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Sunday, April 5, 2026

रहबर हमारे

 नमस्ते वणक्कम्।

 बन गये रहबर लुटेरे देश के।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

 अपनी हिंदी अपने विचार अपनी स्वतंत्र शैली।

6-4-26

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 हर पाँच साल के एक बार चुनाव।

 नेता बन जाते रहबर।

 पिछले चुनाव के वचन

 न निभाकर ,

 वहीं समस्या को नये ढंग से देने चतुर।

 जनता भुलक्कड़, वही नेता के अंधे अनुयाई।

 नेता अन्याय भी करें फिर भी पिछलग्गू।

 एक ओर राज धर्म के नाम भ्रष्टाचारी।

 प्रजातंत्र में दोष मतदाता का।

‌राजतंत्र में  प्रेमिका के लिए 

 लड़ाई झगड़ा, हजारों सिपाही की पत्नियाँ

 एक राजकुमारी के लिए विधवाएँ।

 अनाथ बालक बालिकाएँ।

 राजभक्ति राजा ईश्वर तुल्य।

 बड़े राजमहल, अनंतपुर में 

 असंख्य रानियाँ।

 खुशामद मंत्री, 

कवि केवल राजा की वीरता के प्रशंसक।

न जनता और देश पर ध्यान।

 अब प्रजातंत्र, आज़ाद देश,

 धन प्रधान पाश्चात्य शिक्षा,

 मातृभाषा भूलने लाखों-करोड़ों के खर्च।

 ये रहबर भारतीय संस्कृति बदलकर 

 शादी को बना दिया खिलवाड़।

 बात बात पर तलाक, परिणाम,

 वैवाहिक जीवन में अशांति।


 प्रजातंत्र देश , मंत्री के बेगार अधिकारी,

 मनमाना भ्रष्टाचार, न्यायाधीश वकील उनके साथ।

 चार्टर्ड अकाउंटेंट कर चुराने में निपुण रहबर।

 धार्मिक क्षेत्र में कदम कदम पर मंदिर,

 शिव, वैष्णव संप्रदाय में,

के भिन्न भिन्न आचार्य

 मानवता मानव एकता तोड़ने में निपुण।

धर्म मूल मजहब के आधार पर लडाइयाँ।

 ये रहबर न चाहते मानवता एकता।

 कहते हैं कलियुग, द्वापर युग में भी

 कुरुक्षेत्र धर्म क्षेत्र नहीं,

 त्रेता युग में सीता के प्रति अन्याय।

 जनसंख्या के आधार पर

 भ्रष्टाचार रीश्वत खोल

 उनके रक्षक अति बुद्धिमान वकील।

‌आज कल  के शिक्षित डाक्टर 

 करोड़ों खर्च करके 

 कार्पोरेट शेयर बाजार।

 मंदिर जितना पूँजी लगाते हैं 

 उतना वसूल।

 अंदर जाने 250/-

तेलंगाना ने के रामानुज मंदिर 

 ये रहबर।

 जिसकी लाठी उसकी भैंस के

 शासक, 40%अल्प संख्यक।

‌ये रहबर फिर भी देशोन्नति में आनंद अनंत।


एस.अनंतकृष्णन के द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

 

 







 



 



 


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