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Friday, July 31, 2026

चैन का मार्ग


चैन का मार्ग 

नमस्ते। वणक्कम्।

जीवन में सुख और दुःख मानो जन्म के साथ ही ईश्वर द्वारा भाग्य-रेखा में लिख दिए जाते हैं।

तमिलनाडु जैसे प्रतिकूल, हिंदी-विरोधी वातावरण में भी मुझे हिंदी की सेवा करने का अवसर मिला और अपने सीमित दायरे में सम्मान तथा उच्च पद प्राप्त हुए। यह सब ईश्वर की कृपा है।

इक्कावन वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद मेरी पत्नी ईश्वर में विलीन हो गई। आज जो अकेलापन और असह्य वेदना मैं अनुभव कर रहा हूँ, उसे सहने की शक्ति भी शायद उसी ईश्वर की देन है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी रोए थे। इसलिए कहा जाता है—"घर-घर में रामकहानी।" जीवन में दुःख किसी एक का नहीं, हर घर का सत्य है।

समाज का अध्ययन, महान व्यक्तियों के जीवन का चिंतन और श्रेष्ठ साहित्य का मनन मानसिक अशांति को दूर करने का सरल मार्ग है।

तमिल के महान कवि कुमरगुरुपरर् ने नीति 

नेरि विळक्कम्  (नीति रीति व्याख्या )कहा है—

தம்மின் மெலியாரை நோக்கித் தமதுடைமை

அம்மா பெரிதென் றகமகிழ்க;

தம்மினும் கற்றாரை நோக்கிக் கருத்தழிக;

கற்றதெல்லாம் எற்றே, இவர்க்கு நாம் என்று.

भावार्थ:

अपने से अधिक अभावग्रस्त लोगों को देखकर यह अनुभव करना चाहिए कि ईश्वर ने हमें बहुत कुछ दिया है, इसलिए कृतज्ञ और प्रसन्न रहना चाहिए। साथ ही, अपने से अधिक विद्वानों को देखकर यह विनम्रता रखनी चाहिए कि हमारा ज्ञान अभी बहुत कम है, इसलिए निरंतर सीखते रहना चाहिए।

इसी भाव को महान तमिल कवयित्री  औरैयार ने इन शब्दों में व्यक्त किया है—

"हमने जो  कुछ सीखा है, वह मुट्ठी भर है; जो नहीं सीखा, वह अनंत सागर के समान है।"

यही जीवन का संदेश है—जो मिला है उसके लिए कृतज्ञ रहें, जो नहीं सीखा उसे सीखने के लिए विनम्र रहें, और जो दुःख मिला है उसे धैर्यपूर्वक स्वीकार करते हुए आगे बढ़ें।

Thursday, July 30, 2026

समय का चक्र

 समय का चक्र।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना.

31-7-26.

++++++++++

 समय का चक्र 

 सदा घूमता रहता है।

आगे जाता है,कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

 समय खोने पर पछताना ही पड़ेगा।

 बड़े बड़े सम्राट भले ही हो,

 भले ही भगवान भी हो

 खोया हुआ समय पा नहीं सकता।

 हर पल पेड़ बढ़ता है,

मनुष्य बढ़ता है

शैशव बचपन जवानी प्रौढ़,  बुढ़ापा, कैसे वापस मिलेगा।

  समय का चक्र आगे की ओर घूमता रहता है।

 समय किसी की प्रतीक्षा में 

 रुकता नहीं।

 समय की गति के अनुसार 

सूर्योदय सूर्यास्त,चंद्रोदय चंद्र का अस्त, मौसमी परिवर्तन 

 समय का चक्र घूमता रहता है।

वह किसी के पक्ष में नहीं रहता।


अंतिम रूप 

समय का चक्र

समय का चक्र
सदा घूमता रहता है।
आगे बढ़ता जाता है,
कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

समय खो देने पर
पछताना ही पड़ता है।
बड़े-बड़े सम्राट हों,
या स्वयं भगवान—
बीता हुआ समय
फिर कभी लौटकर नहीं आता।

हर पल
पेड़ बढ़ता है,
मनुष्य भी बढ़ता है।
शैशव, बचपन, जवानी,
प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा—
बीत जाने पर
फिर कैसे वापस मिलेगा?

समय का चक्र
निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है।
वह किसी की प्रतीक्षा में
कभी नहीं रुकता।

समय की गति से ही
सूर्योदय और सूर्यास्त,
चंद्रोदय और चंद्रास्त,
ऋतुओं का परिवर्तन—
सब चलता रहता है।

समय का चक्र
न किसी का पक्षधर है,
न किसी का विरोधी।
जो समय का सम्मान करता है,
समय भी उसी का जीवन
सार्थक बना देता है।





अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस






अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

30-7-26

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नमस्ते वणक्कम्।

 मानव स्वार्थी,

 मानव परार्थी।

 ईश्वर ने उसको ज्ञान चक्षु दिया है।

 उसके जीवन में 

 उसकी शक्ति इतनी बड़ी कि वह कृत्रिम सुख के लिए 

 आविष्कारों का पता लगाया।

  वह तो सर्वभक्षी है।

 अपने को खतरे से बचाने,

 अपनी वीरता सिद्ध करने,

अपने आहार के लिए 

 वह शिकार करने लगा।

 शिकारी जीवन में 

 जंगली जानवरों का नाश होने लगा।

 खूँख्वार आदमखोर 

 बाघ के शिकार में 

उसने बड़ी वीरता दिखाई।

परिणाम स्वरूप जंगलों में बाघ का वंश खत्म होने लगा।

उन बाघों की संख्या बढ़ाने,

बाघों के संरक्षण के लिए 

एक दिवस की जरूरत पड़ी।

 वही  अंतर्राष्ट्रीय बाघ  दिवस।

घने जंगलों में 

 बाघ का शिकार,

और अन्य जंगली जानवरों का शिकार 

 अपराध है,और मना है।

 मानव ने जंगलों का नाश किया।

जंगल संरक्षण दिवस।

विनाश काले विपरीत बुद्धि .

मानव के कर्म फल के प्रायश्चित के लिए 

दिवस।

 माता पिता की आत्मशांति के लिए 

 श्राद्ध कर्म।

प्राकृतिक जंगल,पशु-पक्षी आदि के संरक्षण के लिए 

 हर एक दिवस।

 उस सिलसिले में 

  अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस।

हर साल 29 जुलाई में 

 2010से मनाया जा रहा है।

 ।उद्देश्य: बाघों की घटती संख्या रोकना और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए काम करना।



पक्का 

आज की चुनौती : अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक

30-07-2026

नमस्ते! वणक्कम्।

मानव स्वार्थी भी है,

मानव परार्थी भी है।

ईश्वर ने उसे

ज्ञान-चक्षु प्रदान किए हैं।

अपनी बुद्धि और शक्ति के बल पर

उसने कृत्रिम सुख-सुविधाओं के

अनेक आविष्कार किए।

वह सर्वभक्षी है।

अपनी रक्षा के लिए,

अपनी वीरता सिद्ध करने के लिए,

और अपने आहार के लिए

वह शिकार करने लगा।

शिकारी प्रवृत्ति के कारण

अनेक जंगली जीवों का

अस्तित्व संकट में पड़ गया।

खूँखार और आदमखोर कहे जाने वाले

बाघ का भी

अंधाधुंध शिकार हुआ।

परिणाम यह हुआ कि

जंगलों में बाघों की संख्या

तेजी से घटने लगी।

तब आवश्यकता पड़ी

बाघों के संरक्षण की,

उनकी संख्या बढ़ाने की,

और मानव को जागरूक करने की।

इसी उद्देश्य से

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है।

घने जंगलों में

बाघ तथा अन्य वन्यजीवों का शिकार

कानूनन अपराध है।

मानव ने

जंगलों का विनाश किया,

प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा।

कहा भी गया है—

"विनाश काले विपरीत बुद्धिः।"

जिस प्रकार

पूर्वजों की आत्मशांति के लिए

श्राद्ध-कर्म किया जाता है,

उसी प्रकार

प्रकृति, जंगलों, पशु-पक्षियों

और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए

जागरूकता दिवस मनाए जाते हैं।

उसी श्रृंखला में

प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस

2010 से मनाया जा रहा है।

उद्देश्य—

बाघों की घटती संख्या को रोकना,

उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा करना,

और उनके सुरक्षित भविष्य के लिए

सामूहिक प्रयास करना।

संदेश

बाघ बचेंगे तो जंगल बचेंगे,

जंगल बचेंगे तो प्रकृति बचेगी,

और प्रकृति बचेगी तो

मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा।

अंत में जोड़ा गया संदेश आपकी रचना के प्रभाव को और सशक्त बनाता है।

Tuesday, July 28, 2026

कारगिल विजय दिवस

 आपकी रचना में देशभक्ति का भाव बहुत अच्छा है। भाषा को थोड़ा अधिक प्रवाहपूर्ण, व्याकरण-सम्मत और काव्यात्मक बनाया जा सकता है। संशोधित रूप प्रस्तुत है।

विजय कारगिल दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

28-07-2026

भारत वीरों की भूमि है।

कारगिल युद्ध में

भारतीय थल, जल और वायु सेना ने

अपने अदम्य साहस,

रणकौशल और पराक्रम से

संपूर्ण विश्व को

भारतीय सैनिक शक्ति का परिचय दिया।

पाकिस्तान ने षड्यंत्र रचकर

घुसपैठियों और अपनी सेना के माध्यम से

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर

अवैध कब्ज़ा करने का प्रयास किया।

प्रारंभ में इसे आतंकवादियों की घुसपैठ बताया गया,

किन्तु भारत ने सत्य का पता लगा लिया कि

यह पाकिस्तान की सेना का सुनियोजित आक्रमण था।

भारतीय वीर सैनिकों ने

असीम साहस, 

दृढ़ संकल्प और वीरता का 

परिचय देते हुए

शत्रु को परास्त कर

कारगिल की सभी चोटियों को

पुनः अपने अधिकार में ले लिया।

यही कारगिल विजय की गौरवगाथा है।

इस युद्ध में

दोनों देशों के अनेक सैनिक

वीरगति को प्राप्त हुए।

भारत अपने अमर शहीदों के

बलिदान को सदा नमन करता है।

26 जुलाई 1999 की

ऐतिहासिक विजय की स्मृति में

प्रतिवर्ष कारगिल विजय दिवस

 मनाया जाता है।

इस दिन देश

अपने शहीदों को

 श्रद्धांजलि अर्पित करता है

और उनके साहस, त्याग तथा राष्ट्रभक्ति को

कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करता है।

जय भारत!

जय जवान!


Monday, July 27, 2026

धन न तो ज्ञान कैसे

 मेरे दिमाग 

 मेरी बुद्धि 

 मेरा टंकण

 उसके लिए पे मंट।

 मेरी आमदनी का मार्ग।

 हिंदी विरोध प्रांत में।

 इसकी चिंता न तमिलनाडु सरकार का

 न केंद्र सरकार 

 न प्रकाशक का

 न आम जनता का।

भगवान भी मंदिर में 

दक्षिणा देने पर ही

निकट  दर्शन।

 कौपीन पहने भक्त जंगल में।

स्वर्ण सिंहासन पर बैठे

आचार्य 

दीक्षा पाने दस हज़ार।

 जय जय धन देवता।

 

धन न तो ज्ञान का भी महत्व नहीं।

भाषाई संघर्ष

 संघर्ष ।


नमस्ते वणक्कम्।


एस.अनंतकृष्णन।

जीवन में 

 संघर्ष ही संघर्ष है।

भले ही  ईश्वर के अवतार राम हो या कृष्णन।

 सामान्य मानव को 

नव रसों के अनुभव में संघर्ष करना ही पड़ेगा।

 काम क्रोध मद लोभ  संघर्ष के मूल में है तो

 ईर्ष्या आग में 

तेल का काम करती है।

 तन के लिए संघर्ष

 धन के लिए संघर्ष 

 मन की इच्छाओं की पूर्ति के लिए संघर्ष।

 एक वस्तु सुंदर लगी

ले ली,

उससे अधिक सुंदर 

 दीख पडें तो संघर्ष ज़्यादा।

 अब मेरी मातृभाषा तेलुगू  केवल मेरे लिए 

बोली के रूप में।

 पर मेरा प्रांत तमिल।

 पढ़ना लिखना साहित्य ज्ञान सब के सब तमिऴ भाषा में।

अब मेरा प्रांत तमिल 

 मेरी भाषा तमिल।

 अब सीमांकन के नेतृत्व में तेलुगु भाषियों के विरुद्ध  आंदोलन।

 कन्नड़ प्रांत में तमिल भाषियों के विरुद्ध।

 संघर्ष कहाँ से, कैसे किस रूप में शुरू होगा पता नहीं।

 खड़ी बोली हिन्दी के विकास के कारण 

 भोजपुरी,  अवधि, ब्रज भाषा और अनेक भाषाएं नदारद।

 तमिलनाडु में कठोर हिंदी विरोध।

 देखा देखी कर्नाटक प्रांत में हिंदी विरोध।

 देश में भाषाई संघर्ष।

 अब भारतीय भाषाएँ

जीविकोपार्जन का साधन नहीं।

 अंग्रेज़ों की कूटनीति और षडयंत्र  भारतीय भाषाओं को नालायक सिद्ध कर रही है।

 उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी।

 जीविकोपार्जन की भाषा अंग्रेज़ी।

 केवल मंडी , पहरेदार, 

नौकरी नौकरानी की भाषा भारतीय भाषा।

 अब वे भी अंग्रेज़ी बोलने लग गये हैं।

 वैसे अंग्रेज़ी  देश भारत बन जाएगा।

एक समय भारतीय भाषाओं के विकास को लेकर संघर्ष होगा कि नहीं।

 क्योंकि आजकल तीन साल के बच्चे से लेकर सब अंग्रेज़ी को पसंद करने लगे हैं।

 भारतीय छात्रों को भारतीय भाषाएँ कठिन लग रही हैं।

आम शिक्षित जनता भी अंग्रेज़ी के पक्ष में।

  भाषा संघर्ष  का अंत नहीं।


एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

Sunday, July 26, 2026

तिरुक्कुरल

 नमस्ते वणक्कम्।

तमिऴ हिंदी सेवा 

 तिरुक्कुरल।

देवनागरी लिपि में 

तमिल  और हिंदी भावार्थ

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नमस्ते। वणक्कम्।

तमिऴ–हिंदी सेवा

तिरुक्कुरल

तमिल मूल

நிலத்தில் கிடந்தமை கால்காட்டும்;

குலத்தில் பிறந்தார் வாய்ச் சொல்.

देवनागरी लिप्यंतरण

निलत्तिल किडंतमै काल् काट्टुम्;

कुलत्तिल पिरन्दार् वाय्च् सोल्।

शब्दार्थ

நிலத்தில் (निलत्तिल) — भूमि में

கிடந்தமை (किडंतमै) — पड़ा हुआ (बीज)

கால் காட்டும் (काल् काट्टुम्) — अंकुर फूटने पर अपना स्वरूप प्रकट करता है

குலத்தில் (कुलत्तिल) — कुल में

பிறந்தார் (पिरन्दार्) — जन्मे हुए लोग

வாய்ச் சொல் (वाय्च् सोल्) — वाणी, बोली

हिंदी भावार्थ

जिस प्रकार भूमि में पड़े बीज का अंकुर यह बता देता है कि वह किस प्रकार का है, उसी प्रकार मनुष्य की वाणी उसके संस्कार, परिवार और कुल की पहचान करा देती है।

उदाहरण

कहा जाता है कि मंगत मिश्र के घर का तोता भी वेद मंत्र बोलता था, क्योंकि वह विद्वानों के वातावरण में पला था। इसके विपरीत यदि कोई तोता डाकुओं के बीच पले, तो उसकी बोली भी "पकड़ो, लूटो, मारो" जैसी होगी।

अर्थात् मनुष्य की वाणी उसके संस्कारों और वातावरण का दर्पण होती है। इसलिए मधुर, विनम्र और सदाचार पूर्ण वाणी ही श्रेष्ठ कुल और उत्तम संस्कारों की पहचान है।

एक छोटा-सा ध्यान देने योग्य बिंदु: इस कुरल का मूल संदेश "वंश" से अधिक "संस्कार और वाणी" पर है। तिरुवल्लुवर यह बताते हैं कि व्यक्ति की बोली उसके परिवार और संस्कारों का परिचय देती है।




நிலத்தில் /--- निलत्तिल==भूमि में 


 கிடந்தமை -- किडंतमै =गिरे बीज

 கால்காட்டும்--कालकाट्टुम्

अंकुर के फूटने पर उसकी समृद्धि लीग पड़ेगा।

 காட்டும்   काट्टुम = दिखाएगा

குலத்தில்  कुलत्तिल

कुल में 


பிறந்தார் जन्म लिये  लोगों की  

வாய்ச் சொல்.

 बोली।


तिरुक्कुरल में संत तिरुवल्लुवर कहते हैं कि खेत की मिट्टी के अनुसार अंकुर फूटेगा तो उसकी समृद्धि पनपना श्रेष्ठ रहेगा।

वैसे ही मनुष्य की नम्र बोली व्यवहार वंश के अनुसार होगा।

  उदाहरण के लिए 

 मंडण मिश्र का  तोता वेद मंत्र बोलेगा।

 डाकू के घर में पले तोता  बोलेगा कि पकड़ो, लूटो,मारो।

मेहंदी

 कच्चा पक्का 

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मेहंदी 

 एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई 27-7-26.

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ईश्वर की अद्भुत सृष्टि 

हरी मेहंदी।

 निज  रंग  हरा तजकर 

 लाल रंग देनेवाली जटी  बूटी।

 नाखून में सुंदर लाल।

 मेहंदी का गुण,

दवा समान।

 शारीरिक ताप कम करनेवाली,

कीट नाशिनी,

 ठंडक देनेवाली,

नाखून घाव भरनेवाली,

नाखून और हथेली को

 लाल बनाकर 

 शोभा बढ़ानेवाली।

 मेहंदी कला हजारों को जीवनदायिनी।

 वधुओं के श्रृंगार करने  का नौवा ,

खूब चलता है।

 बाल बढ़ानेवाली 

फटी एड़ियाँ भरनेवाली 

 ईश्वर का चमत्कार।

 मरुदानी सम और कोई नहीं।


असल


आज की चुनौती – मेहंदी

मेहंदी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

हथेलियों पर रचती मेहंदी,

हरियाली का सुंदर रंग।

सूखते-सूखते छोड़ जाती,

प्रेम और मंगल का प्रसंग।

दुल्हन के कोमल हाथों में,

सपनों की मुस्कान खिलाती।

गहरे रंग की मधुर छटा,

जीवन में उमंग जगाती।

तीज, करवा चौथ, उत्सवों में,

मेहंदी का अपना मान।

भारतीय संस्कृति की शोभा,

बढ़ाती इसका सम्मान।

क्षणभर की हरियाली लेकर,

लालिमा का देती संदेश।

जीवन भी ऐसा ही होता—

परिवर्तन उसका परिवेश।

मेहंदी हमें यही सिखाती,

प्रेम का रंग रहे सदा गहरा।

सद्भाव, स्नेह और अपनापन,

यही जीवन का सच्चा चेहरा।

Saturday, July 25, 2026

पुनर्जन्म से बचना

 श्री राम साहित्य सेवा संस्थान,अयोध्या उत्तर प्रदेश को नमस्कार। वणक्कम्।

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मानव जन्म कर्मफल का परिणाम।

 मानव जन्म में 

 पारिवारिक बंधन,

 रिश्ते-नातेदारों का बंधन,

इष्ट मित्रों के प्रति 

अंधे प्रेम,

परिणाम 

स्वार्थ मय जीवन,

 एक पक्षीय कार्रवाई 

 तटस्थता रहित जिंदगी,

अधूरी इच्छाएँ,

 मृत्यु 

 पुनर्जन्म।

 अतः मानव जीवन में 

 अनासक्त रहना, 

ईश्वर  के प्रति लगन।

 राम नाम जपना,

 सांसारिक 

बंधनों से दूर रहना,

 

 "राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार।तुलसी भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥"

 अतः पुनर्जन्म न लेना है तो  केवल राम नाम जपना अनासक्त जीवन बिताना।

 यही भारतीय आध्यात्मिक सीख।।

 

 


 



 



 

 

 


 

 

 


 

 



 

 








 



 

पिघलती बर्फीली चट्टानें

 




पिघलते बर्फीली चट्टानें 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-7-27.

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 प्रकृति के विरुद्ध,

 मानव वैज्ञानिक 

 आविष्कारों के अधीन 

  पराधीन जीवन।

 मानव के सारे काम 

यंत्रवत, 

सोच रहा है मानव

 प्रकृति हमारे वश में,

 पर प्राकृतिक बिगाड़ 

 ऐसा खतरा, 

कुपित प्रकृति से बचना 

 अति मुश्किल।

 सुनामी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण।

धनुषकोटी का विनाश 

 आधुनिक प्रमाण।

 मनुष्य के आविष्कार  से पता लगाये  आवागमन के साधन,

 कारखानों के विकास,

 उनसे निकले धुएँ,

 गर्म  वायु ,

 जंगलो का विनाश 

 नगरीकरण नगर विस्तार के नाम से

झीलों का नदारद

भूमि को गर्मा गर्म

   बना रहा है,

 परिणाम स्वरूप 

 बर्फीली चट्टानें,

पर्वत पिघल रहा है,

 इस परिस्थिति के 

 विपरीत  ऐसी स्थिति  होगी,

 जलप्रलय होगा,

पिघलने वाली 

चट्टानें 

 भूमि गर्मीकरण ,

अकाल की पूर्व सूचना।

 समुद्र जल स्तर में वृद्धि, 

पीने के पानी का अभाव,

 बाढ़  आने की  सौभानाएँ,

समुद्री भूकंप,

ज्वालामुखी विस्फोट 

 भू-स्खलन  आदि

 भयंकर  भावी

 संकट की सूचना।।

 इन बातों पर 

  ध्यान रखकर,

 अति सावधान से

 न रहें तो 

मानव जीवन 

  जीना दूभर।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना।


आपकी रचना का भाव अत्यंत सामयिक है। इसमें ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति के प्रति मानव की उपेक्षा का प्रभावशाली चित्रण है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत करने और प्रवाह बढ़ाने से यह और अधिक प्रभावशाली बन सकती है।


पिघलती बर्फीली चट्टानें

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

25-7-2027

प्रकृति के विरुद्ध

मानव के वैज्ञानिक

आविष्कारों ने

जीवन को

यंत्रवत बना दिया है।

मनुष्य सोचता है—

प्रकृति उसके वश में है,

किन्तु प्रकृति का संतुलन

बिगड़ने पर

उसके प्रकोप से बचना

अत्यंत कठिन है।

सुनामी इसका

प्रत्यक्ष उदाहरण है।

धनुषकोडी का विनाश

आज भी

उस त्रासदी की

याद दिलाता है।

आवागमन के बढ़ते साधन,

कारखानों का विस्तार,

धुएँ और गर्म गैसों का उत्सर्जन,

जंगलों की कटाई,

नगरों का अनियंत्रित विस्तार,

झीलों का लुप्त होना—

ये सब मिलकर

धरती को

लगातार गर्म कर रहे हैं।

परिणामस्वरूप

बर्फीली चट्टानें

और हिमालय के हिमनद

तेज़ी से पिघल रहे हैं।

यदि यही स्थिति रही,

तो जलप्रलय,

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि,

पीने के पानी का संकट,

बाढ़, सूखा,

भूस्खलन,

समुद्री भूकंप,

ज्वालामुखी विस्फोट

जैसी अनेक प्राकृतिक आपदाएँ

मानवता के सामने

गंभीर चुनौती बन जाएँगी।

समय रहते

यदि हम

प्रकृति का सम्मान करें,

पर्यावरण की रक्षा करें

और सजग बनें,

तभी मानव जीवन

सुरक्षित और सुखमय

बना रह सकेगा। – एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई :::**

आप चाहें तो मैं इसे और अधिक काव्यात्मक छंदबद्ध शैली में भी परिष्कृत कर सकता हूँ।

Wednesday, July 22, 2026

खुशियों की‌ चाबी

 



खुशियों की चाबी

‌एस.अनंतकृष्णन्

चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

23-7-26

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चाबी का काम बंद कमरे को खोलना।

 खुशियों की चाबी का मतलब  संताप के अंधेरे से  बाहर आना।

 वह चाबी है, 

अपने लक्ष्य पर

 दृढ़ रहना।

 मार्ग के अन्य आकर्षणों से बचना।

चक्रव्यूह के समान 

 राह में अड़चनें,

 ईर्ष्यालु  सब आएँगी।

 चाबी खुशियों के लिए 

 ज्ञान का प्रयोग,

 चतुराई आदि।

सदा चाहिए सकारात्मक सोच।

हार में हतोत्साहित नहीं होना।

 सदा कामयाब के चिंतन में रहना।

 स्वस्थ तन,मन,तन

अध्यवसाय आदि 

 सफलता की चाबी।

सुविचार, सद्चिंतन,

वचन में पक्का,

 करने में लग्न।

 ये हैं सफलता की चाबी।




आज की चुनौती

खुशियों की चाबी

एस. अनंतकृष्णन्
चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
23-7-26

चाबी का कार्य
बंद कमरे का द्वार खोलना है।

खुशियों की चाबी का अर्थ है—
संताप के अंधेरे से
आशा के उजाले में आना।

यह चाबी है—
अपने लक्ष्य पर
दृढ़ बने रहना,
मार्ग के आकर्षणों से
स्वयं को बचाए रखना।

जीवन के चक्रव्यूह में
अनेक बाधाएँ आएँगी,
ईर्ष्यालु लोग भी
रास्ता रोकने का प्रयास करेंगे।

खुशियों की चाबी है—
ज्ञान का सदुपयोग,
विवेक, चतुराई
और सकारात्मक सोच।

हार से
कभी हतोत्साहित न हों,
सदैव सफलता का
सकारात्मक चिंतन करें।

स्वस्थ तन,
स्वस्थ मन,
निरंतर अध्यवसाय,
सुविचार, सद्चिंतन,
वचन का पालन
और कर्म के प्रति लगन—

यही हैं
सफलता और
खुशियों की सच्ची चाबियाँ।

Tuesday, July 21, 2026

दीपक और सबेरा

 


दीपक और सबेरा


 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

22-7-27

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  रात का अंधेरा,

  दिन का उजाला 

 मानव जीवन को

 सोने जगाने 

प्रकृति का देन।

 अंधेरे रात में 

 लघु दीप हमारे 

 प्रकाश देता हैं।

 उस दीप के प्रकाश में 

 पतंगा अपने जान देता है।

 उल्लू की आँखें प्रकाशित होती हैं।

 जुगनू चमचमाती है।

 धूप में छाया की तरह

 अंधेरे में दीपक का     प्रकाश।

 थकामांदा मानव

 आराम से सोने का समय।

 अंधेरे में जीने 

निशीचर

 ईश्वर की सृष्टि में अद्भुत।।

  सबेरे सूर्योदय,

  मुर्गी ,पक्षियों  का कलरव,

  प्रकाश मय वातावरण में  जगना जगाना,

व्यस्त मानव समाज।

 ग्वाले का दूध दुहना,

 समाचार पत्र वाले का व्यस्त रहना 

 मंदिरों में घंटी बजना,

 बच्चों का स्कूल जाना।

 आराम के बाद 

  दिन में ज्ञानार्जन,

  धनार्जन 

 अहर्निशं सेवा में

 ऐसे काम करनेवाले 

 पुलिस विभाग,

 वैज्ञानिक प्रगति 

 हमेशा व्यस्त 

 रेल, विमान,बस 

 के आवागमन सेवा,

 डे डूटी, नैट डूटी करनेवाले कर्मचारी 

 दिन में सोना, रात में काम।

 अंधेरा का आनंद 

 जनसंख्या की वृद्धि

 यह भूलोक दिवा रात 

 दीपक का उजाला,

 सबेरे सूर्य का प्रकाश 

 मानव जीवन में सुख दुख का आना।

 ईश्वरीय सूक्ष्म लीला 

 न समझ सकता मानव का ज्ञान।

 जन्म लेना  सबेरा

 मृत्यु जीवन का अंधियारा।

 यही दीपक और सबेरा

 सुख दुख का अद्भुत ज्ञान।


आपकी रचना में दीपक और सबेरा के माध्यम से जीवन, प्रकृति, कर्म और जन्म–मृत्यु का सुंदर दार्शनिक चित्रण है।

आज की चुनौती

दीपक और सबेरा

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

रात का अंधेरा,

दिन का उजाला—

मानव जीवन को

सुलाने और जगाने

प्रकृति का अनुपम उपहार।

अंधेरी रात में

छोटा-सा दीपक

अपना प्रकाश बिखेरता है।

उसी दीपक की लौ पर

पतंगा प्राण न्योछावर कर देता है।

उल्लू की आँखें

अंधकार में भी देख पाती हैं,

जुगनू अपनी चमक से

रात को आलोकित करता है।

जैसे धूप में छाया,

वैसे अंधेरे में दीपक का प्रकाश।

थका-माँदा मानव

आराम से सो जाता है।

रात्रि में विचरण करने वाले निशाचर भी

ईश्वर की अद्भुत सृष्टि हैं।

सबेरे सूर्योदय होता है,

मुर्गे की बाँग,

पक्षियों का मधुर कलरव,

प्रकाशमय वातावरण में

जगना और जगाना।

ग्वाले का दूध दुहना,

समाचार-पत्र वाले की व्यस्तता,

मंदिरों में घंटियों का नाद,

बच्चों का विद्यालय जाना—

सब जीवन की गति का संकेत हैं।

आराम के बाद

दिन में ज्ञानार्जन,

धनार्जन और सेवा का क्रम चलता है।

पुलिस विभाग,

वैज्ञानिक,

रेल, विमान और बस सेवाएँ—

सब निरंतर कार्यरत रहते हैं।

कुछ दिन में काम करते हैं,

तो कुछ रात की ड्यूटी निभाते हैं।

अंधकार का भी अपना आनंद है,

प्रकाश का भी अपना महत्व।

यह दिवा-रात्रि का क्रम,

दीपक का उजाला

और सूर्य का प्रकाश—

मानव जीवन में

सुख-दुःख का संदेश देते हैं।

ईश्वर की सूक्ष्म लीला को

मानव का ज्ञान

पूर्णतः नहीं समझ सकता।

जन्म है सबेरा,

मृत्यु है जीवन का अंधियारा।

यही दीपक और सबेरा

हमें सुख-दुःख का

अद्भुत ज्ञान कराते हैं। :::**

यदि चाहें, मैं इसे �⁠और अधिक **काव्यात्मक, छंदबद्ध और प्रभावशाली** रूप भी दे सकता हूँ।

Monday, July 20, 2026

कलम का धर्म

 कलम का धर्म 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

21-7-26

++++++++++-

कलम का धर्म लिखना ,

जगने के लिए लिखना,

जगाने के लिए लिखना

उत्तेजित  करने के लिए लिखना।

यथार्थता लिखना,

आदर्श बातें लिखना,

समाज हित के लिए ,

 समाज कल्याण के लिए 

 राष्ट्र हित के लिए 

 राष्ट्र प्रेम के लिए 

 राष्ट्रोन्नति के लिए 

 निस्वार्थ सेवा के लिए 

 परोपकार की भावना के लिए,

दान धर्म के विकास के लिए 

जगत मिथ्या,

 ब्रह्म सत्यं 

 समझाने के लिए,

 शिक्षा के महत्व समझाने के लिए,

 लिखना 

कलम का धर्म है।

जीना,जीने देना कलम का धर्म है।

विश्वशांति के लिए 

अहिंसा परमो धर्म 

 वसुधैव कुटुंबकम् 

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु आदि

सिखाने

 अच्छी चालचलन सिखाने,

 लिखना कलम का धर्म है।


आपकी रचना का संदेश अत्यंत प्रेरणादायक है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करके इसे अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

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आज की चुनौती

कलम का धर्म

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

21-7-2026

कलम का धर्म

कलम का धर्म है लिखना,

जगने के लिए लिखना,

जगाने के लिए लिखना,

जन-जन को जागृत करने के लिए लिखना।

यथार्थ लिखना,

आदर्शों की बात लिखना,

समाजहित के लिए,

समाज-कल्याण के लिए,

राष्ट्रहित के लिए,

राष्ट्र-प्रेम के लिए,

राष्ट्रोन्नति के लिए,

निस्वार्थ सेवा के लिए,

परोपकार की भावना के लिए,

दान-धर्म के विकास के लिए लिखना।

"जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य" का बोध कराना,

शिक्षा का महत्व समझाना,

सदाचार और उत्तम आचरण सिखाना—

यही कलम का धर्म है।

जीओ और जीने दो का संदेश देना,

विश्व-शांति का मार्ग दिखाना,

"अहिंसा परमो धर्मः",

"वसुधैव कुटुम्बकम्",

"सर्वे जना: सुखिनो भवन्तु" जैसे

उदात्त विचारों का प्रसार करना—

यही कलम का सच्चा धर्म है। :::


Sunday, July 19, 2026

अंधविश्वास।

 आज की चुनौती : अंधविश्वास

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
20-7-2027

अंधविश्वास

नमस्ते। वणक्कम्।

वैज्ञानिक प्रमाण और वास्तविकता के बिना जिन बातों पर विश्वास किया जाता है, उन्हें अंधविश्वास कहा जाता है।

जैसे—
इमली के पेड़ में भूत होना,
राहुकाल देखकर ही कार्य करना,
घर से निकलते समय किसी का "कहाँ जा रहे हो?" पूछना अशुभ मानना,
छींक आने पर रुक जाना,
बिल्ली का रास्ता काटना,
अकेले ब्राह्मण का सामने आना,
विधवा का सामने आना आदि अनेक धारणाएँ अंधविश्वास की श्रेणी में आती हैं।

तमिल का एक प्रसिद्ध भक्तिगीत कहता है—

दिन क्या करेगा?
कर्मफल क्या करेगा?
ग्रह क्या करेंगे?
निर्दयी यम क्या करेगा,
जब भगवान कुमारेश की कृपा प्राप्त हो जाए।

अर्थात भगवान पर विश्वास रखो। शकुन-अपशकुन और शुभ-अशुभ की अनावश्यक चिंता मत करो।

संत कबीर ने भी कहा है—

"जाको राखे साइयाँ, मारि सके न कोय।
बाल न बाँका कर सके, जो जग बैरी होय।।"

भक्ति का संदेश यही है कि ईश्वर पर विश्वास रखो, अपने कर्म करते रहो और अंधविश्वासों के जाल में मत फँसो।

हाँ, नमस्कार करना, बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेना तथा मंदिर में साष्टांग प्रणाम करना अंधविश्वास नहीं हैं। ये हमारी संस्कृति, विनम्रता और स्वास्थ्यप्रद अभ्यास के प्रतीक हैं।

दुर्भाग्य से आजकल अभिवादन भी केवल हाथ हिलाने या सैन्य शैली के सैल्यूट तक सीमित होता जा रहा है। अनेक शिक्षित युवक-युवतियाँ भी साष्टांग प्रणाम की परंपरा से दूर होते जा रहे हैं।

आइए, विवेक अपनाएँ,

 अंधविश्वास छोड़ें,

 विज्ञान और सदाचार को स्वीकार करें ।

तथा ईश्वर में सच्ची श्रद्धा रखते हुए 

कर्मपथ पर आगे बढ़ें।

Saturday, July 18, 2026

अंध भक्ति में भला नहीं।

 अंध भक्ति में भला नहीं।


अंध भक्ति प्रह्लाद में अपने पिता के प्रति नहीं।

अंध। भक्ति के कारण एकलव्य अंगूठा को बैठा।

कर्ण  अपने पुण्य को बैठा।

 हरिश्चंद्र अपने जीवन को बैठा।

 सीता  को संन्यासी वेशधारी रावण को भक्त समझकर लक्ष्मण रेखा पारकर रावण के अशोक वन  में रहना पड़ा।

 पिता के अंधभक्ति के कारण रावण के बेटा

प्राण को बैठा।

 अंध भक्ति तोड़कर 

 कार्तिकेय तमिलनाडु पलनी शहर में आकर 

‌तमिल भगवान बन गये।

 पिताजी को उपदेश देकर 

 स्वामि नाथ बन गये।

 अंध भक्ति प्रेम के कारण 

 भ्रष्टाचारी नेता  जीतता है।

 अभिनेता पर अंधविश्वास तमिलनाडु के शासक।

 यही अंध भक्ति अंधे प्रेम का परिणाम।


 



नदियों की पुकार

 

आज की चुनौती

नदी की पुकार





नदी की पुकार

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।
मैं हूँ नदी।
कहते हैं 
नदियों के तट,
सभ्यता का पलना।
नदी मैं न तो
 जीना दुश्वार।
 पशु पक्षी वनस्पति
 सब के जीवधार।
 खेद की बात  है 
 रेत का लूट करते हैं।
कारखानों के 
 विषैले पानी बहाते हैं,
बाँध बाँधकर रोकते हैं 
 मैरी चौड़ाई कम करते हैं,
 पवित्र गंगाजल को
 प्रदूषित करै
 गंगा के किनारे
 मिनरल वाटर बेचते हैं।
नदियों को बचानै
आंदोलन भी करते हैं।
 भारतीय नदियों को 
जोडकर राष्ट्रीय जल 
योजना का भी विचार करते हैं।
जन संख्या बढ़ने से
‌जंगलों का नाश,
झीलों  का नदारद 
 नगर विस्तार नगरीकरण
 कारखानों का विकास 
मेरे विकास में बाधक।
अब नदी की पुकार 
नदी बचाओ की क्रांतियाँ 
नदी की पुकार।
  जल प्रदूषण 
 सही नहीं,
उर्वर धरती के लिए खतरा।
नदियों को
 न बचाने पर
 भूतल में
 अकाल के कारण बनाएंगे।
 धरती सूख जाएगी।
अतः नदी बचाने की 
योजना को  प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हम भूलोक को
 हरे भरे रखेंगी।






एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मैं हूँ नदी।
कहते हैं,
नदियों के तट पर
सभ्यता का पालना पला है।

मेरे बिना
जीवन दुश्वार है।
पशु, पक्षी, वनस्पति
सभी का मैं जीवनाधार हूँ।

खेद की बात है कि
मेरी रेत लूटी जाती है।
कारखानों का विषैला जल
मुझमें बहाया जाता है।
बाँध बनाकर
मेरे स्वाभाविक प्रवाह को रोका जाता है,
मेरी चौड़ाई और अस्तित्व
धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं।

पवित्र गंगाजल को भी
प्रदूषित किया जाता है,
और गंगा के किनारे
मिनरल वाटर बेचा जाता है।
एक ओर
नदियों को बचाने के आंदोलन चलते हैं,
दूसरी ओर
भारतीय नदियों को जोड़ने की
राष्ट्रीय जल योजना पर विचार होता है।

बढ़ती जनसंख्या,
जंगलों का विनाश,
झीलों का लुप्त होना,
नगरों का विस्तार,
और कारखानों की बढ़ती संख्या—
ये सब मेरे अस्तित्व के लिए चुनौती हैं।

अब मेरी पुकार सुनो।
"नदी बचाओ" केवल नारा नहीं,
जीवन बचाने का संकल्प है।
जल प्रदूषण
धरती की उर्वरता के लिए
गंभीर खतरा है।

यदि नदियों को
समय रहते नहीं बचाया गया,
तो धरती पर
जल संकट और अकाल
मानवता के भविष्य को चुनौती देंगे।
धरती सूख जाएगी,
जीवन कठिन हो जाएगा।

अतः
नदियों के संरक्षण और संवर्धन की
योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हमारा यह भू-लोक
सदा हरा-भरा, समृद्ध
और जीवनदायी बना रहेगा।

— एस. अनंतकृष्णन

Friday, July 17, 2026

इच्छाओं का अंत

 



इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

18-7-26

+++++++++++++

 इच्छाओं का अंत कहाँ?

  राजपाट त्यागकर 

  सिद्धार्थ  इस आकांक्षा लेकर 

 जंगल में गये

 कि मानव जीवन

 को रोग, मृत्यु, बुढ़ापे से मुक्ति कर सकें।

 अंत में ज्ञान मिला 

 इच्छा ही दुखों का मूल।

 कबीर ने लिखा है

 चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।जिनको कछु न चाहिए, 

वे साहन के साह ॥

 उज्जैन के राजा

 भर्तृहरि संन्यासी बने।

 उनके लगाव एक कुतिया में लगा।

 कुतिया के बच्चे हुए।

 तब संत पट्टिनत्तार ने उनसे कहा ,"तुम बड़े कुटुंबी हो गये।

एक हिंदी कहानी है

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्यागा। संन्यासी बना,

 पर उनके एक बढ़िया घोड़ा था। उस पर का प्यार तज न सका।

  इच्छा रहित  जीवन

  जीना अंत तक असंभव।

 जीवन पर्यन्त 

 ईश्वर के ध्यान में 

 लगना भी

 ऊँची अभिलाषा पाने के लिए।

 ईश्वर में विलीन होने के लिए।

 इच्छाएँ ज्वार भाटे के समान।

 समुद्र की तरंगों के समान।

 हवा के समान।

 जब तक साँस,तब तक आस।




इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” 


इच्छाओं का अंत

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

18-7-2026

इच्छाओं का अंत कहाँ?

राजपाट त्यागकर

सिद्धार्थ वन को गए,

इस आकांक्षा के साथ

कि मानव जीवन को

रोग, बुढ़ापे और मृत्यु के दुःख से

मुक्ति का मार्ग मिले।

अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ—

इच्छा ही दुःखों का मूल है।

संत कबीर ने कहा है—

“चाह गई, चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥”

उज्जैन के राजा

भर्तृहरि संन्यासी बने,

पर उनका मोह

एक कुतिया से जुड़ा रहा।

जब उसके बच्चे हुए,

तब संत पट्टिनत्तार ने कहा—

“तुम तो बड़े कुटुंबी हो गए!”

एक हिंदी कहानी भी यही सिखाती है—

एक व्यक्ति ने सब कुछ त्याग दिया,

संन्यासी बन गया,

किन्तु अपने प्रिय घोड़े का मोह

न छोड़ सका।

पूर्णतः इच्छा-रहित जीवन

जीना अत्यंत कठिन है।

ईश्वर के ध्यान में निरंतर लीन रहना भी

एक उच्च अभिलाषा ही है—

परमात्मा में विलीन होने की अभिलाषा।

इच्छाएँ ज्वार-भाटे-सी उठती हैं,

समुद्र की तरंगों-सी उमड़ती हैं,

हवा की तरह निरंतर बहती रहती हैं।

सच ही कहा गया है—

“जब तक साँस, तब तक आस।” :::**




Thursday, July 16, 2026

भ्रम का जाल

 आज की चुनौती

भ्रमजाल (भ्रम का जाल)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
17-7-26

भ्रम में
नकली को असली समझकर
मनुष्य धोखा खा जाता है,
भयभीत हो जाता है।

रस्सी को साँप समझ लेना,
मृगमरीचिका को पानी मान लेना—
यही भ्रम का जाल है।

भ्रम से जन्म लेती हैं
गलतफ़हमियाँ,
गलत कदम,
गलत निर्णय और
गलत कार्यवाही।

झूठी खबरें,
अधूरी बातें और
अफ़वाहें
मानव जीवन को
दुविधा और संकट में डाल देती हैं।

रात्रि के अंधकार में
भूत की कल्पना करना,
नश्वर जगत को
अनश्वर समझ बैठना,
क्षणिक लाभ के लिए
गलत मार्ग अपनाना—
ये भी भ्रम के ही रूप हैं।

महाभारत में
"अश्वत्थामा हतः" सुनकर
आचार्य द्रोण
अपने पुत्र के मोह में पड़ गए।
"कुंजरः" शब्द धीमे स्वर में कहा गया,
और वे शस्त्र त्यागकर
निहत्थे हो गए।

दानवीर कर्ण ने
वेशधारी ब्राह्मण बने इन्द्र को
अपना कवच-कुण्डल दान दे दिया।

महाबली ने
वामन रूपधारी
भगवान विष्णु को न पहचानकर
तीन पग भूमि दान कर दी।

अज्ञातवास में
पाण्डवों ने
अपने नाम, रूप और कार्य बदलकर
जीवन बिताया।

दमयंती के स्वयंवर में
देवताओं ने
नल का रूप धारण कर
उसे भ्रमित करना चाहा।

मारीच का स्वर्ण-मृग रूप
और रावण का संन्यासी वेश
राम और सीता को
भ्रम के जाल में ले गया।

पौधों की समान आकृति वाली
पत्तियों को देखकर भी
मनुष्य कई बार
पहचानने में भूल कर बैठता है।

संक्षेप में—
भ्रम का जाल
मानव जीवन में
दुःख, संकट और संताप का
एक बड़ा कारण है।

इसलिए
सत्य, विवेक और धैर्य से ही
भ्रम का निवारण संभव है।

Wednesday, July 15, 2026

ज्ञान दर्पण

 ज्ञान दर्पण 

आज का ललकार : ज्ञान दर्पण


ज्ञान दर्पण

एस. अनन्तकृष्णनसौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारकस्वरचित भावाभिव्यक्ति16-07-2026


ज्ञान दर्पण


दर्पण हमारे बाहरी रूप को

ज्यों का त्यों दिखाता है—सुंदर या असुंदर।


पर ज्ञान का दर्पण

अज्ञात को ज्ञात कराता है,

भले-बुरे,सत्य-असत्य का विवेक कराता है।


वह खंड-अखंड का बोध देता है,

मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है

,ज्ञान-चक्षु प्रदान कर 

सभ्य, संस्कारित, आदर्श और संयमित जीवन

 जीना सिखाता है।


आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि,

नश्वर संसार में रहते हुए भी 

सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।


जो माया-मोह में फँसकर 

भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या और कामनाओं के

 वशीभूत हो जाते हैं,

वे यह भूल जाते हैं  कि कर्मों का फल 

एक दिन अवश्य मिलता है।

बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,

अपराधियों को बचाने वाले वकील,

काले धन का समर्थन करने वाले

भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—

यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,तो

 ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।

ज्ञान के दर्पण में सत्य, 

ईमानदारी,तटस्थता और परोपकार सर्वोपरि हैं।

माया ईश्वर की शक्ति  का अंश है।

उसका आकर्षण 

ज्ञानी मनुष्य को भी 

भ्रमित कर सकता है।


मन और बुद्धि की चंचलता

 कुकर्मों को जन्म देती है,

और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।

इसलिए अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग

 अपनाने हेतु ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।


समाज में जैसे मच्छर, मक्खियाँ और दीमक

 हानि पहुँचाते हैं,

वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं

सर्व ज्ञानी रावण भी 

नारी-मोह में पड़कर 

विवेक खो बैठा।


धर्म का त्याग कर,

भक्ति के नाम पर धन-संग्रह करने वाले 

पाखंडी मानव-एकता के बाधक हैं।


ज्ञान के दर्पण में भोग नहीं,

त्याग, बलिदान और विश्व-कल्याण का स्थान है।


महर्षि वाल्मीकि,गोस्वामी तुलसीदास और सम्राट अशोक ने। ज्ञान के प्रकाश से 

विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।


आदि शंकराचार्य जैसे आत्मज्ञानी महापुरुषों ने 

मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।


"सर्वे भवन्तु सुखिनः 

","वसुधैव कुटुम्बकम्"और "जय जगत" का संदेश

ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।


वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—सभी 

मानवता को सत्य, सदाचार और कल्याण का 

मार्गदर्शन दिखानेवाले। ज्ञान के दर्पण हैं।

एस. अनन्तकृष्णन, सौहार्द सम्मान प्राप्त चेन्नै तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

16-1-26.

++++++++++++

ज्ञान दर्पण

 दर्पण हमारे रूप को 

 ज्यों का त्यों 

 दिखाता है।

 सुंदर असुंदर 

  बाहरी रूप।

 ज्ञान दर्पण 

 अज्ञात ज्ञात

 भला बुरा

 सत्य असत्य 

 अनेक बातों को 

 सोचने समझने

 खंड अखंड बोध 

 जानने,

 मानव पशु में 

 मानवता देकर 

 ईश्वर सृष्टियों में 

 ज्ञान चक्षु प्राप्त 

  सभ्य जीवन,

 संस्कृत जीवन 

 आदर्श जीवन 

 संयमित जीवन 

 जीने के लिए 

 ज्ञान दर्पण 

‌केवल मनुष्य के लिए।

आत्मज्ञान प्राप्त दिव्य पुरुष ऋषि मुनि

 नश्वर जगत,

 अनश्वर धर्म में दृढ़ रहते हैं।

 लौकिक माया मोह 

 आस्थाई जानकर भी

 भ्रष्टाचारी रिश्वत खोरी

लोभी ईर्ष्यालु कामी पुरुष अलग जीवन 

वे नहीं जानते कि

कर्म फल के अनुसार 

दंड मिलता ही है।

 बड़े बड़े स्नातक स्नातकोत्तर बनकर 

 अपराधी को छुड़ानेवाले वकील,

 काले धन के समर्थक सी.ए,

 भ्रष्टाचार‌ करोडपति मंत्री, सांसद, विधायक 

 ज्ञानी होकर भी अज्ञानी।

 ज्ञान के दर्पण में 

 सत्य प्रधान।

 ईमानदारी प्रधान 

 तटस्थता प्रधान 

 परोपकार प्रधान।

मायादेवी ईश्वर का एक अंश,

अति आकार्षक

ज्ञानी मनुष्य को

अज्ञानी मूर्ख बना देता है।

बुद्धि में चंचलता 

 मन की चंचलता 

 अज्ञानी के कुकर्म

 अशांति असंतोष का मूल।

  अहिंसा परमो धर्म का विरोध।

 इन सब को तजने

 ज्ञान का दर्पण चाहिए।

समाज में मच्छर, मक्खियाँ दीमक

संख्या के समान

 आसुरी शक्तियाँ

 ज्ञान के दर्पण नहीं देखते।

सर्वज्ञानी रावण

 नारी आकर्षण से

 अज्ञानी बन गया।

धर्म  तजकर 

 आश्रम में चाँदी के सिंहासन में बैठकर 

 भक्ति के नाम 

 धन संग्रह करनेवाले 

पाखंडी मजहबी लोग

 मानव एकता के बाधक  ज्ञानी नहीं।

ज्ञान के दर्पण में 

 भोग का स्थान नहीं।

त्याग , बलिदान,

 विश्व जन कल्याण ही प्रधान।

 तुलसीदास , वाल्मीकि 

 ज्ञान के दर्पण के बाद 

 विश्ववंद्य  बने।

अत्याचारी अशोक

 ज्ञान के दर्पण के बाद 

 विश्व विख्यात आदर्श 

सम्राट बने।

 आत्मज्ञानी  जन्मजात होते हैं

 जैसे 

 आदि शंकराचार्य।

वेदों के रचयिता।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु 

वसुधैव कुटुंबकम् 

जय जगत के

 विश्वगुरु।

वेद उपनिषद कुरान बाइबिल ही ज्ञान के दर्पण।

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आज का ललकार : ज्ञान दर्पण

ज्ञान दर्पण
एस. अनन्तकृष्णन
सौहार्द सम्मान प्राप्त, चेन्नै (तमिलनाडु), हिंदी प्रेमी प्रचारक
स्वरचित भावाभिव्यक्ति
16-07-2026

ज्ञान दर्पण

दर्पण हमारे बाहरी रूप को
ज्यों का त्यों दिखाता है—
सुंदर या असुंदर।

पर ज्ञान का दर्पण
अज्ञात को ज्ञात करता है,
भले-बुरे,
सत्य-असत्य का विवेक कराता है।

वह खंड-अखंड का बोध देता है,
मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है,
ज्ञान-चक्षु प्रदान कर
सभ्य, संस्कारित, आदर्श
और संयमित जीवन जीना सिखाता है।

आत्मज्ञान प्राप्त ऋषि-मुनि
नश्वर संसार में रहते हुए भी
सनातन धर्म के सत्य पर दृढ़ रहते हैं।

जो माया-मोह में फँसकर
भ्रष्टाचार, रिश्वत, लोभ, ईर्ष्या
और कामनाओं के वशीभूत हो जाते हैं,
वे यह भूल जाते हैं कि
कर्मों का फल
एक दिन अवश्य मिलता है।

बड़े-बड़े स्नातक और स्नातकोत्तर,
अपराधियों को बचाने वाले वकील,
काले धन का समर्थन करने वाले,
भ्रष्ट मंत्री, सांसद और विधायक—
यदि सत्य और धर्म से विमुख हैं,
तो ज्ञानी होकर भी अज्ञानी हैं।

ज्ञान के दर्पण में
सत्य, ईमानदारी,
तटस्थता और परोपकार
सर्वोपरि हैं।

माया ईश्वर की शक्ति है।
उसका आकर्षण
ज्ञानी मनुष्य को भी
भ्रमित कर सकता है।

मन और बुद्धि की चंचलता
कुकर्मों को जन्म देती है,
और वही अशांति व असंतोष का मूल बनती है।
इसलिए
अहिंसा, सत्य और सदाचार का मार्ग अपनाने हेतु
ज्ञान का दर्पण आवश्यक है।

समाज में जैसे
मच्छर, मक्खियाँ और दीमक
हानि पहुँचाते हैं,
वैसे ही आसुरी प्रवृत्तियाँ
ज्ञान के दर्पण से दूर रहती हैं।

सर्वज्ञानी रावण भी
नारी-मोह में पड़कर
विवेक खो बैठा।

धर्म का त्याग कर,
भक्ति के नाम पर
धन-संग्रह करने वाले पाखंडी
मानव-एकता के बाधक हैं।

ज्ञान के दर्पण में
भोग नहीं,
त्याग, बलिदान
और विश्व-कल्याण का स्थान है।

महर्षि वाल्मीकि,
गोस्वामी तुलसीदास
और सम्राट अशोक ने
ज्ञान के प्रकाश से
विश्ववंदनीय स्थान प्राप्त किया।

आदि शंकराचार्य जैसे
आत्मज्ञानी महापुरुषों ने
मानवता को सत्य का मार्ग दिखाया।

"सर्वे भवन्तु सुखिनः",
"वसुधैव कुटुम्बकम्"
और "जय जगत" का संदेश
ज्ञान के दर्पण का ही संदेश है।

वेद, उपनिषद, कुरआन और बाइबिल—
सभी मानवता को
सत्य, सदाचार और कल्याण का मार्ग दिखाने वाले
ज्ञान के दर्पण हैं।




 


 

 

 


 

 

  



  












 


चिंता को चुनौती

 चिंता को चुनौती 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक 

14-7-26

मानव‌ का जन्म

सुख दुख के मिलन में।

चिंता  के चक्कर में मानव।

 भूख  मिटाने की चिंता,

 पहनावे ओढावे की चिंता 

 आवास की चिंता।

 आर्थिक चिंता,

नौकरी की चिंता,

 वेतन वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,

 योग्य पत्नी पति मिलने की चिंता 

  संतानोत्पत्ति की चिंता।

सुपुत्री सुपुत्र की चिंता।

  संतानों की शिक्षा,

 नौकरी, बहु-दामाद की चिंता।

 इन चिंताओं की

चुनौतियों का सामना करने की चिंता।

जीवन पर्यंत चुनौतियां।

 लोभ और ईर्ष्या की चिंता।

यों ही जीवन भर चिंता ही चिंता।

बचपन में चिंता ,

 जवानी में चिंता

 बूढापे में चुनौतियाँ।


आज की चुनौतीचिंता को चुनौती


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई (तमिलनाडु)14-7-2026


मानव का जीवनसुख-दुःख का संगम है।चिंता के चक्र मेंहर मानव निरंतर व्यस्त है।


भूख मिटाने की चिंता,तन ढकने के वस्त्रों की चिंता,अपने घर-आवास की चिंता,आर्थिक अभाव की चिंता।


नौकरी पाने की चिंता,वेतन-वृद्धि और पदोन्नति की चिंता,योग्य जीवनसाथी मिलने की चिंता,संतान-सुख की चिंता।


सुपुत्र-सुपुत्री के भविष्य की चिंता,उनकी शिक्षा और रोजगार की चिंता,बहू-दामाद के चयन की चिंता,परिवार के सुख-समृद्धि की चिंता।


इन सब चुनौतियों कासाहस से सामना करना हीजीवन की सबसे बड़ी चुनौती है।


लोभ और ईर्ष्याचिंताओं को और बढ़ाते हैं।यों ही बीत जाता हैमानव का पूरा जीवन।


बचपन में छोटी-छोटी चिंताएँ,जवानी में बड़ी जिम्मेदारियाँ,और बुढ़ापे में नई-नई चुनौतियाँ।


इसलिए चिंता नहीं,चिंतन और पुरुषार्थ अपनाइए।

साहस, धैर्य और विश्वास के साथ हर चुनौती पर 

विजय पाइए।