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Friday, April 24, 2026

सुप्रभात्

 

सिंहपुर के रंगनाथ सुप्रभात्

कौशल्या सुप्रजा राम… (मूल श्लोक का अर्थ)
कौशल्या के सुपुत्र राम!
प्रातःकालीन संध्या का समय हो गया है।
हे नरश्रेष्ठ (नर-व्याघ्र)! जागिए,
दैविक नित्य कर्म करने का समय आ गया है।


उत्तिष्ठ… श्लोक का भावार्थ
उठिए, हे सिंगवर के स्वामी!
उठिए, हे कमलापति!
उठिए, हे रंगनाथ पर्वत के अधिपति!
हे ब्रह्मा द्वारा पूजित प्रभु, जागिए!


श्लोक 1

संस्कृत:
मातः समस्त जगतां महिते सरोजे...

संशोधित हिंदी:
हे समस्त जगत की जननी, पूजनीय कमल-वासी देवी!
असीम वैभव से युक्त, सिंहपुरी में प्रतिष्ठित,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिय!
आपका यह प्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 2

संशोधित हिंदी:
चेंजी नगर के समीप स्थित सिंहवर क्षेत्र में,
पर्वत शिखर पर निर्मित इस मंदिर में विराजमान देवी!
भक्तों को समस्त मंगल प्रदान करने वाली,
हे श्रीरंगनाथ की प्रिया,
आपका यह प्रभात शुभ हो।


श्लोक 3

संशोधित हिंदी:
हे सृष्टि के मूल कारण, ब्रह्मा के सृजनकर्ता!
पीपल वृक्ष से सुशोभित इस पावन स्थल में,
शेषशय्या पर विश्राम करने वाले प्रभु!
सिंहपुर के नायक,
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


श्लोक 4

संशोधित हिंदी:
प्रभात में शीतल, सुखद वायु बह रही है,
कोयलें मधुर और मनोहर स्वर में गा रही हैं।
आकाश में तारे लुप्त हो रहे हैं,
हे रंगेश, सिंहपुर के नायक!
आपका यह सुप्रभात मंगलमय हो।


🌼 सिंगवर रंगनाथ सुप्रभातम् (छंदबद्ध हिंदी रूप)

१.
कौशल्या के राम उठो, प्राची हुई उजास।
नर-व्याघ्र! अब जागिए, करो दिवस उपवास॥ (= नित्य कर्म)

देव-कर्म का काल है, छोड़ो निद्रा-भोग।
उठो प्रभो! जग दीखता, नव प्रभात संयोग॥


२.
उठो सिंगवर के प्रभु, कमला-पति भगवान।
रंगनाथ गिरि-नाथ हे, ब्रह्मा करें गुणगान॥

जागो हे जगदीश अब, करुणा-सागर नाथ।
भक्त प्रतीक्षा कर रहे, खोलो कृपा के पाथ॥


३.
जग की जननी, वंदिता, कमल-विहारिणी मात।
असीम विभव-विलासिनी, मंगलमय यह प्रात॥

सिंहपुरी में राजती, पूजित सदा सुविभूष।
रंगनाथ की प्रिया तुम, हर लो जन की क्लेश॥


४.
चेंजी नगरी पास में, सिंहवर पावन धाम।
गिरि-शिखर पर मंदिरा, जहाँ विराजे राम॥

भक्तों को वरदान दो, मंगलमयी स्वरूप।
रंगनाथ प्रिय वल्लभे, हर लो भव का कूप॥


५.
पीपल तरु से शोभित, पावन सुंदर थान।
शेष-शय्या पर शयन, जग के पालनधाम॥

ब्रह्मा जिनसे जन्म लें, सृष्टि करें विस्तार।
सिंहपुर के नायक हे, करो कृपा अपार॥


६.
शीतल मंद समीर बहे, भोर हुई सुखदाय।
कोयल मधुरिम गान कर, हृदय हर्ष उपजाय॥

नभ के तारे लुप्त हैं, छाया नव प्रकाश।
रंगेश! जागो अब प्रभु, पूर्ण करो सब आश॥

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