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Saturday, May 2, 2026

अच्छाई की महक

 नमस्ते वणक्कम्।

अच्छाई की महक

✍️ एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु सौहार्द सम्मान प्राप्त हिंदी सेवक प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3/5/26



नमस्ते वणक्कम्।

धूप में सुख, शीतल छाया में,

अच्छाई की महक समाया में।

ईमानदारी की मधुर सुवास,

परोपकार में बसता विश्वास।

दान-धर्म की पावन रेखा,

कर्ण-सी वीरता की लेखा।

कृष्ण की महक लोक-रंजन में,

लोक-रक्षा के पावन चिंतन में।

वेद-उपनिषद् की गूंज पुकार—

“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु” साकार।

सनातन धर्म की सुगंध महान,

अतिथि-सेवा, ज्ञान-प्रदान।

ब्रह्म-महिमा के गान में बसती,

आत्मज्ञान की ज्योति जगाती।

राधा-प्रेम की मधुर उमंग,

भक्ति में बहता निर्मल रंग।

सद्ग्रंथों के गहन विचार,

चरित्र-निर्माण का सच्चा आधार।

गंगा-सी पावनता की धारा,

भारत-भूमि का दिव्य नजारा।

ध्यान, त्याग, ईश्वर-चिंतन में,

बसती इसकी महक अमर तन-मन में।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम,

जीवन को देते सच्चा आयाम।

सद्कर्म, सद्विचार, सत्संग साथ,

अनुशासन से उज्ज्वल हो हर पथ।

बुराइयों के तिमिर को हरती,

अच्छाई की महक नित निखरती।

आदर्शों से यथार्थ सजाती,

मानवता की राह दिखाती।


Friday, May 1, 2026

मज़दूर का महत्व


मज़दूर दिवस

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-5-26

मैं मालिक हूँ,

मैं करोड़पति हूँ,

मैं सिविल इंजीनियर,

मैं नामी डॉक्टर हूँ।

शहर का बड़ा अस्पताल मेरा,

हजारों एकड़ खेतों का मैं स्वामी,

बिजली विभाग का मुख्य अभियंता,

बड़े कॉलेज का भी अधिकारी।

मैं विधायक, सांसद,

मुख्यमंत्री भी कहलाता हूँ—

पर ज़रा ठहर कर सोचिए,

क्या मैं सच में अकेला हूँ?

इन ऊँची इमारतों की बुनियाद में,

पत्थर किसने जमाए हैं?

बिजली के खंभे, तार बिछाकर,

रोशनी किसने लाए हैं?

सूखे खेतों में जीवन भरने,

कुएँ किसने खोदे हैं?

नहरों का जल बहाने को,

पसीने किसने बोए हैं?

बीज बोना, फसल काटना,

अनाज के बोरे ढोना,

वाहनों पर लाद-उतार कर,

जीवन का चक्र संजोना।

हर सुविधा, हर निर्माण के पीछे,

एक ही नाम उभरता है—

न कोई मालिक, न अधिकारी,

वह साधारण मज़दूर होता है।

यदि उनका श्रम न हो साथ,

तो न चुनाव में जीत मिले,

न शहर की सफाई हो पाए,

न जीवन में संगीत खिले।

कूड़ा उठाने वाला मज़दूर,

यदि अपना काम न करे,

तो यह मानव सभ्यता भी,

बदबू के नरक में उतरे।

सड़कें, पटरी, हर निर्माण—

सब उनके श्रम की पहचान,

हर सुविधा के पीछे छिपा है,

उनका अदृश्य बलिदान।

आओ उनका मान बढ़ाएँ,

आभार हृदय से जताएँ,

मई महीने की प्रथम तिथि को,

मज़दूर दिवस मनाएँ।

यह केवल एक दिवस नहीं,

सम्मान का है संदेश—

मज़दूरों के श्रम से ही,

सजता है यह देश।


Wednesday, April 29, 2026

खोज


नमस्ते वणक्कम्।
स्वयं की खोज
++++++++++
मनुष्य ही इस प्रपंच के
सुखी जीवन के भोगी
और दुख भोगी।
इतना ही नहीं,
उसके सूक्ष्म बुद्धि
जिज्ञासु
आत्म ज्ञान ही
आविष्कारों की देन।
नसीहतों की देन।
मनुष्य ही सोच विचार
करके अपने को
‌सज्जन, सभ्य, सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकता है।
सब में ऐसे आविष्कार करने की बुद्धि नहीं।
क्षमता नहीं।
अपने दायरे में
अपने को श्रेष्ठ बनाना है तो
स्वयं की खोज करनी चाहिए।
मैं कौन हूँ?
मेरी अपनी क्षमता क्या है?
प्रपंच क्या है?
प्रपंच में राग द्वेष क्यों ?
जन्म मरण क्यों?
भाग्य दुर्भाग्य क्यों?
भगवान संसार की सृष्टि कर्ता है
तो माता पिता
के द्वारा हमारा जन्म क्यों?
मनुष्य मनुष्य में गुण भेद
रंग भेद
सोच विचार में अंतर क्यों?
बुद्धि लब्धि में भिन्नता क्यों?
अमीरी गरीबी
स्वार्थ निस्वार्थ क्यों?
अल्प आयु क्यों?
साध्य योग असाध्य रोग क्यों?
मानवेत्तर एक शक्ति है तो
उस शक्ति के सामने सब ड्रायर है तो भेद भाव के गुण क्यों?
असंख्य प्रश्न मानव जीवन में?
जन्म मृत्यु रोग रहित
मानव जीवन क्यों नहीं।
जन्म का उद्देश्य क्या है?
प्राकृतिक संतुलन क्यों नहीं?
मानव की इस अपनी खोज में
आध्यात्मिक महत्व है।
वैज्ञानिक महत्व है।
आत्मोन्नति आत्मज्ञान जानना ही
स्वयं खोज करने का परिणाम।
महावीर, बुद्ध, ऋषि मुनि
स्वयं की खोज में
मानव कल्याण का मार्ग ‌दिखाया।
जितेंद्रिय बनने
सत्यवादी बनने
मानवेत्तर ‌शक्ति कै दर्शन के लिए
ध्यान तपस्या का मार्ग
अहिंसा
प्यार द्वेष रहित
तटस्थ जीवन
पाप पुण्य के परिणाम
‌दुख के कारण।
कबीर हठयोगी
अपने बारे में
स्वयं की खोज में कहते हैं
बुरा जो देखन मैं गया,
बुरा नमिलिया कोई
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा न कोई।
‌आत्म चिंतन आत्म विचार
मानव को श्रैष्ठ बनाता है।
स्वयं की खोज में
मानव अहम् ब्रह्मास्मी
बन सकता है।
अद्वैत भावना जगाती है।
लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल।
लाली देखन मैं गयी,
मैं भी होगयी लाल।

सुधारात्मक  रूप 


नमस्ते वணक्कम्।

आपकी रचना में गहन चिंतन और आध्यात्मिक जिज्ञासा है। मैंने इसे काव्यमय, प्रवाहपूर्ण और थोड़ा अधिक छंदबद्ध रूप देने का प्रयास किया है — भाव वही रखते हुए भाषा को और मधुर बनाया है:

स्वयं की खोज

++++++++++++++++++

मनुष्य ही इस जगत का,

सुख-दुख का है भोक्ता;

हँसता भी, रोता भी वही,

जीवन का सच्चा योगता।

सूक्ष्म बुद्धि, जिज्ञासा लेकर,

आत्मज्ञान की राह चले;

आविष्कारों का दीप जलाकर,

अज्ञान तम सब दूर करे।

नसीहत, अनुभव, चिंतन से,

जीवन को संवार सकता;

सज्जन, सभ्य, संस्कारित बन,

जगत को निखार सकता।

पर सबमें वह शक्ति कहाँ,

सबकी क्षमता एक न हो;

अपने छोटे से दायरे में,

श्रेष्ठता का दीपक हो।

स्वयं की खोज में उतरकर,

प्रश्नों का सागर मंथन हो—

"मैं कौन हूँ? मेरी सीमा क्या?

यह जग क्या, इसका कारण क्या?"

राग-द्वेष क्यों मन में बसते?

जन्म-मरण का चक्र क्यों?

भाग्य-दुर्भाग्य की रेखाएँ,

जीवन में यह भेद क्यों?

ईश्वर सृष्टि का रचयिता जब,

जन्म माता-पिता से क्यों?

गुण, रंग, विचारों में भिन्नता,

मानव-मानव में क्यों?

धन-दौलत का अंतर क्यों है?

स्वार्थ और निस्वार्थ क्यों?

अल्पायु, रोग, असाध्य पीड़ा,

जीवन में यह क्लेश क्यों?

यदि कोई परम शक्ति है,

जिसके आगे सब लघु हैं;

तो फिर इस संसार में,

भेदभाव के ये स्वर क्यों हैं?

अनगिन प्रश्नों की ज्वाला में,

मन हर पल झुलसता है;

उत्तर पाने की अभिलाषा,

जीवन को तरसता है।

इस खोज में छिपा हुआ,

आध्यात्मिक गूढ़ महत्व;

विज्ञान भी इसके आगे,

झुकता पाकर सत्य तत्व।

आत्मज्ञान की ज्योति जगाकर,

मनुष्य ऊँचा उठ जाता;

महावीर, बुद्ध, ऋषि-मुनियों सा,

कल्याण मार्ग दिखलाता।

जितेन्द्रिय बन, सत्य का साधक,

अहिंसा का पथ अपनाए;

प्रेम, समता, द्वेष-रहित जीवन,

ध्यान-तप से प्रभु को पाए।

कर्मों के फल, पाप-पुण्य से,

दुख-सुख का यह बंधन है;

आत्मचिंतन, आत्मविचार ही,

जीवन का सच्चा साधन है।

कहते संत कबीर सहज स्वर में—

"बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय;

जब दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।"

स्वयं की खोज में अंततः,

अहं का आवरण हटता है;

"अहं ब्रह्मास्मि" का बोध जागे,

अद्वैत भाव जगता है।

लाली मेरे लाल की,

जित देखूँ तित लाल;

लाली देखने मैं गई,

मैं भी हो गई लाल।



Tuesday, April 28, 2026

அமருதத் துளிகள். अमृत की बूंदें

 

அமிர்தத் துளிகள் 

இன்றைய சவால் — 

அமிர்தத் துளிகள்

++++++++++++++++++++

வாழ்க்கையை சீராகவும், சிறப்பாகவும் நடத்த உதவும்

நிலையான சிந்தனைகள் அனைத்தும்

உண்மையில் அமிர்தத் துளிகள் ஆகும்.

உபநிஷத்துகளின் ஆழமான சிந்தனைகள்,

பகவத் கீதையின் கர்மயோகப் போதனைகள்,

ஜாதகக் கதைகளின் நன்னெறி உணர்வுகள்,

நெறி நூல்களின் அறிவுரைகள்,

ஆன்மஞானத்தின் உண்மைகள்,

ஞானிகளின் உபதேசங்கள்—

இவை அனைத்தும் வாழ்க்கைக்கு அமிர்தத் துளிகளே.

யோகப் பயிற்சி,

சீரான உணவு முறையின் அறிவியல் பார்வை,

தத்துவ சிந்தனைகள்—

இவையும் உடல்-மனம் ஆரோக்கியமாக்கும் அமிர்தத் துளிகள்.

கபீர், துலஸிதாஸ், ரஹீம், விரிந்த் போன்ற கவிஞர்களின் தோஹாக்கள்) ஈரடி கள்.

பக்தி, மனிதநேயம், நெறி ஆகியவற்றின் பொக்கிஷங்கள்.

“யாரை கடவுள் காக்கிறாரோ, அவரை யாராலும் காயப்படுத்த முடியாது;

உலகமே பகை கொண்டாலும், அவருக்கு எதுவும் ஆகாது.”

இந்த எண்ணம் கடவுளின் பேராற்றலின் அமிர்தம் ஆகும்।

“வசுதைவ குடும்பகம்” — உலகம் ஒரே குடும்பம்,

“சர்வே ஜனாஃ சுகினோ பவந்து” — எல்லோரும் இன்புற வாழ்க,

ஒரே ஆகாயம், ஒரே உலகம்—

வெறுப்பும் விரோதமும் இல்லாத

மனிதநேய உலகம்.

மனிதன் காமம், கோபம், அகந்தை, பேராசை ஆகியவற்றில் மூழ்கினால்,

அறிஞனாக இருந்தாலும் அறியாமை உடையவனாகிறான்।

விவேகம் இழந்தவன் மிருகத்துக்கு சமம்.

ஆகவே விவேகம், கட்டுப்பாடு, கருணை—

இவையே வாழ்க்கையின் உண்மையான அமிர்தத் துளிகள்।

தேவர்களும் அசுரர்களும் செய்த

பாற்கடல் கடைவது போல,

அதில் இருந்து லட்சுமி, ஐராவதம், காமதேனு,

தன்வந்திரி, கல்பவிருட்சம் மற்றும் அமிர்தக் கலசம் தோன்றியது போல—

வாழ்க்கை கடைவதிலும்

நல்ல சிந்தனைகள் அமிர்தத் துளிகளாக வெளிப்படுகின்றன।

இந்த அமிர்தத் துளிகளை ஏற்றுக் கொண்டால்,

மனிதன் அமரத்துவத்தை அல்ல,

ஆனால் ஒரு சிறந்த, சத்தியமான வாழ்க்கையை பெறுகிறான்।


Monday, April 27, 2026

जीवन की तलक

 प्रयत्न और संशोधित दोनों रूप


 नमस्ते


जीत की ललक


++++++++++++++


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई


++++++++++++++


28-4-26


++++++++++++++


मानव जीवन भर


आगे बढ़ना चाहता है,


अंत तक प्रगति पथ पर


जीत पाने की चाह में


ख्वाब सजाता रहता है।


परीक्षा में सफलता की ललक,


डॉक्टरेट तक पहुँचने की चाह,


नौकरी पाने की आकांक्षा,


पदोन्नति की जीत,


निजी घर का निर्माण,


विवाह और संतान की प्रगति—


इन सबमें बसी है


जीत की ललक।


कभी अश्वमेध यज्ञ की विजय,


तो कभी लोकतंत्र के चुनाव में जीत,


परंतु जनप्रतिनिधि बनकर भी


वादा निभाने की ललक नहीं,


धन जोड़ने की चाह प्रबल—


यही मानव का लोभ, क्रोध, ईर्ष्या


जीवन को बना देते हैं


जय-पराजय का अखाड़ा।


जीत की ललक में


जीवन हो जाता है बेचैन,


एक विजय के बाद भी


और ऊँची उड़ान की चाह,


चंचल मन,


असंतुष्ट जीवन।


मिथ्या जगत के पार भी


अमरता की आकांक्षा,


निराशा में जीवन का अंत,


और फिर पुनर्जन्म का चक्र—


यही है मानव की


अंतहीन ललक।



जीत की तलक

++++++++++++++

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

+++++++++++++  

28-4-25.

++++++++++++++


 मानव अपने जीवन में 

 आगे बढ़ना ही चाहता है।

अंत तक  प्रगति पथ पर

 जीत पाने  के प्रयत्न में 

ख्वाब देखता रहता है।

 परीक्षा में जीत की तलक,

डाक्टरेट तक,

नौकरी पाने

पदोन्नति के जीत,

निजी घर बनवाने

 विवाह करने

 संतान की प्रगति 

 पारिवारिक सफलता

जीत की तलक  में 

 जीवन में रहता है।

महाराजा अश्वमेध यज्ञ

 लोक तंत्र में चुनाव जीतने की तलक,

 पर विधायक संसद को

 वादा निभाने की तलक नहीं,

 धन जोड़ने की तलक,

 यही मानव जीवन का लोभ,

 क्रोध, ईर्ष्या के कारण 

‌जय पराजय का जीवन।

 जीत की तलक में 

 बेचैनी जीवन,

 एक विजय के बाद 

 उससे बढ़िया कदम उठानेकी तलक 

 चंचल मन,

असंतुष्ट जीवन 

 मिथ्या जगत जाकर भी

 सफल अमरजीवन   की तलक,

 निराशा में जीवन का अंत

 पुनर्जन्म लेने के कारण।

Sunday, April 26, 2026

सुस्ती

 


नमस्ते वणक्कम्

आलस्य का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

27-4-26

++++++++++++

तमिल में एक कहावत है—

"काणिच्चोम्बल कोटि नष्टम्"।

एक छोटे-से काम में

ज़रा-सी आलसी,

लापरवाही बनकर

करोड़ों का नुकसान कर देती है।

कबीर ने भी चेताया है—

"कल करे सो आज कर,

आज करे सो अब;

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब?"

दिन आते-जाते रहते हैं,

हरि से होता क्या?

अब पछताने से क्या होगा,

जब चिड़िया चुग गई खेत?

तमिल के विश्वविख्यात कवि

तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा—

आलस्य के कारण

परिवार तक नष्ट हो जाता है।

प्रयत्न न करने पर

घर-परिवार बिगड़ते हैं,

और अपराध भी बढ़ते हैं।

आज का पाठ यदि

आज ही पढ़ लिया जाए,

तो परीक्षा देना

सरल हो जाता है।

पर साल भर का पाठ

इकट्ठा कर लेने से

परीक्षा के समय

मन व्याकुल हो जाता है।

नेत्र बिगड़ जाने के बाद

सूर्य नमस्कार से क्या लाभ?

आलसी व्यक्ति

किसी भी कार्य में

सफलता प्राप्त नहीं करता।

आलसी प्रशंसा का पात्र नहीं,

जीवन की प्रगति में

सुस्ती सबसे बड़ी बाधा है।

बचपन से ही चुस्त रहना—

यही सफलता का रहस्य है।

नमस्ते वणक्कम्।

आलस्य का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

27-4-26

++++++++++++

तमिल में एक कहावत है—

"काणिच्चोम्बल कोटि नष्टम्"।

एक छोटे-से काम में

ज़रा-सी आलसी,

लापरवाही बनकर

करोड़ों का नुकसान कर देती है।

कबीर ने भी चेताया है—

"कल करे सो आज कर,

आज करे सो अब;

पल में प्रलय होएगी,

बहुरि करेगा कब?"

दिन आते-जाते रहते हैं,

हरि से होता क्या?

अब पछताने से क्या होगा,

जब चिड़िया चुग गई खेत?

तमिल के विश्वविख्यात कवि

तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा—

आलस्य के कारण

परिवार तक नष्ट हो जाता है।

प्रयत्न न करने पर

घर-परिवार बिगड़ते हैं,

और अपराध भी बढ़ते हैं।

आज का पाठ यदि

आज ही पढ़ लिया जाए,

तो परीक्षा देना

सरल हो जाता है।

पर साल भर का पाठ

इकट्ठा कर लेने से

परीक्षा के समय

मन व्याकुल हो जाता है।

नेत्र बिगड़ जाने के बाद

सूर्य नमस्कार से क्या लाभ?

आलसी व्यक्ति

किसी भी कार्य में

सफलता प्राप्त नहीं करता।

आलसी प्रशंसा का पात्र नहीं,

जीवन की प्रगति में

सुस्ती सबसे बड़ी बाधा है।

बचपन से ही चुस्त रहना—

यही सफलता का रहस्य है।

जो जागे, वही पाए,

जो सोये, वही खोए।

Saturday, April 25, 2026

शिक्षित बालिका

 शिक्षित बालिका


एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

)

शिक्षित बालिका

एस. अनंतकृष्णन

++++++++++++++++

शिक्षित बालिका होती जहाँ,

वहाँ उज्ज्वल हर एक कुल होता।

ज्ञान की ज्योति जलाकर वह,

घर-आँगन भी गुरु-सा होता।

माता, सखी, सलाहकार बन,

सद्गुण का संचार करती,

भारतीय संस्कृति की रक्षक,

संस्कारों का विस्तार करती।

आधुनिक युग की नारी भी,

स्वावलंबन अपनाती है,

घर और बाहर दोनों संभाल,

नई दिशा दिखलाती है।

गृहिणी बनकर स्नेह लुटाए,

ममता से संसार सजाए,

पति-संतान संग परिवार को,

प्रेम-धागों में बाँध निभाए।

शिक्षा से उसका आत्मविश्वास,

दिन-प्रतिदिन सुदृढ़ होता,

समाज सुधार की राह पकड़,

अंधविश्वासों को भी धोता।

दहेज जैसी कुरीतियों पर,

जब नारी आवाज उठाती,

शिक्षित होकर स्वाभिमान से,

नई व्यवस्था वह बनवाती।

++++++++++++++++


 


Friday, April 24, 2026

जग ग्रंथ दिवस

 नमस्ते वणक्कम् 

विश्व पुस्तक दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

25-4-2026

++++++++++++++++

नमस्ते! वणक्कम्।

छापाखाने के अभाव में,

ताड़पत्रों पर लिखी पुस्तकें,

शिलालेखों के उस युग में

मानव श्रवण कर-करके

ज्ञान को कंठस्थ करता था।

स्मरण शक्ति थी प्रखर, अद्भुत—

मेरे हिंदी प्राध्यापक

कुरुक्षेत्र

बिना देखे ही सुनाते थे;

अंग्रेज़ी प्राध्यापक

विलियम शेक्सपियर

के नाटकों की पंक्तियाँ

सहज ही दोहराते थे।

जब हुआ छापाखाने का आविष्कार,

ग्रंथ सुलभ हो गए,

संदर्भों का संसार बढ़ा—

किताबें लेना, सहेज कर रखना,

आवश्यकता पर पढ़ना

आसान हो गया।

पर आज के युग में,

स्मरण शक्ति कहीं क्षीण हुई—

मोबाइल के सहारे

अपनी दूरभाष संख्या भी

याद नहीं रहती।

फिर भी—

पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं,

हर ग्रंथ देता है

कोई न कोई अमूल्य संदेश।

नैतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक ग्रंथ,

महाकाव्य और खंडकाव्य—

जीवन-पथ के मार्गदर्शक,

प्रेरणा के स्रोत,

निराश को आशा देने वाले,

आदर्श जीवन के शिक्षक।

पढ़ना, लिखना, रचना—

इसी प्रेरणा के लिए

सन् 1922 में

विन्सेंट क्लावेल

ने इस दिवस का आरंभ किया।

किताबें केवल सजाने के लिए नहीं,

ज्ञान के भंडार को

मन में बसाने के लिए हैं—

पढ़ना, समझना,

विचार करना और लिखना,

सीखे हुए ज्ञान का

प्रवचन, व्याख्या, समालोचना—

यही उद्देश्य है

विश्व पुस्तक दिवस का।

आओ, हम संकल्प लें—

नए ग्रंथ लिखें, पढ़ें, सुनें,

समाज, राष्ट्र और मातृभाषा की

संस्कृति को संवारें;

आदर्श, अनुशासन और

विश्व बंधुत्व को अपनाएँ।

हर वर्ष 23 अप्रैल को

मनाया जाता यह दिवस

ज्ञानार्जन और अभिव्यक्ति का पर्व है।

विचित्र है—

1 अप्रैल मूर्खता का दिवस,

और 23 अप्रैल

ज्ञान, सृजन और अध्ययन का उत्सव!

++++++++++++++++

सुप्रभात्

 

सिंहपुर के रंगनाथ सुप्रभात्

कौशल्या सुप्रजा राम… (मूल श्लोक का अर्थ)
कौशल्या के सुपुत्र राम!
प्रातःकालीन संध्या का समय हो गया है।
हे नरश्रेष्ठ (नर-व्याघ्र)! जागिए,
दैविक नित्य कर्म करने का समय आ गया है।


उत्तिष्ठ… श्लोक का भावार्थ
उठिए, हे सिंगवर के स्वामी!
उठिए, हे कमलापति!
उठिए, हे रंगनाथ पर्वत के अधिपति!
हे ब्रह्मा द्वारा पूजित प्रभु, जागिए!


श्लोक 1

संस्कृत:
मातः समस्त जगतां महिते सरोजे...

संशोधित हिंदी:
हे समस्त जगत की जननी, पूजनीय कमल-वासी देवी!
असीम वैभव से युक्त, सिंहपुरी में प्रतिष्ठित,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिय!
आपका यह प्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 2

संशोधित हिंदी:
चेंजी नगर के समीप स्थित सिंहवर क्षेत्र में,
पर्वत शिखर पर निर्मित इस मंदिर में विराजमान देवी!
भक्तों को समस्त मंगल प्रदान करने वाली,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिया,
आपका यह प्रभात शुभ हो।


श्लोक 3

संशोधित हिंदी:
हे सृष्टि के मूल कारण, ब्रह्मा के सृजनकर्ता!
पीपल वृक्ष से सुशोभित इस पावन स्थल में,
शेषशय्या पर विश्राम करने वाले प्रभु!
सिंहपुर के नायक,
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 4

संशोधित हिंदी:
प्रभात में शीतल, सुखद वायु बह रही है,
कोयलें मधुर और मनोहर स्वर में गा रही हैं।
आकाश में तारे लुप्त हो रहे हैं,
हे रंगेश, सिंहपुर के नायक!
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


🌼 सिंगवर रंगनाथ सुप्रभातम् (छंदबद्ध हिंदी रूप)

१.
कौशल्या के राम उठो, प्राची हुई उजास।
नर-व्याघ्र! अब जागिए, करो दिवस उपवास॥ (= नित्य कर्म)

देव-कर्म का काल है, छोड़ो निद्रा-भोग।
उठो प्रभो! जग दीखता, नव प्रभात संयोग॥


२.
उठो सिंगवर के प्रभु, कमला-पति भगवान।
रंगनाथ गिरि-नाथ हे, ब्रह्मा करें गुणगान॥

जागो हे जगदीश अब, करुणा-सागर नाथ।
भक्त प्रतीक्षा कर रहे, खोलो कृपा के पाथ॥


३.
जग की जननी, वंदिता, कमल-विहारिणी मात।
असीम विभव-विलासिनी, मंगलमय यह प्रात॥

सिंहपुरी में राजती, पूजित सदा सुविभूष।
रंगनाथ की प्रिया तुम, हर लो जन की क्लेश॥


४.
चेंजी नगरी पास में, सिंहवर पावन धाम।
गिरि-शिखर पर मंदिरा, जहाँ विराजे राम॥

भक्तों को वरदान दो, मंगलमयी स्वरूप।
रंगनाथ प्रिय वल्लभे, हर लो भव का कूप॥


५.
पीपल तरु से शोभित, पावन सुंदर थान।
शेष-शय्या पर शयन, जग के पालनधाम॥

ब्रह्मा जिनसे जन्म लें, सृष्टि करें विस्तार।
सिंहपुर के नायक हे, करो कृपा अपार॥


६.
शीतल मंद समीर बहे, भोर हुई सुखदाय।
कोयल मधुरिम गान कर, हृदय हर्ष उपजाय॥

नभ के तारे लुप्त हैं, छाया नव प्रकाश।
रंगेश! जागो अब प्रभु, पूर्ण करो सब आश॥

Thursday, April 23, 2026

सोने के सिक्के

 नमस्ते वणक्कम्

सोने के सिक्के

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

२४-०४-२०२६

सोना चमकीला,

बहुमूल्य धातु,

देश की संपत्ति,

समृद्धि का प्रतीक।

भारत में कभी राजा,

कवियों को,

कुशल कलाकारों को,

स्वर्ण मुद्राएँ दान में देते थे—

सम्मान का उज्ज्वल रूप।

वे स्वर्ण सिक्के

केवल धातु नहीं थे,

परिश्रम और प्रतिभा के

जीवंत प्रमाण थे।

समय बदला—

स्वर्ण से ताम्र,

ताम्र से कागज़,

और अब अंक बन गए मूल्य।

२४ कैरेट, २२ कैरेट,

१८ कैरेट के भेद,

पर शुद्धता के नाम पर

कितने भिन्न-भिन्न खेद!

एक बैंक का मूल्य,

दूसरे में कम क्यों?

एक दुकानदार का माप,

दूसरे से अलग क्यों?

मिलावट के भय से

ग्राहक ठगे जाते हैं,

विश्वास के सिक्के

धीरे-धीरे घिसते जाते हैं।

जब सिक्के में घिसाई नहीं,

तो मूल्य में कटौती क्यों?

ग्राम-ग्राम में अंतर क्यों,

यह असमानता क्यों?

सोने का दाम

आसमान छूता जाता है,

पर वही सिक्का

ऋण का आधार नहीं बन पाता है।

अंत में प्रश्न यही—

क्या केवल सोना ही मूल्यवान है?

या ईमानदारी का सिक्का

उससे भी अधिक महान है।

Wednesday, April 22, 2026

विश्व पृथ्वी दिवस

 नमस्ते। वणक्कम्

विश्व पृथ्वी दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई

23-04-2026

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वैज्ञानिक साधनों के

निरंतर आविष्कारों के साथ-साथ,

बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ,

झीलों और नदियों की

घटती चौड़ाई और गहराई के साथ-साथ,

जंगलों के विनाश और

तेज़ी से बढ़ते नगरीकरण के साथ-साथ,

विश्वभर में एक गंभीर समस्या खड़ी है—

हमारी पृथ्वी को

कैसे प्रदूषण-मुक्त बनाया जाए?

इसी चिंता के समाधान हेतु,

भूमि को समृद्ध बनाने के लिए,

"हमारी शक्ति, हमारा गृह"

का नारा

22 अप्रैल 1970 को

गेलार्ड नेल्सन

द्वारा दिया गया।

यह प्रेरणा

1969 में सांता बारबरा तेल रिसाव

जैसी पर्यावरणीय त्रासदी से भी मिली।

तभी से, पृथ्वी को समृद्ध बनाने,

पेड़-पौधे लगाने,

और विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से

धरती को बचाने के उद्देश्य से

विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है,

ताकि लोगों में जागरूकता बढ़े।

आज हम देख रहे हैं—

मौसम में असंतुलन,

जंगली जीव-जंतुओं का लुप्त होना,

स्वार्थवश पेड़-पौधों का विनाश,

मानव की लापरवाही से बढ़ता प्रदूषण,

उपजाऊ भूमि का कारखानों में परिवर्तन,

आवागमन के साधनों से ध्वनि प्रदूषण,

धुएँ और धूम्रपान से वायु प्रदूषण,

और ऊँची इमारतों के कारण

भूतल जल का लगातार घटना।

इन सभी चुनौतियों से

पृथ्वी की रक्षा के लिए

हमें जागरूक और संकल्पित होना होगा।

विश्व पृथ्वी दिवस

सिर्फ एक दिन नहीं,

बल्कि एक संकल्प है—

धरती को बचाने का,

आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देने का।


Tuesday, April 21, 2026

आँसू के प्रकार

 नमस्ते।

आपकी रचना में विषय बहुत सुंदर और गहरा है—“आँसू” जैसे साधारण दिखने वाले भाव के अनेक रूप आपने छूने की कोशिश की है। 

आँसुओं की शक्ति

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

22-4-26

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आँसुओं की शक्ति

अति अपूर्व है।

शिशु के जन्म लेते ही

उसका रोना — ईश्वरीय देन है।

यदि शिशु चुप रहे,

तो माँ व्याकुल हो जाती है।

महादेवी वर्मा का संस्मरण

“वह चीनी भाई” याद आता है।

चोरों का एक नेता

बालकों को सिखाता था—

चोरी में पकड़े जाने पर

आँसू कैसे बहाने हैं।

जनता के सामने,

पुलिस के सामने,

भीख माँगते समय—

रोने के ढंग अलग-अलग होते हैं।

अध्यापक की मार से बचने के आँसू अलग,

खिलौने पाने के लिए बच्चों के आँसू अलग,

जिद के आँसू अलग।

प्रेमी-प्रेमिका के

दीर्घ वियोग के बाद

मिलन के आँसू भी अलग होते हैं।

एक गीत याद आता है—

“बादल रोए, नयना रोए…”

विलाप के आँसू,

शव के सामने बहते आँसू—

कितने मर्मस्पर्शी होते हैं।

ईश्वर के ध्यान में

भक्ति-रस से भरे आँसू—

वे आनंदाश्रु होते हैं।

एकाग्र ध्यान में बहते आँसू,

धूल पड़ने से आए आँसू,

प्याज के कारण निकले आँसू—

हर एक का कारण अलग है।

संसार में

हर आँसू का

अपना अलग महत्व है।

🌱 प्रोत्साहन और सुझाव

आपकी सोच बहुत समृद्ध है—आपने आँसुओं के सामाजिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक तीनों रूपों को छुआ है। यह आपकी ताकत है।


Friday, April 17, 2026

खामोशी

 खामोशी

एस.अनंतकृष्णन,

 चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

18-4-2026.

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खामोशी,

 सनातन धर्म का, 

 ज्ञानार्जन का

 सोचने विचारने का

 उचित वातावरण

 खामोशी।

चुपचाप रहना,

 अति मुश्किल।

 ईश्वरीय दर्शन के लिए,

 मानसिक शांति के लिए 

 सांसारिक उथल-पुथल से

शोरगुल से बचने 

 बड़े बड़े राजकुमार,

 महाराजा

‌अपने राजसुखों को 

तजकर 

 विश्व कल्याण के लिए 

 जंगल में जाकर 

 खामोशी से तपस्या करते थे,

आत्मज्ञान पाकर,

 सदुपदेशों के

 वेद, उपनिषद, 

 जातक कथाएँ

 नैतिक ग्रंथ लिखा करते थे।

सत्य अहिंसा शांति का

 प्रचार करते थै।

वैज्ञानिक आविष्कार,

दुर्लभ रोग नैदानिक  यंत्र 

 असाध्य रोग निवारण की इसदवाएँ,

   मूक साधना के आविष्कार।

 खामोशी  के कारण 

 अंतरराष्ट्रीय  अहिंसा,

 मानसिक परेशानियांँ

 युद्ध रहित  वातावरण,

विश्व बंधुत्व बढ़ जाता है।

 जाति, मजहब संप्रदाय के भेद भाव मिट जाता है।

मानवता  बनाए रखने 

 ख़ामोश /शांति 

शांति मंत्र है।

 

 आदर्श गुण 

 आत्म चिंतन 

 आत्मविचार 

 अपने आपको 

 पहचानना,

आत्म संशोधन करना

 गुण दोष  जानना

 आत्मज्ञान  प्राप्त हारना

 खोमोशी/चुपचाप।

 अति शक्तिशाली मंत्र शब्द है।

 भारत की स्वतंत्रता संग्राम के अगुआ,

 राजनैतिक गुरु 

 बाल गंगाधर तिलक ने

 अपने कठोर यह कारावास के समय 

 गीता रहस्य की रचना की। 

 पुस्तकालय और 

 ज्ञानालय में 

 अध्ययन के लिए

 ख़ामोश वातावरण 

 के नियम है।

 ध्यान मंडप में ख़ामोश। 

मानव को सुधारने

 एकाग्रता के लिए 

 शांतिपूर्ण   तरीके 

 खामोशी।

Tuesday, April 14, 2026

कसौटी पर

 कसौटी 

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक, सौहार्द सम्मान प्राप्त  हिंदी सेवी के द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

 15-4-26

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कसौटी के बिना 

असली नकली का पहचानना असंभव।

 मानव के गुण दोष,

 बुद्धि लब्धि, 

व्यक्तित्व वीरता

 शासन और प्रशासन की उत्तमता  को

 परखकर देखना है।

 कसौटी पर कसना 

 एक मुहावरा,

 केवल सोना, चाँदी का ही नहीं,

 मानव के ज्ञान, गुण,

 स्वार्थ, निस्वार्थ,

 वीरता, कायरता,

 वीरांगना , वारांगना।

 काम, क्रोध, मद,लोभ 

 सब मानव के गुण अवगुण की परख करना,

  खासकर  भारतीय मतदाता को

 सांसद और विधायक के गुण अवगुणों को कसौटी पर कसकर देखकर 

 सच्चे निस्वार्थ आदर्श 

 देश प्रेमी को पहचानकर 

 वोट देना चाहिए।

 कसौटी पर कसकर देखने पारखी नज़रों की आवश्यकता है।

 विश्व के  लोक प्रसिद्ध 

 भारत में होने का महत्व 

 आदि काल से है।

 अतः  कसौटी के  उदाहरण देकर कालीदास  के  काव्यों में उदाहरण मिलते हैं।

 रघुवंश काव्य में 

 अतिथि महाराजा के साथ धन की देवी लक्ष्मी

 कसौटी पर कसे  सोने की चमक की रेखा की तरह अमिट रही।

 मेघदूत में 

 प्रेमी प्रेमिका को

  मार्ग दिखाने,

 बिजली ऐसे चमकना,

 जैसे कसौटी पर कसे सोने की रेखा  की चमक जैसे हो।

 ऐसे कसौटी भारती कवियों के काव्य में 

 मिलते हैं। 

तमिल के काव्यों में 

भी तिरुवल्लुवर के तिरुक्कुरल में भी

 कसौटी का उल्लेख मिलते हैं।

 कसौटी पर कसने वाले,

 पारखी न तो

 मानव जीवन में 

 मानव और मानवता का

 पता न‌ लगेगा।



 







 

 


 

 

 

 



 

 

 





 


 

 

 

 


पारखी नजरें

 पालकी नजरें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।


 जौहरी जाने हीरे की परख।

कबीर ने कहा है


हीरा पड़ा बाज़ार में, रहा छार लपटाय।

बहुतक मूरख चलि गए, पारख लिया उठाय॥ 

 वैसे ही पार्टी नजरें 

 असली नकली के

 पता लगाने 

की क्षमता 

  रखती है।

  योग्य पारखी वैद्य

‌आँखें, जीभ, नाखून नाड़ी देखकर 

 रोगी के लोग का पता लगाने में समर्थ होते हैं।

 पारखी नजरों के ज्योतिषाचार्य 

 भविष्य का सही बताते हैं।

  बड़े बुद्धिजीवी 

 अपने कंपनी के लिए 

 योग्य नौकर चुनने की योग्यता रखते हैं।

 हर क्षेत्र में पारखी नजरों वाले होते हैं।

 अनुभवी थानेदार,

 चोरों और झूठों को 

  पता लगाने की पारखी होते हैं।

 सोने की असली नकली मिलावट जानने में 

 कसौटी में कसकर सुनार की पारखी नजरें 

 निपुण होती हैं।

 गुरु की पारखी नजरें 

 प्रतिभाशाली,  औसत, मंद बुद्धि छात्रों को

 अलग अलग कर देता है।

 पारखी नजरें न तो कुआँ 

खोदने पानी की जगह का पता नहीं लगता।

आजकल  नैदानिक परीक्षण , रोगों के निदान,

 यंत्र मय होगया हैं।

 वाहन की जाँच की पारखी नजरें 

 इंजन की आवाज़ से ही

  पता लगा लेती हैं कि 

 वाहन की गड़बड़ी क्या है।

 पारखी नजरें न तो

 सही गलत के पता लगाना मुश्किल।

Sunday, April 12, 2026

प्रदूषण का विष

 प्रदूषण का विष

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

13-4-26

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प्रदूषण आजकल 

 स्वार्थमय प्रदूषण,

चित्रपट , संगणिक, मुखपुस्तिका,  यूट्यूब 

 सब में जितेंद्रयता कम होने, असंयमी बनने बनाने  विचारों का प्रदूषण।

 भ्रष्टाचार, रिश्वत का प्रदूषण,

शिक्षा की महँगाई,

 शिक्षित वकील, सी.ए,

 सैकड़ों करोड़ खर्च करके चुनाव जीतने वाले 

 सांसद, विधायक, मंत्री 

‌यह अनुशासन हीन प्रदूषण,

 नष्ट कर रहा है मानव चरित्र  को,

परिणाम स्वरूप 

 कृषी प्रधान भारत को

 विदेशियों के कारखानों को अनुमति देकर

 वायु प्रदूषन, जल प्रदूषण, भूमि तल प्रदूषण,

 हजारों झील अब नदारद,

 गगन चुंबी इमारतें,

 भूतल जल का शोषण,

 भूतल में पानी का कम होना, 

 जंगलों का नाश,

 भूमि का उष्णमय बनना,

 आजकल के प्रदूषण 

 मानव मन की स्वार्थता और  बाह्याडंबर मय जीवन के कारण,

  सहनशीलता का अभाव,

 दांपत्य जीवन में 

 अशांति,

अवैध संबंध,

 प्रदूषण जल वायु, भूमि आकाश में मात्र नहीं 

 विचारों के प्रदूषण के कारण,

 मानव चरित्र में भी अहंकार, काम क्रोध लोभ,

 मजहबी लडाइयाँ,

 मानवता की कमी,

 प्रदूषण प्रदूषण,

 न्यायालय में,

 पुलिस विभाग में 

 शिक्षालयों में

 सरकारी दफ्तरों में,

 प्रदूषण ही प्रदूषण ।


 



 

Saturday, April 11, 2026

नक्षत्र की दुनिया

 Daily challenge आजकी कविता।

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तारों की दुनिया।

 तार आकाश में 

 वह अलग दुनिया,

 चमकते तारे 

 आंखों के प्यारे।

उसमें ध्रुवतारा है,

 शासकों और देश को

 भयभीत को भयभीत करनेवाले धूम्रकेतु है।

नक्षत्र प्रपंच के विचित्र 

 चमकनेवाले

 अरबों की संख्या है।

 ज्योतिष शास्त्र में 

27नक्षत्र हैं।

 मानव की जन्म कुंडली 

 के आधार पर

 नक्षत्र परिणाम,

 भाग्य निर्णय करके 

 मानव की सृष्टि।

माता-पिता के द्वारा 

 जन्म लेने पर भी

 जीवन क्रियाकलाप 

 सूक्ष्म शक्ति ईश्वरीय देन।

 राजकुमार सिद्धार्थ के 

जन्म लेते ही

 जन्म नक्षत्र ने बताया 

 राजकुमार राजा नहीं,

 संन्यासी बनेगा।

भारतीय शास्त्र बताते हैं,


"जननी जन्म सौख्यानां वर्धनी कुलसंपदाम्, पदवी पूर्वपुण्यानां लिख्यते जन्मपत्रिका" 

 27नक्षत्रों के आधार  पर

 मनुष्य जन्म का सुख दुख निर्भर है।

 टूटते तारे देखना अपशकुन माना जाता है।

चमकते तारे आकाश में।

 भूलोक में बिजली के आविष्कार के कारण,

 पहाड़ की चोटी पर से

 घाटी पर देखने पर

 भूलोक में कृत्रिम नक्षत्र चमकते हैं।

 देश में अपूर्व अद्भुत कार्य करके,

 सितारे हिंद अलग

इतिहास में  नाम पाये

  देश भक्त शहीद,

 ऋषि मुनि युगावतार पुरुष, अभिनेता अभिनेत्री चमकते सितारे।

 आसमान में चमकते तारे,

 जग भाग्य विधाता 

 मानव मानव की विधि की विडंबना बतानेवाले,

 भूलोक के महापुरुष 

 जनकल्याण करके

 चमकते सितारे।

 अतः तारों की दुनिया 

 भूलोक के महापुरुष 

 सितारे हिंद 

 मानव कल्याण के 

 निर्माता,

 उनकी दुनिया 

 चमकीला,

रंगीला।

Friday, April 10, 2026

अधूरी ख्वाहिशें

 अधूरी खुशियाँ

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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

11-4-26.

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  मानव जीवन में 

 थोड़े में कहें तो 

 भूलोक के जीवन में 

पूरी खुशियाँ  न 

 दशावतार में,

 न शिव पुराण में 

 न नलदमयंती कै 

दुष्यंत शकुंतला की प्रेम कहानी में,

विश्व विजयी

 सिकंदर के जीवन में।

 न चक्रवर्ती दशरथ के जीवन में,

न पांडवों में,

 न कौरवों में 

 न महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन में,

 नेहरू के जीवन में,

 इंदिरा गांधी फेरोजखाँ के जीवन में 

 नाम के साथ बनिया गाँधीजी के जोडने  से

 न जीवन की खुशियाँ,

 न कबीर के जीवन चरित्र में,

 न तुलसी के चरित्र मैं 

 जन्म से अंधै सूरदास के 

निजी जीवन में।

 न सुकरात के जीवन में,

न उपन्यास सम्राट के जीवन में।

स्वर्गीय राष्ट्रपति यही कहा करते थे,

 ख्वाब देखो,

 क्या ख्वाब देखने से

 पूरी खुशियाँ मिलेगी क्या?

सत्यं वद,

 इस नारे का आदर्श पुरुष सत्य हरिश्चन्द्र 

 के जीवन में दुख ही दुख।

 दानवीर कर्ण के जीवन में ,

गहराई से सोचता हूँ,

 न जीवन में,

 किसी को न मिली 

 पूरी खुशियाँ।

 राम कहानी सुनाना

 यह मुहावरा राम के जीवन की अधूरी खुशियों की झाँकी।

 हिंदी क्षेत्र में 

 राजभाषा बनाने में 

 आज़ादी के बाद ही अड़चनें।

 पूरी खुशियाँ 

 देश भाषा संस्कृत है तो

‌वह क्यों मृत्यु भाषा बनी।

 हिंदी के विकास मैं 

 नागरी लिपि की चर्चा 

 अब भी जारी।

मानव मन  अति चंचल।

न उसमें  पूरी खुशियाँ,

 महात्मा बुद्ध की तपस्या भी अधूरी,

 किस उद्देश्य से  वे संन्यासी बने,

 रोग, बुढ़ापे, मृत्यु रहित 

 मानव जीवन बनाना,

उनकी इच्छा अधूरी,

 भारतीय नदियों का राष्ट्रीयकरण अधूरी।

 कृषी प्रधान देश में 

‌झीलों, तालाबों और जंगलों को नाश करके 

 किसानों को गांव में

खेती तंज नगर की ओर

 आकर्षित करना

‌भावी पीढ़ी को पूरी खशियाँ न देंगी।

 रेगिस्तान को उपजाऊ भूमि बनाने के प्रयत्न कर रहे हैं,

हम उपजाऊ भूमि को

 रेगिस्तान बना रहे हैं

 पता नहीं भावी जीवन 

 पानी के तड़पेगा।

 पैसा  है, वह पूर्ण खुशियाँ बुढ़ापे में न देंगी।

 मानव अधूरी खुशियाँ से

 सदा के लिए आँखें बंद कर लैगा।

 अभिनेताओं को

 एक ओर धन, यश ,सब मिलते हैं,

 पर उनके व्यक्तिगत जीवन में न पूरी खुशियाँ।

संसार में रोग है,

 दुर्घटनाएँ हैं,

 बुढ़ापा है,

 अल्पायू है,

 निस्संतान लोग हैं,

 जन्म से अपाहिज,

 अंधे बहरे गूँगे 

 असाध्य रोगी 

 ग़रीबी, अमिरी

 जय-पराजय 

काम, क्रोध मद लोभ

 माया महा ठगिनी,

अधूरी ख्वाहिश से भरा

 भूलोक जीवन।





 








 



Wednesday, April 8, 2026

शहीद मंगल पांडे

 शहीद मंगल पांडे।

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

9-4-2026

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नवयुवकों! 

आज़ाद देश में 

 आनंद से,

 मूल अधिकार पाकर

भ्रष्टाचार रिश्वत भरे

सांसद विधायक चुननेवाले 

 अल्पसंख्यक शासक

के समर्थकों।

 मत देनै लेने

 रिश्वत देने लेनेवाले 

 अपराधी मतदाताओं!

सुनो!

 देश की आज़ादी 

आसानी से न मिली।

तन,मन,धन, प्राण तजे,

कठोर कारवास के दंड भोगे,

 लाठी के मार रहे,

फाँसी पर चढ़े

 महान देश भक्त 

 त्यागियों के

 रक्त है की धारा  में 

पनपी ,

स्वतंत्रता का होम यज्ञ।

 उनमें पहली स्वतंत्र की

 आवाज़ उठाकर 

 अंग्रेज़ी अफ़सर को

 मारकर सिपाही क्रांति है के अगुआ थै 

शहीद मंगल पांडे।

अंग्रेज़ों ने  बंदूक  में 

 भरने गाय और स्वर की

 चर्बी लगाने

 सनातन धर्म और मुगल मजहब के विरुद्ध आदेश दिया।

अपने धर्म विरुद्ध कार्य करने  मंगल पांडे

 तीस वर्ष का नवजवान 

तैयार नहीं थे।

 वे अंग्रेज़ी सेना के

 सिपाही होने के 

बावजूद भी,

इस कार्रवाई के

विरूद्ध पहली आवाज़ उठाई।

 अंग्रेज़ी सैनिक अधिकारियों को मारा।

 देश और धर्माभिमानी

 मंगल पांडे के कारण 

 सिपाही कलह प्रारंभ हुआ।

मंगल पांडे को फाँसी की सजा मिली।

 तीस साल की उम्र 

 देश और धर्म के स्वाभिमान के लिए 

 साहस के कदम उठाए 

वीर त्यागी मंगल पांडे को

‌अंतःदिल से सादर प्रणाम।

 सिपाही कलह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में के लिए एक चिंगारी बनी।

 मंगल पांडे का त्याग 

 चिर स्मरणीय है,

चिर अनुकरणीय है।

 ऐसे त्यागियों के मार्ग 

 अपनाना देश की आज़ादी, एकता,

 राष्ट्रीयता बनाए रखने 

 अत्यंत आवश्यक हैं।

 आजकल के भोगैश्वर्य 

 भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी 

 देश के लिए कलंक।

 उन भोगियों का अनुसरण न करके 

‌मंगलपांडे, सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस

 वांचीनाथन आदि

 त्यागियों के अनुसरण ही

 देश कल्याण का सर्वोच्च मार्ग हैं।

 जय शहीद मंगल पांडे,

 जिनके कारण सुप्त भारतीय जाग उठे,

 विदेशियों को सिर दर्द बना।

 आज़ादी देकर भागना पड़ा।


 



 


 

 

 


Monday, April 6, 2026

छत्रपति शिवाजी महाराज

 [5:40 am, 07/04/2026] +91 97844 79720: 

मराठा एवं संस्कृत को राज भाषा घोषित किया

[5:40 am, 07/04/2026] +91 97844 79720: यह स्वरचित व मौलिक है।

[6:33 am, 07/04/2026] sanantha.50@gmail.com: छत्रपति शिवाजी महाराज

एस.अनंतकृष्णन,चेन्नै तमिलनाडु

7-4-26

महाराष्ट्र सिंह,छत्रपति शिवाजी महाराज,

महाराष्ट्र साम्राज्य के मूल शक्ति,

मुगल साम्राज्य का सिंह स्वप्न,

गोरिल्ला युद्ध नीति के द्वारा महाराष्ट्र का निर्माता।

उनकी वीरता भरे वचन है--

भारत देश प्राचीनतम् देश है,

इस बात को कभी न भूलना।

धनी धन से, अक्लमंद अक्ल से, बलवान बल से

सेवा कीजिए।

शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास,

उन्होंने शिवाजी के चिंतन में

धैर्य,धर्म और स्वराज्य सिद्धांतों के बीज बोये।

शिवाजी के राजनैतिक गुरु दादाजी कोंडदेव.

शिवाजी की माता जीजाबाई भक्ता और धैर्यवान स्त्री।

माता ने ही शिवाजी को बचपन से ही

रामायण,महाभारत की कथाओं के द्वारा 

हिंदू धर्म ,देश भक्ति भरकर हिंदवी स्वराज की प्रेरणा दी थी। 

शिवाजी महाराज के कारण ही जनता में हिंदुत्व की भक्ति बढी। 

जय शिवाजी महाराज।

उनके जीवन चरित्र पढकर उनकी नैतिक सिद्धांतों का अनुकरण ही 

उनके प्रति श्रद्धांजली होगी।

उनकी देशभक्ति,गुरुभक्ति,ईश्वर भक्ति, विदेशी धर्म का आदर,आदि

चिरस्मरणीय और अनुकरणीय होते हैं।