संयम का मीठा फल।
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
29-10-26.
संयम मानव को चाहिए
न तो परिणाम होगी
बेइज्जती।
पंचेंद्रिय काबू में न होता तो
क्या होता ।
मन अपने वश में
न होता तो
मनमाना करें तो
मान मर्यादा नष्ट हो जाता।
इंद्र को हुआ,
अपमान अहिल्या के कारण।
हजारों मोनी का शाप मिला।।
आँखें लड़की को देखकर मारा,तो
उसका जूता मारा सिर पर।
जिह्वा बावरी अपने वश में न रहकर,
बकता तो पागल का नाम मिलता।।
संत तिरुवल्लुवर ने कहा --
ऒरुमैयुळ्
आमैपोल ऐंतडक्कल आट्ऱिन ऍऴुमैयुम एमाप्पुडैत्तु।(तमिऴ)
कछुए जैसै विपत्ति के समय अपने पैर,अपने पंचेंद्रिय कान,आँखेँ, नाक,मुख, शरीर को अपने कवच में छिपा लेता है, वैसे मानवभी अपने पंचेंद्रियों को बुरे मार्ग पर चलने न देकर काबू में रख लेना चाहिए।
इस जन्म में मनुष्य
संयम के साथ रहेगा तो
अपने आनेवाले सात जन्मों में सुखी रहेगा।
संयम के कारण
ऋषि-मुनियों को
आत्मज्ञान मिलता है।
तुलसीदास संयम बना,
पत्नी के मोह छोड़ा तो
हिंदी साहित्य का शशी बना।
कबीर ने कहा
कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥
अर्थात
हाथी धीरज धरकर अपने स्थान से न हटकर रहने से पेट भर खाया है।
कुत्ता टूटे रोटी के टुकड़े के लिए घर घर फिरता है।
धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।
माली सींचै सौ घडा,
ऋतु आए फल होय।
संयम और सब्रता का फल मीठा ही होता है।
संयम का मीठा फल
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
29-10-2026
संयम मानव को चाहिए,
अन्यथा परिणाम होगा
अपमान और बेइज्जती!
पंचेंद्रियों पर नियंत्रण
यदि न होता,
तो मानव का जीवन
कैसा होता?
मन अपने वश में
यदि न होता,
मनमानी करने से
मान-मर्यादा का नाश होता।
इंद्र को भी अहंकार और वासना के कारण
अपमान का सामना करना पड़ा।
अहिल्या प्रसंग से जुड़ी कथा
हमें यही सीख देती है
कि अनियंत्रित इच्छाएँ
पतन का कारण बनती हैं।
आँखें यदि मर्यादा भूल जाएँ,
पराई स्त्री को बुरी दृष्टि से देखें,
तो सम्मान के बदले
अपमान ही मिलता है।
जिह्वा यदि अपने वश में न रहे,
बिना सोचे-समझे कुछ भी बकती रहे,
तो व्यक्ति विवेकहीन कहलाता है
और उपहास का पात्र बन जाता है।
संत तिरुवल्लुवर का अमूल्य संदेश
संत तिरुवल्लुवर ने तिरुक्कुरल में कहा है—
ऒरुमैयुळ्
आमैपोल ऐंतडक्कल आट्ऱिन ऍऴुमैयुम एमाप्पुडैत्तु।
“ஒருமையுள் ஆமைபோல் ஐந்தடக்கல் ஆற்றின்
எழுமையும் ஏமாப்புடைத்து.”
हिंदी भावार्थ:
कछुआ जिस प्रकार संकट के समय
अपने अंगों को कवच के भीतर समेट लेता है,
उसी प्रकार मनुष्य यदि अपनी पाँचों इंद्रियों
पर नियंत्रण रखना सीख ले,
तो उसका संयम
सात जन्मों तक उसके लिए
सुरक्षा और कल्याण का आधार बनता है।
इस जन्म में जो मनुष्य
संयम का मार्ग अपनाता है,
वह अपने भावी जीवन को भी
सुखमय बनाने की नींव रखता है।
संयम के कारण ही
ऋषि-मुनियों ने तपस्या की,
मन को वश में किया
और आत्मज्ञान प्राप्त किया।
तुलसीदास का जीवन-परिवर्तन
तुलसीदास पत्नी के मोह में
अत्यधिक आसक्त थे।
पत्नी के उपदेश ने
उनके जीवन की दिशा बदल दी।
सांसारिक मोह से विरक्त होकर
उन्होंने भक्ति का मार्ग अपनाया
और रामचरितमानस की रचना करके
हिंदी साहित्य के आकाश में
चंद्रमा की भाँति चमक उठे।
कबीर का धैर्य-संदेश
संत कबीर कहते हैं—
“कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥”
भावार्थ:
हाथी धैर्यपूर्वक अपने स्थान पर रहकर
अपना पेट भरने योग्य भोजन पाता है,
जबकि कुत्ता रोटी के एक टुकड़े के लिए
घर-घर भटकता फिरता है।
यह दोहा हमें धैर्य, संतोष
और आत्मसम्मान का महत्त्व समझाता है।
कबीर का एक और प्रसिद्ध दोहा है—
“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥”
भावार्थ:
हे मन! धैर्य रख।
हर काम अपने उचित समय पर होता है।
माली चाहे सौ घड़े पानी सींच दे,
फिर भी फल ऋतु आने पर ही लगता है।
निष्कर्ष
संयम हमें मर्यादा सिखाता है,
धैर्य हमें प्रतीक्षा करना सिखाता है,
और विवेक हमें सही मार्ग दिखाता है।
इंद्रियों पर नियंत्रण हो,
वाणी में मधुरता हो,
मन में धैर्य हो
और आचरण में मर्यादा हो,
तो जीवन सुंदर बन जाता है।
संयम और धैर्य का फल
सदैव मीठा होता है।
आज कष्ट सहकर भी
जो मर्यादा का मार्ग अपनाता है,
वही कल सम्मान, शांति
और संतोष का फल पाता है।
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