नमस्ते वणक्कम्
विश्व पुस्तक दिवस
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई
25-4-2026
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नमस्ते! वणक्कम्।
छापाखाने के अभाव में,
ताड़पत्रों पर लिखी पुस्तकें,
शिलालेखों के उस युग में
मानव श्रवण कर-करके
ज्ञान को कंठस्थ करता था।
स्मरण शक्ति थी प्रखर, अद्भुत—
मेरे हिंदी प्राध्यापक
कुरुक्षेत्र
बिना देखे ही सुनाते थे;
अंग्रेज़ी प्राध्यापक
विलियम शेक्सपियर
के नाटकों की पंक्तियाँ
सहज ही दोहराते थे।
जब हुआ छापाखाने का आविष्कार,
ग्रंथ सुलभ हो गए,
संदर्भों का संसार बढ़ा—
किताबें लेना, सहेज कर रखना,
आवश्यकता पर पढ़ना
आसान हो गया।
पर आज के युग में,
स्मरण शक्ति कहीं क्षीण हुई—
मोबाइल के सहारे
अपनी दूरभाष संख्या भी
याद नहीं रहती।
फिर भी—
पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं,
हर ग्रंथ देता है
कोई न कोई अमूल्य संदेश।
नैतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक ग्रंथ,
महाकाव्य और खंडकाव्य—
जीवन-पथ के मार्गदर्शक,
प्रेरणा के स्रोत,
निराश को आशा देने वाले,
आदर्श जीवन के शिक्षक।
पढ़ना, लिखना, रचना—
इसी प्रेरणा के लिए
सन् 1922 में
विन्सेंट क्लावेल
ने इस दिवस का आरंभ किया।
किताबें केवल सजाने के लिए नहीं,
ज्ञान के भंडार को
मन में बसाने के लिए हैं—
पढ़ना, समझना,
विचार करना और लिखना,
सीखे हुए ज्ञान का
प्रवचन, व्याख्या, समालोचना—
यही उद्देश्य है
विश्व पुस्तक दिवस का।
आओ, हम संकल्प लें—
नए ग्रंथ लिखें, पढ़ें, सुनें,
समाज, राष्ट्र और मातृभाषा की
संस्कृति को संवारें;
आदर्श, अनुशासन और
विश्व बंधुत्व को अपनाएँ।
हर वर्ष 23 अप्रैल को
मनाया जाता यह दिवस
ज्ञानार्जन और अभिव्यक्ति का पर्व है।
विचित्र है—
1 अप्रैल मूर्खता का दिवस,
और 23 अप्रैल
ज्ञान, सृजन और अध्ययन का उत्सव!
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