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Saturday, July 25, 2026

पिघलती बर्फीली चट्टानें

 




पिघलते बर्फीली चट्टानें 

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-7-27.

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 प्रकृति के विरुद्ध,

 मानव वैज्ञानिक 

 आविष्कारों के अधीन 

  पराधीन जीवन।

 मानव के सारे काम 

यंत्रवत, 

सोच रहा है मानव

 प्रकृति हमारे वश में,

 पर प्राकृतिक बिगाड़ 

 ऐसा खतरा, 

कुपित प्रकृति से बचना 

 अति मुश्किल।

 सुनामी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण।

धनुषकोटी का विनाश 

 आधुनिक प्रमाण।

 मनुष्य के आविष्कार  से पता लगाये  आवागमन के साधन,

 कारखानों के विकास,

 उनसे निकले धुएँ,

 गर्म  वायु ,

 जंगलो का विनाश 

 नगरीकरण नगर विस्तार के नाम से

झीलों का नदारद

भूमि को गर्मा गर्म

   बना रहा है,

 परिणाम स्वरूप 

 बर्फीली चट्टानें,

पर्वत पिघल रहा है,

 इस परिस्थिति के 

 विपरीत  ऐसी स्थिति  होगी,

 जलप्रलय होगा,

पिघलने वाली 

चट्टानें 

 भूमि गर्मीकरण ,

अकाल की पूर्व सूचना।

 समुद्र जल स्तर में वृद्धि, 

पीने के पानी का अभाव,

 बाढ़  आने की  सौभानाएँ,

समुद्री भूकंप,

ज्वालामुखी विस्फोट 

 भू-स्खलन  आदि

 भयंकर  भावी

 संकट की सूचना।।

 इन बातों पर 

  ध्यान रखकर,

 अति सावधान से

 न रहें तो 

मानव जीवन 

  जीना दूभर।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित रचना।


आपकी रचना का भाव अत्यंत सामयिक है। इसमें ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति के प्रति मानव की उपेक्षा का प्रभावशाली चित्रण है। भाषा को थोड़ा परिष्कृत करने और प्रवाह बढ़ाने से यह और अधिक प्रभावशाली बन सकती है।


पिघलती बर्फीली चट्टानें

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

25-7-2027

प्रकृति के विरुद्ध

मानव के वैज्ञानिक

आविष्कारों ने

जीवन को

यंत्रवत बना दिया है।

मनुष्य सोचता है—

प्रकृति उसके वश में है,

किन्तु प्रकृति का संतुलन

बिगड़ने पर

उसके प्रकोप से बचना

अत्यंत कठिन है।

सुनामी इसका

प्रत्यक्ष उदाहरण है।

धनुषकोडी का विनाश

आज भी

उस त्रासदी की

याद दिलाता है।

आवागमन के बढ़ते साधन,

कारखानों का विस्तार,

धुएँ और गर्म गैसों का उत्सर्जन,

जंगलों की कटाई,

नगरों का अनियंत्रित विस्तार,

झीलों का लुप्त होना—

ये सब मिलकर

धरती को

लगातार गर्म कर रहे हैं।

परिणामस्वरूप

बर्फीली चट्टानें

और हिमालय के हिमनद

तेज़ी से पिघल रहे हैं।

यदि यही स्थिति रही,

तो जलप्रलय,

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि,

पीने के पानी का संकट,

बाढ़, सूखा,

भूस्खलन,

समुद्री भूकंप,

ज्वालामुखी विस्फोट

जैसी अनेक प्राकृतिक आपदाएँ

मानवता के सामने

गंभीर चुनौती बन जाएँगी।

समय रहते

यदि हम

प्रकृति का सम्मान करें,

पर्यावरण की रक्षा करें

और सजग बनें,

तभी मानव जीवन

सुरक्षित और सुखमय

बना रह सकेगा। – एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई :::**

आप चाहें तो मैं इसे और अधिक काव्यात्मक छंदबद्ध शैली में भी परिष्कृत कर सकता हूँ।

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