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Sunday, November 1, 2026

समय

 

आज की चुनौती : समय का मुसाफिर

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
2-11-2026

समय तो निरंतर चलता रहता है।

जो समय की परवाह नहीं करता,
समय भी उसकी परवाह नहीं करता।

कबीर ने कहा है—

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

समय बीत जाने के बाद
पछताने से क्या लाभ?
तब तो भगवान भी
बीते हुए समय को लौटा नहीं सकता।

समय की गति निराली है।

बैठे-बैठे भविष्य की कल्पना करें,
तो कल्पनाओं में भविष्य
तेजी से सामने आ जाता है।

भूतकाल की स्मृतियों में जाएँ,
तो बीते हुए वर्षों की यात्रा
पलभर में पूरी हो जाती है।

हम सभी समय के मुसाफिर हैं।

शैशव की यात्रा,
बचपन की यात्रा,
युवावस्था की यात्रा,
प्रौढ़ावस्था की यात्रा
और अंत में वृद्धावस्था की यात्रा।

जीवन की यह यात्रा
समय के साथ निरंतर चलती रहती है।

अतः हम समय के मुसाफिर हैं।

समय अनमोल है।
इसका सदुपयोग करें।
बीते समय पर पछताने के बजाय
वर्तमान को सार्थक बनाएँ।

यही जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।

मन मान और

 मन, मान और धन


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु


मन में उच्च विचार हों,

सोच ऊँची हो,

तो सभी उसका सम्मान करते हैं।


परंतु वास्तविकता यह भी है कि

धनियों के दरबार में

मान मिले या न मिले,

धन का अपना प्रभाव रहता है।


फिर भी उच्च विचार,

अथक परिश्रम,

समाज-कल्याण की भावना,

निष्काम एवं निस्वार्थ सेवा

मनुष्य को महान बनाती है।


लालबहादुर शास्त्री जी

अपने निरंतर परिश्रम,

सादगी और देशसेवा के बल पर

प्रधानमंत्री बने।


देश ही उनके लिए सर्वस्व था।


स्वच्छ भारत की घोषणा के साथ

चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी जी

भी देश के प्रधानमंत्री बने।


इससे एक संदेश मिलता है—

मनुष्य की पहचान

उसके धन से नहीं,

उसके कर्म और विचारों से होती है।


मन प्रधान है, धन नहीं।


मन में उच्च विचार रखो,

निष्काम एवं निस्वार्थ सेवा करो।

धन को ही सर्वस्व मत समझो।


मन की आवाज सुनो,

सत्य के पथ पर चलते रहो।

भले ही अकेले चलना पड़े,

ईश्वर के प्रतिनिधियों के माध्यम से

एक दिन तुम्हें सम्मान अवश्य मिलेगा।


औवैयार की कविता और धन का प्रभाव


तमिल की प्रसिद्ध कवयित्री औवैयार ने

धनी कवियों को मिलने वाले सम्मान

और उनकी कविताओं की प्रशंसा के विषय में

एक व्यंग्यपूर्ण कविता कही है।


விரகர் இருவர் புகழ்ந்திட வேண்டும்


प्रशंसा करने वाले दो चतुर खुशामदी लोग चाहिए।


விரல்நிறைய மோதிரங்கள் வேண்டும்


उँगलियों में अनेक बहुमूल्य अंगूठियाँ होनी चाहिए।


அரையதனில் பஞ்சேனும் பட்டேனும் வேண்டும்


कमर पर मुलायम सूती या रेशमी वस्त्र होना चाहिए।


அவர்வித்தை நஞ்சேனும் வேம்பேனும் நன்று


उनकी विद्या अथवा कविता भले ही विष के समान हो या नीम की तरह कड़वी, फिर भी उसे अच्छी ही कहा जाएगा!


कितना तीखा व्यंग्य है!


एक कवि समाज को बिगाड़ने वाली,

विषैली और बुरी कविता भी लिखे,

फिर भी उसे सम्मान मिल सकता है।


क्यों?


क्योंकि उसके चारों ओर

खुशामद करने वाले लोग हैं।

हर कविता के बाद

'वाह! वाह!' कहने वाले लोग हैं।


उँगलियों में रत्नजड़ित अंगूठियाँ पहनने वाले

धनी कवि की कविता अच्छी हो या बुरी,

मधुर हो या कड़वी,

उसकी प्रशंसा करने वाले

हमेशा मिल ही जाएँगे।


औवैयार ने धनी कवियों को मिलने वाले

ऐसे सम्मान पर व्यंग्य करते हुए

कवि कंबन के सामने

राजदरबार में यह कविता सुनाई थी।


साहित्य और अमरत्व


आजकल काम-वासना से भरे

चलचित्रों के गीत

मौसमी हवा की तरह आते-जाते रहते हैं।


लेकिन सच्चे साहित्यकारों की

अमर कृतियाँ,

उनके उच्च विचार और जीवन-दर्शन

युगों-युगों तक स्मरणीय

और अनुकरणीय बने रहते हैं।


धन से प्रशंसा खरीदी जा सकती है,

लेकिन सच्चा सम्मान

उच्च विचारों और श्रेष्ठ कर्मों से ही मिलता है।


मन को ऊँचा रखो,

मान अपने आप मिलेगा।

धन को प्रधान मत समझो,

मानवता को प्रधान समझो।


---


एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक


स्वरचित भावाभिव्यक्ति — अपने विचार, अपनी हिंदी, अपनी शैली।

Saturday, October 31, 2026

संकल्प

 

संकल्प और ऊँचाइयाँ

हर मानव को चाहिए
एक दृढ़ संकल्प!

ज्ञानवृद्धि का संकल्प,
उच्च शिक्षा पाने का संकल्प,
उच्चतम पद प्राप्त करने का संकल्प।

सुशील एवं सुसंस्कृत परिवार के
पुत्र या पुत्री से
विवाह करने का संकल्प।

सुपुत्र-सुपुत्री के
लालन-पालन,
शिक्षा-दीक्षा और
चरित्र-निर्माण का संकल्प।

समाज और देश की सेवा का संकल्प,
बड़े-बड़े अनुसंधान करने का संकल्प,
समाज-कल्याण का संकल्प।

जलाशयों, नदियों, नालों और समुद्रों को,
सड़कों एवं सार्वजनिक स्थलों को
स्वच्छ रखने का संकल्प।

प्रदूषणमुक्त धरती,
स्वच्छ पर्यावरण बनाने का संकल्प।

दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों में
नई खोज करने का संकल्प।

संकल्प के बिना किए गए कार्यों में
लक्ष्य से भटकने का,
पीछे हटने का
अवसर अवश्य रहेगा।

ऊँचाइयों पर चढ़ना है तो
संकल्प ही साथ देगा।

हर कार्य को उसकी मंज़िल तक पहुँचाने की
मन में ठान लेना,
अपने लक्ष्य पर दृढ़ रहना,
सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने का
सार्थक मार्ग है।

संकल्प मनसा, वाचा, कर्मणा लेना चाहिए।

कर्तव्य-पालन,
वचन-पालन,
सत्य का पालन,
ईमानदारी से जीवन-यापन,
और अपने कदम निरंतर
आगे बढ़ाते रहना—

यह सब
दृढ़ संकल्प से ही संभव है!

संकल्प और ऊँचाइयाँ

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

1-11-26.


 हर मानव को चाहिए 

 संकल्प ।

 ज्ञानवृद्धि का संकल्प।

 उच्चतम शिक्षा पाने का संकल्प।

 उच्चतम पद पाने का संकल्प। 

 भद्र कुल के माता-पिता के

 पुत्र /पुत्री  से शादी कर लेने का संकल्प।

 सुपुत्र सुपुत्री के 

लालन पालन

 शिक्षा दीक्षा,

 चरित्र गठन का संकल्प।

 समाज,देश की सेवा करने का संकल्प।

 बड़े बड़े अनुसंधान करने का संकल्प।

 समाज कल्याण का संकल्प।

 जलाशय, नदी नाले 

समुद्र , 

सड़क आदि को 

साफ़ साफ़ रखने का संकल्प।

प्रदूषण रहित धर्ती 

 स्वच्छ रखने का संकल्प।

 दुर्गम पहाड, जंगल आदि की खोज का संकल्प।

संकल्प रहित 

 कार्य में उपलक्ष्य का,

 लक्ष्य से पीछे हटने का

अवसर अवश्य होगा।

 ऊँचाई पर चढ़ना है तो

 संकल्प साथ देगा ही।

 हर कार्य के मंजिल तक पहुँचने

 कसम  खाना,

 अपने लक्ष्य पर 

दृढ़‌ रहने बनने  में 

 सार्थक होने की सीढ़ी है।

संकल्प मनसा वाचा कर्मणा लेना चाहिए।

 कर्तव्य पालन,

 वचन पालन, 

सत्यपालन,

 ईमानदारी,

 अपने कदम 

आगे ही रखना,

 संकल्प से ही है संभव।


Friday, October 30, 2026

सरदार पटेल

 

सरदार वल्लभभाई पटेल : अखंड भारत के शिल्पकार

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
31-10-2026

++++++++++++

सरदार वल्लभभाई पटेल स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं प्रथम गृहमंत्री थे।

विभाजन के बाद अनेक रियासतों में बँटे भारत को एकजुट करके सशक्त एवं अखंड भारत के निर्माण में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। हैदराबाद के निजाम की रियासत को भी भारतीय संघ में सम्मिलित कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उनके दृढ़ संकल्प, साहस और निर्णय लेने की क्षमता के कारण ही उन्हें 'लौह पुरुष' कहा जाता है।

भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। खेड़ा सत्याग्रह, बारडोली सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन जैसे आंदोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें अनेक बार कारावास जाना पड़ा और वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।

उस महान नेता की देशभक्ति, त्याग और राष्ट्रसेवा अतुलनीय थी।

स्वतंत्र भारत के प्रथम गृहमंत्री एवं उपप्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश की एकता, अखंडता और प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महान योगदान दिया।

उनके नाम से प्रचलित निम्नलिखित प्रेरणादायक विचार आज भी हमारे लिए अनुकरणीय एवं स्मरणीय हैं। उनके विचारों को अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

उनके प्रेरणादायक विचार

  1. काम ही पूजा है।
    कर्मशीलता और स्वावलंबन का मंत्र।

  2. शक्ति के अभाव में विश्वास किसी काम का नहीं है।
    आत्मबल, साहस और राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता का संदेश।

  3. आज से हमें ऊँच-नीच और जाति-पंथ का भेद समाप्त करना होगा।
    सामाजिक समरसता और समानता का संदेश।

  4. अनुशासन और विनम्रता के बिना स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।
    स्वतंत्रता के साथ कर्तव्य और मर्यादा का बोध।

  5. जुर्म करो मत, जुर्म सहो मत। जीना है तो मरना सीखो।
    अन्याय के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़े होने की प्रेरणा।

हमारी सच्ची श्रद्धांजलि

महापुरुषों की जयंती मनाना ही पर्याप्त नहीं है। उनके आदर्शों, विचारों और जीवन मूल्यों को अपने आचरण में अपनाना आवश्यक है।

राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, अनुशासन, साहस और निस्वार्थ देशसेवा के मार्ग पर चलना ही सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

जय हिंद!
वंदे मातरम्!

Wednesday, October 28, 2026

संयम

  संयम का मीठा फल।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

29-10-26.

संयम मानव को चाहिए 

 न तो परिणाम होगी 

 बेइज्जती।

   पंचेंद्रिय काबू में न होता तो

 क्या होता ।

 मन अपने वश में 

 न होता तो  

मनमाना करें तो

 मान मर्यादा नष्ट हो जाता।

 इंद्र को हुआ,

 अपमान अहिल्या के कारण।

 हजारों मोनी का शाप मिला।। 

 आँखें  लड़की को देखकर मारा,तो

 उसका जूता मारा सिर पर।

 जिह्वा बावरी अपने वश में न रहकर,

 बकता तो  पागल का नाम मिलता।।  

संत तिरुवल्लुवर ने कहा --

ऒरुमैयुळ्

आमैपोल ऐंतडक्कल आट्ऱिन ऍऴुमैयुम एमाप्पुडैत्तु।(तमिऴ)

कछुए जैसै  विपत्ति के समय अपने पैर,अपने पंचेंद्रिय कान,आँखेँ, नाक,मुख, शरीर को अपने कवच में छिपा लेता है,  वैसे मानवभी अपने पंचेंद्रियों को बुरे मार्ग पर चलने न देकर काबू में रख लेना चाहिए। 

इस जन्म में मनुष्य

 संयम के साथ रहेगा तो

 अपने आनेवाले सात जन्मों में सुखी रहेगा।

संयम के कारण 

ऋषि-मुनियों को

 आत्मज्ञान मिलता है।

तुलसीदास संयम बना,

 पत्नी के मोह छोड़ा तो

 हिंदी साहित्य का शशी बना।

कबीर ने कहा 

 कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥

   अर्थात 

हाथी धीरज धरकर अपने स्थान से न हटकर रहने से  पेट भर खाया है।

 कुत्ता टूटे रोटी के टुकड़े के लिए घर घर फिरता है।

 धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।

 माली सींचै सौ घडा,

ऋतु आए फल होय।

  संयम और सब्रता का फल  मीठा ही होता है।

 संयम का मीठा फल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

29-10-2026


संयम मानव को चाहिए,

अन्यथा परिणाम होगा

अपमान और बेइज्जती!


पंचेंद्रियों पर नियंत्रण

यदि न होता,

तो मानव का जीवन

कैसा होता?


मन अपने वश में

यदि न होता,

मनमानी करने से

मान-मर्यादा का नाश होता।


इंद्र को भी अहंकार और वासना के कारण

अपमान का सामना करना पड़ा।

अहिल्या प्रसंग से जुड़ी कथा

हमें यही सीख देती है

कि अनियंत्रित इच्छाएँ

पतन का कारण बनती हैं।


आँखें यदि मर्यादा भूल जाएँ,

पराई स्त्री को बुरी दृष्टि से देखें,

तो सम्मान के बदले

अपमान ही मिलता है।


जिह्वा यदि अपने वश में न रहे,

बिना सोचे-समझे कुछ भी बकती रहे,

तो व्यक्ति विवेकहीन कहलाता है

और उपहास का पात्र बन जाता है।


संत तिरुवल्लुवर का अमूल्य संदेश


संत तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा है—

ऒरुमैयुळ्

आमैपोल ऐंतडक्कल आट्ऱिन ऍऴुमैयुम एमाप्पुडैत्तु।

“ஒருமையுள் ஆமைபோல் ஐந்தடக்கல் ஆற்றின்

எழுமையும் ஏமாப்புடைத்து.”


हिंदी भावार्थ:


कछुआ जिस प्रकार संकट के समय

अपने अंगों को कवच के भीतर समेट लेता है,

उसी प्रकार मनुष्य यदि अपनी पाँचों इंद्रियों

पर नियंत्रण रखना सीख ले,

तो उसका संयम

सात जन्मों तक उसके लिए

सुरक्षा और कल्याण का आधार बनता है।


इस जन्म में जो मनुष्य

संयम का मार्ग अपनाता है,

वह अपने भावी जीवन को भी

सुखमय बनाने की नींव रखता है।


संयम के कारण ही

ऋषि-मुनियों ने तपस्या की,

मन को वश में किया

और आत्मज्ञान प्राप्त किया।


तुलसीदास का जीवन-परिवर्तन


तुलसीदास पत्नी के मोह में

अत्यधिक आसक्त थे।

पत्नी के उपदेश ने

उनके जीवन की दिशा बदल दी।


सांसारिक मोह से विरक्त होकर

उन्होंने भक्ति का मार्ग अपनाया

और रामचरितमानस की रचना करके

हिंदी साहित्य के आकाश में

चंद्रमा की भाँति चमक उठे।


कबीर का धैर्य-संदेश


संत कबीर कहते हैं—


“कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥”


भावार्थ:


हाथी धैर्यपूर्वक अपने स्थान पर रहकर

अपना पेट भरने योग्य भोजन पाता है,

जबकि कुत्ता रोटी के एक टुकड़े के लिए

घर-घर भटकता फिरता है।


यह दोहा हमें धैर्य, संतोष

और आत्मसम्मान का महत्त्व समझाता है।


कबीर का एक और प्रसिद्ध दोहा है—


“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥”


भावार्थ:


हे मन! धैर्य रख।

हर काम अपने उचित समय पर होता है।

माली चाहे सौ घड़े पानी सींच दे,

फिर भी फल ऋतु आने पर ही लगता है।


निष्कर्ष


संयम हमें मर्यादा सिखाता है,

धैर्य हमें प्रतीक्षा करना सिखाता है,

और विवेक हमें सही मार्ग दिखाता है।


इंद्रियों पर नियंत्रण हो,

वाणी में मधुरता हो,

मन में धैर्य हो

और आचरण में मर्यादा हो,

तो जीवन सुंदर बन जाता है।


संयम और धैर्य का फल

सदैव मीठा होता है।


आज कष्ट सहकर भी

जो मर्यादा का मार्ग अपनाता है,

वही कल सम्मान, शांति

और संतोष का फल पाता है।

Tuesday, October 27, 2026

माँ

 [28/10, 1:48 am] sanantha.50@gmail.com: एक अक्षर मा़ँ के नाम पर 

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

281026

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 माँ ममता  का प्रतिबिम्ब।

 माँ -पिता  के प्रेम मिलन का परिणाम ।

 जगत में मानव जन्म।

माँ के गर्भ में ही शिशु का आकार।

 जन्म लेते ही प्रथम चुंबन माँ का।

 प्रथम शब्द माँ के 

मुख ध्वनि।

 अतः भाषा बनी मातृभाषा।

 माँ के स्तन पान 

 प्रथम आहार।

 माँ के गोद प्रथम पलना।

माँ के साथ पकड़कर 

 प्रथम चलना।

 माँ ममतामयी।

निस्वार्थ प्रेम दिखानेवाली।

त्याग की जीवित मूर्ति।

खुद भूखी, 

खिलाती खाना।

 नहलाती

 वस्त्र पहनाती।

पल पल के विकास में 

 ध्यान रखती।

 विविध कष्ट सहकर,

 संतानों को सुखी रखने में तत्पर।

 पन्ना जैसे देश की रक्षा के लिए,

अपने पुत्र की हत्या सहनेवाली।

 कुंती जैसे निर्दयी माँ।

माँ अमूल्य सिक्का।

 अक्षर अमर अक्षय है माँ का प्यार।।

[28/10, 2:00 am] sanantha.50@gmail.com: एक अक्षर माँ के नाम पर


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

28-10-2026


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माँ की ममता का प्रतिबिंब,

माँ-पिता के प्रेम-मिलन का परिणाम,

इस जगत में मानव का जन्म।


माँ के गर्भ में ही

शिशु का आकार बनता है।

जन्म लेते ही

माँ का प्रथम चुंबन मिलता है।


माँ के मुख से निकली ध्वनि

शिशु के कानों में पड़ती है,

इसीलिए तो उस भाषा को

मातृभाषा कहते हैं।


माँ का स्तनपान

शिशु का प्रथम आहार,

माँ की गोद

उसका प्रथम पालना।


माँ की उँगली पकड़कर

प्रथम कदम बढ़ाना,

माँ की ममता में पलना,

जीवन का प्रथम पाठ सीखना।


माँ ममतामयी,

निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति,

त्याग और तपस्या की

जीवंत मूर्ति।


खुद भूखी रहकर भी

संतान को भोजन खिलाती,

नहलाती, वस्त्र पहनाती,

पल-पल उसका ध्यान रखती।


विविध कष्ट सहकर भी

संतानों को सुखी रखने में

सदैव तत्पर रहती।


पन्ना धाय जैसी माँ,

देश की रक्षा के लिए

अपने पुत्र का बलिदान देकर भी

कर्तव्य-पथ से नहीं डिगती।


कुंती जैसी माँ,

जीवन की कठिनाइयों में भी

अपने पुत्रों को

धर्म-पथ पर चलना सिखाती।


माँ अनमोल रत्न है,

उसके प्रेम का कोई मोल नहीं।


माँ शब्द का एक-एक अक्षर

अमर है, अक्षय है।

माँ का प्यार

अनंत है, अविनाशी है!

 : आज की चुनौती 

 हर एक को  

हर पल एक चुनौती कब,क्या होगा,

पता नहीं।

नेपाल यात्रा गये,

 बाढ की चुनौती।

 अमेरिका जाने निकलें तो    ईरान उग्रैन की चुनौती।

 महँगाई की चुनौती 

 भ्रष्टाचार और रिश्वत की चुनौती।

  इन सबके बीच 

 Daily challenge 

रचना की है चुनौती।

  सोच विचार परिवर्तन का समय।

 अब विषय और चुनौती चार पाँच दिन से न तो

 सोच-विचार न करने की चुनौती।

 समय काटने की चुनौती।

 कहते हैं मानव जन्म दुर्लभ।

 यह दुर्लभ जन्म न होने में भला ही भला।

 अन्य जीव जन्म में

 न भविष्य की चिन्ता।

 न पढ़ाई की चिंता।

 न परीक्षा कीचिंता।

न नौकरी की चिंता 

 न शादी की चिंता।

 न संतान की चिंता।

 न संतान होने की चिंता।

राम भी रोया।

कृष्ण भी रोया।

 हर मानव 

 रंक हो या राजा

 चिंता ही चिंता।।

आज की चुनौती


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु


हर एक के जीवन में

हर पल एक चुनौती है।

कब, क्या हो जाएगा,

किसे पता है?


नेपाल की यात्रा पर जाएँ,

तो बाढ़ की चुनौती।

अमेरिका जाने निकलें,

तो ईरान-यूक्रेन युद्ध की चुनौती।


महँगाई की चुनौती,

भ्रष्टाचार और रिश्वत की चुनौती,

इन सबके बीच

हर दिन एक नई चुनौती।


प्रतिदिन नई रचना करना,

वह भी अपने आप में एक चुनौती।

सोच-विचार करना,

नए विषय खोजना,

समय के साथ बदलना—

यह भी एक चुनौती।


अब चार-पाँच दिनों से

न विषय सूझता है,

न विचार आते हैं,

न कुछ लिखने का मन होता है।

यह भी एक चुनौती है—

समय काटने की चुनौती!


कहते हैं,

मानव-जन्म दुर्लभ है।

कभी-कभी मन सोचता है—

यह दुर्लभ जन्म न मिला होता,

तो शायद चिंताएँ भी न होतीं!


अन्य जीवों के जीवन में

न भविष्य की चिंता,

न पढ़ाई की चिंता,

न परीक्षा की चिंता,

न नौकरी की चिंता,

न शादी की चिंता,

न संतान की चिंता,

न संतान होने की चिंता।


राम भी रोए,

कृष्ण भी रोए।

जब अवतारों के जीवन में भी

दुःख और संघर्ष आए,

तो सामान्य मानव की क्या बिसात!


रंक हो या राजा,

हर मानव के जीवन में

चिंता ही चिंता!


यही है आज की चुनौती—

चिंताओं के बीच जीना

और फिर भी जीवन से

हार न मानना।

Tuesday, October 20, 2026

मोह से मुक्ति

 

मोह से मुक्ति

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
21-10-2026


ईश्वरीय सृष्टि माया और मोह से रहित नहीं है।

ईश्वर ने नारी की रचना,

 संसार की निरंतरता और विकास के लिए की है। 

मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से 

पूरी तरह मुक्त होना सहज नहीं है।

भगवान की सृष्टि में महामाया का प्रभाव 

मानव मन में आकर्षण उत्पन्न करता है। 

संतानोत्पत्ति, संतान का लालन-पालन, 

प्रेम और ममता—ये सभी जीवन के स्वाभाविक अंग हैं। इनके मोह से मुक्ति पाना अत्यंत कठिन है।

जब तक मनुष्य अज्ञान और आसक्ति में बँधा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता।

आदि शंकराचार्य ने भज गोविन्दम् में 

संसार के इसी चक्र की ओर संकेत किया है—

पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥

इसका भावार्थ है—

  • पुनरपि जननम् — बार-बार जन्म लेना।
  • पुनरपि मरणम् — बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना।
  • पुनरपि जननी जठरे शयनम् — बार-बार माता के गर्भ में निवास करना।
  • इह संसारे बहुदुस्तारे — इस संसार-सागर को पार करना अत्यंत कठिन है।

माँ का प्यार,

 पत्नी के प्रति मोह,

 संतान का पालन-पोषण,

 स्वादिष्ट भोजन की इच्छा, 

सुंदर रूप का आकर्षण, 

नृत्य-संगीत का आनंद तथा आभूषण, 

हीरे और पन्ने जैसे बहुमूल्य रत्नों के प्रति आसक्ति—मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार के मोह से घिरा हुआ है।

इन सबके बीच रहते हुए भी

 मनुष्य अपने मन को आसक्ति से मुक्त कैसे करे?

यह आत्मचिंतन का विषय है।

सांसारिक सुखों की लालसा में

 मनुष्य कभी-कभी अनुचित मार्ग भी अपना लेता है।

 शीघ्र लाभ पाने के लिए भ्रष्टाचार और 

रिश्वत का सहारा लेना भी

 इसी अंधी लालसा का परिणाम है।

मोह से मुक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, 

बल्कि संसार में रहते हुए मोह का दास न बनना है।

माँ से प्रेम करना, 

पत्नी की सेवा करना, 

संतान का पालन-पोषण करना और 

दूसरों के प्रति करुणा रखना—

ये सब जीवन के पवित्र कर्तव्य हैं। 

समस्या प्रेम में नहीं, 

बल्कि उस आसक्ति में है 

जो मनुष्य को विवेक और धर्म के मार्ग से

 विचलित कर देती है।

यदि मनुष्य मोह से मुक्ति पाना चाहता है, 

तो उसे ईश्वर का स्मरण करना चाहिए, 

मन को संयमित करना चाहिए 

और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

आत्मा और परमात्मा की एकता का

 अनुभव करना ही अद्वैत मार्ग का परम लक्ष्य है।

आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत है—

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।

अर्थात् ब्रह्म ही परम सत्य है, 

जगत की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता नहीं है

 तथा

 जीवात्मा और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है।

जब मनुष्य इस सत्य को समझकर जीवन में उतारने का प्रयास करता है, 

तब धीरे-धीरे उसका मोह कम होने लगता है और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।

ईश्वर का स्मरण, कर्तव्य का पालन, मन का संयम और आत्मज्ञान—यही मोह से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने के साधन हैं।

ॐ नमः शिवाय।
ॐ मुरुगा! शरणम्।

मोह से मुक्ति।

 एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

21-10-26.

+++++++

ईश्वरीय सृष्टि 

 माया मोह रहित नहीं।

 ईश्वर ने नारी को  बनाया,

 सांसारिक विकास के लिए।

 वह सहज 

मूल प्रवृत्ति से  मुक्ति 

 पाना संभव नहीं।

 भगवान की सृष्टि में 

 महामाया देवी

 मानव मन में 

 आकर्षण के लिए।

 संतानोत्पत्ति,

संतान का लालन-पालन,

 प्रेम मोह।

 मुक्ति पाना मुश्किल।

 अतः निराश मनुष्य की मृत्यु, जन्म के चक्कर से बच नहीं सकता।

आदि शंकराचार्य ने लिखा है

• पुनरपि जननं: बार-बार जन्म लेना

• पुनरपि मरणं: बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना

• पुनरपि जननी जठरे शयनम्: और बार-बार माता के गर्भ में सोना (कष्ट उठाना)

• इह संसारे बहुदुस्तारे: इस अत्यंत कठिन और विशाल संसार-सागर को पार करना बहुत मुश्किल है।

  माँ का प्यार,

 पत्नी का मोह,

  संतान पालन,

 स्वादिष्ट खाने की  इच्छा, 

सुंदर रूप का मोह,

 नाच ,गान, आभूषण हीरा पन्ना आदि 

इतना मोह, 

 मुक्ति पाना,

आत्मज्ञानियों के लिए ही संभव है। 

 सद्यःफल के लिए भ्रष्टाचार और रिश्वत।

 मोह से मुक्ति होना है तो  ईश्वर ध्यान में रखना है।

 आत्मा परमात्मा एक होकर अद्वैत मार्ग पर चलना है।

जगत माया मिथ्या 

ब्रह्म सत्यं को अपनाना है।

Monday, October 19, 2026

विजयदशमी एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 20-10-26 +++++++ दशहरा नवरात्रि के दसवें दिन विजयदशमी के दिन मनाते हैं। तीन दिन दुर्गा पूजा तीन दिन नवरात्रि पूजा तीन दिन सरस्वती पूजा। विजयदशमी सरस्वती पूजा हैं। उस दिन में विद्यारंभ का दिन है। देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया है। इस विजयोल्लास में विजयदशमी मनाते हैं। लक्ष्मी के बिना जगत जीवन कठिनतम है। इसलिए लक्ष्मी की कृपा पाने लक्ष्मी पूजा। कर्नाटक में मैसूर में यह दिन धूमधाम से मनाते हैं। उत्तर भारत में राम लीला के रूप में मनाते हैं। रावण की मूर्ति जलाई जाती हैं। दुष्टों के संहार, बुराइयों का जलन, विद्यारंभ के यह त्यौहार वास्तव में दिव्य शक्ति के उज्जवलतम की झलक है।

 

विजयदशमी

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

20-10-26

+++++++

दशहरा

नवरात्रि के दसवें दिन

विजयदशमी के दिन

मनाते हैं।

तीन दिन दुर्गा पूजा

तीन दिन नवरात्रि पूजा

तीन दिन सरस्वती पूजा।

विजयदशमी सरस्वती पूजा हैं।

उस दिन में विद्यारंभ का दिन है।

देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया है।

इस विजयोल्लास में

विजयदशमी मनाते हैं।

लक्ष्मी के बिना जगत जीवन कठिनतम है।

इसलिए लक्ष्मी की कृपा पाने लक्ष्मी पूजा।

कर्नाटक में मैसूर में यह दिन धूमधाम से मनाते हैं।

उत्तर भारत में

राम लीला के रूप में

मनाते हैं।

रावण की मूर्ति जलाई जाती हैं।

दुष्टों के संहार,

बुराइयों का जलन,

विद्यारंभ के यह त्यौहार

वास्तव में

दिव्य शक्ति के उज्जवलतम की झलक है।

Sunday, October 18, 2026

अनमोल हीरे

   अनमोल हीरा


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-10-2026


++++++++++


अनमोल हीरा,

आदर्श नेता,

होशियार संतान,

देश के रक्षक,

प्रत्यक्ष देव समान

हमारे वीर जवान!


थल, जल और वायु सेना के वीर,

राष्ट्र की रक्षा में तत्पर,

हमारे गाँव, हमारे किसान,

देश की समृद्धि के आधार महान!


देश के धनी, दानी,

मानवता के अभिमानी,

सन्मार्ग के पथ-प्रदर्शक,

ऋषि-मुनि और संत महान—

ये सब हैं भारत के

अनमोल हीरे!


सनातन धर्म की अमूल्य धरोहर,

वेद, उपनिषद, रामायण, भगवद्गीता,

जातक कथाएँ और ज्ञान की गंगा,

मंदिर, तीर्थस्थल और पावन परंपराएँ—

भारत की आत्मा के अनमोल हीरे!


राम और कृष्ण,

रामकृष्ण परमहंस,

आदि शंकराचार्य,

महात्मा बुद्ध और गुरु नानक—

ज्ञान, भक्ति और मानवता के

अनमोल हीरे!


अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत,

दर्शन के विविध प्रकाश,

आत्मज्ञान के पथ पर

दिखाते जीवन को नई दिशा—

भारत की ज्ञान-संपदा के

अनमोल हीरे!


स्वतंत्रता संग्राम के शहीद,

राष्ट्रभक्त वीर और महान नेता,

जिनके त्याग और बलिदान से

स्वतंत्र हुआ हमारा भारत—

वे हैं राष्ट्र के अनमोल हीरे!


लाल, बाल और पाल,

समाज-सुधारक राजा राममोहन राय,

नेताजी सुभाषचंद्र बोस,

राष्ट्रपिता महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी—

इनके आदर्शों से आलोकित

भारत के इतिहास के पन्ने!


गंगा, यमुना, सरस्वती,

गोदावरी, कावेरी और कृष्णा,

जीवनदायिनी पावन नदियाँ,

हिमालय का दिव्य कैलाश—

प्रकृति के अनुपम उपहार,

भारत के अनमोल हीरे!


देशभक्ति, देशप्रेम,

सेवा, त्याग और सद्भाव,

ऋषि-मुनि, संत और कविगण—

भारत की संस्कृति के गौरव,

राष्ट्र की आत्मा के अनमोल हीरे!


नवभारत के निर्माता,

लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल,

पंडित जवाहरलाल नेहरू,

और राष्ट्रनिर्माण में योगदान देने वाले

असंख्य महापुरुष महान!


धन्य है भारतभूमि,

धन्य इसकी आध्यात्मिक विरासत,

धन्य हैं इसके गुरुजन,

धन्य हैं इसके वीर सपूत!


भारत की महानता के ये उज्ज्वल सितारे,

हम सबके लिए हैं अनमोल हीरे!

Friday, October 16, 2026

मानवता

 [16/10, 6:12 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सब से बड़ा है धर्म है।

एस‌ . अनंत कृष्णन, चेन्नई।

17-10-26.

++++++++

मानव और पशु में 

 फर्क नहीं।

 मानवता के कारण 

 मानव श्रेष्ठ है।

औवैयार ने अपने ग्रंथ आत्तिच्चूडी में  लिखा है--

धर्म करना चाह।

 धर्म क्या है?

मजहब नहीं,

धर्म कर्म।

 अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से करना धर्म है।

भलमानसाहस धर्म है।

 निस्वार्थ समाज सेवा,

 दीन दुखियों की सेवा मानवता है।

 धन है धन से सेवा,

बुद्धि है तो बुद्धि से सेवा

 बल है तो बल से।

अन्नदान, भूदान,गो दान, स्वर्ण दान,रजत दान धर्म है।

देश को स्वच्छ रखना,

 नदी नालों को प्रदूषित न करना धर्म हो।

पेड़ लगाना धर्म है।

मानवता है तो

 भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

 विसर्जन के नाम से छिन्न-भिन्न करके अपमानित न करता।

 उन करोड़ों के रूपयों से ऐसी सेवा करता,

 जिससे सब लोग मातृ मजहब में फिर जुड़ जिते।

 मनसा वाचा कर्मणा 

 देश की रक्षा करना 

 अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहना मानवता है।

 अच्छी चालचलन , अनुशासन, वचन निभाना मानवता धर्म है।

 वसुधैव कुटुंबकम्, 

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु का पालन करना धर्म है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

[16/10, 6:13 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सबसे बड़ा धर्म है


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

दिनांक: 17-10-2026


++++++++


मानव और पशु में

प्राकृतिक अंतर भले ही कम हो,

पर मानवता के कारण

मानव श्रेष्ठ है।


महाकवयित्री औवैयार ने

अपने ग्रंथ ‘आत्तिचूड़ी’ में

कहा है—


“அறம் செய விரும்பு”

अर्थात् धर्म-कर्म करने की इच्छा रखो।


धर्म क्या है?


धर्म केवल मजहब नहीं,

धर्म है सत्कर्म।

अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से निभाना धर्म है।


भलमनसाहत, साहस और सदाचार

धर्म के ही रूप हैं।

निस्वार्थ समाज-सेवा

और दीन-दुखियों की सेवा

सच्ची मानवता है।


धन है, तो धन से सेवा करो।

बुद्धि है, तो बुद्धि से सेवा करो।

बल है, तो बल से सेवा करो।

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

दूसरों के काम आना

मानवता का सच्चा परिचय है।


अन्नदान, भूदान, गोदान,

स्वर्णदान और रजतदान—

ये सभी दान के विभिन्न रूप हैं।

परंतु दान का वास्तविक महत्त्व

उसकी भावना और

उससे होने वाले जनकल्याण में है।


देश को स्वच्छ रखना,

नदियों और नालों को

प्रदूषित होने से बचाना,

वृक्ष लगाना और प्रकृति की रक्षा करना

भी हमारा धर्म है।


यदि हमारे हृदय में मानवता है,

तो भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

विसर्जन के नाम पर

उन्हें खंडित करके

प्रकृति को प्रदूषित क्यों करें?


उस धन का उपयोग

जनकल्याण के कार्यों में हो,

जिससे निर्धनों, असहायों और

दीन-दुखियों के जीवन में

सुख और आशा का संचार हो।


मनसा, वाचा, कर्मणा—

मन, वचन और कर्म से

देश की रक्षा करना,

अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहना,

अच्छा आचरण करना,

अनुशासन का पालन करना

और अपने वचन को निभाना

मानवता के सच्चे लक्षण हैं।


“वसुधैव कुटुम्बकम्”—

अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी

एक परिवार है।


“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु”—

अर्थात् सभी जन सुखी हों।


इन महान आदर्शों का पालन करना

ही सच्चा धर्म है।


मजहब अनेक हो सकते हैं,

पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं,

परंतु मानवता का संदेश

सबको जोड़ता है।


मानव-सेवा ही माधव-सेवा है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

Thursday, October 15, 2026

सत्य की मशाल

 [15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल।

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

16-10-26.

 अंधकार मिटाने मशाल।

 जीवन में 

 प्रकाश लाने

 सत्य की मशाल।।

 सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा।

 उसकी बात एक ही रहेगी।

 बदल बदलकर बातें न होगी।

वही सत्य की मशाल।

 सत्य की मशाल अलौकिक प्रकाश।

 आत्मज्ञान जगाती हैं।

 सत्य की मशाल सर्वेश्वर के दर्शन कराती।

 बेचैनी अंधकार मिटा देती।

 सत्यार्थ प्रकाश  

मानव पाता  दिव्य शक्ति।

[15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

16-10-2026


अंधकार मिटाने वाली मशाल,

जीवन में प्रकाश लाने वाली मशाल,

सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा—

यही है सत्य की मशाल!


सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा,

उसका कथन एक ही रहेगा।

बदल-बदलकर बातें न होंगी,

सत्य की राहें कभी न बदलेंगी।


यही है सत्य की मशाल,

यही है सत्य की मशाल!


सत्य की मशाल का अलौकिक प्रकाश,

जगाता है आत्मज्ञान का विश्वास।

अंतरात्मा को निर्मल बनाती,

परमेश्वर के दर्शन कराती।


मन की बेचैनी, भ्रम और अंधकार मिटाती,

जीवन में शांति की ज्योति जलाती।

सत्यार्थ के प्रकाश को जब मानव अपनाता है,

उसके अंतर्मन में दिव्य ज्ञान जगमगाता है।


सत्य की मशाल जलती रहे,

मानवता का पथ प्रकाशित करती रहे!

Wednesday, October 14, 2026

परमाचार्य वाणी

 परमाचार्य वाणी

परमाचार्य की दिव्यवाणी — भाग 1


मंगलारंभ : विनायक और तत्त्वमय विनायक


सादर समर्पण — महापेरियवा के श्रीचरणों में


कांचीपुरम मठ के परमाचार्य की दिव्यवाणी को सरल हिंदी में YouTube के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने के विनम्र प्रयास में, उनके कमल-सदृश श्रीचरणों में सादर प्रणाम करके इस कार्य का श्रीगणेश कर रहा हूँ।


मेरी अर्धांगिनी अपने अंतिम समय तक यही विश्वास व्यक्त करती रही कि महापेरियवा उसकी रक्षा करेंगे। अंततः वह उन्हीं का नाम स्मरण करते हुए इस संसार से विदा हो गई।


यह YouTube प्रस्तुति मेरी अर्धांगिनी की पावन स्मृति में तथा महापेरियवा के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित है।


मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कांची कामकोटि पीठ इस प्रयास को अपना आशीर्वाद प्रदान करे और इसकी प्रस्तुति के लिए आवश्यक अनुमति प्रदान करने की कृपा करे।


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विषय-प्रवेश


इस श्रृंखला में परमाचार्य की दिव्यवाणी के माध्यम से निम्नलिखित विषयों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा।


1. मंगलारंभ

   - विनायक

   - तत्त्वमय विनायक

2. अद्वैत

3. धर्म और मत

4. वैदिक धर्म

5. सामान्य धर्म

6. सामाजिक विषय

7. संस्कृति

8. कर्ममार्ग

9. भक्तिमार्ग

10. देवता, मूर्तियाँ और अवतार-पुरुष

11. मंगलारती


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1. तमिलनाडु की विशेषता — सर्वत्र विराजमान पिळ्ळैयार


तमिलनाडु की एक विशेषता है कि यहाँ पग-पग पर भगवान विनायक के दर्शन होते हैं। तमिल भाषा में उन्हें स्नेह और आदर से ‘पिळ्ळैयार’ कहा जाता है।


विनायक के मंदिरों के लिए विशाल गोपुरम और भव्य भवन ही आवश्यक नहीं हैं। कहीं वे पीपल के वृक्ष के नीचे खुले आकाश में विराजमान हैं, कहीं गली के मोड़ पर, तो कहीं नदी के किनारे।


इस प्रकार पिळ्ळैयार जनसामान्य के जीवन के साथ सहज रूप से जुड़े हुए हैं। वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करने वाले विघ्नेश्वर हैं।


तमिल भाषा में ‘पिळ्ळै’ का अर्थ बालक या पुत्र होता है। उसके साथ आदरसूचक ‘आर’ जोड़कर ‘पिळ्ळैयार’ कहना तमिलनाडु की विशिष्ट भाषायी और सांस्कृतिक परंपरा है।


पार्वती और परमेश्वर के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण भी उन्हें विशेष आदर प्राप्त है। तमिल परंपरा में उनके नाम के भीतर ही पुत्र के प्रति स्नेह और सम्मान की भावना व्यक्त होती है।


‘कुमारन’ शब्द का प्रयोग भी तमिल में बालक अथवा युवक के अर्थ में होता है। किंतु धार्मिक परंपरा में ‘कुमारन’ या ‘कुमारस्वामी’ कहने पर प्रायः भगवान सुब्रह्मण्य अर्थात् कार्तिकेय का स्मरण होता है। तमिल में उन्हें ‘कुमरक्कडवुळ’ भी कहा जाता है।


इस प्रकार तमिल संस्कृति में दोनों दिव्य पुत्रों के नामों और संबोधनों की अपनी विशिष्ट परंपरा है।


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2. बालस्वरूप में आदि-देव — तत्त्वमय विनायक


विनायक बालस्वरूप में दिखाई देते हैं। फिर भी वे आदि-तत्त्व के प्रतीक माने जाते हैं।


प्रणव अर्थात् ‘ॐ’ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में परम तत्त्व का प्रतीक है। सृष्टि के मूल में स्थित इसी प्रणव-तत्त्व से विनायक का संबंध माना गया है।


उनका गजमुख और उनकी वक्र सूँड भक्तों को प्रणव के स्वरूप का स्मरण कराते हैं। इस प्रकार बालस्वरूप में विराजमान विनायक अपने भीतर गहन आध्यात्मिक तत्त्व को समेटे हुए हैं।


वे विघ्नों को दूर करने वाले और शुभ कार्यों के आरंभ में सर्वप्रथम पूजे जाने वाले देवता हैं। भक्तों को अनुग्रह प्रदान करने में भी उनका स्थान विशेष है।


इसका सुंदर उदाहरण तमिल भक्ति-साहित्य की महान कवयित्री औवैयार के जीवन से संबंधित परंपरागत कथा है।


3. औवैयार और विनायक की असीम कृपा


औवैयार भगवान गणपति की महान उपासिका थीं। उन्होंने विनायक के प्रणवस्वरूप का ध्यान करते हुए ‘विनायकर अकवल्’ नामक प्रसिद्ध भक्तिपरक रचना की। इस रचना में योग, आध्यात्मिक साधना और ज्ञान से संबंधित अनेक गहन भाव सरल काव्यात्मक शैली में व्यक्त हुए हैं।


तमिल भक्ति-परंपरा में इस रचना को विशेष श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।


औवैयार के संबंध में एक प्रसिद्ध कथा भी प्रचलित है।


सुंदरमूर्ति नायनार, जिन्हें आरूरर भी कहा जाता है, और चेरमान पेरुमाल नायनार कैलास की ओर प्रस्थान करने वाले थे। दोनों औवैयार को भी अपने साथ ले जाना चाहते थे।


उस समय औवैयार भगवान विनायक की पूजा में लीन थीं। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे शीघ्र पूजा समाप्त करके उनके साथ चलें।


औवैयार ने उत्तर दिया:


“आपको कैलास जाना है तो जाइए। आपके लिए मैं अपनी पूजा में शीघ्रता नहीं करूँगी। मेरे लिए विनायक की पूजा ही कैलास के समान है।”


वे अपनी पूजा में पूरी तरह तल्लीन रहीं।


कथा के अनुसार, पूजा पूर्ण होने पर भगवान विनायक ने उन्हें अपनी सूँड से उठाया और क्षणभर में कैलास पहुँचा दिया। इस प्रकार औवैयार उन दोनों भक्तों के पहुँचने से पहले ही कैलास पहुँच गईं।


यह कथा भगवान विनायक की कृपा, भक्त की अनन्य निष्ठा और सच्ची उपासना की महिमा को दर्शाती है।


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4. सुंदरमूर्ति नायनार और चेरमान पेरुमाल


तमिल शैव भक्ति-साहित्य में सुंदरमूर्ति नायनार और चेरमान पेरुमाल नायनार की मैत्री का विशेष स्थान है।


आपके द्वारा उद्धृत तमिल पद्य में चेरमान पेरुमाल की कैलास-यात्रा और उनकी काव्य-प्रतिभा का स्मरण किया गया है।


सरल हिंदी भावानुवाद


आरूरर अर्थात् सुंदरमूर्ति नायनार के प्रिय मित्र बनकर,


पूर्वकाल से ही उनसे मैत्री का संबंध निभाते हुए,


तीव्र वेग से दौड़ते अश्व पर सवार होकर,


महान कैलास पर्वत पर पहुँचकर,


‘आदि-अंत उला’ नामक काव्य की तत्काल रचना करके उसका गान करने वाले चेर राजा की महिमा अद्भुत है।


भावार्थ


ये पंक्तियाँ चेरमान पेरुमाल नायनार की ओर संकेत करती हैं। वे सुंदरमूर्ति नायनार के परम मित्र माने जाते हैं। शैव भक्ति-परंपरा में उनकी कैलास-यात्रा और ‘तिरुक्कैलाय ज्ञान उला’ नामक रचना का विशेष उल्लेख मिलता है।


आपके उद्धृत प्रसंग में भगवान विनायक की कृपा से औवैयार का कैलास पहुँचना और सुंदरमूर्ति नायनार तथा चेरमान पेरुमाल की कैलास-यात्रा—इन दोनों घटनाओं का सुंदर संबंध दिखाई देता है।


इस प्रकार भगवान विनायक और भगवान कार्तिकेय, दोनों दिव्य भाइयों की कथाएँ इस प्रसंग में एक साथ स्मरण की जाती हैं।


---


5. विनायक की सहज कृपा


भगवान विनायक को विघ्नेश्वर कहा जाता है। वे भक्तों के विघ्न दूर करने वाले और शुभ कार्यों के आराध्य देवता हैं।


तमिलनाडु के पलनी में भगवान कार्तिकेय की विशेष महिमा है। इस प्रसंग में ज्येष्ठ पुत्र विनायक और कनिष्ठ पुत्र कार्तिकेय—दोनों का स्मरण होता है।


बालस्वरूप में विराजमान विनायक को आदि-तत्त्व का प्रतीक मानकर उनकी उपासना की जाती है। भक्तिभाव से की गई उनकी आराधना हमें यह संदेश देती है कि ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए बाहरी आडंबर से अधिक महत्त्व सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का है।


श्री गणेशाय नमः।


महापेरियवा के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।


— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु


मोबाइल

 

मोबाइल में उलझा बचपन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
15-10-2026

+++++++++

मैं 77 वर्ष का जवान हूँ,
मन से आज भी युवा हूँ।
पर बचपन में मोबाइल की ऊर्जा कैसी होगी,
इसका निजी अनुभव कहाँ से लाऊँ?

पर देखता हूँ समाज को,
देखता हूँ बहू-बेटे, बेटी-दामाद को,
पोते-पोतियों के बचपन को,
और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव को।

एक परिवार में
एक मोबाइल की कीमत
एक लाख रुपये तक पहुँच जाती है,
पेड़-पौधों से भी कम महत्त्वपूर्ण
प्रकृति नहीं,
बल्कि मोबाइल ही
बच्चों की दुनिया बन जाती है।

शिशु रोता है तो
लोरी नहीं सुनाई जाती,
यूट्यूब पर लोरी सुनाकर
उसे चुप कराया जाता है।

बच्चे को खाना खिलाना हो तो
मोबाइल पर अंग्रेज़ी की राइम्स चलती हैं।
तीन वर्ष के बच्चे को भी
मातृभाषा के बालगीतों से
परिचित कराने का समय कहाँ है?

बच्चे को चुप बैठाना हो,
तो मोबाइल गेम का सहारा।
ज्ञान चाहिए तो मोबाइल,
पढ़ाई चाहिए तो मोबाइल,
हर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा!

माँ से पूछकर संदेह मिटाने की
सहज परंपरा कहाँ खो गई?
स्वाभाविक सोच और समझ के स्थान पर
चैटजीपीटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
का बढ़ता हुआ सहारा!

स्मरणशक्ति घटती जाती है,
अपनी बुद्धि पर भरोसा कम होता जाता है।

मित्र को फोन करना हो,
और मोबाइल की बैटरी समाप्त हो जाए,
तो मन में उलझन ही उलझन!

गृहकार्य लिखना हो,
गणित का प्रश्न हल करना हो,
निबंध तैयार करना हो,
तो तुरंत ए.आई. की याद आती है।

घर में कोई मेहमान आए,
तो स्वागत के शब्द कम पड़ जाते हैं।
बातचीत चलती रहती है,
पर आँखें मोबाइल पर टिकी रहती हैं।
सामने बैठा मनुष्य उपेक्षित,
मोबाइल ही सबसे निकट का साथी!

भोजन सामने रखा है,
पर मन भोजन में कहाँ?
आँखें मोबाइल पर,
हाथ भोजन उठाता है,
मुँह तक पहुँचाता है,
पर खाने में पड़ा बाल भी
नज़र नहीं आता!

मोबाइल की यह कैसी परेशानी?
बच्चा चाहता है अपना एकांत,
घर में कोई भी आए,
न स्वागत, न आत्मीय बातचीत,
सिर झुका हुआ,
आँखें मोबाइल पर!

आस-पड़ोस के बच्चों के साथ
खेलना-कूदना बंद,
मिलना-जुलना बंद।
मोबाइल का एक कोना ही
उसकी पूरी दुनिया बन जाता है।

न खान-पान की चिंता,
न मित्रों की चिंता,
न परिवार के साथ समय बिताने की इच्छा।
एक आभासी दुनिया में
बचपन धीरे-धीरे सिमटता जाता है।

ऐसे बचपन में
हँसी भी व्यक्तिगत,
बातचीत भी सीमित,
संबंध भी दूर-दूर,
और मनुष्य के बीच
मनुष्य ही अपरिचित!

मोबाइल स्वयं दोषी नहीं,
उसका अतिरेक चिंता का विषय है।
उचित उपयोग ज्ञान देता है,
पर असीमित उपयोग
बचपन की सहजता छीन सकता है।

बचपन को मोबाइल का बंदी नहीं,
मानवीय संबंधों का धनी बनाइए।
मातृभाषा के गीत सुनाइए,
प्रकृति से प्रेम कराइए,
मित्रों के साथ खेलने दीजिए,
बड़ों के अनुभव सुनने दीजिए।

मोबाइल में उलझा बचपन
केवल बच्चों की समस्या नहीं,
अभिभावकों के लिए भी
एक गंभीर उलझन है!

प्रश्न यही है—
बच्चों के हाथ में मोबाइल हो,
या मोबाइल के हाथ में
बच्चों का बचपन?

Monday, October 12, 2026

 ॐ हरिनारायण हरिनारायण  ॐ 


आज मेरे मन में उठे विचार। 

*********************

स्वचिंतक - स्वरचयिता --यस। अनंतकृष्णन 

++++++++++++++++++++++++++

जग देखा ,कोई जागता नहीं ;

जग देखा ,कोई जगाता नहीं। 

जगाने के प्रयत्न  में लगे लोग ,

जग की दृष्टि  में हैं पागल। 


राम राज्य  की स्थापना ,

राग अलापते लोग। 

राम राज्य में थे राक्षस। 

राम राज्य में थे स्त्री मोही ;


राम राज्य में थे कामांधकारिणी। 

राम राज्य में थे ऐसे धोबी ,

सीता का हँसी  उड़ाया;

राम के गुण  पर कलंक लगाया।

अग्निप्रवेश सीता पर आरोप।

जग को आदर्श दिखाने 

भेज दिया वन वास ;

अश्वमेध यज्ञ  अपने अधिकार जमाने 

अड़ोस -पड़ोस के राजाओं को 

डराने -धमकाने।

अपने ही पुत्रों के साथ लड़ाई। 

_---------------

राम राज्य में भी गुह ,शबरी जैसे 

निम्न जाति  के लोग;

उनको गले लगाने ,

जूठा खाने  में दिखाई  अपनी महानता।

नतीजा रामायण काल के 

मनुष्य -मनुष्य के 

भेद मिटा नहीं ,

और बढ रहा है आज भी। 


आरक्षण की  माँग  जाट कर रहे हैं ,

कई लोग अपने को निम्न जातियों की सूची में 

जुड़ने ,जुड़ाने तैयार।गौरवान्वित ;


छात्र वृत्ति ,उद्योग ,पद ,स्कूल ,कालेज की भर्ती 

अपने को हरिजन प्रमाण पत्र ,

एन केन प्रकारने  लेने तैयार। 

और कोई हरिजन कहने पर 

कारावास बिना पूछ-ताछ के। 

खुद अपने को अनुसूचित कहकर 

प्रमाणित करने में मानते सम्मान।

********** 

जग देखा ,कोई जागता नहीं ,

जग देखा, कोई जगाता नहीं ;

********************

शासक का धन ज़माना,

अंतःपुर में दासियाँ ज़माना 

कायरों को लूटकर धन जोड़ना 

इसीको आदी  काल से कहते हैं वीरता;


राजा के सुख देख खुश रहना 

राजा को देव तुल्य मानना ,

गुलाम -बेगार रहना ,

आज कल लोकतंत्र के नाम से भी चल रहा है ,

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं। 

-------

मजदूर  तो कई,

 समाज कल्याण के लिए ;

पर धनी वही मज़दूर 

राम के युग से  आज तक;

आत्म-ह्त्या की सेना;

कहीं जीने की सेना नहीं।

हत्या करने की कूली  सेना;

उनको तो राजनैतिक समर्थन।

कितने निर्दयी लक्ष्मी के 

गुलाम बन 

धन जोड़ रहे हैं ;

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं ;

**********

भ्रष्टाचारियों का आदर -सम्मान। 

सद्यः फल के लिए धन का गुलाम।

धन दो ,दान दो , धन जोड़ो ,

मनमाना करो.

कितने भ्रष्टाचारियों के नाम प्रकट।

पूछ-ताछ के आयोग दिखावा। 

इन आयोगों के खर्च ,

भ्रष्टाचारियों के लूटने से ज़्यादा। 

पर परिणाम आज तक न मिला दंड.

लोग तो  भुलक्कड़। फिर वही कुर्सी पर। 

नशीली चीजों की आमदनी से चलती सरकार।

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं।


सच बोलने का साहस नहीं,क्यों?

उसके लिए एक कहानी की रचना की ;

सत्य हरिश्चंद्र ; उसीके आदर्श में  पले 

मोहनदास ने इंदिरा फरोज़  खान को 

इंदिरा गाँधी बनाकर पति के नाम जुड़ने के 

भारतीय परम्पराको तोड़  डाला।

सोचो ,राजा का श्मशान की पहरेदारी करना 

क्या किसी में सत्य बोलने का साहस।

नबी को पत्थर मारा,ईसा को शूली पर चढ़ाया। 

क्या किसी में क्रांति का साहस।

****

भगवान का नाम लो ,प्रायश्चित के नाम लूटो।

पापि यों को बचने दो ,यदि वह आमिर हो तो.

गरीब हो तो प्रायश्चित्त करने पैसे नहीं ,दंड भोगो।


कोई समझता नहीं ,कोई समझाता नहीं ,

कोई जगता नहीं ,कोई जगाता नहीं। 

********

फिर भी इन सब को जगाने कहीं न कहीं ,

कोई जिसे लोग पागल ,नालायक ,

बेचारा भला आदमी कह कर हँसी  उड़ा  रहे हैं 

वही एक ऐसी छोटी -सी चिनगारी  छोड़ रहा हैं ,

वह भी चिंगारी शनैः  शनैः हर एक के 

जीवन में जलकर कफन के रूप धारण कर रही हैं। 

कोई समझता नहीं ,समझाता नहीं ,

जागता नहीं ,जगाता नहीं। 


नश्वर जगत में मनमाना 

रंग मंच के खेल 

चल रहा है;

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं ;

कोई समझता नहीं ,समझाता नहीं ;

अनश्वर नाटक धरती के मंच पर खेला जा रहा है.

Sunday, October 11, 2026

जागृति

  जागृति

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

12-10-26.

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भारत के लोगों में 

चाहिए जागृति।

राष्ट्रीय एकता योजना में केंद्र सरकार के साथ 

 प्रांतीय सरकार चलना

 जागरण है।

  प्रांतीय मोह ,

 प्रांतीय भाषा

 प्रांतीय प्रगति में 

 केंद्र सरकार का ध्यान और सहयोग जागृति है।

जवानों में छात्रों में 

 स्वतंत्रता संग्राम के 

शहीदों की जीवनी

 तन मन धन के त्याग 

जगाना ,

 उनकी जीवनी   के अनुकरण करना जागृति है।

 होनहार बिरवान के होत   चीखने पात  

बचपन से ही पालन करना,

 अनुशासन से रहना

 अच्छी चाल चलन सीखना जागृति है।

माता-पिता गुरु देव 

 को सदा निभाना जागृति है।

वीर जवान प्रत्यक्ष देव

देश के  रक्षक,

किसान जनता की भूख मिटाने का आधार।

उनके प्रति श्रद्धा रखना

 जागृति है।। 

पल  पल देश के कल्याण में  लगना।

जागृति है।

 ज्ञान पिपासा सदा रखना जागृति है।

सर्वैश्वर ही जगत की सृष्टि का आधार।

जान समझकर 

 सदा सर्वकाल  

 जपना, मन को आत्मा में विलीन कर लेना

 आत्मज्ञान पाने की जागृति है।




 
















वो

 जागृति


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-10-2026


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भारत के जन-जन में

जागृति का भाव जगाना है।

राष्ट्रीय एकता के संकल्प को

जीवन में अपनाना है।


केंद्र और प्रांतीय सरकारें

मिलकर जब आगे बढ़ती हैं,

राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखकर

जनकल्याण की राह चुनती हैं,

तभी सच्ची जागृति आती है।


प्रांतीय अस्मिता का सम्मान,

प्रांतीय भाषाओं का उत्थान,

प्रांतीय प्रगति के लिए

केंद्र का सहयोग और ध्यान—

यही राष्ट्रीय जागृति की पहचान।


जवानों और विद्यार्थियों में

स्वतंत्रता-संग्राम के शहीदों की

गौरवगाथा जगाना,

उनके त्याग, तपस्या और बलिदान को

हृदय में स्थान दिलाना,

उनके आदर्शों का अनुकरण करना—

यही सच्ची जागृति है।


“होनहार बिरवान के होत चीकने पात।”


बचपन से ही संस्कार देना,

अनुशासन का पाठ पढ़ाना,

सदाचार और सद्व्यवहार से

जीवन-पथ को सुंदर बनाना—

यही जागृति का संदेश है।


माता-पिता, गुरु और देव—

इन सबके प्रति श्रद्धाभाव रखना,

उनके आदर्शों को जीवन में उतारना,

अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना—

यही जागृति है।


वीर जवान प्रत्यक्ष देवतुल्य,

देश की सीमाओं के रक्षक हैं।

किसान अन्नदाता बनकर

जन-जन की भूख मिटाते हैं।

उनके परिश्रम और त्याग के प्रति

श्रद्धा-सम्मान प्रकट करना—

यही सच्ची जागृति है।


पल-पल देश के कल्याण में

अपना योगदान देना,

राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर

कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ना—

यही जागृति है।


ज्ञान की पिपासा सदा बनाए रखना,

निरंतर सीखते और समझते रहना,

अज्ञान के अंधकार को मिटाकर

ज्ञान का प्रकाश फैलाना—

यही जागृति है।


सर्वेश्वर ही इस जगत की

सृष्टि के मूल आधार हैं।

इस सत्य को हृदय से समझकर

ईश्वर का निरंतर स्मरण करना,

मन को अंतर्मुखी बनाकर

आत्मा में एकाग्र होना,

आत्मज्ञान की अनुभूति पाना—

यही आध्यात्मिक जागृति है।


राष्ट्रीय चेतना से आत्मचेतना तक,

कर्तव्य-बोध से ईश्वर-बोध तक—

मानव जीवन की संपूर्ण यात्रा

जागृति से ही सार्थक होती है।


जागो, जगाओ, जागृति फैलाओ!

राष्ट्र को सशक्त बनाओ,

मानवता को समृद्ध बनाओ,

आत्मज्ञान से जीवन को आलोकित बनाओ।

Saturday, October 10, 2026

अंधविश्वास

 [10/10, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अंधविश्वास 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 

11-10-26.

+++++++++

 अंधविश्वास 

विश्व भर में है,

 भिन्न भिन्न सिद्धांत।

 तमिल में ईश्वर भक्ति को ही प्रधानता देकर 

 अंधविश्वास पर विश्वास न करने की एक कविता है।

 हम कहते हैं,

 राहुकाल में,

यम खंड में 

 ग्रहण के समय,

 वर्षा के होते

 कहीं बाहर न जाना है,

 कोई काम न करना है,

यह तो सही नहीं है,

तमिऴ के भक्त कवि

 अरुण गिरिनाथर ने 

 अपने ईश्वर को सर्वश्रेष्ठ मानकर  

बताया है कि 

 दिन क्या करेगा?

ग्रह क्या करेगा?

 यम क्या करेगा।

जब मेरे भगवान 

 कार्तिक प्रत्यक्ष दर्शन देने पर?

 अर्थात सर्वेश्वर पर 

विश्वास करके अपने कर्तव्य करना चाहिए।

 कबीर ने कहा है 

शकुन अपशकुन की बात क्या कहना है।

कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।

मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय॥

कौए की बोली से शकुन देखना

अपशकुन देखना

 कोयल की तरह मीठी-मीठी बोली से जग वश में ।

 काम करना है, 

सोना नहीं।

 छिपकली के आवाज़ 

 ये सब वैज्ञानिक आधार नहीं।

कबीर सोता क्या करे, उठि न भजे भगवान।

जामे रावण मारिया, सोई बलवंत सुजान॥

हमें कर्मरत रहना है।

 अज्ञान के कारण 

 भगवान पर के अंधविश्वास के कारण 

 मानव अंधविश्वास पर विश्वास करता है।

 यह ठीक नहीं है,

शुभस्य शीघ्रम्  

अतः  हमें प्रयत्न और कर्तव्य पर मन लगाना है।

[10/10, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अंधविश्वास


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

दिनांक: 11-10-2026


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अंधविश्वास विश्वभर में प्रचलित है,

इसके रूप अनेक, सिद्धांत अनेक।

परंतु विवेक का संदेश यही है—

श्रद्धा हो, पर तर्क का भी साथ रहे।


तमिल भक्ति साहित्य में भी

ऐसी सशक्त वाणी मिलती है,

जो ईश्वर की महिमा का गुणगान करते हुए

अंधविश्वास से मुक्त रहने की प्रेरणा देती है।


हम कहते हैं—

राहुकाल में कोई काम न करो,

यमगण्ड के समय बाहर न निकलो,

ग्रहण के समय सावधान रहो,

वर्षा हो तो घर से बाहर न जाओ!


क्या हर परिस्थिति में

ऐसी मान्यताओं का पालन आवश्यक है?

क्या समय, ग्रह और शकुन

हमारे कर्मों से भी अधिक शक्तिशाली हैं?


तमिल के भक्त कवि अरुणगिरिनाथर की

ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा हमें प्रेरित करती है।

जब भगवान मुरुगन की कृपा का विश्वास हो,

तब मन में भय क्यों हो?


दिन क्या कर सकता है?

ग्रह क्या कर सकता है?

यम क्या कर सकता है?

जब मेरे आराध्य भगवान मुरुगन

मेरी रक्षा के लिए विद्यमान हैं!


इसका भाव यही है—

सर्वेश्वर पर श्रद्धा रखकर

अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।


संत कबीर की वाणी भी

हमें बाहरी संकेतों से अधिक

अपने आचरण का महत्त्व समझाती है।


कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।

मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय॥


अर्थात कौआ किसी का धन नहीं हरता,

न ही कोयल किसी को धन देती है।

कोयल अपनी मधुर वाणी से

सबका मन मोह लेती है।


इसलिए कौए की आवाज़ को

शुभ-अशुभ का संकेत मानने के बजाय,

हमें अपनी वाणी मधुर रखनी चाहिए।

दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भाव रखना चाहिए।


छिपकली की आवाज़,

राह चलते शकुन-अपशकुन

और ऐसी अनेक मान्यताओं को

बिना विवेक के सत्य मान लेना उचित नहीं।

किसी मान्यता को स्वीकार करने से पहले

उसके आधार और प्रमाण पर विचार करना चाहिए।


कबीर की एक प्रसिद्ध उक्ति है—


कबीर सोता क्या करे, जागि न जपे मुरारि।

एक दिन तू भी सोयगा, लंबे पाँव पसारि॥


इस वाणी का संदेश है कि

जीवन को आलस्य और अज्ञान में न गँवाएँ।

जागृत रहें, सत्कर्म करें

और ईश्वर का स्मरण करते रहें।


अंधविश्वास का एक प्रमुख कारण

अज्ञान और भय है।

ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा

मनुष्य को निर्भय, विवेकशील

और कर्तव्यनिष्ठ बनाए—

न कि निष्क्रिय और भयभीत।


ईश्वर पर विश्वास करना अच्छी बात है,

परंतु उस विश्वास के नाम पर

अपने प्रयासों को रोक देना उचित नहीं।


शुभस्य शीघ्रम्!


शुभ कार्य को शीघ्र आरंभ करें।

विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाएँ,

प्रयत्न को अपना साथी बनाएँ

और कर्तव्य को अपना धर्म समझें।


ईश्वर में श्रद्धा रखें,

विवेक से विचार करें,

परिश्रम से आगे बढ़ें।

यही अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग है।


🙏 ॐ मुरुगा! सर्वं शिवमयम्! 🙏

Friday, October 9, 2026

विश्व डाक दिवस

 विश्व डाक दिवस।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

101026

************

डाक विभाग अंग्रेज़ी की देन।

 भारत के इतिहास में 

कबूतर, हंस पक्षी, मेघ ,राजदूत, संदेश ध्वनि द्वारा।

 प्राचीन काल से आज तक के परिवर्तन

  महत्व पूर्ण है। 

रोज़ डाकिये की प्रतीक्षा में।

 वह दिन याद है

 तार के आते ही 

 सब रोने लगते।

 वह केवल अशुभ संदेश लाता था।

 मणि आर्डर का महत्व 

विश्व डाक दिवस 

 आजकल वह स्पीड पोस्ट, बचत बैंक , 

आदि सुविधाओं से भरा है। 

 डाक घर का नारा है

अहर्निशम सेवा महे।।

 आजकल मोबाइल आने के बाद डाक सेवा कम।

 डाकिये की चिट्ठी ही नौकरी देती।

 दूर के मित्र, नाते रिश्तेदारों से कुशल क्षेम के संदेश लाते।

 धन्य है डाक सेवा के 

 अन्वेषक।

जय विश्व डाक दिवस।

 डाक विश्व दिवस


विश्व डाक दिवस


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

10-10-2026


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यादों में डाक सेवा


डाक विभाग अंग्रेज़ों की देन,

भारत के इतिहास में

संदेशों का अपना रहा है विशेष स्थान।


कबूतरों से संदेश भेजना,

हंस-पक्षियों की कल्पना,

मेघों के माध्यम से संदेश,

राजदूतों का संदेश पहुँचाना,

ध्वनि और संकेतों द्वारा संवाद करना—

प्राचीन काल से आज तक

संचार के अनेक रूपों में

महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है।


रोज़ डाकिये की प्रतीक्षा में,

बीते दिनों की यादें ताज़ा होती हैं।


वह दिन आज भी याद है,

जब तार के आते ही

घर में हलचल मच जाती थी।

तार का नाम सुनते ही

मन में आशंका जाग उठती थी,

क्योंकि अक्सर वह

किसी अशुभ समाचार का संदेश लाता था।


मनीऑर्डर का भी

अपना विशेष महत्त्व था।

दूर रहने वाले परिजनों के लिए

वह आर्थिक सहारा बनता था,

और परिवार के चेहरों पर

खुशी की लहर दौड़ा देता था।


विश्व डाक दिवस!


आज डाक विभाग

स्पीड पोस्ट, बचत बैंक

और अनेक सुविधाओं से युक्त है।

जनसेवा के पथ पर चलते हुए

यह विभाग निरंतर

अपनी भूमिका निभा रहा है।


डाक विभाग का ध्येय-वाक्य है—


“अहर्निशं सेवामहे।”

अर्थात्—हम दिन-रात सेवा में तत्पर रहते हैं।


आज मोबाइल और इंटरनेट के युग में

डाक सेवाओं का उपयोग भले ही कम हुआ हो,

पर डाक सेवा का महत्त्व

आज भी कम नहीं हुआ है।


डाकिये के हाथों आई चिट्ठी

कभी नौकरी का समाचार लाती थी,

कभी दूर बैठे मित्रों का प्यार,

तो कभी नाते-रिश्तेदारों की

कुशल-क्षेम का संदेश।


वे चिट्ठियाँ केवल कागज़ नहीं थीं,

उनमें भावनाएँ बसती थीं,

अपनों का स्नेह झलकता था,

और दूरियाँ भी मिट जाती थीं।


धन्य हैं वे आविष्कारक,

धन्य है डाक सेवा,

जिसने दूरियों को घटाकर

मानव-हृदयों को जोड़ने में

अपना अमूल्य योगदान दिया।


जय हो डाक सेवा की!

जय हो विश्व डाक दिवस की!

जिंदगी

 जिंदगी  त्याग के लिए ,

जिंदगी भोग के लिए.

जिंदगी खुशी से जीने के लिए। 

कितने लोगों से यह संभव है ,पर 

त्यागियों के बिना संसार सुखी नहीं। 

माँ -बाप के त्याग से  बच्चा पलता  हैं.

राष्ट्र सेवकों के परिश्रम से 

देश का विकास होता है। 

पुलिस ,सैनिक आदि के त्याग से 

अमन चमन का जीवन बिताते हैं.

किसानों के परिश्रम से भोजन मिलता हैं। 

शिक्षित और चतुर लोगों की योजना से 

देश का विकास होता है.

आध्यात्मिक लोगों के उपदेश से 

अनुशासन ,सत्य ,अहिंसा ,दानी ,दयालु 

 के कारण परोपकारी  होते हैं.

भोगियों से देश का पतन ,

त्यागियों से देश का उत्थान। 

व्यवहार में देखें तो स्वार्थियों 

और भोगियों का पारा बढ़ता है. 

त्यागी बेचारा भला आदमी बन जाता है

स्वरचित अनंतकृष्णन द्वारा.

Thursday, October 8, 2026

शब्द

 

शब्दों का प्रहार

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।
दिनांक: 9-10-2026

शब्दों का महत्त्व अपार है।
शब्दों की शक्ति से
बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ होती हैं।

शब्द जोड़ते हैं,
शब्द तोड़ते हैं।
शब्द प्रेम जगाते हैं,
शब्द वैर बढ़ाते हैं।

‘जियो, जीने दो’
जीवन का सुंदर संदेश है।
लेकिन शब्दों के प्रयोग में
सावधानी भी आवश्यक है।

हँसमुख और हँसकर मुख दिखाने में,
शब्दों के अर्थ और भाव में
सूक्ष्म अंतर हो सकता है।
शब्दों का गलत प्रयोग
किसी के मन को आहत कर सकता है।

बिना सोचे-समझे बोले गए कठोर शब्द
श्रोता के हृदय पर गहरा प्रहार करते हैं।
शरीर का घाव भर सकता है,
लेकिन मन का घाव
लंबे समय तक हरा रह सकता है।

प्रियजनों के कठोर शब्द
कभी-कभी सुधार की भावना से निकलते हैं,
जबकि अप्रिय व्यक्तियों के कठोर शब्द
क्रोध और प्रतिशोध की भावना जगा सकते हैं।

संत तिरुवल्लुवर का संदेश

अग्नि से जला हुआ घाव
समय के साथ भर सकता है,
लेकिन जिह्वा से निकले कटु शब्दों का घाव
आसानी से नहीं भरता।

रहीम का दोहा

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पाताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥

अर्थात् जिह्वा बिना सोचे-समझे
स्वर्ग से पाताल तक की बातें कह जाती है।
वह स्वयं तो मुख के भीतर रहती है,
लेकिन उसके कटु वचनों के कारण
सिर पर जूते पड़ने की नौबत आ जाती है।

कबीर का दोहा

एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःख रासि।
एक शब्द बंधन कटे, एक शब्द गल फाँसी॥

अर्थात् एक शब्द सुख का भंडार बन सकता है,
दूसरा दुःख का कारण।
एक शब्द बंधनों से मुक्त कर सकता है,
तो दूसरा फाँसी तक की नौबत ला सकता है।

वाणी का विवेक

ऐसे शब्द बोलने चाहिए
कि सुनने वाला अपना बन जाए।
हमारे शब्दों से
दूसरों के मन में शांति आए
और हमारे अपने हृदय को भी
शांति का अनुभव हो।

कबीर का अमर संदेश है—

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥

शब्दों का प्रहार कैसा हो?

शब्दों का प्रहार
मरहम के स्पर्श जैसा सुखद हो,
न कि लाठी के प्रहार जैसा
पीड़ादायक और दुःखद।

बोलने से पहले सोचें,
शब्द चुनने से पहले समझें,
और अपनी वाणी में
प्रेम, करुणा तथा विवेक भरें।

क्योंकि—

शब्दों से दिल जीते जाते हैं,
शब्दों से दिल टूट भी जाते हैं।
सोच-समझकर बोलेंगे,
तो प्रेम और शांति बाँटेंगे।
बिना सोचे बोलेंगे,
तो दुःख के घाव छोड़ जाएँगे।

— एस. अनंतकृष्णन