मोबाइल में उलझा बचपन
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
15-10-2026
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मैं 77 वर्ष का जवान हूँ,
मन से आज भी युवा हूँ।
पर बचपन में मोबाइल की ऊर्जा कैसी होगी,
इसका निजी अनुभव कहाँ से लाऊँ?
पर देखता हूँ समाज को,
देखता हूँ बहू-बेटे, बेटी-दामाद को,
पोते-पोतियों के बचपन को,
और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव को।
एक परिवार में
एक मोबाइल की कीमत
एक लाख रुपये तक पहुँच जाती है,
पेड़-पौधों से भी कम महत्त्वपूर्ण
प्रकृति नहीं,
बल्कि मोबाइल ही
बच्चों की दुनिया बन जाती है।
शिशु रोता है तो
लोरी नहीं सुनाई जाती,
यूट्यूब पर लोरी सुनाकर
उसे चुप कराया जाता है।
बच्चे को खाना खिलाना हो तो
मोबाइल पर अंग्रेज़ी की राइम्स चलती हैं।
तीन वर्ष के बच्चे को भी
मातृभाषा के बालगीतों से
परिचित कराने का समय कहाँ है?
बच्चे को चुप बैठाना हो,
तो मोबाइल गेम का सहारा।
ज्ञान चाहिए तो मोबाइल,
पढ़ाई चाहिए तो मोबाइल,
हर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा!
माँ से पूछकर संदेह मिटाने की
सहज परंपरा कहाँ खो गई?
स्वाभाविक सोच और समझ के स्थान पर
चैटजीपीटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
का बढ़ता हुआ सहारा!
स्मरणशक्ति घटती जाती है,
अपनी बुद्धि पर भरोसा कम होता जाता है।
मित्र को फोन करना हो,
और मोबाइल की बैटरी समाप्त हो जाए,
तो मन में उलझन ही उलझन!
गृहकार्य लिखना हो,
गणित का प्रश्न हल करना हो,
निबंध तैयार करना हो,
तो तुरंत ए.आई. की याद आती है।
घर में कोई मेहमान आए,
तो स्वागत के शब्द कम पड़ जाते हैं।
बातचीत चलती रहती है,
पर आँखें मोबाइल पर टिकी रहती हैं।
सामने बैठा मनुष्य उपेक्षित,
मोबाइल ही सबसे निकट का साथी!
भोजन सामने रखा है,
पर मन भोजन में कहाँ?
आँखें मोबाइल पर,
हाथ भोजन उठाता है,
मुँह तक पहुँचाता है,
पर खाने में पड़ा बाल भी
नज़र नहीं आता!
मोबाइल की यह कैसी परेशानी?
बच्चा चाहता है अपना एकांत,
घर में कोई भी आए,
न स्वागत, न आत्मीय बातचीत,
सिर झुका हुआ,
आँखें मोबाइल पर!
आस-पड़ोस के बच्चों के साथ
खेलना-कूदना बंद,
मिलना-जुलना बंद।
मोबाइल का एक कोना ही
उसकी पूरी दुनिया बन जाता है।
न खान-पान की चिंता,
न मित्रों की चिंता,
न परिवार के साथ समय बिताने की इच्छा।
एक आभासी दुनिया में
बचपन धीरे-धीरे सिमटता जाता है।
ऐसे बचपन में
हँसी भी व्यक्तिगत,
बातचीत भी सीमित,
संबंध भी दूर-दूर,
और मनुष्य के बीच
मनुष्य ही अपरिचित!
मोबाइल स्वयं दोषी नहीं,
उसका अतिरेक चिंता का विषय है।
उचित उपयोग ज्ञान देता है,
पर असीमित उपयोग
बचपन की सहजता छीन सकता है।
बचपन को मोबाइल का बंदी नहीं,
मानवीय संबंधों का धनी बनाइए।
मातृभाषा के गीत सुनाइए,
प्रकृति से प्रेम कराइए,
मित्रों के साथ खेलने दीजिए,
बड़ों के अनुभव सुनने दीजिए।
मोबाइल में उलझा बचपन
केवल बच्चों की समस्या नहीं,
अभिभावकों के लिए भी
एक गंभीर उलझन है!
प्रश्न यही है—
बच्चों के हाथ में मोबाइल हो,
या मोबाइल के हाथ में
बच्चों का बचपन?
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