँ।

मेरी अपनी दस वर्ष की आयु से लेकर

आज तक नारियों की

असंख्य शोक-कथाएँ सुनी हैं।

नारी जीवन के चरित्र में

भारतीय स्त्रियाँ

कभी बेगार बनी रहीं।

बालिका विवाह,

पति-पत्नी का अनमेल विवाह,

शादी क्या है —

यह जानने से पहले ही शादी।

बारह वर्ष में वैधव्य,

सती-प्रथा की अग्नि,

पतिव्रता के कठोर सिद्धांत।

भले ही राम की पत्नी हो —

अफवाहों के कारण त्याग;

सीता का वनवास।

वसुदेव-देवकी की कथा,

द्रौपदी को जुए में हारना,

भरी सभा में अपमान।

दुष्यंत-शकुंतला की पीड़ा,

नल का दमयंती को

आधी रात जंगल में छोड़ जाना।

हरिश्चंद्र द्वारा

पत्नी को बेचकर दासी बनाना,

और सीता का

भूमि में समा जाना।

भारतीय नारियों की

रामकहानी अनंत है।

जौहर की अग्नि में

जीवित जलती स्त्रियाँ,

अबला रूप में

युगों की वेदना।

फिर भी —

नारी का सबला रूप भी है।

त्रिदेवियों की आराधना,

नारी के अनेक रूप —

भद्रमहिला, वीरांगना।

आज की आधुनिक,

शिक्षित महिलाएँ भी

कष्टों से पूर्ण मुक्त नहीं।

पति-पत्नी दोनों

नौकरी करते हैं,

पर घर की जिम्मेदारी

अधिकतर नारी ही संभालती है।

अब भी

नारी पूर्ण स्वतंत्र नहीं।

ईश्वर की सृष्टि में

गर्भधारण और वंशवृद्धि का भार

नारी पर ही है।

पुरुष का सुख एक दिन,

नारी का दुःख

दस महीनों का।

फिर शिशु का पालन,

ममता का अमृत।

प्रकृति की इस सृष्टि में

नर के सामने

नारी कभी-कभी

अबला दिखाई देती है।

पर इतिहास गवाह है —

जब समय पुकारता है,

वही नारी

वीरांगना बनकर उठती है,

जैसे रानी लक्ष्मीबाई।

Friday, March 6, 2026

नाम जफ

 आपके भाव बहुत गहरे और आध्यात्मिक हैं। मैं आपकी रचना को थोड़ा व्यवस्थित और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ — भाव वही रखते हुए।

शीर्षक: नाम जप ही मेरा काम

नींद नहीं आई,

मन में कोई चिंता नहीं,

शरीर में कोई पीड़ा नहीं,

फिर भी नींद नहीं आई।

मन कहता है —

कुछ करो, कुछ कमाओ,

देश कल्याण के लिए

कुछ तो कार्य करो।

पर मैं तो

पचहत्तर वर्ष का वृद्ध हूँ,

क्या करूँ? कैसे करूँ?

तभी भीतर से

आत्म चेतना जाग उठी —

कहने लगी धीरे से,

“कुछ मत करो,

केवल नाम जपते रहो।

तुम्हारे शुभ विचारों को

कोई न कोई

कहीं न कहीं

कार्य रूप देगा।”

तब समझना —

तुम्हारा जनकल्याण का भाव

किसी दूसरे दिव्य मानव के द्वारा

साकार हो रहा है।

कवि गीत लिखता है,

पर उसे मधुर स्वर में

गाने वाला

कोई दूसरा होता है।

बस उसी तरह —

तुम्हारा काम है

नाम जपना।

नाम जप ही

तुम्हारा कर्म,

तुम्हारा धर्म,

तुम्हारा जीवन। ।

Thursday, March 5, 2026

लोभ

 लालची जमाई।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

6.3-26.

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मानव ज्ञान चक्षु प्राप्त है।

 फिर भी वह दुखी हैं।

विश्वामित्र मुनि वशिष्ठ समान बनने के प्रयत्न में।

रामावतार कृष्णावतार 

 वामनावतार में  विशिष्ट उद्देश्य।

 वे दुखी थे, अपने लक्ष्य प्राप्ति के  लिए ज़रा अधर्म से हटे।

 ऐसी नश्वर और मिथ्या जगत में मानव सद्यःफल के लिए,

 माया में ही फँस जाता।

 अनजान में ही 

 वह लालची बन जाता।

 धन के लालची,

 पद के लालची

 अधिकारक्षेत्र  में लालची।

 वाराणसी ईर्ष्या के केंद्र।

 ईर्ष्यालु और लालची 

 कभी सुखी नहीं होते।

 उनके मन में 

 जो नहीं है,

 उसको प्राप्त करने की

 अभिलाषा।

 अडैस पड़ोस के लोगों में 

जो नया है

जो संपत्ति है

 उनको प्राप्त करने सदा दुखी ।

 लोभ से बड़ा घाटा होता है।

 असंतुष्ट और बेचैनी जीवन।

जितना है, उससे आनंद नहीं।

जो नहीं है,उसकी चिंता।

 लालची कंजूसी होता है।

कबीर के दोहे देखिए 

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।

भक्ति करे कोई सूरमा, जाति बरन कुल खोय॥"


"गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।

दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥"

"माया मुई न मन मुवा, मरि-मरि गया सरीर।

आसा त्रिष्णाँ नाँ मुई, यौं कहै दास कबीर॥"

Tuesday, March 3, 2026

भाव की श्रेष्ठता

 भाव की श्रैष्ठता

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-3-25.


पुनरुक्त, 

शब्द युग्म द्विरुक्त

ध्वनि अनुकरण शब्द 

  भावार्थ देने पर अधिक महत्व।

 कल कल, चल चल, सरसर टण टण ये ध्वनि अनुकरण,

 पर भाव नहीं इसमें।

 भाव नहीं तो,

  महत्व नहीं,

टण टण घंटी बजती है

 भक भक रेल चलती हैं

सर सर हवा बहती है

 ये हैं  ध्वनि अनुकरण।

 ध्वनि के लिए अर्थ नहीं 

आहिस्ते आहिस्ते , धीरे-धीरे,घर- घर ,

दिन दिन, ।

सार्थक निरर्थक शब्दों में 

 भाव नहीं तो

 कोई प्रयोजन नहीं।

 रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब शून।

पानी गये न उभरे 

 मोती मानुष चूना।

 पानी के श्लेषार्थ के कारण भाव गंभीर होता है।

 

 सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर"

 सुवर्ण के तीन अर्थ के कारण भाव गंभीर होता है।

 भाव प्रधान कहानियाँ

 अपना अपना भाग्य,

 प्रेरणा देनेवाले नारे

 स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार।

वंदेमातरम 

 जय जवान जय किसान।

 हम दो हमारे दो।

 अहर्निशम् सेवा में

  ये कितने भाव प्रधान होते हैं,

 भाव प्रधान न हो तो 

 वह अस्थाई हो जाते हैं।


"पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन।

 कितने भाव भरा वाक्य है।

 अतः  भाव  की श्रेष्ठता 

 न तो  न जनकल्याण,

न लोक हित।

 वसुधैव कुटुंबकम्,

  सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

 जय जगत।

कितने  प्रेरणाप्रद

 जगत शांति का मार्ग।

 अहिंसा परमो धर्मः।

 ये ही श्रेष्ठ भाव

 दुनिया के लिए 

 भाई चारा , एकता, शांति देने के भाव।


 

 

 



 


 

 

 

 

 

  

 


 


 

 


  

 


 

 

 

 

 



 

 

 




 


 



 


 


 


 


 



Monday, March 2, 2026

प्रह्लाद

 प्रह्लाद।

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 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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3-3-26

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 कबीर ने कहा है,

जाको राखे साइयाँ,

 माली न सकै कोई।

 बाल न बांका करि सकै,

 जो जग वैरी होय।।

 इसके प्रमाण में है

 भक्त प्रह्लाद की कहानी।।

 हिरण्यकश्यप असुरों का रिजा,

 ब्रह्म से वर पाया कि

 उसकी मृत्यु न किसी 

 मानव से, जानवर से

अग्नि से पानी से, 

 प्रचंड हवा से,  

किसी भी 

हालत में न हो।

ऐसी स्थिति में नारद ने 

 जब प्रह्लाद गर्भ में था,

 तब विष्णु का महामंत्र,

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः का उपदेश दिया।

वर प्राप्त  असुर राजा,

 अहंकार के कारण 

 अपने को ही   ईश्वर समझा।

 विष्णु का विरोधी बना।

 उसने आदेश दिया 

सबको हिरण्याक्ष नमः 

 कहकर ही जप करना है।

 न विष्णु का नाम।

 असुर राजा के डर है

 देश भर में हिरण्याक्ष नमः का जप गूँजता ।

पर पुत्र प्रह्लाद 

हिरण्यकश्यप की आराधना करने 

तैयार नहीं था।

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।

 पिता के डराने से भी

 न डरा वह।

तब अपने पुत्र को

 मारने के लिए,

 विष पिलाया।

 हाथी द्वारा हत्या करने की कोशिश की।

 समुद्र में  पत्थर बाँधकर फेंका सब से बचकर निकला।

 अंत में अपनी बहन होलिका ,

 जो आग में जलकर मरती  नहीं,

 उसकी गोद में 

बिठाकर जलाया।

 ईश्वर की रक्षा का पात्र

 प्रह्लाद मुस्कुराते जीवित निकला।

 जाको राखे साइयाँ 

 मारी न  सकै कोय।।

 प्रह्लाद और पिता के तर्क  में पिताजी ने पूछा 

 भगवान कहाँ है?

पिता से प्रह्लाद ने कहाँ 

 भगवान इस स्तंभ में है।

 दिखाओ, 

 डाँटते ही ,

 स्तंभ तोड़कर 

 नर्सिंह के रूप में 

 विष्णु प्रकट हुए।

 हिरण्यकश्यप के पेट चीरकर  वध किया।

 प्रह्लाद का चरित्र 

अटल भक्ति,

 समर्पण भाव, 

शरणागति तत्व।

 ठीक है

जाको राखे साइयाँ 

मारी न  सकै कोई।

बाल न बाँकै करि सकै

जो जग वैरी होय।।

वाणी के डिक्टेटर कबीर वाणी।


 



 

 

 

 





 

 

 



 

 



 

 



 

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 


 

 




 

 


 









होली

 होली

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-3-26.

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होली 

क्यों?

रंगीला होली क्यों?

 आनंदोल्लास होली क्यों?

 अपने को ही ईश्वर ऐलान किये,

हिरण्यकश्यप 

अपने ही पुत्र के वध के 

 प्रयत्न में हारते हारते 

 अपनी निर्दयी बहन की याद आती।

 होलिका ने वर पाया है 

वह आग में न जलेगी,

अपने विष्णु भक्त पुत्र

 हिरण्याय नमः  जप  करने इन्कार किया तो

अपने ही पुत्र को मारने

 होलिका के गोद में 

प्रह्लाद भक्त को बिठाकर आग जलाया तो

 भक्त प्रह्लाद तो 

 मुस्कुराते हुए जिंदा निकला।

होलिका जलकर भस्म हो गई।

आम जनता की खुशी का ठिकाना न रहा।

इस दिन वह की याद में,

 आनंदोल्लास होली पर्व।

 आश्चर्य की बात है आदि होली दक्षिण के  विजयनगर में यह पहले पहल होली मनाया गया।

 अन्याय के नाश में 

यह त्योहार भ्रष्टाचारी रिश्वतखोरों यह के लिए एक ख़तरनाक घंटी।

 दूसरी भी कहानी राधा कृष्ण प्रेम मे।

 उनके लिए यह आनंद उल्हास भी।

 दुष्टो़ का वध।

सत्यं वद ।

याद रख ।

ईश्वरीय दंड पुरस्कार निश्चित।

 आदर्श भक्त जीवन को


 ईश्वरीय शक्ति और बाकी निश्चित ।

,+++++++++++++



 

  




 व्

Saturday, February 28, 2026

माँ

 माँ की ममता 

++++++++++

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई 

 स्वरचित रचना 

+++++++++

बंधन रहित स्नेह,

माँ रूपी कवच।


मेरे रूप होने के पहले

मेरे चेहरे देखने के पहले,

मेरे स्वर सुनने के पहले,

माँ के हृदय प्रेम तो

 माँ की तुलना में और कोई नहीं।

 जन्म लेने के बाद,

रोग रहित , अहर्निशम्

जागकर पालनेवाली है माँ।

पालने में, कंधों पर ढोकर 

 रक्षा करनेवाली है माँ।

प्यार का जन्मस्थान,

त्याग का प्रतिबिंब,

गहरे प्रेम की देवी,

बंधन रहित स्नेह, माँ रूपी कवच।

मां से रूठो

माँ से लड़ो,

फिर भी ढूँढकर

 अपने प्यार जताने वाली है माँ।

 हमारे कष्ट के समय,

हमारे रोते समय,

 दिलासा देने वाली है माँ।

माँ के मन में  द्रोह नहीं, धोखा नहीं, प्रेम ही प्रेम में इंगित माँ।

 सर्वस्व विस्मरण करके,

माँ के गोद में सोते

 बचपन ही स्वर्णकाल व

स्वर्गकाल  मेरे।

माँ अपने बारे में चिंतित नहीं,

सदा-सर्वदा चिंतित हैं

 अपने संतान के बारे में।

जान लेने हजारों,

 जान देने एक ही नाता माँ।

ढाई अक्षर मंत्र माँ ही

 मेरे जन्मदात्री।

मेरे प्रथम आराधना देवी माँ ही।

प्यार बताने हजारों होने पर भी 

 प्यार जताने माँ के बराबर माँ ही।

हजारों छुट्टियाँ आने पर भी,माँ के कार्यालय रसोई की छुट्टी नहीं।

उम्र के अंतर न देखती माँ,

माँ के दुलार में 

पचास वर्ष के  बेटे भी शिशु समान।

वर्षा के भीगी मुझे,

 अपने आँचल से पोँछी,

 माँ देखकर 

वर्षा को भी  होगी ईर्ष्या।

माँ प्यार का खान।

 माँ प्यार का कोष।

प्रेमचंद उपन्यास सम्राट की कहानी मेँ,

 माँ का जिक्र देखिए,

 माँ को जलाओ,तो

 दया का सुगंध निकलेगा।

 पीसो तो दया का रस निकलेगा।

 थोड़े में कहें तो

 मातृत्व   वर्णनातीत 

 प्रेम और दया के प्रतिबिंब है।