समय का चक्र।
एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना.
31-7-26.
++++++++++
समय का चक्र
सदा घूमता रहता है।
आगे जाता है,कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।
समय खोने पर पछताना ही पड़ेगा।
बड़े बड़े सम्राट भले ही हो,
भले ही भगवान भी हो
खोया हुआ समय पा नहीं सकता।
हर पल पेड़ बढ़ता है,
मनुष्य बढ़ता है
शैशव बचपन जवानी प्रौढ़, बुढ़ापा, कैसे वापस मिलेगा।
समय का चक्र आगे की ओर घूमता रहता है।
समय किसी की प्रतीक्षा में
रुकता नहीं।
समय की गति के अनुसार
सूर्योदय सूर्यास्त,चंद्रोदय चंद्र का अस्त, मौसमी परिवर्तन
समय का चक्र घूमता रहता है।
वह किसी के पक्ष में नहीं रहता।
अंतिम रूप
समय का चक्र
समय का चक्र
सदा घूमता रहता है।
आगे बढ़ता जाता है,
कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।
समय खो देने पर
पछताना ही पड़ता है।
बड़े-बड़े सम्राट हों,
या स्वयं भगवान—
बीता हुआ समय
फिर कभी लौटकर नहीं आता।
हर पल
पेड़ बढ़ता है,
मनुष्य भी बढ़ता है।
शैशव, बचपन, जवानी,
प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा—
बीत जाने पर
फिर कैसे वापस मिलेगा?
समय का चक्र
निरंतर आगे ही बढ़ता रहता है।
वह किसी की प्रतीक्षा में
कभी नहीं रुकता।
समय की गति से ही
सूर्योदय और सूर्यास्त,
चंद्रोदय और चंद्रास्त,
ऋतुओं का परिवर्तन—
सब चलता रहता है।
समय का चक्र
न किसी का पक्षधर है,
न किसी का विरोधी।
जो समय का सम्मान करता है,
समय भी उसी का जीवन
सार्थक बना देता है।
No comments:
Post a Comment