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Tuesday, October 20, 2026

मोह से मुक्ति

 

मोह से मुक्ति

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
21-10-2026


ईश्वरीय सृष्टि माया और मोह से रहित नहीं है।

ईश्वर ने नारी की रचना,

 संसार की निरंतरता और विकास के लिए की है। 

मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से 

पूरी तरह मुक्त होना सहज नहीं है।

भगवान की सृष्टि में महामाया का प्रभाव 

मानव मन में आकर्षण उत्पन्न करता है। 

संतानोत्पत्ति, संतान का लालन-पालन, 

प्रेम और ममता—ये सभी जीवन के स्वाभाविक अंग हैं। इनके मोह से मुक्ति पाना अत्यंत कठिन है।

जब तक मनुष्य अज्ञान और आसक्ति में बँधा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता।

आदि शंकराचार्य ने भज गोविन्दम् में 

संसार के इसी चक्र की ओर संकेत किया है—

पुनरपि जननं, पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे,
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥

इसका भावार्थ है—

  • पुनरपि जननम् — बार-बार जन्म लेना।
  • पुनरपि मरणम् — बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना।
  • पुनरपि जननी जठरे शयनम् — बार-बार माता के गर्भ में निवास करना।
  • इह संसारे बहुदुस्तारे — इस संसार-सागर को पार करना अत्यंत कठिन है।

माँ का प्यार,

 पत्नी के प्रति मोह,

 संतान का पालन-पोषण,

 स्वादिष्ट भोजन की इच्छा, 

सुंदर रूप का आकर्षण, 

नृत्य-संगीत का आनंद तथा आभूषण, 

हीरे और पन्ने जैसे बहुमूल्य रत्नों के प्रति आसक्ति—मनुष्य का जीवन अनेक प्रकार के मोह से घिरा हुआ है।

इन सबके बीच रहते हुए भी

 मनुष्य अपने मन को आसक्ति से मुक्त कैसे करे?

यह आत्मचिंतन का विषय है।

सांसारिक सुखों की लालसा में

 मनुष्य कभी-कभी अनुचित मार्ग भी अपना लेता है।

 शीघ्र लाभ पाने के लिए भ्रष्टाचार और 

रिश्वत का सहारा लेना भी

 इसी अंधी लालसा का परिणाम है।

मोह से मुक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, 

बल्कि संसार में रहते हुए मोह का दास न बनना है।

माँ से प्रेम करना, 

पत्नी की सेवा करना, 

संतान का पालन-पोषण करना और 

दूसरों के प्रति करुणा रखना—

ये सब जीवन के पवित्र कर्तव्य हैं। 

समस्या प्रेम में नहीं, 

बल्कि उस आसक्ति में है 

जो मनुष्य को विवेक और धर्म के मार्ग से

 विचलित कर देती है।

यदि मनुष्य मोह से मुक्ति पाना चाहता है, 

तो उसे ईश्वर का स्मरण करना चाहिए, 

मन को संयमित करना चाहिए 

और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

आत्मा और परमात्मा की एकता का

 अनुभव करना ही अद्वैत मार्ग का परम लक्ष्य है।

आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धांत है—

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।

अर्थात् ब्रह्म ही परम सत्य है, 

जगत की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता नहीं है

 तथा

 जीवात्मा और ब्रह्म में मूलतः भेद नहीं है।

जब मनुष्य इस सत्य को समझकर जीवन में उतारने का प्रयास करता है, 

तब धीरे-धीरे उसका मोह कम होने लगता है और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।

ईश्वर का स्मरण, कर्तव्य का पालन, मन का संयम और आत्मज्ञान—यही मोह से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने के साधन हैं।

ॐ नमः शिवाय।
ॐ मुरुगा! शरणम्।

मोह से मुक्ति।

 एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

21-10-26.

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ईश्वरीय सृष्टि 

 माया मोह रहित नहीं।

 ईश्वर ने नारी को  बनाया,

 सांसारिक विकास के लिए।

 वह सहज 

मूल प्रवृत्ति से  मुक्ति 

 पाना संभव नहीं।

 भगवान की सृष्टि में 

 महामाया देवी

 मानव मन में 

 आकर्षण के लिए।

 संतानोत्पत्ति,

संतान का लालन-पालन,

 प्रेम मोह।

 मुक्ति पाना मुश्किल।

 अतः निराश मनुष्य की मृत्यु, जन्म के चक्कर से बच नहीं सकता।

आदि शंकराचार्य ने लिखा है

• पुनरपि जननं: बार-बार जन्म लेना

• पुनरपि मरणं: बार-बार मृत्यु को प्राप्त होना

• पुनरपि जननी जठरे शयनम्: और बार-बार माता के गर्भ में सोना (कष्ट उठाना)

• इह संसारे बहुदुस्तारे: इस अत्यंत कठिन और विशाल संसार-सागर को पार करना बहुत मुश्किल है।

  माँ का प्यार,

 पत्नी का मोह,

  संतान पालन,

 स्वादिष्ट खाने की  इच्छा, 

सुंदर रूप का मोह,

 नाच ,गान, आभूषण हीरा पन्ना आदि 

इतना मोह, 

 मुक्ति पाना,

आत्मज्ञानियों के लिए ही संभव है। 

 सद्यःफल के लिए भ्रष्टाचार और रिश्वत।

 मोह से मुक्ति होना है तो  ईश्वर ध्यान में रखना है।

 आत्मा परमात्मा एक होकर अद्वैत मार्ग पर चलना है।

जगत माया मिथ्या 

ब्रह्म सत्यं को अपनाना है।

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