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Saturday, July 18, 2026

नदियों की पुकार

 

आज की चुनौती

नदी की पुकार





नदी की पुकार

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई।
मैं हूँ नदी।
कहते हैं 
नदियों के तट,
सभ्यता का पलना।
नदी मैं न तो
 जीना दुश्वार।
 पशु पक्षी वनस्पति
 सब के जीवधार।
 खेद की बात  है 
 रेत का लूट करते हैं।
कारखानों के 
 विषैले पानी बहाते हैं,
बाँध बाँधकर रोकते हैं 
 मैरी चौड़ाई कम करते हैं,
 पवित्र गंगाजल को
 प्रदूषित करै
 गंगा के किनारे
 मिनरल वाटर बेचते हैं।
नदियों को बचानै
आंदोलन भी करते हैं।
 भारतीय नदियों को 
जोडकर राष्ट्रीय जल 
योजना का भी विचार करते हैं।
जन संख्या बढ़ने से
‌जंगलों का नाश,
झीलों  का नदारद 
 नगर विस्तार नगरीकरण
 कारखानों का विकास 
मेरे विकास में बाधक।
अब नदी की पुकार 
नदी बचाओ की क्रांतियाँ 
नदी की पुकार।
  जल प्रदूषण 
 सही नहीं,
उर्वर धरती के लिए खतरा।
नदियों को
 न बचाने पर
 भूतल में
 अकाल के कारण बनाएंगे।
 धरती सूख जाएगी।
अतः नदी बचाने की 
योजना को  प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हम भूलोक को
 हरे भरे रखेंगी।






एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

मैं हूँ नदी।
कहते हैं,
नदियों के तट पर
सभ्यता का पालना पला है।

मेरे बिना
जीवन दुश्वार है।
पशु, पक्षी, वनस्पति
सभी का मैं जीवनाधार हूँ।

खेद की बात है कि
मेरी रेत लूटी जाती है।
कारखानों का विषैला जल
मुझमें बहाया जाता है।
बाँध बनाकर
मेरे स्वाभाविक प्रवाह को रोका जाता है,
मेरी चौड़ाई और अस्तित्व
धीरे-धीरे सिमटते जा रहे हैं।

पवित्र गंगाजल को भी
प्रदूषित किया जाता है,
और गंगा के किनारे
मिनरल वाटर बेचा जाता है।
एक ओर
नदियों को बचाने के आंदोलन चलते हैं,
दूसरी ओर
भारतीय नदियों को जोड़ने की
राष्ट्रीय जल योजना पर विचार होता है।

बढ़ती जनसंख्या,
जंगलों का विनाश,
झीलों का लुप्त होना,
नगरों का विस्तार,
और कारखानों की बढ़ती संख्या—
ये सब मेरे अस्तित्व के लिए चुनौती हैं।

अब मेरी पुकार सुनो।
"नदी बचाओ" केवल नारा नहीं,
जीवन बचाने का संकल्प है।
जल प्रदूषण
धरती की उर्वरता के लिए
गंभीर खतरा है।

यदि नदियों को
समय रहते नहीं बचाया गया,
तो धरती पर
जल संकट और अकाल
मानवता के भविष्य को चुनौती देंगे।
धरती सूख जाएगी,
जीवन कठिन हो जाएगा।

अतः
नदियों के संरक्षण और संवर्धन की
योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
तभी हमारा यह भू-लोक
सदा हरा-भरा, समृद्ध
और जीवनदायी बना रहेगा।

— एस. अनंतकृष्णन

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