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Thursday, October 15, 2026

सत्य की मशाल

 [15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल।

एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

16-10-26.

 अंधकार मिटाने मशाल।

 जीवन में 

 प्रकाश लाने

 सत्य की मशाल।।

 सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा।

 उसकी बात एक ही रहेगी।

 बदल बदलकर बातें न होगी।

वही सत्य की मशाल।

 सत्य की मशाल अलौकिक प्रकाश।

 आत्मज्ञान जगाती हैं।

 सत्य की मशाल सर्वेश्वर के दर्शन कराती।

 बेचैनी अंधकार मिटा देती।

 सत्यार्थ प्रकाश  

मानव पाता  दिव्य शक्ति।

[15/10, 9:09 pm] sanantha.50@gmail.com: सत्य की मशाल


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

16-10-2026


अंधकार मिटाने वाली मशाल,

जीवन में प्रकाश लाने वाली मशाल,

सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा—

यही है सत्य की मशाल!


सत्यवान सदा प्रकाश में रहेगा,

उसका कथन एक ही रहेगा।

बदल-बदलकर बातें न होंगी,

सत्य की राहें कभी न बदलेंगी।


यही है सत्य की मशाल,

यही है सत्य की मशाल!


सत्य की मशाल का अलौकिक प्रकाश,

जगाता है आत्मज्ञान का विश्वास।

अंतरात्मा को निर्मल बनाती,

परमेश्वर के दर्शन कराती।


मन की बेचैनी, भ्रम और अंधकार मिटाती,

जीवन में शांति की ज्योति जलाती।

सत्यार्थ के प्रकाश को जब मानव अपनाता है,

उसके अंतर्मन में दिव्य ज्ञान जगमगाता है।


सत्य की मशाल जलती रहे,

मानवता का पथ प्रकाशित करती रहे!

Wednesday, October 14, 2026

परमाचार्य वाणी

 परमाचार्य वाणी

परमाचार्य की दिव्यवाणी — भाग 1


मंगलारंभ : विनायक और तत्त्वमय विनायक


सादर समर्पण — महापेरियवा के श्रीचरणों में


कांचीपुरम मठ के परमाचार्य की दिव्यवाणी को सरल हिंदी में YouTube के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने के विनम्र प्रयास में, उनके कमल-सदृश श्रीचरणों में सादर प्रणाम करके इस कार्य का श्रीगणेश कर रहा हूँ।


मेरी अर्धांगिनी अपने अंतिम समय तक यही विश्वास व्यक्त करती रही कि महापेरियवा उसकी रक्षा करेंगे। अंततः वह उन्हीं का नाम स्मरण करते हुए इस संसार से विदा हो गई।


यह YouTube प्रस्तुति मेरी अर्धांगिनी की पावन स्मृति में तथा महापेरियवा के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित है।


मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कांची कामकोटि पीठ इस प्रयास को अपना आशीर्वाद प्रदान करे और इसकी प्रस्तुति के लिए आवश्यक अनुमति प्रदान करने की कृपा करे।


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विषय-प्रवेश


इस श्रृंखला में परमाचार्य की दिव्यवाणी के माध्यम से निम्नलिखित विषयों को सरल हिंदी में प्रस्तुत करने का प्रयास रहेगा।


1. मंगलारंभ

   - विनायक

   - तत्त्वमय विनायक

2. अद्वैत

3. धर्म और मत

4. वैदिक धर्म

5. सामान्य धर्म

6. सामाजिक विषय

7. संस्कृति

8. कर्ममार्ग

9. भक्तिमार्ग

10. देवता, मूर्तियाँ और अवतार-पुरुष

11. मंगलारती


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1. तमिलनाडु की विशेषता — सर्वत्र विराजमान पिळ्ळैयार


तमिलनाडु की एक विशेषता है कि यहाँ पग-पग पर भगवान विनायक के दर्शन होते हैं। तमिल भाषा में उन्हें स्नेह और आदर से ‘पिळ्ळैयार’ कहा जाता है।


विनायक के मंदिरों के लिए विशाल गोपुरम और भव्य भवन ही आवश्यक नहीं हैं। कहीं वे पीपल के वृक्ष के नीचे खुले आकाश में विराजमान हैं, कहीं गली के मोड़ पर, तो कहीं नदी के किनारे।


इस प्रकार पिळ्ळैयार जनसामान्य के जीवन के साथ सहज रूप से जुड़े हुए हैं। वे अपने भक्तों पर अनुग्रह करने वाले विघ्नेश्वर हैं।


तमिल भाषा में ‘पिळ्ळै’ का अर्थ बालक या पुत्र होता है। उसके साथ आदरसूचक ‘आर’ जोड़कर ‘पिळ्ळैयार’ कहना तमिलनाडु की विशिष्ट भाषायी और सांस्कृतिक परंपरा है।


पार्वती और परमेश्वर के ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण भी उन्हें विशेष आदर प्राप्त है। तमिल परंपरा में उनके नाम के भीतर ही पुत्र के प्रति स्नेह और सम्मान की भावना व्यक्त होती है।


‘कुमारन’ शब्द का प्रयोग भी तमिल में बालक अथवा युवक के अर्थ में होता है। किंतु धार्मिक परंपरा में ‘कुमारन’ या ‘कुमारस्वामी’ कहने पर प्रायः भगवान सुब्रह्मण्य अर्थात् कार्तिकेय का स्मरण होता है। तमिल में उन्हें ‘कुमरक्कडवुळ’ भी कहा जाता है।


इस प्रकार तमिल संस्कृति में दोनों दिव्य पुत्रों के नामों और संबोधनों की अपनी विशिष्ट परंपरा है।


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2. बालस्वरूप में आदि-देव — तत्त्वमय विनायक


विनायक बालस्वरूप में दिखाई देते हैं। फिर भी वे आदि-तत्त्व के प्रतीक माने जाते हैं।


प्रणव अर्थात् ‘ॐ’ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में परम तत्त्व का प्रतीक है। सृष्टि के मूल में स्थित इसी प्रणव-तत्त्व से विनायक का संबंध माना गया है।


उनका गजमुख और उनकी वक्र सूँड भक्तों को प्रणव के स्वरूप का स्मरण कराते हैं। इस प्रकार बालस्वरूप में विराजमान विनायक अपने भीतर गहन आध्यात्मिक तत्त्व को समेटे हुए हैं।


वे विघ्नों को दूर करने वाले और शुभ कार्यों के आरंभ में सर्वप्रथम पूजे जाने वाले देवता हैं। भक्तों को अनुग्रह प्रदान करने में भी उनका स्थान विशेष है।


इसका सुंदर उदाहरण तमिल भक्ति-साहित्य की महान कवयित्री औवैयार के जीवन से संबंधित परंपरागत कथा है।


3. औवैयार और विनायक की असीम कृपा


औवैयार भगवान गणपति की महान उपासिका थीं। उन्होंने विनायक के प्रणवस्वरूप का ध्यान करते हुए ‘विनायकर अकवल्’ नामक प्रसिद्ध भक्तिपरक रचना की। इस रचना में योग, आध्यात्मिक साधना और ज्ञान से संबंधित अनेक गहन भाव सरल काव्यात्मक शैली में व्यक्त हुए हैं।


तमिल भक्ति-परंपरा में इस रचना को विशेष श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।


औवैयार के संबंध में एक प्रसिद्ध कथा भी प्रचलित है।


सुंदरमूर्ति नायनार, जिन्हें आरूरर भी कहा जाता है, और चेरमान पेरुमाल नायनार कैलास की ओर प्रस्थान करने वाले थे। दोनों औवैयार को भी अपने साथ ले जाना चाहते थे।


उस समय औवैयार भगवान विनायक की पूजा में लीन थीं। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे शीघ्र पूजा समाप्त करके उनके साथ चलें।


औवैयार ने उत्तर दिया:


“आपको कैलास जाना है तो जाइए। आपके लिए मैं अपनी पूजा में शीघ्रता नहीं करूँगी। मेरे लिए विनायक की पूजा ही कैलास के समान है।”


वे अपनी पूजा में पूरी तरह तल्लीन रहीं।


कथा के अनुसार, पूजा पूर्ण होने पर भगवान विनायक ने उन्हें अपनी सूँड से उठाया और क्षणभर में कैलास पहुँचा दिया। इस प्रकार औवैयार उन दोनों भक्तों के पहुँचने से पहले ही कैलास पहुँच गईं।


यह कथा भगवान विनायक की कृपा, भक्त की अनन्य निष्ठा और सच्ची उपासना की महिमा को दर्शाती है।


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4. सुंदरमूर्ति नायनार और चेरमान पेरुमाल


तमिल शैव भक्ति-साहित्य में सुंदरमूर्ति नायनार और चेरमान पेरुमाल नायनार की मैत्री का विशेष स्थान है।


आपके द्वारा उद्धृत तमिल पद्य में चेरमान पेरुमाल की कैलास-यात्रा और उनकी काव्य-प्रतिभा का स्मरण किया गया है।


सरल हिंदी भावानुवाद


आरूरर अर्थात् सुंदरमूर्ति नायनार के प्रिय मित्र बनकर,


पूर्वकाल से ही उनसे मैत्री का संबंध निभाते हुए,


तीव्र वेग से दौड़ते अश्व पर सवार होकर,


महान कैलास पर्वत पर पहुँचकर,


‘आदि-अंत उला’ नामक काव्य की तत्काल रचना करके उसका गान करने वाले चेर राजा की महिमा अद्भुत है।


भावार्थ


ये पंक्तियाँ चेरमान पेरुमाल नायनार की ओर संकेत करती हैं। वे सुंदरमूर्ति नायनार के परम मित्र माने जाते हैं। शैव भक्ति-परंपरा में उनकी कैलास-यात्रा और ‘तिरुक्कैलाय ज्ञान उला’ नामक रचना का विशेष उल्लेख मिलता है।


आपके उद्धृत प्रसंग में भगवान विनायक की कृपा से औवैयार का कैलास पहुँचना और सुंदरमूर्ति नायनार तथा चेरमान पेरुमाल की कैलास-यात्रा—इन दोनों घटनाओं का सुंदर संबंध दिखाई देता है।


इस प्रकार भगवान विनायक और भगवान कार्तिकेय, दोनों दिव्य भाइयों की कथाएँ इस प्रसंग में एक साथ स्मरण की जाती हैं।


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5. विनायक की सहज कृपा


भगवान विनायक को विघ्नेश्वर कहा जाता है। वे भक्तों के विघ्न दूर करने वाले और शुभ कार्यों के आराध्य देवता हैं।


तमिलनाडु के पलनी में भगवान कार्तिकेय की विशेष महिमा है। इस प्रसंग में ज्येष्ठ पुत्र विनायक और कनिष्ठ पुत्र कार्तिकेय—दोनों का स्मरण होता है।


बालस्वरूप में विराजमान विनायक को आदि-तत्त्व का प्रतीक मानकर उनकी उपासना की जाती है। भक्तिभाव से की गई उनकी आराधना हमें यह संदेश देती है कि ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए बाहरी आडंबर से अधिक महत्त्व सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का है।


श्री गणेशाय नमः।


महापेरियवा के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।


— एस. अनंतकृष्णन

चेन्नई, तमिलनाडु


मोबाइल

 

मोबाइल में उलझा बचपन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई
15-10-2026

+++++++++

मैं 77 वर्ष का जवान हूँ,
मन से आज भी युवा हूँ।
पर बचपन में मोबाइल की ऊर्जा कैसी होगी,
इसका निजी अनुभव कहाँ से लाऊँ?

पर देखता हूँ समाज को,
देखता हूँ बहू-बेटे, बेटी-दामाद को,
पोते-पोतियों के बचपन को,
और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव को।

एक परिवार में
एक मोबाइल की कीमत
एक लाख रुपये तक पहुँच जाती है,
पेड़-पौधों से भी कम महत्त्वपूर्ण
प्रकृति नहीं,
बल्कि मोबाइल ही
बच्चों की दुनिया बन जाती है।

शिशु रोता है तो
लोरी नहीं सुनाई जाती,
यूट्यूब पर लोरी सुनाकर
उसे चुप कराया जाता है।

बच्चे को खाना खिलाना हो तो
मोबाइल पर अंग्रेज़ी की राइम्स चलती हैं।
तीन वर्ष के बच्चे को भी
मातृभाषा के बालगीतों से
परिचित कराने का समय कहाँ है?

बच्चे को चुप बैठाना हो,
तो मोबाइल गेम का सहारा।
ज्ञान चाहिए तो मोबाइल,
पढ़ाई चाहिए तो मोबाइल,
हर प्रश्न का उत्तर पाने के लिए
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा!

माँ से पूछकर संदेह मिटाने की
सहज परंपरा कहाँ खो गई?
स्वाभाविक सोच और समझ के स्थान पर
चैटजीपीटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता
का बढ़ता हुआ सहारा!

स्मरणशक्ति घटती जाती है,
अपनी बुद्धि पर भरोसा कम होता जाता है।

मित्र को फोन करना हो,
और मोबाइल की बैटरी समाप्त हो जाए,
तो मन में उलझन ही उलझन!

गृहकार्य लिखना हो,
गणित का प्रश्न हल करना हो,
निबंध तैयार करना हो,
तो तुरंत ए.आई. की याद आती है।

घर में कोई मेहमान आए,
तो स्वागत के शब्द कम पड़ जाते हैं।
बातचीत चलती रहती है,
पर आँखें मोबाइल पर टिकी रहती हैं।
सामने बैठा मनुष्य उपेक्षित,
मोबाइल ही सबसे निकट का साथी!

भोजन सामने रखा है,
पर मन भोजन में कहाँ?
आँखें मोबाइल पर,
हाथ भोजन उठाता है,
मुँह तक पहुँचाता है,
पर खाने में पड़ा बाल भी
नज़र नहीं आता!

मोबाइल की यह कैसी परेशानी?
बच्चा चाहता है अपना एकांत,
घर में कोई भी आए,
न स्वागत, न आत्मीय बातचीत,
सिर झुका हुआ,
आँखें मोबाइल पर!

आस-पड़ोस के बच्चों के साथ
खेलना-कूदना बंद,
मिलना-जुलना बंद।
मोबाइल का एक कोना ही
उसकी पूरी दुनिया बन जाता है।

न खान-पान की चिंता,
न मित्रों की चिंता,
न परिवार के साथ समय बिताने की इच्छा।
एक आभासी दुनिया में
बचपन धीरे-धीरे सिमटता जाता है।

ऐसे बचपन में
हँसी भी व्यक्तिगत,
बातचीत भी सीमित,
संबंध भी दूर-दूर,
और मनुष्य के बीच
मनुष्य ही अपरिचित!

मोबाइल स्वयं दोषी नहीं,
उसका अतिरेक चिंता का विषय है।
उचित उपयोग ज्ञान देता है,
पर असीमित उपयोग
बचपन की सहजता छीन सकता है।

बचपन को मोबाइल का बंदी नहीं,
मानवीय संबंधों का धनी बनाइए।
मातृभाषा के गीत सुनाइए,
प्रकृति से प्रेम कराइए,
मित्रों के साथ खेलने दीजिए,
बड़ों के अनुभव सुनने दीजिए।

मोबाइल में उलझा बचपन
केवल बच्चों की समस्या नहीं,
अभिभावकों के लिए भी
एक गंभीर उलझन है!

प्रश्न यही है—
बच्चों के हाथ में मोबाइल हो,
या मोबाइल के हाथ में
बच्चों का बचपन?

Monday, October 12, 2026

 ॐ हरिनारायण हरिनारायण  ॐ 


आज मेरे मन में उठे विचार। 

*********************

स्वचिंतक - स्वरचयिता --यस। अनंतकृष्णन 

++++++++++++++++++++++++++

जग देखा ,कोई जागता नहीं ;

जग देखा ,कोई जगाता नहीं। 

जगाने के प्रयत्न  में लगे लोग ,

जग की दृष्टि  में हैं पागल। 


राम राज्य  की स्थापना ,

राग अलापते लोग। 

राम राज्य में थे राक्षस। 

राम राज्य में थे स्त्री मोही ;


राम राज्य में थे कामांधकारिणी। 

राम राज्य में थे ऐसे धोबी ,

सीता का हँसी  उड़ाया;

राम के गुण  पर कलंक लगाया।

अग्निप्रवेश सीता पर आरोप।

जग को आदर्श दिखाने 

भेज दिया वन वास ;

अश्वमेध यज्ञ  अपने अधिकार जमाने 

अड़ोस -पड़ोस के राजाओं को 

डराने -धमकाने।

अपने ही पुत्रों के साथ लड़ाई। 

_---------------

राम राज्य में भी गुह ,शबरी जैसे 

निम्न जाति  के लोग;

उनको गले लगाने ,

जूठा खाने  में दिखाई  अपनी महानता।

नतीजा रामायण काल के 

मनुष्य -मनुष्य के 

भेद मिटा नहीं ,

और बढ रहा है आज भी। 


आरक्षण की  माँग  जाट कर रहे हैं ,

कई लोग अपने को निम्न जातियों की सूची में 

जुड़ने ,जुड़ाने तैयार।गौरवान्वित ;


छात्र वृत्ति ,उद्योग ,पद ,स्कूल ,कालेज की भर्ती 

अपने को हरिजन प्रमाण पत्र ,

एन केन प्रकारने  लेने तैयार। 

और कोई हरिजन कहने पर 

कारावास बिना पूछ-ताछ के। 

खुद अपने को अनुसूचित कहकर 

प्रमाणित करने में मानते सम्मान।

********** 

जग देखा ,कोई जागता नहीं ,

जग देखा, कोई जगाता नहीं ;

********************

शासक का धन ज़माना,

अंतःपुर में दासियाँ ज़माना 

कायरों को लूटकर धन जोड़ना 

इसीको आदी  काल से कहते हैं वीरता;


राजा के सुख देख खुश रहना 

राजा को देव तुल्य मानना ,

गुलाम -बेगार रहना ,

आज कल लोकतंत्र के नाम से भी चल रहा है ,

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं। 

-------

मजदूर  तो कई,

 समाज कल्याण के लिए ;

पर धनी वही मज़दूर 

राम के युग से  आज तक;

आत्म-ह्त्या की सेना;

कहीं जीने की सेना नहीं।

हत्या करने की कूली  सेना;

उनको तो राजनैतिक समर्थन।

कितने निर्दयी लक्ष्मी के 

गुलाम बन 

धन जोड़ रहे हैं ;

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं ;

**********

भ्रष्टाचारियों का आदर -सम्मान। 

सद्यः फल के लिए धन का गुलाम।

धन दो ,दान दो , धन जोड़ो ,

मनमाना करो.

कितने भ्रष्टाचारियों के नाम प्रकट।

पूछ-ताछ के आयोग दिखावा। 

इन आयोगों के खर्च ,

भ्रष्टाचारियों के लूटने से ज़्यादा। 

पर परिणाम आज तक न मिला दंड.

लोग तो  भुलक्कड़। फिर वही कुर्सी पर। 

नशीली चीजों की आमदनी से चलती सरकार।

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं।


सच बोलने का साहस नहीं,क्यों?

उसके लिए एक कहानी की रचना की ;

सत्य हरिश्चंद्र ; उसीके आदर्श में  पले 

मोहनदास ने इंदिरा फरोज़  खान को 

इंदिरा गाँधी बनाकर पति के नाम जुड़ने के 

भारतीय परम्पराको तोड़  डाला।

सोचो ,राजा का श्मशान की पहरेदारी करना 

क्या किसी में सत्य बोलने का साहस।

नबी को पत्थर मारा,ईसा को शूली पर चढ़ाया। 

क्या किसी में क्रांति का साहस।

****

भगवान का नाम लो ,प्रायश्चित के नाम लूटो।

पापि यों को बचने दो ,यदि वह आमिर हो तो.

गरीब हो तो प्रायश्चित्त करने पैसे नहीं ,दंड भोगो।


कोई समझता नहीं ,कोई समझाता नहीं ,

कोई जगता नहीं ,कोई जगाता नहीं। 

********

फिर भी इन सब को जगाने कहीं न कहीं ,

कोई जिसे लोग पागल ,नालायक ,

बेचारा भला आदमी कह कर हँसी  उड़ा  रहे हैं 

वही एक ऐसी छोटी -सी चिनगारी  छोड़ रहा हैं ,

वह भी चिंगारी शनैः  शनैः हर एक के 

जीवन में जलकर कफन के रूप धारण कर रही हैं। 

कोई समझता नहीं ,समझाता नहीं ,

जागता नहीं ,जगाता नहीं। 


नश्वर जगत में मनमाना 

रंग मंच के खेल 

चल रहा है;

कोई जागता नहीं ,कोई जगाता नहीं ;

कोई समझता नहीं ,समझाता नहीं ;

अनश्वर नाटक धरती के मंच पर खेला जा रहा है.

Sunday, October 11, 2026

जागृति

  जागृति

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

12-10-26.

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भारत के लोगों में 

चाहिए जागृति।

राष्ट्रीय एकता योजना में केंद्र सरकार के साथ 

 प्रांतीय सरकार चलना

 जागरण है।

  प्रांतीय मोह ,

 प्रांतीय भाषा

 प्रांतीय प्रगति में 

 केंद्र सरकार का ध्यान और सहयोग जागृति है।

जवानों में छात्रों में 

 स्वतंत्रता संग्राम के 

शहीदों की जीवनी

 तन मन धन के त्याग 

जगाना ,

 उनकी जीवनी   के अनुकरण करना जागृति है।

 होनहार बिरवान के होत   चीखने पात  

बचपन से ही पालन करना,

 अनुशासन से रहना

 अच्छी चाल चलन सीखना जागृति है।

माता-पिता गुरु देव 

 को सदा निभाना जागृति है।

वीर जवान प्रत्यक्ष देव

देश के  रक्षक,

किसान जनता की भूख मिटाने का आधार।

उनके प्रति श्रद्धा रखना

 जागृति है।। 

पल  पल देश के कल्याण में  लगना।

जागृति है।

 ज्ञान पिपासा सदा रखना जागृति है।

सर्वैश्वर ही जगत की सृष्टि का आधार।

जान समझकर 

 सदा सर्वकाल  

 जपना, मन को आत्मा में विलीन कर लेना

 आत्मज्ञान पाने की जागृति है।




 
















वो

 जागृति


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

12-10-2026


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भारत के जन-जन में

जागृति का भाव जगाना है।

राष्ट्रीय एकता के संकल्प को

जीवन में अपनाना है।


केंद्र और प्रांतीय सरकारें

मिलकर जब आगे बढ़ती हैं,

राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखकर

जनकल्याण की राह चुनती हैं,

तभी सच्ची जागृति आती है।


प्रांतीय अस्मिता का सम्मान,

प्रांतीय भाषाओं का उत्थान,

प्रांतीय प्रगति के लिए

केंद्र का सहयोग और ध्यान—

यही राष्ट्रीय जागृति की पहचान।


जवानों और विद्यार्थियों में

स्वतंत्रता-संग्राम के शहीदों की

गौरवगाथा जगाना,

उनके त्याग, तपस्या और बलिदान को

हृदय में स्थान दिलाना,

उनके आदर्शों का अनुकरण करना—

यही सच्ची जागृति है।


“होनहार बिरवान के होत चीकने पात।”


बचपन से ही संस्कार देना,

अनुशासन का पाठ पढ़ाना,

सदाचार और सद्व्यवहार से

जीवन-पथ को सुंदर बनाना—

यही जागृति का संदेश है।


माता-पिता, गुरु और देव—

इन सबके प्रति श्रद्धाभाव रखना,

उनके आदर्शों को जीवन में उतारना,

अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना—

यही जागृति है।


वीर जवान प्रत्यक्ष देवतुल्य,

देश की सीमाओं के रक्षक हैं।

किसान अन्नदाता बनकर

जन-जन की भूख मिटाते हैं।

उनके परिश्रम और त्याग के प्रति

श्रद्धा-सम्मान प्रकट करना—

यही सच्ची जागृति है।


पल-पल देश के कल्याण में

अपना योगदान देना,

राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर

कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ना—

यही जागृति है।


ज्ञान की पिपासा सदा बनाए रखना,

निरंतर सीखते और समझते रहना,

अज्ञान के अंधकार को मिटाकर

ज्ञान का प्रकाश फैलाना—

यही जागृति है।


सर्वेश्वर ही इस जगत की

सृष्टि के मूल आधार हैं।

इस सत्य को हृदय से समझकर

ईश्वर का निरंतर स्मरण करना,

मन को अंतर्मुखी बनाकर

आत्मा में एकाग्र होना,

आत्मज्ञान की अनुभूति पाना—

यही आध्यात्मिक जागृति है।


राष्ट्रीय चेतना से आत्मचेतना तक,

कर्तव्य-बोध से ईश्वर-बोध तक—

मानव जीवन की संपूर्ण यात्रा

जागृति से ही सार्थक होती है।


जागो, जगाओ, जागृति फैलाओ!

राष्ट्र को सशक्त बनाओ,

मानवता को समृद्ध बनाओ,

आत्मज्ञान से जीवन को आलोकित बनाओ।

Saturday, October 10, 2026

अंधविश्वास

 [10/10, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अंधविश्वास 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई 

11-10-26.

+++++++++

 अंधविश्वास 

विश्व भर में है,

 भिन्न भिन्न सिद्धांत।

 तमिल में ईश्वर भक्ति को ही प्रधानता देकर 

 अंधविश्वास पर विश्वास न करने की एक कविता है।

 हम कहते हैं,

 राहुकाल में,

यम खंड में 

 ग्रहण के समय,

 वर्षा के होते

 कहीं बाहर न जाना है,

 कोई काम न करना है,

यह तो सही नहीं है,

तमिऴ के भक्त कवि

 अरुण गिरिनाथर ने 

 अपने ईश्वर को सर्वश्रेष्ठ मानकर  

बताया है कि 

 दिन क्या करेगा?

ग्रह क्या करेगा?

 यम क्या करेगा।

जब मेरे भगवान 

 कार्तिक प्रत्यक्ष दर्शन देने पर?

 अर्थात सर्वेश्वर पर 

विश्वास करके अपने कर्तव्य करना चाहिए।

 कबीर ने कहा है 

शकुन अपशकुन की बात क्या कहना है।

कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।

मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय॥

कौए की बोली से शकुन देखना

अपशकुन देखना

 कोयल की तरह मीठी-मीठी बोली से जग वश में ।

 काम करना है, 

सोना नहीं।

 छिपकली के आवाज़ 

 ये सब वैज्ञानिक आधार नहीं।

कबीर सोता क्या करे, उठि न भजे भगवान।

जामे रावण मारिया, सोई बलवंत सुजान॥

हमें कर्मरत रहना है।

 अज्ञान के कारण 

 भगवान पर के अंधविश्वास के कारण 

 मानव अंधविश्वास पर विश्वास करता है।

 यह ठीक नहीं है,

शुभस्य शीघ्रम्  

अतः  हमें प्रयत्न और कर्तव्य पर मन लगाना है।

[10/10, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अंधविश्वास


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

दिनांक: 11-10-2026


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अंधविश्वास विश्वभर में प्रचलित है,

इसके रूप अनेक, सिद्धांत अनेक।

परंतु विवेक का संदेश यही है—

श्रद्धा हो, पर तर्क का भी साथ रहे।


तमिल भक्ति साहित्य में भी

ऐसी सशक्त वाणी मिलती है,

जो ईश्वर की महिमा का गुणगान करते हुए

अंधविश्वास से मुक्त रहने की प्रेरणा देती है।


हम कहते हैं—

राहुकाल में कोई काम न करो,

यमगण्ड के समय बाहर न निकलो,

ग्रहण के समय सावधान रहो,

वर्षा हो तो घर से बाहर न जाओ!


क्या हर परिस्थिति में

ऐसी मान्यताओं का पालन आवश्यक है?

क्या समय, ग्रह और शकुन

हमारे कर्मों से भी अधिक शक्तिशाली हैं?


तमिल के भक्त कवि अरुणगिरिनाथर की

ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा हमें प्रेरित करती है।

जब भगवान मुरुगन की कृपा का विश्वास हो,

तब मन में भय क्यों हो?


दिन क्या कर सकता है?

ग्रह क्या कर सकता है?

यम क्या कर सकता है?

जब मेरे आराध्य भगवान मुरुगन

मेरी रक्षा के लिए विद्यमान हैं!


इसका भाव यही है—

सर्वेश्वर पर श्रद्धा रखकर

अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।


संत कबीर की वाणी भी

हमें बाहरी संकेतों से अधिक

अपने आचरण का महत्त्व समझाती है।


कागा काको धन हरे, कोयल काको देय।

मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय॥


अर्थात कौआ किसी का धन नहीं हरता,

न ही कोयल किसी को धन देती है।

कोयल अपनी मधुर वाणी से

सबका मन मोह लेती है।


इसलिए कौए की आवाज़ को

शुभ-अशुभ का संकेत मानने के बजाय,

हमें अपनी वाणी मधुर रखनी चाहिए।

दूसरों के प्रति प्रेम और सद्भाव रखना चाहिए।


छिपकली की आवाज़,

राह चलते शकुन-अपशकुन

और ऐसी अनेक मान्यताओं को

बिना विवेक के सत्य मान लेना उचित नहीं।

किसी मान्यता को स्वीकार करने से पहले

उसके आधार और प्रमाण पर विचार करना चाहिए।


कबीर की एक प्रसिद्ध उक्ति है—


कबीर सोता क्या करे, जागि न जपे मुरारि।

एक दिन तू भी सोयगा, लंबे पाँव पसारि॥


इस वाणी का संदेश है कि

जीवन को आलस्य और अज्ञान में न गँवाएँ।

जागृत रहें, सत्कर्म करें

और ईश्वर का स्मरण करते रहें।


अंधविश्वास का एक प्रमुख कारण

अज्ञान और भय है।

ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा

मनुष्य को निर्भय, विवेकशील

और कर्तव्यनिष्ठ बनाए—

न कि निष्क्रिय और भयभीत।


ईश्वर पर विश्वास करना अच्छी बात है,

परंतु उस विश्वास के नाम पर

अपने प्रयासों को रोक देना उचित नहीं।


शुभस्य शीघ्रम्!


शुभ कार्य को शीघ्र आरंभ करें।

विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाएँ,

प्रयत्न को अपना साथी बनाएँ

और कर्तव्य को अपना धर्म समझें।


ईश्वर में श्रद्धा रखें,

विवेक से विचार करें,

परिश्रम से आगे बढ़ें।

यही अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग है।


🙏 ॐ मुरुगा! सर्वं शिवमयम्! 🙏

Friday, October 9, 2026

विश्व डाक दिवस

 विश्व डाक दिवस।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

101026

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डाक विभाग अंग्रेज़ी की देन।

 भारत के इतिहास में 

कबूतर, हंस पक्षी, मेघ ,राजदूत, संदेश ध्वनि द्वारा।

 प्राचीन काल से आज तक के परिवर्तन

  महत्व पूर्ण है। 

रोज़ डाकिये की प्रतीक्षा में।

 वह दिन याद है

 तार के आते ही 

 सब रोने लगते।

 वह केवल अशुभ संदेश लाता था।

 मणि आर्डर का महत्व 

विश्व डाक दिवस 

 आजकल वह स्पीड पोस्ट, बचत बैंक , 

आदि सुविधाओं से भरा है। 

 डाक घर का नारा है

अहर्निशम सेवा महे।।

 आजकल मोबाइल आने के बाद डाक सेवा कम।

 डाकिये की चिट्ठी ही नौकरी देती।

 दूर के मित्र, नाते रिश्तेदारों से कुशल क्षेम के संदेश लाते।

 धन्य है डाक सेवा के 

 अन्वेषक।

जय विश्व डाक दिवस।

 डाक विश्व दिवस


विश्व डाक दिवस


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।

10-10-2026


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यादों में डाक सेवा


डाक विभाग अंग्रेज़ों की देन,

भारत के इतिहास में

संदेशों का अपना रहा है विशेष स्थान।


कबूतरों से संदेश भेजना,

हंस-पक्षियों की कल्पना,

मेघों के माध्यम से संदेश,

राजदूतों का संदेश पहुँचाना,

ध्वनि और संकेतों द्वारा संवाद करना—

प्राचीन काल से आज तक

संचार के अनेक रूपों में

महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया है।


रोज़ डाकिये की प्रतीक्षा में,

बीते दिनों की यादें ताज़ा होती हैं।


वह दिन आज भी याद है,

जब तार के आते ही

घर में हलचल मच जाती थी।

तार का नाम सुनते ही

मन में आशंका जाग उठती थी,

क्योंकि अक्सर वह

किसी अशुभ समाचार का संदेश लाता था।


मनीऑर्डर का भी

अपना विशेष महत्त्व था।

दूर रहने वाले परिजनों के लिए

वह आर्थिक सहारा बनता था,

और परिवार के चेहरों पर

खुशी की लहर दौड़ा देता था।


विश्व डाक दिवस!


आज डाक विभाग

स्पीड पोस्ट, बचत बैंक

और अनेक सुविधाओं से युक्त है।

जनसेवा के पथ पर चलते हुए

यह विभाग निरंतर

अपनी भूमिका निभा रहा है।


डाक विभाग का ध्येय-वाक्य है—


“अहर्निशं सेवामहे।”

अर्थात्—हम दिन-रात सेवा में तत्पर रहते हैं।


आज मोबाइल और इंटरनेट के युग में

डाक सेवाओं का उपयोग भले ही कम हुआ हो,

पर डाक सेवा का महत्त्व

आज भी कम नहीं हुआ है।


डाकिये के हाथों आई चिट्ठी

कभी नौकरी का समाचार लाती थी,

कभी दूर बैठे मित्रों का प्यार,

तो कभी नाते-रिश्तेदारों की

कुशल-क्षेम का संदेश।


वे चिट्ठियाँ केवल कागज़ नहीं थीं,

उनमें भावनाएँ बसती थीं,

अपनों का स्नेह झलकता था,

और दूरियाँ भी मिट जाती थीं।


धन्य हैं वे आविष्कारक,

धन्य है डाक सेवा,

जिसने दूरियों को घटाकर

मानव-हृदयों को जोड़ने में

अपना अमूल्य योगदान दिया।


जय हो डाक सेवा की!

जय हो विश्व डाक दिवस की!