Search This Blog

Tuesday, June 16, 2026

रक्त दान दिवस

 




दैनिक चुनौती।

विश्व रक्तदान दिवस 

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै 

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

17-6-26.

+++++++++++

 भारत भूमि पुण्य भूमि।

 सनातन दान  है

 अन्न दान, भू दान, रक्तदान, स्वर्ण दान, चाँदी दान, कन्यादान,

राष्ट्र को बचाने प्राण दान।

समय की माँग,

 वैज्ञानिक युग में 

 चिकित्सा क्षेत्र में 

 अंगों  के दान, 

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय, अग्न्याशय और छोटी आंत। जीवित रहते हुए भी एक किडनी या लिवर का एक हिस्सा दान किया जा सकता है।


हृदय दान, नेत्रदान  मृत्यु के बाद।


 रक्त दान  

बार बार दे सकते हैं।

 एक व्यक्ति   हर तीन महीने  अर्थात साल में चार बार दे सकते हैं।

दानी की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

दानी का वजन कम से कम 45 किलो होना चाहिए।

रक्तदान के समय दानी  पूरी तरह से स्वस्थ और ऊर्जावान  होना चाहिए।

 पियक्कड़ और रुग्णावस्था में दान नहीं दे सकते।

 रक्त दान  शल्य चिकित्सा के समय,

दुर्घटना में ब्लड की कमी होने पर रक्त की जरूरत है।

  रक्त दान देने 

रक्तदान केंद्र है।

 रक्त दान पाने ,

रक्त दान महत्व समझाने

 शिविर भी चलाते हैं।

सरकार दानियों को पैसे भी देती है।

सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ दान रक्तदान।

 रक्त दान के महत्व समझाने 

 रक्त दान दिवस मनाते हैं।


आदरणीय अनन्तकृष्णन जी,

आपकी रचना का भाव अत्यंत प्रेरणादायक है। विषय की महत्ता को ध्यान में रखते हुए इसे थोड़ा साहित्यिक एवं प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व रक्तदान दिवस

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

17-06-2026

भारत भूमि पुण्य भूमि है,

दान की महान परंपरा यहाँ की शान है।

अन्नदान, भूदान, रक्तदान,

स्वर्णदान, रजतदान, कन्यादान,

और राष्ट्र रक्षा हेतु प्राणदान।

समय की माँग है कि

वैज्ञानिक युग में चिकित्सा क्षेत्र को

दान की महिमा से सशक्त बनाया जाए।

अंगदान के माध्यम से

किडनी, लिवर, फेफड़े, हृदय,

अग्न्याशय तथा छोटी आंत का दान

अनेक जीवनों में नव आशा जगाता है।

जीवित रहते हुए

एक किडनी अथवा लिवर का एक भाग

दान किया जा सकता है।

नेत्रदान और हृदयदान

मृत्यु के पश्चात भी

मानवता की सेवा का माध्यम बनते हैं।

रक्तदान ऐसा महादान है

जो बार-बार किया जा सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति प्रत्येक तीन माह में

रक्तदान कर सकता है।

दानी की आयु 18 से 65 वर्ष के बीच

और वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

रक्तदान के समय

दानी पूर्णतः स्वस्थ एवं ऊर्जावान हो।

मद्यपान करने वाले तथा रोगग्रस्त व्यक्ति

रक्तदान नहीं कर सकते।

शल्य चिकित्सा, दुर्घटनाओं तथा

रक्त की कमी से जूझ रहे रोगियों के लिए

रक्त अमूल्य जीवनदाता बनता है।

रक्तदान केंद्र तथा शिविर

जन-जन को इसके महत्व से परिचित कराते हैं।

मानवता की सेवा का यह श्रेष्ठ माध्यम

असंख्य प्राणों की रक्षा करता है।

आइए, हम सब संकल्प लें—

रक्तदान करें, जीवन बचाएँ।

सभी दानों में श्रेष्ठ है रक्तदान,

मानव सेवा का यह महान अभियान।

विश्व रक्तदान दिवस

हमें रक्तदान के महत्व का संदेश देता है

और मानवता के प्रति

अपने कर्तव्य का स्मरण कराता है।

"रक्तदान – महादान,

जीवन रक्षा का महान अभियान।"

सादर। 🙏🩸🌹

माता का ममत्व

 माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।




माँ का महत्व।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

+++++++++++++

 माँ हमको गर्भकाल में 

‌रूप देती है,

 पेट में खिलाने

 पलने की सुविधा।

 जन्म लेते ही स्तन पान।

पहला शब्द 

 माँ का दुलार भरा।

 मातृभाषा के शब्द भंडार।

 निस्वार्थ प्रेम त्याग।

तन से मन से धन से।

 माँ के ममत्व‌ से ही

 सम्राट शिवाजी महाराज वीरधीर गंभीर साहसी 

‌हिंदु भक्त देश प्रेमी बने।

 माता जैसे बच्चा,

 धागा जैसा कपड़ा

 यही  कहावत तमिल में।

 सुशिक्षित संस्कारवान माँ से शिशु का व्यक्तित्व।

माँ के बंधुत्व संबंध 

अति प्यारी निराली।

 माँ के कारण रिश्तेदारों की भीड़।

 माँ न तो  मानव रूप नहीं।

 ममता का महत्व नहीं।

 मातृभाषा, मातृभूमि,

 यही जीने का राग।

नमस्ते वणक्कम्, आदरणीय अनन्तकृष्णन जी।

आपकी रचना में माँ के निस्वार्थ प्रेम, त्याग, ममता, मातृभाषा और मातृभूमि के महत्व का सुंदर चित्रण है। भाव बहुत अच्छे हैं। मैंने आपकी रचना को थोड़ा सुव्यवस्थित और काव्यात्मक रूप देने का प्रयास किया है।

माता का महत्व

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

स्वरचित भावाभिव्यक्ति

+++++++++++++

माँ हमको गर्भकाल में

जीवन का रूप देती है,

अपने आँचल की छाया में

पलने-बढ़ने की सुविधा देती है।

जन्म लेते ही शिशु को

स्तनपान का अमृत मिलता,

पहला शब्द जो मुख से निकले,

वह "माँ" का स्वर ही होता।

माँ के दुलार भरे शब्दों से

मातृभाषा का ज्ञान मिलता,

निस्वार्थ प्रेम और त्याग से

जीवन का सम्मान मिलता।

तन से, मन से, धन से

माँ करती सतत उपकार,

ममता की शीतल छाया में

खिलता जीवन का संसार।

माँ के संस्कारों से ही

वीर और महापुरुष बनते हैं,

जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज को

माता के आदर्श प्रेरित करते हैं।

तमिल की एक सुंदर कहावत है—

"माता जैसी संतान, धागे जैसा कपड़ा",

सुशिक्षित और संस्कारवान माँ से

निखरता शिशु का व्यक्तित्व सारा।





माँ से ही बंधुत्व के रिश्ते,

माँ से ही परिवार की शान,

माँ न हो तो मानव जीवन में

न रहे ममता का सम्मान।

मातृभाषा, मातृभूमि और माता,

जीवन के तीन अनमोल राग,

इनके प्रति श्रद्धा और समर्पण

बनें मानव जीवन का सुहाग।

+++++++++++++

भावार्थ:

माता केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन को संस्कार, भाषा, प्रेम, त्याग और व्यक्तित्व प्रदान करने वाली प्रथम गुरु है। माता, मातृभाषा और मातृभूमि का सम्मान मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य है।

सादर प्रणाम। 🙏

जय माता। जय मातृभूमि। जय मातृभाषा।

Sunday, June 14, 2026

समय यात्रा

 


समय का मुसाफिर 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

15.6.26

**************

मानव समय का मुसाफिर।

मोसम समय का मुसाफिर।

 बचपन एक मुसाफिर 

 लड़कपन एक मुसाफ़िर।

जवानी एक मुसाफिर 

 बुढ़ापा यात्रा का विश्राम 

 मौसमी फूल फल

सूर्य चन्द्र चौबीस घंटों के मुसाफिर।।

 पृथ्वी के सब जीव-जंतु जीवन काल निर्णय।

 अतः भूलोक समय का मुसाफिर।

नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

आपकी रचनाओं में जीवन-दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और अनुभूति की गहराई दिखाई देती है। "समय का मुसाफिर" हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं।

समय चलता रहता है,

जीवन बदलता रहता है।

जो समय का महत्व समझ ले,

उसका जीवन सँवरता रहता है।

आप इसी प्रकार हिंदी सेवा, साहित्य-साधना और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से अपने विचारों का प्रकाश फैलाते रहें।

ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य, मानसिक शांति और सृजन की निरंतर प्रेरणा प्रदान करें। आपकी धर्मपत्नी को भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ मिले, यही मंगलकामना है।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री गणेशाय नमः।

जय श्री राम।

जय हनुमान।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

सादर प्रणाम एवं शुभकामनाएँ।

प्रार्थना

 


नमस्ते वणक्कम्।
मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ
‌मेरी प्यारी अर्द्धांगिनी मेरी जान
जल्दी स्वस्थ हो जाएँ।
मेरी जाने अनजाने गलतियों को
माफ़ कर दीजिए।
हे भगवान मेरे प्राण उनकी प्रार्थना से बची।
उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।
‌विनम्र निवेदन करता हूँ।
ॐ गणेशाय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ नमः शिवाय
ऊँ दुर्गा मैं नमः।
सत् चित् आनन्द स्वामिये नमः।
सच्चिदानंद स्वामिये नमः
अगस्त्याय नमः
भोगरे नमः
कडुवॆळि सिद्ध पुरुषाय नमः
इडैक्काडरे नमः
पुलिप्पाणिये नमः
अऴुकिनी सिद्ध पुरुषाय नमः
ॐशीरडी साईं नमः
ॐ पुट्टभर्ति स्वामिये नमः
जय जय शंकर हर हर शंकर।
ॐ रमण महर्षिये नमः
ॐ राघवेंद्राय नमः
ॐ शेषाद्रि स्वामिये नमः
ॐ गोरख सिद्ध पुरुषायै नमः
ॐ चिदंबरम स्वामिये नमः
ओम् रेड्डी पट्टी स्वामिये नमः
ॐ बड़े भाई साहब नमः।
ॐ पांबन स्वामिये नमः
ओम् पूंडीमहाने नमः
ओं भृगु मुनि ये नमः
ओं भ्रुंगी मुनिये नमः
ओं ईश्वरभट्टाय नमः
ओं कणक्कण पट्टी स्वामिये नमः
ओं माधूरी स्वामिये नमः
ओं चाक्कडै सिद्धपुरुषाय नमः
अरुट पेरुंज्योति अरुट् पॆरुँज्योति
तनिप्पेरुम् करुणै अरुट् पेरुमल ज्योति ।
ओम् भैरवाय नमः
ओं जय हनुमान।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
ॐॐ ॐॐ ॐॐ ॐॐ



नमस्ते। वणक्कम्। 🙏

आपकी प्रार्थना में प्रेम, समर्पण, करुणा और जीवनसाथी के प्रति अटूट निष्ठा झलक रही है। अपनी अर्द्धांगिनी के स्वास्थ्य के लिए आपका हृदय जिस वेदना और श्रद्धा से भगवान के चरणों में झुक रहा है, वह स्वयं एक महान तपस्या है।

ईश्वर से मेरी भी यही प्रार्थना है—

हे गणपति, हे शिवशंकर, हे माता दुर्गा, हे मुरुगन, हे साईंनाथ, हे हनुमान, हे सभी सिद्ध पुरुषों और महापुरुषों!

आपकी कृपा से AK जी की धर्मपत्नी को शक्ति, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करें।

उनकी पीड़ा कम हो, श्वास सहज हो, मन में साहस बना रहे और उपचार सफल हो।

परिवार को धैर्य, विश्वास और मानसिक बल दें।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।"

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

आपने लिखा — "उसकी जान बचाने की प्रार्थना मेरी बारी है।"

यह एक पति के प्रेम और कर्तव्य का अत्यंत मार्मिक भाव है। वर्षों तक जो साथ निभाता है, उसकी पीड़ा अपनी पीड़ा बन जाती है। आपकी सेवा, जागरण, चिंता और प्रार्थना भी ईश्वर की दृष्टि में एक पुण्य यज्ञ के समान हैं।

विश्वास बनाए रखिए। चिकित्सा और प्रार्थना दोनों साथ-साथ चलें।

ईश्वर आपकी अर्द्धांगिनी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें।

ॐ नमः शिवाय।

ॐ श्री सुब्रह्मण्याय नमः।

अरुट्पेरुंज्योति, तनिप्पेरुं करुणै, अरुट्पेरुंज्योति। 🙏🌺

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं प्रार्थनाएँ।

Saturday, June 13, 2026

पुण्य कलश

 नमस्ते वणक्कम्। 🙏


पुण्य कलश

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

14-6-26

+++++++++++++

मानव तो

सर्वगुण संपन्न 

 ज्ञानी, ब्रह्म सम।

पर  महामायादेवी

ईश्वर का एक अंग,

संसार को माया छाया जगत के रूप में 

बनाते रखने में समर्थ।

अचूक, सद्यःफल दाता।

परिणाम स्वरूप वह

 स्वार्थ निस्वार्थ 

बन जाता है।

 अन्याय का साथ देता है।

दशरथ की भूल,

शब्द भेदी बाण का प्रयोग 

शिशु हत्या पाप।

 राम का दुख

 रावण का बुद्धि भ्रष्ट 

 ये सब  न होने

 आदि काल में वेद उपनिषद और अनेक पुराण, प्रासांगिक कथाएँ।

पापों से मुक्ति पाने 

 हवन होम पुण्य कलश का महत्व।

 पुण्य कलश  सकारात्मक ऊर्जा,

 कलश में त्रिदेव और देवियों की उपस्थिति 

 सद्विचारों का स्रोत।

 दान धर्म का महत्व।

 परोपकार्थ

 इदम् शरीरम् की सीख।

 पापों की मुक्ति के लिए 

भूदान स्वर्ण दान चाँदीदान।

  जगत मिथ्या

 ब्रह्म सत्यं।

नश्वर दुनिया 

 अनश्वर सत्य प्रभाव।

 अनश्वर सूक्ष्म शक्ति

 परिणाम 

 अखिलेश्वर की अनंत शक्ति।

 पुण्य कर्म का फल,

 पाप कर्म का दंड।

 मानव  लौकिक 

 बंधन से छूटता नहीँ।

अतः जन्म पुनर्जन्म 

 सुखी दुखी का अनुभव।।

इन सब से छूटकर 

 दिव्य शक्ति सद्बुद्धि 

 आत्मसंतोष, 

आत्मज्ञान पाने,

पुण्य कलश की स्थापना

 फिर भी ज्ञान चक्षु प्राप्त मानव अपने अस्थाई जीवन को स्थाई मानकर 

 नकारात्मक विचार में।

 यही संसार है के दुःखों का मूल।

 पुण्य कलश की स्थापना 

आदर्श परोपकार जीवन कै लिए।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई


आपकी रचना में आध्यात्मिक चिंतन, कर्मफल, माया, दान, परोपकार तथा पुण्य कलश के प्रतीकात्मक महत्व का सुंदर समावेश है। भाव अत्यंत गहन हैं। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहमय रूप देने का एक विनम्र प्रयास प्रस्तुत है।

पुण्य कलश

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

14-6-2026

मानव तो

सर्वगुण-संपन्न,

ज्ञानी, ब्रह्म के समान है।

पर महामायादेवी,

ईश्वर की ही एक शक्ति,

इस संसार को

माया-छाया जगत के रूप में

संचालित करने में समर्थ है।

वह अचूक,

सद्यःफलदायिनी है।

उसके प्रभाव से मानव

स्वार्थी भी बन जाता है,

तो कभी निस्वार्थ भी।

कभी अन्याय का साथ देता है,

कभी धर्म के पथ पर चलता है।

दशरथ की भूल,

शब्दभेदी बाण का प्रयोग,

श्रवण कुमार के वध का पाप;

राम का दुःख,

रावण की बुद्धि का भ्रष्ट होना—

इन सब घटनाओं में

कर्मफल का संदेश छिपा है।

इसीलिए आदि काल से

वेद, उपनिषद, पुराण

और अनेक प्रेरक कथाएँ

मानव को सत्कर्म का मार्ग दिखाती हैं।

पापों से मुक्ति हेतु

हवन, होम और पुण्य कलश का

विशेष महत्व बताया गया है।

पुण्य कलश

सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मान्यता है कि उसमें

त्रिदेव तथा देवियों का वास होता है।

वह सद्विचारों का स्रोत है,

दान और धर्म का प्रेरक है,

और सिखाता है—

"परोपकारार्थम् इदं शरीरम्"

अर्थात यह शरीर

परोपकार के लिए है।

भूदान, स्वर्णदान, चाँदीदान

और सेवा के विविध रूप

मानव को पुण्य के मार्ग पर ले जाते हैं।

जगत मिथ्या है,

ब्रह्म ही सत्य है।

यह संसार नश्वर है,

पर सत्य और दिव्य शक्ति अमर हैं।

पुण्य कर्म का फल मिलता है,

पाप कर्म का दंड भी।

फिर भी मानव

लौकिक बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता।

अतः जन्म-पुनर्जन्म के चक्र में

सुख-दुःख का अनुभव करता रहता है।

इन बंधनों से ऊपर उठकर,

सद्बुद्धि, आत्मसंतोष

और आत्मज्ञान प्राप्त करने हेतु

पुण्य कलश की स्थापना

एक शुभ प्रेरणा है।

किन्तु ज्ञान-चक्षु प्राप्त मानव भी

अपने अस्थायी जीवन को स्थायी मानकर

नकारात्मक विचारों में उलझ जाता है।

यही संसार के दुःखों का मूल है।

अतः पुण्य कलश की स्थापना

केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,

अपितु आदर्श, परोपकारी

और सदाचारी जीवन का संकल्प है।

— एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 🙏

रचना का मूल संदेश अत्यंत सुंदर है— सत्कर्म, परोपकार, आत्मज्ञान और सकारात्मक चिंतन ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

Friday, June 12, 2026

बाल श्रम दिवस

 नमस्ते आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में बाल श्रम की सामाजिक विडंबना, गरीबी, उपेक्षा और बच्चों के शोषण के प्रति गहरी चिंता व्यक्त हुई है। इसे थोड़ा परिष्कृत और प्रवाहपूर्ण रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

13-06-2026

मानव जीवन में

जीने के लिए धन की आवश्यकता है।

परंतु धनाभाव में भी

संतान का जन्म

ईश्वर की देन है।

किन्तु जब माता-पिता

पालन-पोषण में असमर्थ होते हैं,

तब जन्म लेती है

एक सामाजिक त्रासदी—

बाल श्रम।

कहीं पियक्कड़ पिता,

कहीं असहाय माँ,

कहीं पिता का नदारद होना,

कहीं जन्म लेते ही

शिशु का त्याग।

कुछ बच्चे अनाथालयों में पलते हैं,

कुछ अपराधियों के हाथों

शोषण का शिकार बनते हैं।

गरीबी, उपेक्षा और विवशता

बचपन का अधिकार छीन लेती है।

सौतेले व्यवहार की पीड़ा,

भूख और अभाव की मार,

नन्हे हाथों को

पुस्तकों की जगह

मजदूरी का बोझ दे देती है।

दयालु और संवेदनशील लोग

बाल श्रम के विरुद्ध

आवाज़ उठाते हैं,

समाज को जागृत करते हैं,

और ठोस कदम भी उठाते हैं।

भीख माँगना भी

एक संगठित धंधा बन गया है।

मासूम बच्चों को आगे कर

दया का व्यापार होता है,

पर उसे रोकने वाले

बहुत कम दिखाई देते हैं।

केवल एक दिवस मनाने से

समस्या का समाधान नहीं होगा।

आवश्यक है

जागरूकता, शिक्षा और संवेदना।

अमीर संतान के लिए तरसते हैं,

गरीबों के यहाँ

फुटपाथों पर बचपन पलता है।

यह भी जीवन का

एक कठोर सत्य है।

आओ मिलकर संकल्प लें—

हर बच्चे को शिक्षा मिले,

हर बच्चे को सम्मान मिले,

हर बच्चे को उसका बचपन मिले।

नारा लगाएँ—

"बाल श्रमिक रहने न देंगे,

बचपन का अधिकार देंगे।"

"पुस्तक, शिक्षा और मुस्कान,

हर बच्चे का हो सम्मान।"

"बाल श्रम का हो अंत,

शिक्षा से बने उज्ज्वल भविष्य अनंत।"

सादर।

Thursday, June 11, 2026

नये भोर की प्रतीक्षा में

 एक नये भोर की प्रतीक्षा।

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

++++++++++++++

12-6-26

+++++++++++

 हे अंतर्यामी!

तेरे चरणो में शरणागति मैं।

 तेरे ही ध्यान में 

 एक नये भोर की प्रतीक्षा में,

 जी के तम मिटने,

 पत्नी अपने रोग से बचने,

 जीवन में सुख देने,

 सर्वेश्वर तेरे चरणों में 

 निवेदन।

 जीवन में  तूने  सब कुछ दिया।

 मेरी पत्नी को स्वस्थ बनाकर,

अति शीघ्र चंगा करके,

मेरे जीवन में 

 सकारात्मक ऊर्जा दो।

शक्ति दो।

 सिवा तेरे अनुग्रह 

तेरी कृपा के

 और कोई शक्ति है नहीं 

नयी शक्ति नया उम्मीद 

‌देनै तेरे चरणों में 

शरणागत हूँ मैं।

 तू है शरणागत वत्सल।

 मार्कंडेय को जीवन दान दिया।

गूँगे को बोलने की शक्ति दी।

 मूर्ख कालिदास को

 महा कवि बनाया।

 नरसिंह अवतार लेकर 

 प्रह्लाद को बचाया।

मैं  निवेदन करता हूँ,

जल्दी चंगा करो।

शक्ति दो।

 नये भोर की प्रतीक्षा में 

 हर कोई तेरे ध्यान में।


आपकी भावाभिव्यक्ति अत्यंत हृदयस्पर्शी है। इसमें पत्नी के स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और आशा का सुंदर भाव व्यक्त हुआ है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत कर प्रवाह और काव्यात्मकता बढ़ाई जा सकती है।

नये भोर की प्रतीक्षा में

एस. अनन्तकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-6-2026

हे अंतर्यामी!

तेरे चरणों में शरणागत हूँ मैं।

तेरे ही ध्यान में लीन,

एक नये भोर की प्रतीक्षा में।

जीवन का तम मिट जाए,

पत्नी मेरे रोग से उबर जाए,

जीवन में फिर सुख का सूरज उगे,

ऐसी विनती तेरे चरणों में।

हे सर्वेश्वर!

जीवन में तूने सब कुछ दिया,

अब मेरी जीवन-संगिनी को

स्वस्थ कर, नवजीवन प्रदान कर।

मेरे जीवन में

सकारात्मक ऊर्जा भर दे,

संघर्ष सहने की शक्ति दे,

आशा का दीप पुनः जला दे।

तेरी कृपा के बिना

और कोई शक्ति नहीं।

नई शक्ति, नया विश्वास,

नया उत्साह प्रदान कर।

मैं तेरी शरण में हूँ,

तू शरणागत-वत्सल है।

मार्कण्डेय को जीवनदान दिया,

गूँगे को वाणी का वरदान दिया।

मूर्ख कालिदास को

महाकवि बना दिया,

नृसिंह रूप धारण कर

प्रह्लाद की रक्षा की।

मैं भी विनम्र निवेदन करता हूँ—

मेरी प्रार्थना स्वीकार करो,

पत्नी को शीघ्र स्वास्थ्य दो,

जीवन में पुनः मुस्कान भरो।

नये भोर की प्रतीक्षा में

मैं तेरा ध्यान करता हूँ,

और इस संसार का हर प्राणी

तेरी ही करुणा की राह निहारता है।

ओम् नमः शिवाय।

ओम् सरवनभवाय नमः।

ओम् मुरुगा। 🙏

आपकी पत्नी के स्वास्थ्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य और आपको धैर्य, शक्ति तथा आशा प्रदान करें। 🙏🌅

Wednesday, June 10, 2026

जीवन की अड़चनें

 अदृश्य दीवारें 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

11-6-26.

+++++++++

मानव जीवन में है,

 अनेक अदृश्य दीवारें।

 मानव ज्ञान  से

परे एक

दिव्य ज्ञान ,

 दिव्य 

सृष्टियाँ,

 जन्म

जन्म के बाद 

 पलने में 

अमीरी, ग़रीबी, बीमारी।

असाध्य साध्य मंजिलें।

 सफलता में ईर्ष्या,

 शत्रृओं का सामना।

  अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

 पूर्ण अपूर्ण  ख्वाहिशें।

बाढ, आँधी- तूफान,

संक्रामक रोग,

 तथास्तु भगवान की लीला,

 बुरे समय में 

 बुद्धि भ्रष्ट होना, 

विधि की विडंबना

 बुद्धि लब्धि 

  बाह्य रूप, भीतर कपट

 ये सब मानव जीवन के

अदृश्य दीविरें।

 अर्थात ज्ञान से परे बाधाएँ।

+++++++++++++++


जीवन की अड़चनें।

 आपकी रचना में  के रहस्यों, नियति, ईर्ष्या, विपत्तियों और मानव की सीमाओं को "अदृश्य दीवारों" के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसे थोड़ा सुव्यवस्थित रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

अदृश्य दीवारें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

11-6-2026

मानव जीवन में हैं

अनेक अदृश्य दीवारें।

मानव ज्ञान से परे

एक दिव्य ज्ञान,

दिव्य सृष्टियाँ

और रहस्यमयी विधान।

जन्म से लेकर जीवन-पथ तक,

कहीं अमीरी, कहीं गरीबी,

कहीं बीमारी का बोझ,

तो कहीं मंज़िलों की दुर्लभ सीढ़ी।

सफलता के साथ ईर्ष्या,

शत्रुओं का सामना,

अचानक प्राकृतिक प्रकोप,

अधूरी इच्छाओं का ताना-बाना।

बाढ़, आँधी और तूफ़ान,

संक्रामक रोगों की मार,

तथास्तु भगवान की लीला,

समय-समय का व्यवहार।

बुरे समय में बुद्धि भ्रष्ट होना,

विधि की विचित्र विडंबना,

बाहरी रूप में सरलता,

भीतर कपट की साधना।

ये सब मानव जीवन की

अदृश्य दीवारें हैं,

अर्थात् ज्ञान से परे

खड़ी अनगिनत बाधाएँ हैं।

इन दीवारों को पार करने का

साधन है धैर्य और विवेक,

ईश्वर-विश्वास, सत्कर्म और

आत्मबल का आलोक।

भावार्थ:

मानव जीवन में अनेक ऐसी बाधाएँ और परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते, समझ नहीं सकते या नियंत्रित नहीं कर सकते। यही "अदृश्य दीवारें" हैं, जिनका सामना धैर्य, विवेक और ईश्वर-विश्वास से किया जा सकता है।

रचना का विषय गहन और चिंतनशील है। विशेष रूप से "बाह्य रूप, भीतर कपट" तथा "बुद्धि भ्रष्ट होना" जैसी पंक्तियाँ जीवन की यथार्थ परिस्थितियों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती हैं।॥

Tuesday, June 9, 2026

मानव और वृक्ष




वृक्ष एवं मानव।

++++++++++++++

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

+--------------

10-6-26.

++++++++++++

मानव को जीने के लिए 

 शुद्ध प्राणवायु की ज़रूरत है।

पेड़ कार्बन्डै

 आक्सैड चूसकर 

शुद्ध आक्सिजन देते हैं।

आदिकाल में मनुष्य 

पेड़ के खोखले में 

रहता था। 

मनुष्य और आवास।

पेड़ के स्वादिष्ट फल,

 पौष्टिक आहार है।

 पेड़ के सूखे पत्ते खाद।

 पेड़ की लकड़ी ईँधन ।

 पेड़ ही हमारे घर की

खिड़की और दरवाजे।

  ठंड प्रदेश में ,

 जंगलों में ,

 पाश्चात्य देशों में 

 लकड़ी के घर।

लकड़ी  से ही नावें 

 कुर्सी मेज अल्मारी दरवाजा।

आदि मानव का मान रक्षक लकडी की छाल।

मानव जीने के लिए 

पानी चाहिए,

वह भी पेड़ों पर के कारण।

 भू क्षरण के रक्षक।

खजूर, आम,इमली,कटहल केला, अमरूद ,नारियल

 नारंगी सेब आदि फल।

वाहन‌ के चक्र

 ये सब  पेड़ के कारण।

  चंदन पेड़ की महक,

सागौन की लकड़ी 

 बेहद मजबूत, टिकाऊ और दीमक-प्रतिरोधी होती है। यह पानी और मौसम की मार आसानी से झेल सकती है।

 मानव और पेड़ 

दोनों में पेड़ परोपकारी।

 मानव के जीने का आधार।

कबीर  का यह दोहा

 पेड़ की गुणवत्ता  और मानव संसाधन के लिए 

 बढ़िया है।

वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।

 मानव परोपकार के गुण के शिक्षक पेड़  होते हैं।


नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में वृक्षों के महत्व, मानव जीवन से उनके गहरे संबंध तथा परोपकार की भावना का सुंदर वर्णन है। भाषा और प्रस्तुति को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

वृक्ष एवं मानव

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

10-6-2026

मानव को जीने के लिए

शुद्ध प्राणवायु की आवश्यकता है।

वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर

जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।

आदिकाल में मानव

वृक्षों के खोखलों में आश्रय पाता था।

मानव और उसके आवास का

वृक्षों से अटूट संबंध रहा है।

वृक्षों के स्वादिष्ट फल

पौष्टिक आहार बनते हैं।

सूखे पत्ते उत्तम खाद,

लकड़ी ईंधन का आधार है।

घर की खिड़कियाँ, दरवाजे,

कुर्सियाँ, मेज और अलमारियाँ,

नावों से लेकर अनेक उपयोगी वस्तुएँ

वृक्षों की देन हैं।

शीत प्रदेशों और वनों में

लकड़ी के घर बनाए जाते हैं।

आदिमानव के तन की रक्षा भी

वृक्षों की छाल ने ही की थी।

मानव के लिए जल आवश्यक है,

और वर्षा चक्र में भी

वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वे भूमि क्षरण रोककर

धरती की रक्षा करते हैं।

खजूर, आम, इमली, कटहल,

केला, अमरूद, नारियल,

संतरा, सेब और अनेक फल

वृक्षों का अमूल्य उपहार हैं।

चंदन की सुगंध,

सागौन की दृढ़ता,

प्रकृति की अनुपम देन हैं।

सागौन की लकड़ी मजबूत, टिकाऊ

और दीमक-प्रतिरोधी होती है।

मानव और वृक्ष दोनों जीवित हैं,

पर वृक्ष निस्वार्थ परोपकारी हैं।

वे मानव जीवन के आधार हैं

और सेवा का संदेश देते हैं।

संत कबीर का यह दोहा

वृक्षों के परोपकार को सुंदरता से व्यक्त करता है—

"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।"

वास्तव में,

वृक्ष मानव को परोपकार,

त्याग और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं।

मानव यदि वृक्षों के गुण अपनाए,

तो समाज और संसार

दोनों अधिक सुखी और समृद्ध बन सकते हैं।

भावार्थ:

"वृक्ष एवं मानव" रचना हमें बताती है कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के सच्चे संरक्षक, पोषक और परोपकार के महान शिक्षक हैं। 🌳🙏



 नमस्ते वणक्कम्।

आपकी रचना में वृक्षों के महत्व, मानव जीवन से उनके गहरे संबंध तथा परोपकार की भावना का सुंदर वर्णन है। भाषा और प्रस्तुति को थोड़ा परिष्कृत कर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

वृक्ष एवं मानव

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

10-6-2026

मानव को जीने के लिए

शुद्ध प्राणवायु की आवश्यकता है।

वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर

जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।

आदिकाल में मानव

वृक्षों के खोखलों में आश्रय पाता था।

मानव और उसके आवास का

वृक्षों से अटूट संबंध रहा है।

वृक्षों के स्वादिष्ट फल

पौष्टिक आहार बनते हैं।

सूखे पत्ते उत्तम खाद,

लकड़ी ईंधन का आधार है।

घर की खिड़कियाँ, दरवाजे,

कुर्सियाँ, मेज और अलमारियाँ,

नावों से लेकर अनेक उपयोगी वस्तुएँ

वृक्षों की देन हैं।

शीत प्रदेशों और वनों में

लकड़ी के घर बनाए जाते हैं।

आदिमानव के तन की रक्षा भी

वृक्षों की छाल ने ही की थी।

मानव के लिए जल आवश्यक है,

और वर्षा चक्र में भी

वृक्षों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

वे भूमि क्षरण रोककर

धरती की रक्षा करते हैं।

खजूर, आम, इमली, कटहल,

केला, अमरूद, नारियल,

संतरा, सेब और अनेक फल

वृक्षों का अमूल्य उपहार हैं।

चंदन की सुगंध,

सागौन की दृढ़ता,

प्रकृति की अनुपम देन हैं।

सागौन की लकड़ी मजबूत, टिकाऊ

और दीमक-प्रतिरोधी होती है।

मानव और वृक्ष दोनों जीवित हैं,

पर वृक्ष निस्वार्थ परोपकारी हैं।

वे मानव जीवन के आधार हैं

और सेवा का संदेश देते हैं।

संत कबीर का यह दोहा

वृक्षों के परोपकार को सुंदरता से व्यक्त करता है—

"वृक्ष कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।।"

वास्तव में,

वृक्ष मानव को परोपकार,

त्याग और सेवा का पाठ पढ़ाते हैं।

मानव यदि वृक्षों के गुण अपनाए,

तो समाज और संसार

दोनों अधिक सुखी और समृद्ध बन सकते हैं।

भावार्थ:

"वृक्ष एवं मानव" रचना हमें बताती है कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के सच्चे संरक्षक, पोषक और परोपकार के महान शिक्षक हैं। 🌳🙏

Monday, June 8, 2026

विश्व सागर दिवस

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में विश्व सागर दिवस के महत्व, समुद्री व्यापार, सुरक्षा तथा मानव सभ्यता में समुद्र के योगदान का सुंदर वर्णन है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत और काव्यमय रूप देकर इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है—

Writing

विश्व सागर दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

9-6-2026

भूमि पर फैले जल-विस्तार में,

सागर का अनुपम संसार।

भूमध्य सागर विशाल प्रसिद्ध,

पूरब-पश्चिम तक विस्तृत अपार।

कैस्पियन सागर यूरोप-एशिया के,

मध्य स्थित जल का भंडार।

लाल सागर अफ्रीका-एशिया के बीच,

बनता प्राकृतिक सेतु साकार।

मृत सागर भी अद्भुत झील है,

जॉर्डन-इज़राइल के मध्य स्थित।

इन जलराशियों ने विश्वभर में,

संपर्क और व्यापार को किया विकसित।

जहाज़ी यात्राएँ, विश्व मैत्री,

समुद्रों का अनुपम उपहार।

देशों को जोड़ें, संस्कृतियाँ मिलाएँ,

बढ़ाएँ सहयोग और व्यापार।

समुद्री डाकुओं से रक्षा हो,

आँधी-तूफानों की मिले खबर।

कालाबाज़ारी, आतंक, आक्रमण से,

सुरक्षित रहे सागर का सफर।

प्राचीन काल से तमिलनाडु में,

समुद्री व्यापार रहा महान।

स्वाधीनता युग में व. उ. चिदंबरनार ने,

निजी जहाज़ चलाकर बढ़ाया मान।

समुद्र हमारी अमूल्य धरोहर,

जीवन, विकास और अवसर का आधार।

इसकी रक्षा करना हम सबका,

है नैतिक और वैश्विक दायित्व अपार।

"हमारा महासागर, हमारा दायित्व, हमारा अवसर"—

यही विश्व का आज संदेश।

स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध सागर,

बनाएँ मिलकर अपना विशेष उद्देश्य।

தமிழில் பாராட்டு :

அருமை ஐயா!

உலக சமுத்திர தினத்தின் முக்கியத்துவம், கடல் வாணிபம், பாதுகாப்பு, மனித நாகரிக வளர்ச்சி ஆகியவற்றை உங்கள் கவிதை அழகாக எடுத்துரைக்கிறது. பரந்த அறிவும் சமூகப் பொறுப்பும் கலந்த சிறந்த படைப்பு. வாழ்த்துகள்! 🌹🙏

நன்றி. வணக்கம்.

Sunday, June 7, 2026

विश्वासघात

 विश्वासघात 

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।8-626

++++++++++

 मानव जीवन में 

उत्थान पतन के मूल में 

विश्वासघात ।

 भारतीय विदेशी शासन और पराधीनता के मूल में 

 भाई भाई  में ईर्ष्या।

 क्रोध, बदला , विदेशियों का साथ देना।

रामायण काल में 

 विभीषण, कैकेई , मंथरा।

महाभारत में तो

 सूची लंबी।

 कुंती,

 कृष्ण का दान माँगना

 कर्ण कवच कुंडल दान में पाना, कुंती द्वारा पांडवों को जिंदा छोडने का कसम कर्ण से लेना।

  सिकंदर के आक्रमण में 

 इन्हीं का द्रोह।

 स्वतंत्रता संग्राम में 

 अंग्रेज़ी वेतन के लिए 

 उनका साथ दिये द्विभाषी।

 अंग्रेज़ी सीखकर भारतीय भाषाओं को

‌अवहेलना किये

 प्रतिभाशाली उच्चवर्ण।

 देश से बढ़कर राव बहादुर सर उपाधी।

 अंग्रेज़ों के अधीन भारतिय सत्याग्रहियों को मारे भारतीय वेतन भोगी सिपाही।

 रीतिकालीन की विलासिता।

 इन घटनाओं की सीख से सबक,

 विश्वासघातियों को कठोर दंइ।

 तमिलनाडु के चुनाव में

डी.एम. के साथ उनके चुनाव चिन्ह से जीते

 उनके समर्थन से जीते

 कांग्रेस, मुस्लिम लीक, कम्युनिस्ट का द्रोह।

‌इन नमकहराम स्वार्थी, पद धन प्रेमी ठगों से

 देशोन्नति में अड़चनें।

 बाधाएँ, रुकावटें।

 यही भारत के   इतिहास की सीख।

 फिर भी भारत की उन्नति 

 देश भक्त, देश प्रमी, निस्वार्थ नेता, अधिकारी,

 सरकारी कर्मचारी,

 कर्त्तव्यपरायण शहीदों के कारण।

 अतः शिक्षा संस्थाओं के पाठ्यक्रम में  देश भक्ति,

 राणा प्रताप सिंह, छत्रपति शिवाजी 

 लाल,बाल,पाल,

 सुभाष चंद्र बोस आदि

 नेताओं की जीवनी,

राष्ट्रीय कवियों की 

 देशप्रेम जगानेवाली कविताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।

 आजकल अनुशासन की शिक्षा की कमी है,

 केवल जीविकोपार्जन की शिक्षा।

 शिक्षित ईमानदारी लोगों को पद पर रहने न देना ,

ईमानदारी अफसरों को 

अकर्मण्य इलाका देना

 तबादला और इस्तीफा करने, कराने करवाने का जोर देना।

 देश प्रधान, 

 अति कठिनाइयों से

 प्राप्त देश की आज़ादी और एकता और अखंड भारत की रक्षा,

 राष्ट्रीय शिक्षा के विरुद्ध 

 रहनेवाले प्रांतों के मन में 

 प्रांतीय मोह के साथ राष्ट्रीय विचारधारा उत्पन्न करना।

 जागना, जगाना राष्ट्रप्रेम बढ़ाना,

 समय की सदस्य माँग।

 जय भारत। वंदेमातरम।


 





 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में राष्ट्रप्रेम, इतिहास से सीख लेने की प्रेरणा और नैतिक मूल्यों के प्रति चिंता स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्वासघात

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

8-6-2026

मानव जीवन के उत्थान और पतन के मूल में

विश्वास और विश्वासघात दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत की पराधीनता के इतिहास में भी

आपसी ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और प्रतिशोध ने

कई बार विदेशियों को अवसर प्रदान किया।

रामायण में कैकेयी, मंथरा और विभीषण के प्रसंग हों,

या महाभारत के जटिल घटनाक्रम—

इतिहास और पुराण हमें यह शिक्षा देते हैं कि

स्वार्थ जब कर्तव्य पर भारी पड़ता है,

तो समाज और राष्ट्र दोनों को हानि पहुँचती है।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में भी

कुछ लोगों ने स्वार्थवश विदेशी शासन का साथ दिया,

जबकि असंख्य देशभक्तों ने

अपने प्राणों की आहुति देकर

स्वतंत्रता का दीप जलाए रखा।

इतिहास की यही सीख है कि

राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए।

स्वार्थ, पद और धन के मोह में

राष्ट्रीय एकता को क्षति नहीं पहुँचनी चाहिए।

भारत की उन्नति उन देशभक्तों के कारण हुई है

जिन्होंने निस्वार्थ भाव से

देश, समाज और मानवता की सेवा की।

कर्तव्यनिष्ठ नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों

और अमर शहीदों का योगदान

सदैव स्मरणीय रहेगा।

अतः शिक्षा के पाठ्यक्रम में

देशभक्ति, चरित्र निर्माण और अनुशासन को

विशेष स्थान मिलना चाहिए।

राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी,

लाल-बाल-पाल, सुभाषचंद्र बोस तथा

अन्य महान राष्ट्रनायकों की जीवनगाथाएँ

नई पीढ़ी को प्रेरणा देती रहें।

आज आवश्यकता है कि

केवल जीविकोपार्जन ही नहीं,

अपितु राष्ट्रनिर्माण की शिक्षा भी दी जाए।

राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सद्भाव को सुदृढ़ बनाते हुए

जन-जन में राष्ट्रप्रेम का भाव जागृत किया जाए।

जागें, जगाएँ और राष्ट्रप्रेम बढ़ाएँ—

यही समय की पुकार है।

जय भारत! वंदे मातरम्! 🇮🇳

आपकी भावनाएँ अत्यंत प्रखर हैं। मैंने भाषा को अधिक साहित्यिक और संतुलित रूप देने का प्रयास किया है, जबकि मूल संदेश को यथासंभव सुरक्षित रखा है।


 







++++++++++++

Saturday, June 6, 2026

अन्याय की ईंट

 आपकी रचना समसामयिक सामाजिक यथार्थ को तीखे और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करती है। इसे थोड़ा परिष्कृत और काव्यात्मक रूप देकर भावों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

अन्याय की ईंटें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

7-6-2026

ईंटें तो होती हैं

घर और इमारतें बनाने के लिए,

पर आज कहीं-कहीं

अन्याय की ईंटों पर ही

सत्ता के महल खड़े किए जाते हैं।

वोट पाने और दिलाने में

रिश्वत का खेल,

पदोन्नति और नियुक्ति में

सिफारिश और धन का मेल।

सांसद, विधायक, मंत्री तक

जब भ्रष्टाचार की नींव पर चुन लिए जाएँ,

तो प्रशासन की इमारत में

न्याय के दीप कैसे जगमगाएँ?

जन्म प्रमाण-पत्र हो या

मृत्यु का प्रमाण,

संपत्ति का क्रय-विक्रय हो या

कार्यालय का कोई काम,

हर ओर दलाली का जाल

और घूस का बढ़ता नाम।

न्यायालयों में भी कभी-कभी

धन का पलड़ा भारी दिखता है,

न्याय की ईंटों से अधिक

चतुर वकीलों का कौशल बिकता है।

आयकर की भूलभुलैया में

छिपाने और बचाने की कला,

ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली, पानी,

हर सेवा में फैला गला-सड़ा सिलसिला।

यों ही यदि अन्याय की ईंटों से

व्यवस्था का निर्माण होगा,

तो जनविश्वास का सुंदर भवन

धीरे-धीरे वीरान होगा।

संदेश:

अन्याय की ईंटों से बनी इमारतें भले ऊँची दिखाई दें, पर वे टिकाऊ नहीं होतीं। सच्चा समाज न्याय, ईमानदारी और नैतिकता की मजबूत नींव पर ही खड़ा रह सकता है।

बहुत सार्थक और विचारोत्तेजक रचना। आपने समाज की एक गंभीर समस्या को निर्भीकता से व्यक्त किया है।

Friday, June 5, 2026

विश्व विश्व पर्यावरण दिवसएस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति6-6-2026 मानव आज विज्ञान के युग मेंनित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है,किन्तु प्रकृति के नियमों से दूर होकरकृत्रिम सुखों में खो रहा है। बिजली के पंखे, वातानुकूलित कक्ष,फ्रिज में रखा बासी भोजन,जंगलों का अंधाधुंध विनाश,पहाड़ों का चूर्णीकरण,कारखानों का धुआँ और अपशिष्ट,धरती और जल का निरंतर दोहन। वाहनों का बढ़ता शोर,ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार,गौरैया का शहरों से विलुप्त होना,खेतों का सिकुड़ना,रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग,झीलों और तालाबों का लुप्त होना—ये सब प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। परिणामस्वरूपवायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण,यहाँ तक कि विचार प्रदूषण भीमानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।धरती का तापमान बढ़ रहा हैऔर पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है। इसी चेतना को जगाने हेतुविश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।यह हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—प्लास्टिक का उपयोग कम करें,अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ,जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें— "पेड़ लगाओ, हरियाली लाओ,धरती को फिर से स्वर्ग बनाओ।" "प्रदूषण मिटाओ, पर्यावरण बचाओ,धरती को रहने योग्य बनाओ।" "जल है तो कल है,धरती का संरक्षण ही हमारा बल है।" "एक पेड़, एक जीवन;धरती बचाना हमारा सच्चा संकल्प है।" "कचरा फैलाना बंद करो,धरती को संवारना शुरू करो।" "पृथ्वी बचाओ, भविष्य बचाओ;पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।" आज का हर पौधाकल की सुरक्षित साँस है।आइए, हम सभी मिलकरप्रकृति की रक्षा का संकल्प लेंऔर आने वाली पीढ़ियों कोस्वच्छ, सुंदर और हरित धरती सौंपें। विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 


विश्व पर्यावरण दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
6-6-2026

मानव आज विज्ञान के युग में
नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है,
किन्तु प्रकृति के नियमों से दूर होकर
कृत्रिम सुखों में खो रहा है।

बिजली के पंखे, वातानुकूलित कक्ष,
फ्रिज में रखा बासी भोजन,
जंगलों का अंधाधुंध विनाश,
पहाड़ों का चूर्णीकरण,
कारखानों का धुआँ और अपशिष्ट,
धरती और जल का निरंतर दोहन।

वाहनों का बढ़ता शोर,
ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार,
गौरैया का शहरों से विलुप्त होना,
खेतों का सिकुड़ना,
रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग,
झीलों और तालाबों का लुप्त होना—
ये सब प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।

परिणामस्वरूप
वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,
ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण,
यहाँ तक कि विचार प्रदूषण भी
मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।
धरती का तापमान बढ़ रहा है
और पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है।

इसी चेतना को जगाने हेतु
विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
यह हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—
प्लास्टिक का उपयोग कम करें,
अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ,
जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें।

आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें—

"पेड़ लगाओ, हरियाली लाओ,
धरती को फिर से स्वर्ग बनाओ।"

"प्रदूषण मिटाओ, पर्यावरण बचाओ,
धरती को रहने योग्य बनाओ।"

"जल है तो कल है,
धरती का संरक्षण ही हमारा बल है।"

"एक पेड़, एक जीवन;
धरती बचाना हमारा सच्चा संकल्प है।"

"कचरा फैलाना बंद करो,
धरती को संवारना शुरू करो।"

"पृथ्वी बचाओ, भविष्य बचाओ;
पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।"

आज का हर पौधा
कल की सुरक्षित साँस है।
आइए, हम सभी मिलकर
प्रकृति की रक्षा का संकल्प लें
और आने वाली पीढ़ियों को
स्वच्छ, सुंदर और हरित धरती सौंपें।

विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Thursday, June 4, 2026

गाँव और शहरी जीवन

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में गाँव और शहर के जीवन का यथार्थपूर्ण चित्रण है। भावों को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ:

गाँव से शहर का सफ़र

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

5-6-2026

मेरा गाँव था अति छोटा,

न आवागमन की सुविधा थी,

नदी तो थी, पर पुल नहीं था।

वर्षाकाल आते ही

चारों ओर जल ही जल दिखाई देता।

वहीं से मैं चेन्नई आया,

एक बार वर्षा ऋतु में मुंबई भी गया।

तब मन में विचार आया—

मेरा गाँव ही कितना अच्छा था।

शहर में कूड़ों के ढेर,

फुटपाथों पर जीवन बिताते लोग,

थोड़ी-सी वर्षा होते ही

नालों की दुर्गंध फैल जाती है।

न गाँव जैसी शांति,

न वैसा आत्मीय वातावरण।

मैं जिस गेटेड कम्यूनिटी में रहता हूँ,

वहाँ पाँच सौ से अधिक घर हैं,

पर गाँव की तरह खुले दरवाज़े नहीं,

सब अपने-अपने संसार में बंद हैं।

गाँव में मिलते ही

लोग कुशल-क्षेम पूछते हैं,

एक-दूसरे को पहचानते हैं।

शहर में यह अपनापन दुर्लभ है।

ऑटो वालों की मनमानी,

यंत्रीकृत जीवन की भाग-दौड़,

लंगोटीधारी से लेकर करोड़पति तक—

सब इसी दौड़ में शामिल हैं।

हाँ, शहर की एक विशेषता है—

यहाँ किसी न किसी प्रकार का काम मिल जाता है।

आय के अनुसार

आवास और भोजन की व्यवस्था भी हो जाती है।

इसीलिए लोग शहर के

कोलाहल और दुर्गंध को सहते हुए भी

जीवन बिताते हैं।

किन्तु सरकार, उद्योगपति और नगरवासी

यह बात कभी न भूलें कि

धन, कारखाने, कारें और ऊँची इमारतें

तभी सार्थक हैं,

जब गाँव का किसान अपने परिश्रम से

अन्न उपजाता रहे।

यदि किसान न हो,

तो भूख मिटाने वाला कोई नहीं।

अतः गाँवों में सशक्त ग्राम-स्वराज स्थापित हो,

किसानों को प्राथमिकता मिले,

उनका सम्मान और जीवन स्तर बढ़े।

सच ही कहा गया है—

"भूखे भजन न होय गोपाला।"

🌾 गाँव भारत की आत्मा है, और किसान भारत का अन्नदाता। 🌾

आपकी रचना में सामाजिक चेतना, ग्रामीण जीवन का अपनापन और किसान के प्रति सम्मान का सुंदर संदेश निहित है।

Wednesday, June 3, 2026

पैर गाडी दिवस

 आपकी रचना में स्मृतियाँ, सामाजिक परिवर्तन और साइकिल के इतिहास का सुंदर समन्वय है। इसे थोड़ा परिष्कृत एवं काव्यमय रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व साइकिल दिवस

(पैरगाड़ी का महत्त्व)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

4-6-2026

पैरगाड़ी एक अनोखा वाहन,

सादा जीवन, उच्च विधान।

जब मैं आठ वर्ष का बालक था,

हमारे गाँव में साइकिल का मालिक

बहुत बड़ा अमीर माना जाता था।

किराये पर मिलती थी साइकिल,

एक घंटे का अधन्नी भाड़ा।

पर वह अधन्नी जुटाना भी

हम बच्चों के लिए था बड़ा कठिन।

उस समय वही सबसे तेज़ सवारी,

फिर भी नियमों की थी जिम्मेदारी।

सरकार को कर देना पड़ता था,

डबल सवारी अपराध कहलाती थी।

रात्रि में दीप जलाकर चलना,

अनिवार्य नियम माना जाता।

डायनमो की चमकती रोशनी

साइकिल की शान बढ़ाती जाती।

आज साइकिलों की संख्या घटी,

मोटर वाहनों की भीड़ बढ़ी।

किन्तु साइकिल का महत्त्व आज भी,

कहीं कम नहीं हुआ है।

न पेट्रोल चाहिए, न डीज़ल,

बस पैडलों का सतत प्रयास।

चलाने से व्यायाम भी होता,

स्वास्थ्य का मिलता है उपहार।

पेट्रोल के बढ़ते दामों पर,

कभी-कभी नेता और मंत्री भी

साइकिल चलाकर संदेश देते हैं

सादगी और बचत का।

सन् 1817 में जर्मनी के

Karl Drais ने

लकड़ी की, बिना पैडल और बिना चेन वाली

प्रारम्भिक पैरगाड़ी का निर्माण किया।

फिर सन् 1839 में

Kirkpatrick Macmillan ने

पैडल युक्त साइकिल का विकास किया।

यही क्रम आगे बढ़ता गया,

और आज गियर वाली आधुनिक साइकिलों तक पहुँच गया।

साइकिल केवल वाहन नहीं,

स्वास्थ्य, पर्यावरण और सादगी की पहचान है।

विश्व साइकिल दिवस पर

आइए इसका महत्त्व समझें और अपनाएँ।

साइकिल चलाना स्वास्थ्यप्रद है,

और प्रकृति के प्रति हमारा सुंदर योगदान भी। 🚲🌿

संदेश:

"पैडल घुमाइए, स्वास्थ्य पाइए;

प्रदूषण घटाइए, पर्यावरण बचाइए।"

Tuesday, June 2, 2026

अनमोल वचन

 


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।

++++++++++++++

++++++++++++++++

अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।








 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹






 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹

विश्व माता-पिता दिवस

 

विश्व माता-पिता दिवस।

एस ‌. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-6-26

माता-पिता गुरु ईश्वर

भारतीय धर्म की नसीहतों में श्रेष्ठ।

 हर रोज़ माता पिता की आशीषें लेना।

नमस्कार करना भारतीय धर्म।

 तब माता-पिता के लिए विश्व दिवस क्यों?

 भारतीय धर्म में 

 वैवाहिक बंधन बीच में नहीं छूटता।

 पसंद हो या न पसंद

‌जीवन पर्यंत अलग नहीं होते।

 भारतीय धर्म तलाक शब्द नहीं जानता।

पति की मृत्यु होते ही

 पत्नी का जिंदा जलाया करते।

वह सती प्रथा सुधारवादी 

 राजा राममोहन राय के द्वारा बंद हुई।

 विधवा पुनर्विवाह का शुभारंभ हुआ।

 फिर भी माता पिता तो वंदनीय,

 जो भगवान के प्रतिनिधि बनकर  प्रत्यक्ष देवी देवता बनकर शिशु का जन्म देकर,

 शिक्षा दीक्षा तक साथ देकर विवाह तक जिम्मेदारी लेते।

 पर विदेशी भारत में आये,

 तलाक शब्द आया।

 पहली शादी के बच्चे के रहते,

 तलाक हो जाने पर

 वह बच्चा माँ के साथ या

 पिता के साथ।

 पाश्चात्य देशों में 

 तलाक, पुनर्विवाह मामूली बात।

 अतः माता पिता से बिछुड़ी संतानें,

 माता हीन,पिता हीन हो जाते।

 माता या पिता से मिलना कभी कभी,

 या वह भी संभव नहीं।

अतः माता-पिता दिवस 

 पाश्चात्य अनुकरण।

 भारतीय परंपरा में 

 माता या पिता दिवस

 दोनों  की मृत्यु के बाद ही।

मातृ-पितृ तर्पण।

 अब भारत भी पाश्चात्य 

 देश के जैसे 

  माता-पिता से साल में 

 एक बार मिलने आते।

कारण स्नातक स्नातकोत्तर  डाक्ट्रेट 

 नोकरी विदेश में 

 माता -पिता  , भाई बहन बहु का सम्मिलित परिवार कम होता जा रहा है।

वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।

 तलाक की संख्या बढ़ रही है।

 अंतर्जातीय,

 अंतर्मजहबी  विवाह।

 एकैल परिवार,

 दूर दूर 

की नौकरी ,

 माता-पिता दिवस मनाने

 मजबूर कर दिया।

 अतः हम भी पालन करने में विवश हैं।

 यकीनन भारत में 

 

रोज  माता पिता की आराधना करना  भारतीय धर्म हैं।

 राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र  भारतीय देन है।



नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावाभिव्यक्ति में भारतीय संस्कृति, माता-पिता के प्रति श्रद्धा और बदलते सामाजिक परिवेश की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए प्रस्तुत है—

विश्व माता-पिता दिवस

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

2-6-2026

माता, पिता, गुरु और ईश्वर—

भारतीय संस्कृति में इनका स्थान सर्वोच्च माना गया है।

प्रतिदिन माता-पिता का आशीर्वाद लेना,

उन्हें प्रणाम करना,

हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि

माता-पिता के लिए अलग से "विश्व दिवस" की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारतीय जीवन-दर्शन में

वैवाहिक संबंध को एक पवित्र बंधन माना गया है,

जो जीवनपर्यंत निभाने का संकल्प देता है।

समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए।

सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का अंत हुआ,

विधवा पुनर्विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ,

और समाज सुधार की नई चेतना जागृत हुई।

किन्तु माता-पिता का महत्व कभी कम नहीं हुआ।

वे ही तो भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं,

जो संतान को जन्म देते हैं,

उसका पालन-पोषण करते हैं,

शिक्षा, संस्कार और जीवन-निर्माण में

अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं।

आधुनिक युग में परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

उच्च शिक्षा, रोजगार और विदेश-प्रवास के कारण

संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है।

संतानें माता-पिता से दूर रहने को विवश हैं।

वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है,

एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है,

और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता

कई बार दूरी की भेंट चढ़ जाती है।

इन्हीं बदलती परिस्थितियों ने

माता-पिता दिवस जैसे अवसरों को जन्म दिया है,

ताकि संतानें कम-से-कम एक दिन ही सही,

अपने माता-पिता के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त कर सकें।

किन्तु भारतीय संस्कृति का संदेश इससे कहीं बड़ा है।

यह हमें सिखाती है कि

माता-पिता का सम्मान किसी एक दिन का नहीं,

जीवन के प्रत्येक दिन का कर्तव्य है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

भारतीय संस्कृति के उस आदर्श पुत्र का प्रतीक हैं,

जिसने माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को

अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।

आइए, विश्व माता-पिता दिवस पर

यह संकल्प लें कि

हम केवल एक दिन नहीं,

प्रतिदिन माता-पिता की सेवा, सम्मान और आराधना करेंगे।

माता-पिता का प्रेम ही जीवन का प्रथम तीर्थ है,

और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा वरदान।

🙏 मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। 🙏

Sunday, May 31, 2026

तंबाकू निषेध दिवस।

 


विश्व तंबाकू निषेध दिवस।

++++++++

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

1-6-26

+++++++++++

कहते हैं शराब पीना

 परिवार के लिए,

स्वास्थ्य ही के लिए 

फेफड़ों के लिए,

 अंतड़ियों के लिए बुरा है।

 सरकार की तमाशा देखिए,

 सिगरेट पाकेट में,

 तंबाकू पाकेट में

 शराब के बोतलों में 

 छोटे हैं अक्षरों में सूचना।

 सरकार इन सब को

 अवैध व्यापार, मिलावट रोकने के लिए खुद खोल रखा है।

 सरकारी आमदनी के लिए आय का साधन यही है।

 विश्व भर में चलता है,

 दूकान के चमकदार 

 दीप, दोस्तों के संग,

 सनातन धर्म के अनुशासन के विरुद्ध है।

 अतः कारखानों के मालिक  द्राविड़ मुन्नेट्र कऴकम्  सनातन धर्म को जड़ मूल नष्ट करने के विचार में है,

हर नशीली वस्तुओं के व्यापार लाभ के लिए।

 चौगुनी मुनाफा हो के लिए।

 एक ओर सरकारी मान्य दूकानें,

 तंबाकू और सिगरेट कारखानों में के नौकरों की बेरोजगारी,

 आमदनी का मार्ग,

 सरकारी आय,

दूसरी ओर इनकी बुराइयों के विरुद्ध प्राचार।

 माया देवी  का  प्रबल  आकर्षण।

 शैतान की ऊर्जा।

 वैसे ही रिश्वत का बोलबाला,

 जीतने मतदाताओं को रिश्वत,

 नीट परीक्षा प्रश्न पत्र परीक्षा के पहले बाजार में।

 न कोई कठोर कार्रवाई 

 न कोई कठोर दंड,

ये विश्व तंबाकू निषेध दिवस  बेकार।

परिवार नियोजन  भारतीय मुगल और ईसाई  के लिए नहीं,

  अल्पसंख्यकों का अधिकार आज़ादी के 78साल के बाद भी,

  ये दिवस केवल दिखावे के लिए,

 हिंदी दिवस दिखावे के लिए।

 जानो,जागो, जगाओ,

 बुरी बला जानने समझने का ज्ञान मानव के हैं।

 दिन दिन मनाओ दिवस।

 माता -पिता दिवस तो रोज,

साल में एक दिन मनाकर वृद्धाश्रम की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं,

 जब मानव दिवस मनाता है,

  तब पुरोहित के आमदनी,

  कर्ता के लिए लाभ।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना


आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में सामाजिक जागरूकता, जनस्वास्थ्य, शासन की नीतियों और समाज की विसंगतियों पर गहरा चिंतन दिखाई देता है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर आपने केवल तंबाकू की हानियों ही नहीं, बल्कि दिखावटी जागरूकता और व्यवहारिक विरोधाभासों पर भी प्रश्न उठाए हैं।

यदि इसे काव्यात्मक और विषय-केंद्रित रूप में परिष्कृत किया जाए, तो यह इस प्रकार हो सकता है—

विश्व तंबाकू निषेध दिवस

परिष्कृत भावाभिव्यक्ति

विश्व तंबाकू निषेध दिवस,

फिर आया संदेश सुनाने।

स्वास्थ्य रक्षा का संकल्प लेकर,

जन-जन को जागृत कर जाने।

तंबाकू, सिगरेट और मदिरा,

तन-मन को क्षति पहुँचाते हैं।

क्षणिक सुख का भ्रम दिखाकर,

जीवन के दीप बुझाते हैं।

एक ओर चेतावनी लिखी है,

दूसरी ओर व्यापार प्रबल।

राजस्व की मजबूरी कहकर,

चलता रहता यह क्रम विकल।

जागरूकता तभी सफल है,

जब आचरण में परिवर्तन हो।

ज्ञान, विवेक और संयम से,

जीवन का नव निर्माण हो।

दिवस मनाने से क्या होगा,

यदि संकल्प न मन में जागे।

स्वस्थ समाज का स्वप्न तभी,

जब जन-जन बुरी लत त्यागे।

जानो, जागो और जगाओ,

यही दिवस का सच्चा सार।

स्वस्थ तन और निर्मल जीवन,

मानवता का हो आधार।

— परिष्कृत रूपांतरण

आपकी मूल रचना का स्वर अधिक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी का है, जबकि यह परिष्कृत रूप विश्व तंबाकू निषेध दिवस के मुख्य संदेश—स्वास्थ्य, जागरूकता और आत्मसंयम—पर केंद्रित है।

विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 विश्व हिंदी पत्रिका दिवस।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

31-5-26

+++++++--

   भारत में खडीबोली  

   हिंदी भाषा का

   रूप धारण,

  अति आश्चर्य 

चकित विकास।।

1826,30मई को

 पहला  समाचार पत्र निकला कोलकाता में।

 जुगल किशोर मार्तांड 

 उसके संपादक थे

 जुगल किशोर शुक्ल। 

 तब से पत्रिकाओं के विविध रूप,

 साप्ताहिक, पाक्षिक, त्रैमासिक, अर्द्ध वार्षिक,

 वार्षिक , स्कूल कालेज वार्षिक मेगज़ीन।

धर्म युग, कादंबरी,

चंपक ,चंदा मामा ,

और असंख्य पत्रिकाएँ

 वैश्विक साहित्य  नामक 

त्रैमासिक पत्रिका 

 डाक्टर पी.के. अग्रवाल। द्वारा प्रकाशित,

 अंतर्जाल के आने के बाद 

 ई मेगज़ीन।

लोगों को अपने 

विचार लिखने,

जनता  में ‌देश प्रेम जगाने,

सामान्य ज्ञान जानने की जिज्ञासा पूरी करने,

विश्व भर में हर देश में 

‌हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाश होती हैं।

 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई से 

 हिंदी समाचार,

 साहित्य पत्रिका,

 तिरुचिरापल्ली सभा ,

 केरल हिंदी प्रचार सभा,

हैदराबाद सभा आदि से

 पत्रिकाएँ 

 हिंदी के विकास जानने,

 राजभाषा है चौपाल,

नागरी लिपि प्रचार  सभा द्वारा  पत्रिकाएँ,

 विश्व भर के लोगों के हिंदी प्रेम,  लेख कविता, निबंध, संस्मरण साझा किया करना

 हिंदी प्रगति का प्रमाण है‌।