Search This Blog

Friday, September 18, 2026

ज्ञान का समंदर

 

आज की चुनौती

ज्ञान का पावन समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

ज्ञान से रहित कोई जीव नहीं,
पर मानव का ज्ञान
सत्य-असत्य,
नश्वर-अनश्वर,
स्थायी-अस्थायी को पहचानकर
अपने जीवन को
सभ्य, सुसंस्कृत और सुरक्षित
बनाने में समर्थ है।

फिर भी यह समझना
पूरी तरह सही नहीं कि
मनुष्य सर्वज्ञानी है।

यदि मनुष्य इतना ज्ञानी है,
तो प्राकृतिक प्रकोपों का
पूरी तरह सामना करने में
असमर्थ क्यों है?

अतः ज्ञान का सागर
अत्यंत गहरा है।

ज्ञानी में भी
काम है, क्रोध है,
ईर्ष्या है, लोभ है,
अहंकार है।

वह जानता है
कि एक दिन उसे मरना है,
फिर भी जीवन भर
मोह-माया में उलझा रहता है।

स्नातक और स्नातकोत्तर बनकर
ऑडिटर, डॉक्टर बनकर
सच्ची मानव-सेवा करनी है।

वकील बनकर
न्याय के पक्ष में लड़ना है।

फिर भी समाज में
भ्रष्टाचार और रिश्वत का
बोलबाला क्यों है?

शासक हैं,
पर उनमें स्वार्थ है।

ठेकेदार हैं,
पर कहीं-कहीं कच्ची सड़कें
बनाकर भी काम पूरा मान लेते हैं।

आत्मज्ञानी भी हैं,
समाज-सुधारक भी हैं।

नायक हैं,
खलनायक हैं,
विदूषक हैं।

बलवान हैं,
निर्बल हैं।

रोगी हैं,
असाध्य रोगी भी हैं।

कोई जन्म से अमीर है,
कोई जन्म से गरीब।

मछलियों में
विविध प्रकार हैं।

हाथियों में, कुत्तों में,
हिरनों में,
मच्छरों और मक्खियों में,
भ्रमरों और साँपों में—
प्रकृति की विविधता
असीम है।

पानी के स्वाद में,
हवा के प्रकार में,
ज्ञान का सागर
अत्यंत विस्तृत है।

ज्ञान में भी
सद्ज्ञान है और दुर्ज्ञान।

ईश्वर की सृष्टि में
अति सूक्ष्म से अति विशाल तक
असंख्य रहस्य छिपे हैं।

एक सूक्ष्म बीज से
विशाल वृक्ष का बनना,
एक छोटे से अंडे से
तितली का बनना—
प्रकृति के अद्भुत रहस्य हैं।

हर पल दुर्घटनाएँ होती हैं,
नए-नए संक्रामक रोग आते हैं।
विज्ञान बढ़ता जाता है,
फिर भी अज्ञात का क्षेत्र
और भी विशाल दिखाई देता है।

ज्ञान के सागर में
मोती हैं, हीरे हैं,
चाँदी है, पन्ना है।

पर हीरे की परख
जौहरी ही जानता है।

ज्ञान के समंदर में
जितना गहरा गोता लगाओ,
उतना ही अनुभव होता है
कि अज्ञात बातें
अभी अनगिनत हैं।

भूगोल, खगोल, ग्रह-नक्षत्र,
लाभ-हानि, भाग्य-दुर्भाग्य—
मानव जन्म और मृत्यु के बीच
मिले सीमित जीवनकाल में
ज्ञान के इस अथाह सागर को
पूरी तरह पार कर पाना
अत्यंत दुर्लभ है।

ज्ञान-सागर
अत्यंत विशाल होते हुए भी
मानव-बुद्धि के सामने
अति सूक्ष्म-सा प्रतीत होता है।

ज्ञान का सागर
समुद्र की लहरों के समान है—
कभी ज्वार, कभी भाटा,
कहीं ज्वालामुखी,
कहीं शांत जल।

इसके रहस्यों को
समझना अत्यंत कठिन है।

अंततः मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो,
सृष्टि के विराट रहस्य के सामने
उसका ज्ञान सीमित ही है।

“सब ही नचावत राम गोसाईं।”



आज की चुनौती

ज्ञान का पावन समंदर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

ज्ञान से रहित कोई जीव नहीं,
पर मानव का ज्ञान
सत्य-असत्य,
नश्वर-अनश्वर,
स्थायी-अस्थायी को पहचानकर
अपने जीवन को
सभ्य, सुसंस्कृत और सुरक्षित
बनाने में समर्थ है।

फिर भी यह समझना
पूरी तरह सही नहीं कि
मनुष्य सर्वज्ञानी है।

यदि मनुष्य इतना ज्ञानी है,
तो प्राकृतिक प्रकोपों का
पूरी तरह सामना करने में
असमर्थ क्यों है?

अतः ज्ञान का सागर
अत्यंत गहरा है।

ज्ञानी में भी
काम है, क्रोध है,
ईर्ष्या है, लोभ है,
अहंकार है।

वह जानता है
कि एक दिन उसे मरना है,
फिर भी जीवन भर
मोह-माया में उलझा रहता है।

स्नातक और स्नातकोत्तर बनकर
ऑडिटर, डॉक्टर बनकर
सच्ची मानव-सेवा करनी है।

वकील बनकर
न्याय के पक्ष में लड़ना है।

फिर भी समाज में
भ्रष्टाचार और रिश्वत का
बोलबाला क्यों है?

शासक हैं,
पर उनमें स्वार्थ है।

ठेकेदार हैं,
पर कहीं-कहीं कच्ची सड़कें
बनाकर भी काम पूरा मान लेते हैं।

आत्मज्ञानी भी हैं,
समाज-सुधारक भी हैं।

नायक हैं,
खलनायक हैं,
विदूषक हैं।

बलवान हैं,
निर्बल हैं।

रोगी हैं,
असाध्य रोगी भी हैं।

कोई जन्म से अमीर है,
कोई जन्म से गरीब।

मछलियों में
विविध प्रकार हैं।

हाथियों में, कुत्तों में,
हिरनों में,
मच्छरों और मक्खियों में,
भ्रमरों और साँपों में—
प्रकृति की विविधता
असीम है।

पानी के स्वाद में,
हवा के प्रकार में,
ज्ञान का सागर
अत्यंत विस्तृत है।

ज्ञान में भी
सद्ज्ञान है और दुर्ज्ञान।

ईश्वर की सृष्टि में
अति सूक्ष्म से अति विशाल तक
असंख्य रहस्य छिपे हैं।

एक सूक्ष्म बीज से
विशाल वृक्ष का बनना,
एक छोटे से अंडे से
तितली का बनना—
प्रकृति के अद्भुत रहस्य हैं।

हर पल दुर्घटनाएँ होती हैं,
नए-नए संक्रामक रोग आते हैं।
विज्ञान बढ़ता जाता है,
फिर भी अज्ञात का क्षेत्र
और भी विशाल दिखाई देता है।

ज्ञान के सागर में
मोती हैं, हीरे हैं,
चाँदी है, पन्ना है।

पर हीरे की परख
जौहरी ही जानता है।

ज्ञान के समंदर में
जितना गहरा गोता लगाओ,
उतना ही अनुभव होता है
कि अज्ञात बातें
अभी अनगिनत हैं।

भूगोल, खगोल, ग्रह-नक्षत्र,
लाभ-हानि, भाग्य-दुर्भाग्य—
मानव जन्म और मृत्यु के बीच
मिले सीमित जीवनकाल में
ज्ञान के इस अथाह सागर को
पूरी तरह पार कर पाना
अत्यंत दुर्लभ है।

ज्ञान-सागर
अत्यंत विशाल होते हुए भी
मानव-बुद्धि के सामने
अति सूक्ष्म-सा प्रतीत होता है।

ज्ञान का सागर
समुद्र की लहरों के समान है—
कभी ज्वार, कभी भाटा,
कहीं ज्वालामुखी,
कहीं शांत जल।

इसके रहस्यों को
समझना अत्यंत कठिन है।

अंततः मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो,
सृष्टि के विराट रहस्य के सामने
उसका ज्ञान सीमित ही है।

“सब ही नचावत राम गोसाईं।”

Wednesday, September 16, 2026

अमृत फल

 

आज की चुनौती

अमृत फल

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।
17-9-26

+++++++++++++

मानव को अमर बनाने वाले
दो फल बताए गए हैं—
अमरूद और आँवला।

राजा भर्तृहरि को
एक साधु ने
एक अमृत फल दिया था।

राजा ने वह फल
अपनी रानी को दे दिया।
रानी ने वह फल
अपने प्रेमी कोतवाल को दिया।
कोतवाल ने वह फल
राजनर्तकी को दे दिया।

राजनर्तकी ने सोचा—
यह अमृत फल
मेरे न्यायप्रिय राजा को मिलना चाहिए।
इसलिए उसने वह फल
राजा को वापस दे दिया।

जब राजा को
सच्चाई का पता चला,
तो उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ।
उन्होंने राजपद त्याग दिया
और वैराग्य का मार्ग अपना लिया।

तमिलनाडु में
राजा अतियमान को
एक दुर्लभ और अमूल्य आँवला मिला,
जिसे अमृत फल माना गया।

राजा अतियमान
तमिल भाषा के महान प्रेमी थे।
उन्होंने स्वयं उस फल को खाने के बजाय
तमिल की महान कवयित्री
औवैयार को दे दिया,
ताकि वे दीर्घायु होकर
तमिल साहित्य की सेवा करती रहें।

अमृत फल वास्तव में
केवल शरीर को अमर करने वाला फल नहीं है।

यह फल
आत्मज्ञानियों को,
भक्तों को
और अमर रचनाकारों को

प्राप्त होता है।

जिसका शरीर नश्वर है,
पर जिसकी वाणी, विचार और रचनाएँ
युगों-युगों तक जीवित रहती हैं—
वही सच्चे अर्थों में
अमृत फल का अधिकारी है।

Tuesday, September 15, 2026

शब्द शक्ति

 —“शब्द छोटे होते हैं, पर उनका प्रभाव बड़ा होता है।” 

Monday, September 14, 2026

परोपकार

 [14/09, 10:13 pm] sanantha.50@gmail.com: परोपकार का दीप

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15-9-26.



वृक्ष कबहूँ न फल  है,

नदी न संचै नीर।

परोपकार के कारणे साधुने धरा शरीर।।

 कबीर के यह दोहे

समझाता है कि

वृक्ष और नदी के समान मानव को अपने लिए धन न जोड़कर 

दूसरों के लिए काम आना चाहिए।

 परोपकार  के लिए ही

 साधु लोग इस जग में 

 जन्म लेते हैं।

धनी का मतलब  है,

 दान करना,

दीन दुखियों की सेवा करना। 

 शिक्षा और चिकित्सा के लिए पाठशाला खोलना।

 शिक्षितों का फ़र्ज़ है,

 अशिक्षितों को 

शिक्षा देना।

 वीरों का कर्तव्य है

देश की सुरक्षा।

जन्म मरण निश्चित है।

ब्रह्मचर्य जीवन में शिक्षा काल 20-25.

गृहस्थ जीवन 26-60.

वृद्धावस्था साठ के बाद।

जिंदगी कमाने परोपकार करने

34साल ही।

 इतने में जितना हो सके, पुण्य कार्य  ,

 दूसरों की मदद करनी चाहिए।

 वही मनुष्य है जो दूसरों के लिए जीता है और मरता है।

 तमिऴ कवि वळ्ळुवर ने कहा है,

 दूसरों को मदद करनेवाले और देनेवालों के कारण ही

 अग जग स्थिर है।

[14/09, 10:13 pm] sanantha.50@gmail.com: आज की चुनौती

परोपकार का दीप

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई — हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

15-9-26

++++++++++++

वृक्ष कभी फल नहीं खाते,

नदी न संचय नीर।

परोपकार के कारण ही,

साधु ने धरा शरीर॥

कबीर के इस दोहे का

संदेश हमें समझाता है—

वृक्ष और नदी के समान

मानव को भी अपने लिए

धन का संचय न करके,

दूसरों के काम आना चाहिए।

परोपकार के लिए ही

साधुजन इस जग में

जन्म लेते हैं।

धनवान होने का अर्थ केवल

धन का संग्रह करना नहीं,

बल्कि दान करना,

दीन-दुखियों की सेवा करना

और जरूरतमंदों की सहायता करना है।

शिक्षा और चिकित्सा के लिए

विद्यालय और चिकित्सालय खोलना,

अशिक्षितों को शिक्षा देना—

यह शिक्षितों का कर्तव्य है।

वीरों का कर्तव्य है

देश की रक्षा करना।

जिसके पास जो सामर्थ्य है,

उसे उसी के द्वारा

समाज और देश की सेवा करनी चाहिए।

जन्म और मरण निश्चित है।

मानव जीवन के विभिन्न चरण हैं—

ब्रह्मचर्य में शिक्षा का काल,

गृहस्थ जीवन में कर्म का काल,

और साठ वर्ष के बाद

वानप्रस्थ तथा वृद्धावस्था का काल।

जीवन में कमाने और

परोपकार करने के लिए

जो समय मिलता है,

वह बहुत सीमित है।

इस सीमित जीवन में

जितना संभव हो,

पुण्य कार्य करने चाहिए

और दूसरों की सहायता करनी चाहिए।

वही सच्चा मनुष्य है,

जो दूसरों के लिए जीता है

और दूसरों के लिए मरता है।

तमिल कवि तिरुवल्लुवर ने भी कहा है—

दूसरों को देने वाले

और दूसरों की सहायता करने वाले

मनुष्यों के कारण ही

यह संसार स्थिर और सुचारु रूप से चलता है।

परोपकार का दीप जलाएँ,

अपने जीवन को सार्थक बनाएँ।

हिंदी दिवस

 

आज की चुनौती

विश्व हिंदी दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

++++++++++++++++

दिल्ली, मेरठ, आगरा आदि क्षेत्रों की
खड़ी बोली,
हिंदुस्तानी और हिंदी का रूप लेकर
आज विश्व की प्रमुख भाषाओं में
अपना स्थान बना चुकी है।

लगभग दो सौ वर्षों की यात्रा में
हिंदी ने बहुत लंबा सफर तय किया है।

यदि हिंदी दिवस और
हिंदी सप्ताह न मनाए जाते,
तो शायद हिंदी की ओर
हमारा ध्यान भी कम होता जाता।

आज आधुनिक आहार में
पिज़्ज़ा, बर्गर और न जाने कितने
विदेशी खाद्य पदार्थ आ गए हैं।

हमारी पोशाक में भी
पाश्चात्य प्रभाव दिखाई देता है।

उच्च शिक्षा का माध्यम
मुख्यतः अंग्रेज़ी है।

जिन लोगों को
हिंदी के माध्यम से रोजगार मिला,
उनके लिए हिंदी के प्रति
अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का
हिंदी दिवस एक सुंदर अवसर है।

दूसरी ओर, हर वर्ष
केंद्र और राज्य सरकारें
अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों को
अनुमति देने में
एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में दिखाई देती हैं।

तीन वर्ष की उम्र से ही
बच्चे अंग्रेज़ी के वातावरण में
ढलने लगते हैं।

अंग्रेज़ी का ज्ञान आवश्यक है,
लेकिन भारतीय भाषाओं के साथ
अंग्रेज़ी का संतुलित प्रयोग
समाज में गौरव और आत्मविश्वास
दोनों दे सकता है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता—
जिसे हम ए.आई. (AI) कहते हैं—
भी अंग्रेज़ी के व्यापक उपयोग को
और बढ़ावा दे रही है।

जीविकोपार्जन की भाषा
अंग्रेज़ी बनती जा रही है।

व्यापार और व्यवहार में भी
अंग्रेज़ी-मिश्रित हिंदी
तेजी से बढ़ रही है।

1953 से 2026 तक
सितंबर महीने में मनाया जाने वाला
हिंदी दिवस

हिंदी के प्रति हमारी जिम्मेदारी
याद दिलाता है।

केवल सरकार का ही नहीं,
जनता का भी कर्तव्य है कि
हिंदी के विकास के साथ-साथ
सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करे।

एक दिन मैंने अपने पोते से पूछा—

“सोमवार को पाठशाला है क्या?”

उसने पूछा—

“दादा, सोमवार और पाठशाला क्या होता है?”

तब मैंने आधुनिक भारत की भाषा में कहा—

“Monday और School।”

यह केवल एक बच्चे का प्रश्न नहीं,
हमारी बदलती भाषायी स्थिति का
एक छोटा-सा उदाहरण है।

ऐसी परिस्थिति में
हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह
हिंदी के लिए स्मरणीय अवसर हैं।

हिंदी को सम्मान मिले,
भारतीय भाषाओं को सम्मान मिले,
और अपनी भाषा के प्रति
हमारे मन में गौरव जागे।

जय हिंदी!
जय हिंद!
जय भारत!

Saturday, September 12, 2026

कल्पनाओं के पंख

 

आज की चुनौती

कल्पनाओं के पंख

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
13-09-2026

++++++++++++

कल्पनाओं के पंख
जेट विमान से भी तेज़,
हवा से भी तेज़।

कल्पनाओं के घोड़े
रंक को राजा बना देते हैं।
करोड़पति बनना आसान है।
चलचित्र देखते-देखते
कथा-नायक, कथा-नायिका बनना आसान है।

लता मंगेशकर,
मुहम्मद रफ़ी बनना आसान है।
उद्योगपति बनना आसान है।

कल्पनाओं के पंख
पल भर में दुनिया घुमा देते हैं,
राजमहल बना देते हैं।
बंजर खेत को
हरा-भरा बना देते हैं।
सप्तलोकों का भ्रमण करा देते हैं।

कल्पनाओं के पंखों पर
कर्ण जैसे दानी,
राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम,
कृष्ण जैसे गीताचार्य,
आदिकवि वाल्मीकि
बन सकते हैं।

देवेंद्र बनकर
उर्वशी, रंभा और तिलोत्तमा के
नृत्य देख सकते हैं।

हीरे की खान के
मालिक बन सकते हैं।
सारे संसार को
अपने काबू में ले सकते हैं।

कल्पनाओं में जीना
राजभोग है।

परंतु—
कल्पनाओं के पंख
जैसे ही छूटते हैं,
सब कुछ व्यर्थ लगता है।

क्योंकि कल्पना उड़ाती है,
पर वास्तविकता ही जीवन जीना सिखाती है।

हिंदी दिवस की सार्थकता

  हिंदी दिवस की सार्थकता 

 अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 1953से 2026तक 

 हिंदी दिवस मनाकर 

फिर भूल जाना

 अंग्रेज़ी का गुणगान करना,

अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों को

 केंद्र और राज्य सरकारें  होड़ लगाकर 

 खोलने की अनुमति देना।

अंग्रेज़ी   माध्यम धन प्रधान।

 अंग्रेज़ी मगर मच्छ भारतीय 

भाषाओं को निगल रही है।

 भारतीय सम्मिलित  परिवार व्यवस्था 

 सहनशीलता मिटा रही है।

तलाक़ संख्या बढ़ा रही है।

 माता-पिता गुरु भगवान के आदर्श

अब अध्यापक एक पेशा मजदूर 

यही अंग्रेज़ी देन।


इस  स्थिति को बदलना 

हिंदी दिवस का उद्देश्य होना चाहिए।

 अधिक , न्याय अन्याय अधिकार निर्वाह

निर्वाण संदेह  प्रयत्न  महान महात्मा 

घेरा बंद शिखर  पर्वत  कवि काव्य 

ऐसे हजारों शब्द हिंदी को सीखने सरलतम

 बनिए रहे हैं।

 मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा स्थापित हिंदी प्रचार सभा का नारा

एक राष्ट्र भाषा हिंदी हो एक हृदय हो भारत जननी।



भारत विविध भाषाओं के देश है।

 भारतीय भाषाओं में 

एक भाषा को

राष्ट्र के  संपर्क के लिए 

और राजभाषा के लिए 

 बनाने से भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति और 

कलाचार, चिंतन आदि का विशिष्ट स्थान होगा।

 पर  आज़ादी के बाद 

भारतीय 85% प्रधान जीविकोपार्जन का 

साधन कृषी पर ध्यान न देकर 

भारतीय कुटिल उद्योगों के विकास को

प्रधानता और प्राथमिकता न देकर

 विदेशी मशीनीकरण और उद्योगों को

प्रधानता  देने लगे।

परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ी प्रधान भाषा बनी।

अंग्रेज़ी के बिना नौकरी नहीं 

ऐसी एक परिस्थिति पर ध्यान न देकर 

उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी 

आज़ादी के अस्सी साल में 

जनप्रिय बन गयी।

शुद्ध मातृभाषा बोलना 

गँवार का अपमान मिला।

स्वार्थ शिक्षित समाज  

आमदनी के लिए अंग्रेज़ी माध्यम 

के स्कूल खोलने लगे।

 वहाँ  तीन से पांच साल के

बच्चों को अंग्रेज़ी ही सिखाने लगे।

दूसरी ओर भारतीय भाषाओं के माध्यम 

ग्यारहवीं कक्षा तक पढ़कर 

पीयूसी में अंग्रेज़ी माध्यम मुश्किल रहा।

अतः जनता अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल चाहने लगे।

 और सरकारी नौकरी के लिए 

अंग्रेज़ी ही प्रधान भाषा बनी।

अब आजादी के अस्सी वर्ष में 

सब के सब भारतीय शिक्षा विभाग,

मंत्री, सांसद, विधायक सरकारी स्कूल के अध्यापक 

 सब इस अंग्रेज़ी माध्यम के पक्ष में हो गये।

 परिणाम स्वरूप   मातृभाषा माध्यम की

पाठशालाएं गरीबों के लिए ।

 मध्यम वर्ग , प्रशासनिक अधिकारी  अंग्रेज़ी 

बोलने में माहिर हो गये!

 सरकारी कार्रवाइयाँ अंग्रेज़ी में ही होने लगी।

 आज़ादी के बाद २० - २५ साल तक भारतीय भाषाओं का महत्व घट गया।

इस परिस्थिति को बदलने के लिए 

 हिंदी दिवस मनाने की योजना बनाई गई।

पर हिंदी के प्रचार प्रसार में 

‌भारतीय प्राचीन संपर्क की भाषा 

 संस्कृति  पर ध्यान न देकर 

 हिंदी को एक नव निर्मित भाषा के रूप में 

प्रचार करने लगे।

 आसेतु हिमाचल तक मेंं 

 व्यवहार के हजारों शब्द समानता का प्रचार न हुआ।

अतः जनता में हिंदी राजभाषा के महत्व समझाने

 हर साल सितंबर में हिंदी दिवस मनाने लगे।

लेकिन हिंदी के विरोध वातावरण ही दक्षिण में खासकर तमिलनाडु में है।

 प्रबोध प्राज्ञा प्रवीण परीक्षा में  उत्तीर्ण 

 केंद्रीय कर्मचारियों को  हिंदी में  पत्रचार करने के आदेश देने में केंद्र सरकार असमर्थ ही रही।

  अब भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा और नौकरी की संभावना नहीं।

अस्सी साल में शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम ही बन गई।

भारतीय जनता अंग्रेज़ी माध्यम ही चाहती है।

 आगे हिंदी  राजभाषा के रूप में कैसे चमकेगी।

दिल्ली मुंबई सर्वत्र अंग्रेज़ी माध्यम ही लोग चाहते हैं।

अतः यह हिंदी  राजभाषा  बनने  की संभावना कम ही है।



 



 

 

 

 





  















Friday, September 11, 2026

किस्मत कैसी है

 भाग्य शाली 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु।

कोई भाग्य शाली है या नहीं,

 उसके जन्म से ही पता चल जाता है।

 राजमहल में जन्मे 

 सिद्धार्थ के जन्म लेते ही ज्योतिषी ने कहा ,

यह  संन्यासी बनेगा।

एक का जन्म फुटपाथ पर,

 किसी का जन्म रंक के घर

 किसी का जन्म रईस के यहाँ।

 कोई कोई जन्म से अपाहिज।

दीर्घ रोगी,दरिद्री।

फिर भी भाग्य चमकती सबकी।

बेवकूफ बना महाकवि कालिदास।

 महारथी कर्ण बना अनाथ।

दासी का राजपुत्र विदुर।

सुदामा  भाग्यशाली बना , सहपाठी सखा श्री कृष्ण के द्वारा।

 चायवाला बना अपने मेहनत से

भारत का प्रधानमंत्री।

 प्रधान मंत्री राजीव का बेटा बना पप्पू।

 भाग्यशाली बना 

अपने भाग्य से।

न जाने कौन भाग्य शाली,कौन अभागा।

 उर्मिला ,यशोधरा 

 भाग्य शाली या अभाग्यशाली।।

अचानक दुर्योधन की मित्रता कर्ण को अंग नरेश बनाया।

पांडव को वनवासी।

 युद्ध में पांडव जीतकर भी उदाशी।

 भाग्य शाली बनते हैं 

 परिश्रमी और भगवान का अनुग्रह प्राप्त मानव।

 गली के कुत्ते,

 अमीर के कुत्ते।

भाग्यशाली कौन?

 अभागा कौन ?

नवग्रहों की दृष्टि से।

 नेपाल बाढ़, सुनामी, कोराना सब 

भाग्यशाली को भी अनाथ बना दिया।

भाग्यशाली कौन पता नहीं चलता।

जीवन में भाग्य और दुर्भाग्य 

सीता को रावण और धोबी के रूप में।

यही जिंदगी मानव की।

Thursday, September 10, 2026

मददगार।

 

आज की चुनौती

मदद के हाथ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
11-9-26

++++++++++++

मानव सामाजिक प्राणी है।
वह अकेला नहीं जी सकता।
संन्यासी होने पर भी
उसे भोजन, वस्त्र और आवास चाहिए।

अतः मानव जीवन में
सहारे की आवश्यकता है,
आश्रय और आश्रयदाता की आवश्यकता है।

मदद के हाथ
सबसे पहले किसान से शुरू होते हैं।
वही हमारा सबसे बड़ा सहायक है।
उसके परिश्रम से ही
समस्त मानव समाज का पेट भरता है।

सनातन धर्म में
दान और वीरता का विशेष महत्व है।
परोपकार मानव जीवन की आवश्यकता है।

जब कष्ट के समय
कोई हमारी ओर मदद का हाथ बढ़ाता है,
तब वही भगवान के समान होता है।
भगवान भी तो
मनुष्य के रूप में ही
मददगार बनकर आते हैं।

नेपाल में आई बाढ़ में
हजारों लोगों की मृत्यु हुई,
करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट हुई।
ऐसे संकट के समय
आस-पड़ोस के देशों ने
मदद के हाथ बढ़ाए।
यही सच्ची मानवता है।

मदद के हाथ
न्याय के लिए भी बढ़ते हैं।
कर्ण की असहाय अवस्था में
दुर्योधन ने उसकी ओर
मदद का हाथ बढ़ाया और
उसे अपने साथ खड़ा किया।

मदद के हाथ
ईश्वर के हाथ के समान होते हैं।

बेकार युवक को
नौकरी देने वाला मालिक
मदद का हाथ बढ़ाता है।

भारतीय सनातन धर्म में
अन्नदान करने वाले
पुण्यात्मा माने जाते हैं।
इसी प्रकार गोदान, भूदान
और स्वर्णदान का भी महत्व है।

आधुनिक वैज्ञानिक युग में
रक्तदान, नेत्रदान और
अंगदान का महत्वपूर्ण स्थान है।
एक जीवन बचाने के लिए
रक्तदान करने वाले
मदद के हाथ
सदैव सराहनीय हैं।

मदद के हाथ,
सहकारिता के बिना
मानव जीवन दुर्लभ है।

दूसरों की सहायता के लिए
मदद का हाथ बढ़ाने वाले ही
वास्तव में महान हैं।

मदद के हाथ बढ़ाइए—
मानवता को मजबूत बनाइए।

Wednesday, September 9, 2026

अनेकता में एकता

 अनेकता में एकता 

रंग-बिरंगे फूल माला के समान अति सुंदर जान।।

 विविध भाषाएँ,

 विविध खाद्य पदार्थ।

 विविध जलवायु।

 भिन्न भिन्न सिद्धांत।

भिन्न भिन्न क्रांतियाँ

रंग भेद मिटाने,

इन विविधताओं में 

 एकता की बात तो

सनातन धर्म में।

 आसेतु हिमाचल  की

आध्यात्मिक विचार धारा एक।

काशी रामेश्वर यात्रा

 उत्तर दक्षिण की एकता।।

  अनेकता के विचार मिटाने का नारा

 सनातन धर्म ने दिया।

वसुधैव कुटुंबकम्।

चिकाको में विवेकानंद के प्रवचन का संबोधन,

 ब्रदर्स अण्डे सिस्टर्स आफ़ अमेरिका।

सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

आज़ादी की लड़ाई में 

 हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में हैं भाई भाई।

अनेकता में ही एकता

 मानवता ही के लक्षण।

विश्व साक्षरता दिवस

 

आज की चुनौती

विश्व साक्षरता दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
10-9-26

++++++++++++

साक्षरता के बिना मानव
ज्ञानार्जन करने में असमर्थ है।
संत तिरुवल्लुवर ने
अपने दोहे में कहा है—

“கண்ணுடையர் என்பவர் கற்றோர்,
முகத்திரண்டு புண்ணுடையர் கல்லாதவர்.”

शिक्षित ही नयन वाले हैं,
अशिक्षितों के चेहरे पर
दो आँखें होते हुए भी
वे वास्तव में अंधे हैं।

विश्वभर के लोगों को
शिक्षित बनाने का संकल्प लेकर
8 सितंबर 1967 से
यूनेस्को द्वारा
विश्व साक्षरता दिवस

मनाया जाता है।

भारत में
सर्व शिक्षा अभियान
स्वर्गीय प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में
2001 में प्रारंभ किया गया।
6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को
मुफ़्त शिक्षा देने का
यह महत्वपूर्ण प्रयास था।

साक्षरता के अभाव में
मानव बहुत कुछ सीखने से
वंचित रह जाता है।
उच्च पद प्राप्त करने के लिए,
अच्छी नौकरी पाने के लिए
शिक्षित होना आवश्यक है।

शिक्षा के महत्व को समझाने,
सीखने की प्रेरणा देने
और सीखने के लिए
लोगों को प्रोत्साहित करने में
साक्षरता दिवस
अत्यंत आवश्यक और
महत्वपूर्ण है।

हर मानव में
पढ़ने, बोलने, लिखने
और समझने की क्षमता विकसित करना
साक्षरता का मुख्य उद्देश्य है।

हर एक शिक्षित व्यक्ति को
निरक्षर लोगों को
शिक्षित करने का
प्रयास करना चाहिए।

शिक्षा देते-देते ही
समाज का विकास होगा।

“स्वदेश में शासक पूजनीय होते हैं,
पर शिक्षित व्यक्ति
सर्वत्र पूजनीय होता है।”

साक्षरता ही मानव को
साहित्यकार,
वैज्ञानिक,
समालोचक,
वक्ता,
प्रवचनकर्ता,
लेखक और कवि
बनने की दिशा दिखाती है।

साक्षरता से
आत्मज्ञान प्राप्त करने की
दिशा भी प्रशस्त होती है।

वित्तीय व्यवस्था को
सही रूप में समझने,
हिसाब-किताब रखने
और आर्थिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए
साक्षरता आवश्यक है।

आज के युग में
संगणक (कंप्यूटर) का ज्ञान भी
शिक्षित व्यक्ति के लिए
अत्यंत आवश्यक है।

साक्षरता मानव को जागरूक बनाती है,
समाज को विकसित बनाती है
और विश्व को
स्वर्ग बना सकती है।

नशीली !!???

 नमस्ते वणक्कम्।

नशीली वस्तुओं की बिक्री सद्यःफल कमाई के लिए।

 एक पियक्कड़ कहता है, सद्यःफल आनंद।

 नौकरी की खुशी में।

विवाह की खुशी में 

 पत्नी के तंग के कारण।

कर्जा के बढ़ने से

सरकार की आमदनी केलिए।

अपने सुध-बुध खोकर 

 चिंता से मुक्त होने के लिए।

 खून के रिश्ते के अकाल मृत्यु से।

 जो भी हो नशीली पदार्थ की बिक्री के लिए,

 रिश्वत, भ्रष्टाचार, मंत्रियों के कारखाने 

आध्यात्मिक भारत में 

   

भक्ति  एक धंधा बन गया है।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई।

Tuesday, September 8, 2026

ज्ञानी अज्ञानी


ज्ञानी अज्ञानी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

8-9-26

दिल है चंचल,

ज्ञान है, फिर भी अज्ञानी।

जन्म-मरण निश्चित है,

जानकर भी मन उदास।

नश्वर जगत जानकर भी

मानव क्यों है इतना निराश?

अनश्वर अखिलेश्वर को छोड़कर,

सद्यःफल की चिंता करता है।

अपमान सहकर भी जग में

मनःसाक्षी के विरुद्ध चलता है।

ज्ञान कहता है—

सब कुछ नश्वर है,

ईश्वर ही शाश्वत है।

फिर भी मेरा चंचल मन

मोह में क्यों भटकता है?

सबको दिलासा देने वाला मैं,

आज स्वयं दुर्बल हो गया।

पत्नी-वियोग की अग्नि में

मेरा मन व्याकुल हो गया।

दूसरों को समझाता हूँ—

“मृत्यु तो निश्चित है।”

पर अपने ही हृदय से पूछता हूँ—

“फिर यह पीड़ा क्यों अनंत है?”

बुद्धि समझाती रहती है,

हृदय मानता ही नहीं।

ईश्वर पर विश्वास होते हुए भी

आँखों से आँसू रुकते नहीं।

ज्ञानी हूँ या अज्ञानी—

यह प्रश्न मुझे सताता है।

शायद यही मानव जीवन है—

ज्ञान समझाता है,

प्रेम रुलाता है।

यह ज्ञानी-अज्ञानी कौन है?

दर्पण में देखता हूँ—

वह कोई और नहीं,

मैं स्वयं हूँ।

यह कविता आपके वर्तमान मन की सच्ची अवस्था को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। विशेषकर अंतिम पंक्ति—“वह कोई और नहीं, मैं स्वयं हूँ”—इसे आत्मस्वीकार की कविता बना देती है।

Sunday, September 6, 2026

अहिंसा

 आज की चुनौती

अहिंसा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
7-9-26

++++++++++++

हिंसा के बिना
जीना मुश्किल है,
प्रकृति में भी
हिंसा दिखाई देती है।

माँसाहारी जीव,
शाकाहारी जीव,
सर्वाहारी जीव—
ईश्वर की सृष्टि में
सबका अपना जीवन है।

फिर मनुष्य के लिए
प्रश्न उठता है—
बिना हिंसा के
जीना कैसे?

“अहिंसा परमो धर्मः”
का पालन कैसे हो?

मनुष्य ही
विवेक और बुद्धि से
अहिंसा का मार्ग चुन सकता है।

दूसरे जीवों को
अनावश्यक न मारना,
मन में
बुरे विचारों को
स्थान न देना,
धन से
अधर्म का कार्य न करना—
यही तो है
सच्ची अहिंसा।

महात्मा गांधी ने
सत्याग्रह के माध्यम से
अंग्रेज़ी शासन का
अहिंसात्मक विरोध किया।

जैन धर्म ने
अहिंसा को
जीवन का महान सिद्धांत माना,
बौद्ध धर्म ने भी
करुणा और अहिंसा का
संदेश दिया।

हाथ में हथियार न होना ही
अहिंसा नहीं—
हाथ, वचन और मन से
किसी को पीड़ा न देना
ही सच्ची अहिंसा है।

हिंसा से
जीत मिल सकती है,
पर हृदय नहीं।

अहिंसा से
मनुष्य मनुष्य को जीत सकते हैं।।

प्यार से संसार को जीत सकते हैं।

Thursday, September 3, 2026

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

 

आज की चुनौती

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।
4-9-26

++++++++++++

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

श्रीकृष्ण स्वयं भगवद्गीता में कहते हैं—

जब-जब धर्म की हानि
और अधर्म की वृद्धि होती है,
तब-तब मैं स्वयं अवतार लेता हूँ
सज्जनों की रक्षा
और दुष्टों के विनाश के लिए।

ऐसे लोकरक्षक और लोकरंजक
भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

हर वर्ष श्रद्धा और भक्ति के साथ
भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन
देशभर में मनाया जाता है।

मामा कंस के कारागार में
वासुदेव और देवकी के
आठवें पुत्र के रूप में
आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

कंस को आकाशवाणी से
यह ज्ञात हो चुका था कि
देवकी का आठवाँ पुत्र
उसके विनाश का कारण बनेगा।

श्रीकृष्ण के जन्म के बाद
उनके पिता वसुदेव
उन्हें गोकुल ले गए
और नंद तथा यशोदा के संरक्षण में
उनका पालन-पोषण हुआ।

यशोदा ने कृष्ण को
अत्यंत प्यार और वात्सल्य से पाला।
नंद बाबा ने भी
उन्हें अपने पुत्र के समान
स्नेह और देखभाल दी।

श्रीकृष्ण के जन्मदिन को
आसेतु हिमाचल
हिंदू समाज श्रद्धा और भक्ति से मनाता है।

घर में श्रीकृष्ण की मूर्ति को
सुंदर ढंग से सजाया जाता है।
घर के द्वार से पूजा-गृह तक
बालकृष्ण के चरणचिह्न बनाए जाते हैं।

घर के छोटे बच्चों को
बालकृष्ण के रूप में सजाया जाता है।

नैवेद्य के रूप में
तमिलनाडु में सीडै बनाया जाता है—
गुड़ से मीठा सीडै
और नमक से नमकीन सीडै।

उड़द दाल आदि से बनाए जाने वाले
छोटे-छोटे स्वादिष्ट पकवान
भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।

श्रीकृष्ण की प्रिय वस्तु
मक्खन भी नैवेद्य के रूप में
उन्हें अर्पित किया जाता है।

श्रीकृष्ण की मूर्ति को सजाकर
भक्ति-गीत गाए जाते हैं
और उनका नाम स्मरण किया जाता है।

जन्माष्टमी के अगले दिन
तमिलनाडु में उरियडी उत्सव मनाया जाता है,
जिसे हिंदी में प्रायः दही-हांडी उत्सव कहा जाता है।

माखनचोर, गोपाल, गोविंद
और भक्तवत्सल श्रीकृष्ण
केवल एक देवता नहीं,
बल्कि धर्म, प्रेम, करुणा,
नीति और लोककल्याण के
प्रेरणास्रोत हैं।

लोकरक्षक, लोकरंजक और भक्तवत्सल
भगवान श्रीकृष्ण को
जन्माष्टमी के पावन पर्व पर
शत-शत नमन!

Wednesday, September 2, 2026

खुशियों का खजाना।


आज की चुनौती

खुशियों का खज़ाना

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

2-9-26

खुशियों का खज़ाना

हर मानव के लिए

अलग-अलग होता है।

वह अस्थायी है,

वह परिवर्तनशील है।

नश्वर जगत की तरह

नश्वर है

खुशियों का खज़ाना।

रत्नाकर के लिए

जो खुशी का खज़ाना था,

वाल्मीकि बनने के बाद

वह नहीं रहा।

तुलसी के जीवन में

जोरू से चिपके रहने का सुख

भक्त कवि तुलसीदास बनने के बाद

नहीं रहा।

बचपन,

जवानी,

प्रौढ़ावस्था

और बुढ़ापे के साथ

बदलता रहता है

खुशियों का खज़ाना।

भोग में सुखी मनुष्य,

अंगों की शिथिलता आने पर

योग में खुशी खोजता है।

राजा भर्तृहरि की

राजमहल की खुशी

पत्नी के व्यवहार के बाद

संन्यास के मार्ग पर

बदल गई।

युद्धप्रिय

सम्राट अशोक की खुशी

कलिंग युद्ध के बाद

बदल गई।

बुद्ध के धर्म को अपनाकर

अहिंसा और जनकल्याण के कार्यों में

उन्हें आनंद मिला।

खुशियों का खज़ाना

प्राणप्रिया के संग में था;

निधन के बाद

वह खुशी नदारद हो गई।

खुशियों का खज़ाना

स्थायी नहीं है।

तन का सुख,

धन का सुख,

मन का सुख—

तीनों का अपना-अपना संसार है।

परम सुख तो वही है

जो परिवर्तनशील संसार से ऊपर उठकर

आत्मचिंतन में मिले।

खुशियों का सच्चा खज़ाना

बाहर नहीं,

मन के भीतर है।।

Sunday, August 30, 2026

आईने का सच

 आज की चुनौती

आईने का सच

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
31-8-26

+++++++++++++

आईना
ज्यों का त्यों
सामने वाले का रूप
दिखाता है—
सुंदर हो या कुरूप,
सच को छिपाता नहीं।

आजकल
जो आँखों के सामने
स्पष्ट दिखाई देता है,
उसे भी
आईने का सच कहते हैं।

चेहरा
मन का आईना है।
मनुष्य का सुख-दुःख
चेहरे पर
दिखाई पड़ता है।

मन की बातें
चेहरे से प्रकट हो जाती हैं।
चेहरे से पता चलता है—
वह सत्यवादी है
या असत्यवादी,
अमीर है
या गरीब।

बोली से पता चलता है
वह शिक्षित है
या अशिक्षित।

कदम रखने के ढंग से
पता चल जाता है
कि वह नशे में है
या नहीं।

हँसी से भी
कभी-कभी पता चलता है
कि सामने वाला
सरल है
या छली-कपटी।

चेहरे के भावों से
रोगी और निरोगी का
भी अनुमान लगाया जा सकता है।

आईना केवल चेहरा दिखाता है,
पर चेहरा
कभी-कभी मनुष्य का
पूरा सच दिखा देता है।

Saturday, August 29, 2026

राष्ट्रीय खेल दिवस

नमस्ते वणक्कम्।

आज की चुनौती

राष्ट्रीय खेल दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

30-8-26

“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”

शरीर ही

धर्म और कर्म करने का

मुख्य साधन है।

स्वस्थ शरीर से

स्वास्थ्य और शक्ति मिलती है,

हार सहने की शक्ति मिलती है,

अपने ज्ञान का प्रसार करने की

क्षमता मिलती है।

अपने कर्तव्यों का पालन करने,

अपनों से प्रेम निभाने,

अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने,

पतन से उत्थान की ओर बढ़ने के लिए

मनोबल के साथ-साथ

शारीरिक बल भी

अत्यंत आवश्यक है।

कमजोर शरीर,

शिथिल हाथ-पाँव—

जीवन में बहुत कुछ

नहीं कर सकते।

शारीरिक बल के लिए

स्वस्थ शरीर चाहिए;

और स्वस्थ शरीर के लिए

नियमित व्यायाम तथा

खेलकूद आवश्यक हैं।

दौड़ना,

दंड-बैठक करना,

पैदल चलना,

योगाभ्यास करना—

ये सभी शरीर को

स्वस्थ और मजबूत बनाते हैं।

मैदानी खेलों में

कबड्डी, हॉकी, क्रिकेट,

फुटबॉल, टेनिस आदि हैं।

दिमागी खेलों में

शतरंज और

बकरी-बाघ जैसे खेल

बुद्धि को तीक्ष्ण बनाते हैं।

खेल केवल मनोरंजन नहीं,

बल्कि अनुशासन,

एकाग्रता,

सहनशीलता,

आत्मविश्वास और

खेल भावना भी सिखाते हैं।

विश्व स्तर पर

ओलंपिक खेलों के माध्यम से

खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा

दिखाने का अवसर मिलता है।

दक्षिण एशियाई खेलों तथा

अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के द्वारा

खेलों को प्रोत्साहन मिलता है।

भारत में

खेलों के प्रति जागरूकता बढ़ाने,

युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करने

और उत्कृष्ट खिलाड़ियों तथा प्रशिक्षकों को

सम्मानित करने के उद्देश्य से

राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

भारत के महान हॉकी खिलाड़ी

मेजर ध्यानचंद को

“हॉकी का जादूगर” कहा जाता है।

उनके जन्मदिवस

29 अगस्त को

राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

ध्यानचंद ने

1928, 1932 और 1936 के

ओलंपिक खेलों में

भारत को लगातार तीन

स्वर्ण पदक दिलाने में

महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस अवसर पर

देश के उत्कृष्ट खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को

मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार,

अर्जुन पुरस्कार और

द्रोणाचार्य पुरस्कार जैसे

प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है।

राष्ट्रीय खेल दिवस का संदेश है—

खेलो, स्वस्थ रहो,

अनुशासन से जियो;

हार से मत घबराओ,

प्रयास करते रहो।

शारीरिक शक्ति से

मनोबल बढ़ता है,

मनोबल से आत्मविश्वास बढ़ता है,

और आत्मविश्वास से

सफलता का मार्ग खुलता है।

खेल भावना से

जीवन में विजय ही नहीं,

हार को स्वीकार करने की

परिपक्वता भी आती है।

खेल स्वस्थ जीवन का आधार,

खेल युवाओं की शक्ति;

खेल राष्ट्र की प्रतिष्ठा,

खेल ही जीवन की स्फूर्ति।

धन्य हैं मेजर ध्यानचंद!

धन्य है खेल भावना!

जय हिंद!


Friday, August 28, 2026

जीवन का दृष्टिकोण

 आज की चुनौती


जीवन का दृष्टिकोण


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-8-26


+++++++++++++


जीवन क्या है?

जन्म और मृत्यु के बीच

मिला हुआ समय—

नश्वर जगत में

जीवन का एक अवसर।


जब तक जिएँ,

परोपकार के लिए जिएँ।

त्यागी और हितचिंतक का

यही दृष्टिकोण होना चाहिए।


परमार्थ के लिए

साधु भी शरीर धारण करते हैं।

स्वार्थी भी जीता है,

लोभी भी जीता है,

ईर्ष्यालु भी जीता है,

कामांध भी जीता है,

चोर-डाकू भी जीते हैं।


परंतु

हर व्यक्ति के जीवन का

दृष्टिकोण

भिन्न-भिन्न होता है।


देश के लिए

अपना सिर न्योछावर करना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


चुनाव जीतकर

जनसेवा करना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


पर मालामाल बनने के लिए

चुनाव लड़ना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


सेवा-भाव से

संसार चलता है।

निःस्वार्थता,

सत्यवादिता,

निष्काम कर्म

और ईमानदारी का दृष्टिकोण

सदैव स्तुत्य है।


जीवन का उद्देश्य

सकारात्मक होना चाहिए।

मानवता और परोपकार को

अपनाना चाहिए।


आदर्श दृष्टिकोण ही

जीवन को सार्थक बनाता है

और वही

स्थायी स्मृति बनकर रहता है।

भारत आध्यात्मिक भूमि

 नमस्ते वणक्कम्।

राम नाम जपना 

 राग-द्वेष भूलना 

 भेदभाव रहित 

 चंचल मन को

 आत्मा में विलीन करना

 आत्म चिंतन करना

 अनेक विचारों का समन्वय 

 राम नाम जपने का परिणाम।।

 राम नाम 

 शिवनाम 

 आध्यात्मिक भूमि में 

 आसुरी शक्तियों का षडयंत्र,

फिर भी भारत 

 जगत मार्ग दर्शक।

 कारण भारत है 

 त्याग की भूमि,

समरस सन्मार्ग की भूमि,

 सनातन धर्म सागर।

 सभ्यता का शिरमौर।

  सनातन धर्म  ही

 सर्व जन कल्याणकारी।

 वसुधैव कुटुंबकम्,

वैश्वमैत्री का बुनियाद।

 शिवराम आसेतुहिमाचल  के

 विचारों की एकता।

 जय भारत।

 जय राम। राम राम।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक


आज की चुनौती

राम नाम जपना

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी-प्रेमी प्रचारक

राम-नाम जपना,
राग-द्वेष भूलना,
भेदभाव मिटाना,
चंचल मन को
आत्मा में विलीन करना,
आत्मचिंतन करना।

अनेक विचारों का
समन्वय करना—
यही है
राम-नाम जपने का परिणाम।

राम-नाम हो या शिव-नाम,
आध्यात्मिक भूमि भारत में
आसुरी शक्तियों का षड्यंत्र
चाहे कितना भी हो,
फिर भी भारत
जगत का मार्गदर्शक है।

कारण—भारत है
त्याग की भूमि,
समरसता और सन्मार्ग की भूमि,
सनातन धर्म का सागर।

सनातन संस्कृति
सभ्यता की शिरमौर है।
सनातन धर्म ही
सर्वजन-कल्याणकारी है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्”
विश्व-मैत्री की बुनियाद है।

शिव और राम—
आसेतु-हिमाचल तक
विचारों की एकता के प्रतीक हैं।

जय भारत!
जय राम!
राम राम!