Search This Blog

Monday, March 19, 2018

आजादी के बाद हिंदी प्रचार


-0:07
9 Views
Anandakrishnan Sethuraman was live.
46 mins

खर्च, पर न कोई शुभ परिणाम.
कविता वाचन में अपने प्रिय मित्रों को
जितना समय देते हैं,
उच्च अधिकारियों के
खुशामद में कितना बोलते हैं,
उनको कितना पैसे देते हैं,
अहिंदी प्रांत के सच्चे हिंदी प्रचारक के
व्यवहारिक हिंदी प्रचार की बातें,
मैदानी समस्याओं, विरोध, इन सब के बीच,
हिंदी प्रचार के संकटकाल में,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की नींव
हिल रही थी, संख्या घट रही थी,
तब रात दिन एक करके,
हिंदी प्रचार में लगे प्रचारकों को
कोई प्रोत्साहन नहीं,
वृद्ध प्रचारकों को सम्मान,
आहा, उ़न प्रचारकों से 600 /- रुपये सम्मान लेकर,
डेढ रुपये के खर्च लेकर,
इस सम्मान देने जो मुख्य अतिथि अाते हैं,
उनको बहुमूल्य वस्त्र, यशोगान,
बिसनस क्लास वायुयान की खर्च,
मैं दिन रात करके हिंदी के असल प्रचार में,
मेरे रुपये, मेरे खरच,
मेरे प्रयत्न हिन्दी प्रचार की बातें सुनने कोई नहीं,
हर एक के भाषण में स्वार्थ की चरम सीमा ऐसे लूटने की संगोष्ठी को दूर से सलाम,
स्वार्थ मय हिंदी के नाम, जीने वाले हिंदी अधिकारी,
हिंदी प्रचार सभा के अहाते में
धन लूटने का अंग्रेजी माध्यम स्कूल,
इनके समर्थक की बुद्धि धिक्कार, मधुशाला के समर्थक, अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल के
समर्थक दोनों ही देश के
संक्रामक रोग फैलाने वाले कीट समान,
हाल ही में कडप्पा संगोष्ठी कितना स्वार्थ ,तमिलनाडु से आये तीन लोगों में कितना अपमान.
ऐसे स्वारथ के रहते
न होगा देशी भाषाओं की विकास.
स्वार्थ मय हिंदी अधिकारी, का चमचा गिरी छोड समाज की, देश की भलाई के ध्यान ही श्रेष्ठ.

Thursday, March 15, 2018

शरणागति

भगवान से प्रार्थना
सुना, देखा, भोगा,
अनु भव किया,
अनुभूति मिली,
तू है भक्तवत्सल,
तू है  शरणागतवत्सल,
लौकिक माया मोह,
तुझसे हमें दूर ही रखते हैं,
परिणाम हम भोगते हैं दुख.
लौकिकता  में  कांचन, कामिनी,
पद, अधिकार, अहंकार, लोभ, क्रोध,
मनुष्यता के कुचलना,
मद मस्त हाथी समान,
उठाकर बार बार फेंक देते.
तेरे शरण में आने नहीं देते.
ईश्वर! तू तो अति चतुर,
रोग,  बुढापा, मृत्यु अटल नियम,
सब दुर्भावना मिटाकर,
अंतिम समय प्रायश्चित्त रूप
तेरे चरण में लाने विवश कर देते.
मैं तो  किसी की चिंता न करता.
तेरे नाम लेता रहता,
अतः मेरी अपनी कोई चिंता नहीं
जानता हूँ मैं जग में,
सब हीं नचावत राम गोसाई.
ऊँ गणेशाय नमः ऊँ कार्तिकेयाय नमः ऊँ नमः शिवाय ओम दुर्गयैा नमः

Wednesday, March 14, 2018

दुखी क्यों

चमचा गिरी करके ,चापलूसी करके
दूसरों के पैरों पर खड़े होकर जीना
ऐसी एक कला है, सब से सीखना दुर्लभ.
दूसरों का अन्याय देखकर ,
आँखें मूंदकर बैठना एक दिव्य कला है
जैसे मंदिर की मूर्तियाँ .
सब न्याय-अन्याय के बीच न्याय का गला घोंटना
एक हृदयहीन मानवता का एक राक्षसी नमूना .
अनश्वर दुनिया में हर कोई दुखी क्यों ?
धर्म -अधर्म की लड़ाई में स्वार्थ वश अधर्म का समर्थन .
अधःपतन मानव जीवन ,भले ही भूपति हो या रईस .
ईश्वरीय नियमित क़ानून जवानी ,बुढापा ,मृत्यु निश्चित
.

मन

मनुष्य जीवन मन पर निर्भर.
मन चंचल लौकिक वासना के पवन ,
तब अस्थिर हो जाता ईश्वरीय भय भी .
अधर्म भी माया मोह में हो जाता ,
धर्म समान.
अलोकिक विचारों में मन स्थिर,
धर्म ही धर्म ,ज्ञान ही ज्ञान ,
ब्रह्मानंद ही ब्रह्मानंद.
माया मोह से दूर , ईश्वरीय बल ही
शाश्वत.
ॐ गणेशाय नमः
ॐ कार्तिकेयाय नमः
ॐ नमः शिवाय
ॐ दुर्गायै नमः

Tuesday, March 13, 2018

भाषा सहोदरी

मैं हूँ तमिलनाडु का हिन्दी प्रेमी ,
सहोदरी हिंदी खींच लाई ,
ऐसा बाँधा बंधन न छोड़ सकता ,
जोड़ ही सकता हैं ,
चोट खाकर किया हिन्दी का प्रचार.
वह सहोदरी के द्वारा सेवा का मेवा भी मिला,
न बाहर आया चेन्नई से ,पर मुख पुस्तिका द्वारा
मिले कई सहोदर -सहोदारियाँ .
अंतर जाल का माया जाल अति विस्तार ,
फँसाएगा तो छूटना मुश्किल.
खडी बोली की सारा शैली पसंद ,
समझ पाना आसान.
अवधी , व्रज , मैथिली से
आज विकसित हिंदी.
धन्य वह सहोदरी ,
जिसने है राखी बांधी.
उसके विकास में हम है सदा सन्नद्ध . स्वरचित -अनंत कृष्णन

साथी तैयार खड़ा है

सब दोस्तों को प्रणाम.
साथ देने कोई नहीं ,
सोचना सही नहीं.
साथ देने तैयार ,
सर्वेश्वर ,

जिसने हमें की है सृष्टि .
शरागति की ही देरी,
शरागात्वत्सल सन्नद्ध है
इत्र -तत्र-सर्वत्र.

आज के चिंतन .

   

 हाथ जोड़  प्रणाम कर ,
 हाथ  न छोड़ेगा परमेश्वर.
साथियाँ   होंगे अनेक.
नाते -खून के रिश्ते अनेक .
धनी मित्र ,धनी नाते-रिश्ते
ज़रा सी बात पर छूट   सकते  हैं , पर
परमेश्वर  हमारी सृष्टी की है ,
 छोड़ेंगे  कभी नहीं,
हर पल साथ रह   पालेंगे  हमें ,
हर क्षण   देंगे उचित ज्ञान .
काम देंगे ,दाम देंगे ,धाम देंगे ,
छोड़ेंगे नहीं  कभी.