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Saturday, February 28, 2026

माँ

 माँ की ममता 

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई 

 स्वरचित रचना 

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बंधन रहित स्नेह,

माँ रूपी कवच।


मेरे रूप होने के पहले

मेरे चेहरे देखने के पहले,

मेरे स्वर सुनने के पहले,

माँ के हृदय प्रेम तो

 माँ की तुलना में और कोई नहीं।

 जन्म लेने के बाद,

रोग रहित , अहर्निशम्

जागकर पालनेवाली है माँ।

पालने में, कंधों पर ढोकर 

 रक्षा करनेवाली है माँ।

प्यार का जन्मस्थान,

त्याग का प्रतिबिंब,

गहरे प्रेम की देवी,

बंधन रहित स्नेह, माँ रूपी कवच।

मां से रूठो

माँ से लड़ो,

फिर भी ढूँढकर

 अपने प्यार जताने वाली है माँ।

 हमारे कष्ट के समय,

हमारे रोते समय,

 दिलासा देने वाली है माँ।

माँ के मन में  द्रोह नहीं, धोखा नहीं, प्रेम ही प्रेम में इंगित माँ।

 सर्वस्व विस्मरण करके,

माँ के गोद में सोते

 बचपन ही स्वर्णकाल व

स्वर्गकाल  मेरे।

माँ अपने बारे में चिंतित नहीं,

सदा-सर्वदा चिंतित हैं

 अपने संतान के बारे में।

जान लेने हजारों,

 जान देने एक ही नाता माँ।

ढाई अक्षर मंत्र माँ ही

 मेरे जन्मदात्री।

मेरे प्रथम आराधना देवी माँ ही।

प्यार बताने हजारों होने पर भी 

 प्यार जताने माँ के बराबर माँ ही।

हजारों छुट्टियाँ आने पर भी,माँ के कार्यालय रसोई की छुट्टी नहीं।

उम्र के अंतर न देखती माँ,

माँ के दुलार में 

पचास वर्ष के  बेटे भी शिशु समान।

वर्षा के भीगी मुझे,

 अपने आँचल से पोँछी,

 माँ देखकर 

वर्षा को भी  होगी ईर्ष्या।

माँ प्यार का खान।

 माँ प्यार का कोष।

प्रेमचंद उपन्यास सम्राट की कहानी मेँ,

 माँ का जिक्र देखिए,

 माँ को जलाओ,तो

 दया का सुगंध निकलेगा।

 पीसो तो दया का रस निकलेगा।

 थोड़े में कहें तो

 मातृत्व   वर्णनातीत 

 प्रेम और दया के प्रतिबिंब है।

























Thursday, February 26, 2026

खोटा व्यापक

 खोटा सिक्का 

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

27-2-26

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खोटा शब्द आजकल 

 व्यापक अर्थ में।

मिलावटी चावल,

 मिलावटी कानून 

 नकली वेषधारी

 खोटा आदमी

 नकली संन्यासी,

 नकली ज्योतिष 

 भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञ,

नकली तेल,

 नकली कार पार्ट्स

बनावटी श्रृंगार 

 न जाने यूट्यूब में 

 फेसबुक में 

 कदम कदम पर 

 खोटा ही खोटा।

 खोटा पुलिस अधिकारी 

 बीस साल के बाद 

 पकड़ा नकली पुलिस।

 खोटा प्रमाण पत्र

 आजकल की खबरें 

 अफ़वाहें खोटा खोटा

 नकली बैंक संदेश।

 नकली मुखपुस्तिका दोस्त।

 मोबयिल  में खोटा लघु संदेश।

जवाब देते  ही लूट।

 खोटा डाक्टर।

 फूँकफूँककर कदम रखना है,

न तो ठगनवाले,

 सन्नद्ध तैयार।

Wednesday, February 25, 2026

प्रकृति

 प्रकृति का न्याय 

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

26=2=26.

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प्रकृति का न्याय 

 अति उत्तम।

 वह तटस्थ न्याय 

  उसका प्रदूषित करने पर विपरीत न्याय।

 ऋतुओं का चक्र 

 नियमानुसार।

 सूर्योदय सूर्यास्त नियमानुसार।

 मौसमी फल, सब्जियाँ

 नियमानुसार।

 समय पर वर्षा।

स्त्री-पुरुष  आकर्षण,

शिशु का जन्म,

 बचपन, जवानी, बुढापा 

नियमानुसार  मृत्यु।

 कर्मफल का पुरस्कार दंड।

पंचतत्व हवा,पानी, अग्नी , भूमि,आकाश 

 आदि की करुणा,

समान।

 न उनमें जाति, मजहब,

संप्रदाय के भेद भाव।

 न राग-द्वेष।

 प्रकृति के कोप में भी 

 न राग-द्वेष।

प्रकृति सदा तटस्थ।

लेकिन प्रकृति रचना के गुण,

अलग-अलग।

 फूल सा कोमल,

 काँटों सा चुभना।

विषैला साँप,

खूँख्वार जानवर,

 माँसपक्षिणी,

 आदमखोर।

 बल, दुर्बल 

 दयालू निर्दयी

 द्रोही ठगी

 प्रेमी त्यागी 

 कंजूसी 

दानी लोभी

 यह प्रकृति का न्याय।

अति सूक्ष्म मानव ज्ञान के अपार।

 बीज अति छोटा

 वटवृक्ष अति बड़ा।

 कटहल भी है, ब्लू बेरी

 आम शैशव में एक स्वाद

 कच्चा आम खट्टा,

पका आम मीठा।

 इमली खट्टा।

 तितली की उत्पत्ति।

 यह प्रकृति न्याय 

 मानव ज्ञान के अपार का

 न्याय।

तभी ईश्वर की अद्भुत माया।

 मानवेतर शक्ति का प्रमाण 

प्रकृति न्याय।।













Tuesday, February 24, 2026

पतझड़

 पतझड़

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-2-26

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भूलोक जीवन में 

  अस्थाई सबकुछ।

 पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।

 इसके प्रकृति दर्शन प्रमाण है

 ऋतुओं के चक्कर।

उसमें पतझड़,

 सर्वस्व खोकर 

 ठूंठ  बने वृक्ष,

 वैसी दशा मानव को भी

 सुख दुख दुख सुख

तब पतझड़ के जैसे 

 धीरज धरना,

 जड में पानी का बचत रखना,

 मानव भी   बाह्याडंबर खर्च रहित  बचत करना चाहिए,

 तभी वृक्ष के समान 

 धीरज धरकर पुनः पनप सकते हैं।

हरे पत्ते,लाल रंग में 

फिर ताम्र रंग में 

धरती पर गिर कर

  पैरों के पड़ते ही

 सर सर आवाज़,

 हवा में उड़ना,

पेड़ वयोवृद्ध 

वृद्ध के समान खड़ा रहना,

मानव के जीवन का प्रतीक।

 भावी जीवन के कष्टों 

में धीरज से रहने का संदेश।

 मानव जीवन में पनपना असंभव।

 शक्ति के रहते कुछ करके  परोपकार करना है, 

वृक्ष के समान।

 




 

Sunday, February 22, 2026

युवा का मन भटका हुआ

  

युवा मन का भटकाव।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

  आधुनिक युवक 

    पल पल 

 भटक जाने का युग

 कलयुग।

  

 बढ़िया शीर्षक

 गंभीर विषय

युवा तो अच्छे सच्चे गुणी, 

देश भक्त 

पर देश और विज्ञान

आज की प्रगति का आधार 

युवक।

विश्व भर में भारत में ही युवा शक्ति अधिक।

बुद्धिमान युवक का हाथ 

अमेरिका देश की प्रगति में  साथ।‌

 मजहब जाति संप्रदाय 

आज तक परिवर्तन नहीं हुए।।

 चुनाव में जाति 

प्रधान धन प्रधान।

 बढ़िया शीर्षक

 गंभीर विषय।

 चंचल मन

 माया/शैतान/सात्तान

हर मजहब में 

सांसारिक सद्यःफल 

 चंद मिनटों के लिए।

 ईश्वर का भय नहीं।

मत-मतांतर  संप्रदाय का अधीन।

 मानव मानव में मजहबी जोश।

 गुरु तो आज एक पेशेवर 

 शिक्षा का व्यापार।

 ट्यूशन के रखते ही वह छात्र अति होशियार।

एक ओर सरकारी स्कूलों के शिक्षक

 पूर्व स्वतंत्र, वेतन निश्चित, 

अनपढ़ अभिभावकों  के बच्चे 

 मातृभाषा माध्यम 

 हीनता-ग्रंथि मन में 

दूसरी ओर निजी स्कूलों के अध्यापक

छुट्टी लेना मना,

 पर छात्र आज्ञाकारी,

 शिक्षित समुदाय के बच्चे।

इन सब के बीच 

 सामाजिक माध्यम  के विपरीत विचार।

मानव-मन सद्यःफल के लिए 

लौकिक जीवन से आकर्षित।

 संगणक अंतर्जाल मैं 

 ज्ञान की बातें हैं,

 अश्लील बातें , खेल।

 एक दिन मैं ने देखा

 मोबाइल खेल।

मारो मारो आत्म हत्या कर लेगा।

झाँककर देखा तो

सांगणिक खेल।

 खेल में मन लगा तो

 बस मन भटक जाता है।



आज वैज्ञानिक प्रगति,

   सर्वत्र ज्ञान का भंडार।।

संगणक और मोबाइल के 

आविष्कार के कारण,

 उँगलियों के दबाने पर

 तुरंत  मन चाहा ज्ञान।

 मनोवांछित दोस्तों से  

वीडियो कान्फ्रेंसिंग 

बड़े बड़े दफ़्तर के काम 

घर में ही।

 कोराना आया तो भला हुआ 

अनेक युवकों को  घर में ही काम।

 हर बात में भला है और बुरा भी। 

 अभी युवकों को संयम से रहना है।

वैज्ञानिक माया, हर बात सिखाती है।

कामोत्तेजक दृश्य,

 हमारे जामाने में हमें पता नहीं 

 माता-पिता कब बोलेंगे मिलेंगे।

 पर हर साल अंतराल के बिना बच्चा।

 आजकल के चित्र पट, 

मोबाइल संगणिक 

 अश्लीलता के केंद्र।

 आध्यात्मिक बातें करते करते

अचानक अश्लीलता सामने।

 जितेंद्रिय न होना,  

प्रेम के कारण  

मन में दुविधाएँ।

 प्रेम और माता पिता के विरोध।

 प्रेम मैं धोखा,

तलाक  शब्द रहित भारत की भाषा

विदेशी संस्कृति विचार 

तलाक मुकद्दमा बढ़ती संख्या।

 बराबर की शिक्षा, बरबरी उद्योग।

 बढ़ती आय, बढ़ती महँगाई।

देरी से शादी, शादी के बाद ।

गर्भधारण करने अस्पताल।

 सम्मिलित परिवार की कमी,

घर में अशांति।

कर्जा  देने बैंक तैयार।

क्रेडिट कार्ड देने अनुरोध,

 बाह्याडंबर खर्च अधिक।

एल के जी के लिए दान दो लाख।

गुरु आजकल  अध्यापक, 

केवल सिखाना मात्र काम!

उपदेश देने तक अध्यापक को हक नहीं,

 पिताजी जैसे मत रहो, 

खूब पढ़ो, इतना ही बस।

लड़के ने पिताजी से कहा,

 आप पढ़ें लिखे नहीं, अध्यापक अपमान करते।

 बस, बिना सोचे विचारे अध्यापक पर क्रोध। 

युवकों  के मन में ऋष्यश्रुंग के उपदेश  नहीं,

 अश्लील गाना, युवावस्था में प्रेम करने की प्रेरणा।

 चित्रपट का संवाद  तो माता पिता के प्रति 

श्रद्धा भक्ति कम, प्रेम प्रेम नया नहीं।

नल दमयंती हंस  दूत, शकुंतला दुष्यंत प्रेम कहानी 

लेकिन प्रेम करनेवाले तन के लिए 

धन के लिए, मनोरंजन के लिए।

किसके लिए पता लगाने में भूल।

परिणाम शादी का महत्व कम।

मिलकर रहेंगे, पसंद है तो सही,

 न तो अलग हो जाएँगे।

भक्ति के क्षेत्र में तो 

 विभिन्न संप्रदाय,

 अलग अलग आचार्य 

 अलग अलग दल,

योगा में क्रिया योग,

 पतंजलि योग। 

जिम।

शिक्षा में सरकारी स्कूल,

गैर सरकारी स्कूल।

मातृभाषा माध्यम की हीनता-ग्रंथि।

राजनीति में एक ही नेता,

एक ही सिद्धांत,

 अनेक शाखाएँ ,अनेक नेता 

एक दूसरे पर कीचड़ उछालना।

भ्रष्टाचार और रिश्वत का बोलबाला।

 युवकों का मन भटका हुआ।

अल्पसंख्यकों की सरकारें 

आरक्षण नीति, 

 संविधान में समान अधिकार 

व्यवहार में  अल्पसंख्यकों का अधिकार ज़्यादा।

 हर एक कार्य में धर्म संकट।

बच्चों को हरफण मौला बनाने के लिए 

 न आराम, न स्वचिंतन  

 कर्नाटक संगीत की बोर्ड, 

क्रिकेट जिम न जाने 

 आये मेहमान से मिलने

 बातें करने समय नहीं।

 विद्यालय से  आते ही

 ट्यूशन भिन्न भिन्न वर्ग।

 युवक का मन हर क्षेत्र में दुविधा 

भक्ति का हो या राजनीति।

 मन भटकने नशीली वस्तुएँ।

 रंग-बिरंगी गोलियाँ।

  हर रंग का अपना अलग प्रभाव 

 मन भटकता रहता है।

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Saturday, February 21, 2026

धर्म और जाति की बढती खाई

 धर्म और जाति की बढती खाई।

 एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

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धर्म  व्यापक।

 मानवता के प्रतीक।

 दान-धर्म, सहानुभूति,

 त्याग सत्य अहिंसा 

‌भलमानसाहस

 यही धर्म।

 भारतीय सनातन धर्म।

 भगवान की दी हुई क्षमता, संपत्ति से संतोष।

 सर्व लौकिक सुख अस्थाई की सीख।

 कालांतर में धर्म का व्यापक रूप, संकुचित रूप में बदलने लगा।

धर्म से नीचे गिरकर 

 मत मतांतरण का जन्म हुआ।

 धार्मिक महान लोग।

 वशिष्ठ के ब्रह्म ऋषि से 

जलकर 

 विश्वामित्र का शपथ।

दुर्वासा का क्रोध।

 भक्त कवियों में 

 अलग अलग संप्रदाय।

मुगलों के शासन काल,

 आश्रयहीन कवियों ने

भगवान का शरण लिया।

 संप्रदाय उत्पन्न होने लगे।

 कबीर पंथ, जायसी पंथ।

 तुलसी पंथ, सूर पंथ।

संप्रदाय के पिछलग्गू 

 सनातन धर्म के वर्णाश्रम।

 उच्च नीच के भेद।

  प्राचीन  जमाने में,

भुजबल, धन बल,  तनबल,  बुद्धि बल

 के आधार पर विवाह।

कालांतर में  केवल जाति और जन्मकुंडली के आधार पर।

 कबीर जैसे वाणी के डिक्टेटर ने   मजहबी एकता पर जोर दिया।

 कुरान पढ़ें वेद पढ़ें

‌खुदा को न जाना न पहचाना।

माया महा ठगनी,

 वशिष्ठ के शुभ मूहूर्त निश्चित।

 पर सीता दुखी थी।

 लोगों के विचार में 

 चिंतन में  जड़मूल 

 परिवर्तन।

 हिंदुओं के अंधविश्वास 

 अत्याचार,

  नये मतों के उदय।

पाश्चात्य देशों के आक्रमण।

 अंग्रेजों के षडयंत्र 

 जीविकोपार्जन अंग्रेज़ी 

 बुद्धि जीवी, प्रतिभाशाली।

 अंग्रेज़ी भाषा के पारंगत।

 वेश भूषा अंग्रेज़ों के जैसे,

 परिणाम ईसाई धर्म के प्रचार,

 देश भर में यह भ्रम,

 बगैर अंग्रेज़ी के

 भारतीय अज्ञानी।

स्वतंत्रता के होते ही

 अंग्रेज़ी देश की भाषा बनी।

 संविधान धर्म निरपेक्षता के आधार पर।

78साल में सब  वेद उपनिषद  सनातन धर्म भूल गये।

 अस्पताल में  रोग दूर करने 

बाइबिल पढ़ने लगे।

‌गली गली प्रचार में 

 बाइबिल साहित्य देने लगे।

 हिंदुओं ने करोड़ों खर्च में 

 काली देवी, गणेश की मूर्ति अति सुंदर बनाकर समुद्र में फेंकने लगे।

 करोड़ों रूपयों के देव देवियाँ,

कबंध बनकर, हाथ रहित पैर रहित ईश्वर का अपमान।

 अब धर्म ,मत माने मजहब, जाति संप्रदाय के आधार पर

 मानव मानव में  भेद भाव, राग-द्वेष।

 अंग्रेज़ी मिश्रित भाषा में गर्व।

 दो हाथ जोड़कर नमस्कार भूल

 एक हाथ का सलाम। 

 धर्म और जाति की  बढती खाई,

 जीविकोपार्जन की भाषा के कारण 

गहरी होती जा रही है।

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 तीसरा संग्रह युग की पुकार के लिए ज्ञ

Friday, February 20, 2026

निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा

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निस्वार्थ सेवा

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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21-2-26

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स्वार्थ निस्वार्थ 

 तटस्थ ईमानदारी 

  पूर्ण सेवा है क्या?

भूलोक में माया महादेवी,

अहंकार में फँसाकर 

 सेवा के बदले

अपनी शक्ति दिखाने

 अश्वमेध यज्ञ।

 सत्य , अहिंसा,मानवता,

दान, धर्म परोपकार दया

 मूल सिद्धांत एक।

 शैव उसमें भी वीर शैव,

वैष्णव उसमें भी राम कृष्ण।

 अल्लाह उसमें भी भेद।

 ईसा उसमें भी भेद।

अपने अपने अनुयायी,

 अपने अपने दल।

‌मतभेद के ज्ञान चक्षु प्राप्त मनुष्य में निस्वार्थ सेवा कहाँ? 

 मूल संस्थापक नेता एक।

सिद्धांत लागू करने में

 अगले चुनाव की याद में 

 शासक दल।

 उनको पतन करके 

 सत्ता पकड़ने में विपक्ष दल।

 निस्वार्थ सेवा ,

तटस्थ सेवा कहाँ।

 मानव मानव में समानता,

सही,

 बुद्धि लब्धि में 

 अंतर।

आकार गुण में अंतर।

 तन में अंतर विचार में अंतर।

 तमाशा देखिए,

 सबेरे तक नेता भ्रष्टाचारी,

स्वार्थी, देश विनाश करनेवाले,

 वहीं शाम को उस नेता की प्रशंसा में दल बदलकर शाम की सभा में भ्रष्टाचारी नेता 

 आदर्श जन सेवक,

 रिश्वत क्या है?

 भ्रष्टाचार क्या है?

 पता नहीं।

राज्यसभा सांसद बोलता है,

  सौ करोड़ है यह सांसद सम्मान।

 निस्वार्थ सेवा तटस्थ सेवा कहाँ?

 ट्यूशन के जमाने में 

 ट्यूशन शुल्क के पाते ही

 कल तक मूर्ख नालायक छात्र आज होशियार कैसे?

 भगवान के सामने अमीरों के सम्मान अलग अलग। 

 गरीब घंटों कतार पर,

 निकट जाते ही पलक झपकने के पहले बाहर।

 निस्वार्थ सेवा कहाँ?

रामायण में मंथरा,

अहंकार में रावण,

 विभीषण कुल कलंक।

 हरिश्चंद्र सत्यवादी,

उसको झूठा स्थापित करने विश्वामित्र।

 महाबली के सामने 

विष्णु का वामन रूप।

 इंद्र को शाप नहीं,

अहल्या को शाप।

 ईसा को शूली,

मुहम्मद नबी को पत्थर मार।

 मानवता भूल मजहबी लड़ाई।

मूर्ति पूजा के विरोध 

मंदिर तोड़ना।

 अपने मजहबी ग्रंथ

 मात्र श्रेष्ठ, अन्य धार्मिक 

ग्रंथों को जलाना।

 बाघ सृष्टि, 

हिरण की सृष्टि।

 बाज की सृष्टि,

 गौरैया की सृष्टि।

 मकड़ी के जाल में 

 फँसे कीड़े पर शोक,

 दुखी प्रकट करते हुए

 मानव गया कसाई की दूकान की ओर।

 कदम कदम पर विपरीत 

 अपना अपना न्याय।

 अपना अपना राग,

 अपनी अपनी डफली।

 राधा और कृष्ण प्रेम की प्रशंसा,

अपने बैठे बेटी का प्रेम विरोध।

कदम कदम पर निस्वार्थ सेवा और तटस्थ सेवा

न जाने समझ पाया।

‌यह ईश्वरीय लीला,

 सूक्ष्म व्यवहार।

विपरीत बुद्धि मिलने में 

 किसका कसर?

 निस्वार्थ सेवा कहाँ।

दो हज़ार रानियों के अंत:पुर,

 बड़े बड़े राजमहल।

 जनता गरीब बेगार गुलाम।

 निस्वार्थ सेवा, तटस्थ सेवा कहाँ।