Search This Blog

Friday, October 16, 2026

मानवता

 [16/10, 6:12 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सब से बड़ा है धर्म है।

एस‌ . अनंत कृष्णन, चेन्नई।

17-10-26.

++++++++

मानव और पशु में 

 फर्क नहीं।

 मानवता के कारण 

 मानव श्रेष्ठ है।

औवैयार ने अपने ग्रंथ आत्तिच्चूडी में  लिखा है--

धर्म करना चाह।

 धर्म क्या है?

मजहब नहीं,

धर्म कर्म।

 अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से करना धर्म है।

भलमानसाहस धर्म है।

 निस्वार्थ समाज सेवा,

 दीन दुखियों की सेवा मानवता है।

 धन है धन से सेवा,

बुद्धि है तो बुद्धि से सेवा

 बल है तो बल से।

अन्नदान, भूदान,गो दान, स्वर्ण दान,रजत दान धर्म है।

देश को स्वच्छ रखना,

 नदी नालों को प्रदूषित न करना धर्म हो।

पेड़ लगाना धर्म है।

मानवता है तो

 भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

 विसर्जन के नाम से छिन्न-भिन्न करके अपमानित न करता।

 उन करोड़ों के रूपयों से ऐसी सेवा करता,

 जिससे सब लोग मातृ मजहब में फिर जुड़ जिते।

 मनसा वाचा कर्मणा 

 देश की रक्षा करना 

 अपने सिद्धांत पर दृढ़ रहना मानवता है।

 अच्छी चालचलन , अनुशासन, वचन निभाना मानवता धर्म है।

 वसुधैव कुटुंबकम्, 

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु का पालन करना धर्म है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

[16/10, 6:13 pm] sanantha.50@gmail.com: मानवता सबसे बड़ा धर्म है


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

दिनांक: 17-10-2026


++++++++


मानव और पशु में

प्राकृतिक अंतर भले ही कम हो,

पर मानवता के कारण

मानव श्रेष्ठ है।


महाकवयित्री औवैयार ने

अपने ग्रंथ ‘आत्तिचूड़ी’ में

कहा है—


“அறம் செய விரும்பு”

अर्थात् धर्म-कर्म करने की इच्छा रखो।


धर्म क्या है?


धर्म केवल मजहब नहीं,

धर्म है सत्कर्म।

अपने कर्तव्य को

ईमानदारी से निभाना धर्म है।


भलमनसाहत, साहस और सदाचार

धर्म के ही रूप हैं।

निस्वार्थ समाज-सेवा

और दीन-दुखियों की सेवा

सच्ची मानवता है।


धन है, तो धन से सेवा करो।

बुद्धि है, तो बुद्धि से सेवा करो।

बल है, तो बल से सेवा करो।

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

दूसरों के काम आना

मानवता का सच्चा परिचय है।


अन्नदान, भूदान, गोदान,

स्वर्णदान और रजतदान—

ये सभी दान के विभिन्न रूप हैं।

परंतु दान का वास्तविक महत्त्व

उसकी भावना और

उससे होने वाले जनकल्याण में है।


देश को स्वच्छ रखना,

नदियों और नालों को

प्रदूषित होने से बचाना,

वृक्ष लगाना और प्रकृति की रक्षा करना

भी हमारा धर्म है।


यदि हमारे हृदय में मानवता है,

तो भगवान की सुंदर मूर्तियाँ बनाकर

विसर्जन के नाम पर

उन्हें खंडित करके

प्रकृति को प्रदूषित क्यों करें?


उस धन का उपयोग

जनकल्याण के कार्यों में हो,

जिससे निर्धनों, असहायों और

दीन-दुखियों के जीवन में

सुख और आशा का संचार हो।


मनसा, वाचा, कर्मणा—

मन, वचन और कर्म से

देश की रक्षा करना,

अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहना,

अच्छा आचरण करना,

अनुशासन का पालन करना

और अपने वचन को निभाना

मानवता के सच्चे लक्षण हैं।


“वसुधैव कुटुम्बकम्”—

अर्थात् संपूर्ण पृथ्वी

एक परिवार है।


“सर्वे जना सुखिनो भवन्तु”—

अर्थात् सभी जन सुखी हों।


इन महान आदर्शों का पालन करना

ही सच्चा धर्म है।


मजहब अनेक हो सकते हैं,

पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं,

परंतु मानवता का संदेश

सबको जोड़ता है।


मानव-सेवा ही माधव-सेवा है।

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।

No comments:

Post a Comment