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Monday, April 27, 2026

जीवन की तलक

 प्रयत्न और संशोधित दोनों रूप


 नमस्ते


जीत की ललक


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एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई


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28-4-26


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मानव जीवन भर


आगे बढ़ना चाहता है,


अंत तक प्रगति पथ पर


जीत पाने की चाह में


ख्वाब सजाता रहता है।


परीक्षा में सफलता की ललक,


डॉक्टरेट तक पहुँचने की चाह,


नौकरी पाने की आकांक्षा,


पदोन्नति की जीत,


निजी घर का निर्माण,


विवाह और संतान की प्रगति—


इन सबमें बसी है


जीत की ललक।


कभी अश्वमेध यज्ञ की विजय,


तो कभी लोकतंत्र के चुनाव में जीत,


परंतु जनप्रतिनिधि बनकर भी


वादा निभाने की ललक नहीं,


धन जोड़ने की चाह प्रबल—


यही मानव का लोभ, क्रोध, ईर्ष्या


जीवन को बना देते हैं


जय-पराजय का अखाड़ा।


जीत की ललक में


जीवन हो जाता है बेचैन,


एक विजय के बाद भी


और ऊँची उड़ान की चाह,


चंचल मन,


असंतुष्ट जीवन।


मिथ्या जगत के पार भी


अमरता की आकांक्षा,


निराशा में जीवन का अंत,


और फिर पुनर्जन्म का चक्र—


यही है मानव की


अंतहीन ललक।



जीत की तलक

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 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

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28-4-25.

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 मानव अपने जीवन में 

 आगे बढ़ना ही चाहता है।

अंत तक  प्रगति पथ पर

 जीत पाने  के प्रयत्न में 

ख्वाब देखता रहता है।

 परीक्षा में जीत की तलक,

डाक्टरेट तक,

नौकरी पाने

पदोन्नति के जीत,

निजी घर बनवाने

 विवाह करने

 संतान की प्रगति 

 पारिवारिक सफलता

जीत की तलक  में 

 जीवन में रहता है।

महाराजा अश्वमेध यज्ञ

 लोक तंत्र में चुनाव जीतने की तलक,

 पर विधायक संसद को

 वादा निभाने की तलक नहीं,

 धन जोड़ने की तलक,

 यही मानव जीवन का लोभ,

 क्रोध, ईर्ष्या के कारण 

‌जय पराजय का जीवन।

 जीत की तलक में 

 बेचैनी जीवन,

 एक विजय के बाद 

 उससे बढ़िया कदम उठानेकी तलक 

 चंचल मन,

असंतुष्ट जीवन 

 मिथ्या जगत जाकर भी

 सफल अमरजीवन   की तलक,

 निराशा में जीवन का अंत

 पुनर्जन्म लेने के कारण।

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