Saturday, April 25, 2015

श्री शंकराचार्य और विषय वासना -मनुष्य दशा -

                                 मनुष्य और स्वभाव गुण 


आचार्य  श्री  शंकराचार्य  सहज स्वाभाविक गुण  के बारें में   अपने  

"विवेक चूडामणि " ग्रन्थ में 

विषय गुण  की निंदा करते हैं. 

 हर एक जीव के एक स्वाभाविक  गुण प्रेम और आसक्त होता है I 

यह स्वाभाविक आकर्षण ही 

उस जीव के अंत या धोखे के कारण बनते हैं.

ये विषय वासना हैं --

नाद ,स्पर्श ,रूप ,रस ,गंध आदि  

 विषयवासना  में एक   से   प्रेम होने पर उसका अंत निश्चय हैं I

हिरन  नाद के प्रेम में फँस जाता  हैं तो  हाथी स्पर्श के   कारण ,

पतंग रूप आकर्षण के कारण ,

मछली स्वाद रस के कारण ,

भ्रमर  सुगंध  के  कारण  

अपने -अपने प्राण तक त्याग देते हैं I 

 एक एक स्वाद  या विषय वासना वाले जंतु -पशु  को 

अपने  जीवन - प्राण संकट  में   डालना पड़ता हैं  तो 

मनुष्य की गति पर  विचार कीजिये  I 

 उसको पाँचों विषय वासानायें आकर्षक   हैं I 

वे  विषय -वासना  के गुलाम  या बेगार भी हो जाते हैं I

उसकी गति कैसी होगी ?

विषय वासना से बचिए I

एक शिकारी  बाजा बजाकर  उस  संगीत के मोह से हिरन को पकड़ लेता है.

हथिनी  की खोज  में हाथी हड्डे  में गिर जाता है .

पतंग  दीप के शिखर की रोशनी  में गिर जाते है 

कीड़े खाने के मोह के कारण  तो 

 मछली काँटे में फँस जाती है.

फूल के सुगंध अली  कली में कैद हो जाता है.

ये पाँचों जीवों को एक ही विषय वासना हैं .

इक  वासना एक एक को संकट  में डाल देता है.

मनुष्य  में ये पाँचों विषय वासनाएँ सम्मिश्रित हैं.

वह नाद ,स्पर्श ,रूप ,रस ,गंध आदि पाँचों विषयों में मोहित हो जाता है.

उसकी दशा -दुर्दशा कैसे  रहेगी .

देखिये  -मूल  श्लोक :--

शंदादिभिः पञ्चभिरेव  पञ्च   

पंचात्व्मापु: स्वगुणैन  बद्धाः I

कुरंग्मातान्ग्पतन्ग्मीन -

भृंगा नरः  पंच्भिरंचितः  किम I






             

Friday, April 10, 2015

भारत की न्याय व्यवस्था मर रहीं है.

क़ानून  भारत  में  ,अमीरों को  सजा  स्थगित रखता है;
गरीबों  को और गरीब  बनाता है;

पियक्क  अभिनेता का  मुकद्दमा सालों चला ,

अभी एक ड्राईवर का गवाह  हैं गाडी मैंने चलाई;

मुख्य मंत्री का  मुकद्दमा  सालों चला,

न्याय सुनाने के बाद अपील में  कहते हैं 

अठारह साल पहले   दाम कम ,

सजा क्या सुनायेंगे पता नहीं.

अभी आंध्रा में बीस तमिलनाडु  के 

चन्दन पेड़ काटनेवाले अपराधियों को 

पुलिस  ने गोली चलाकर  मार डाला.

वे अपराधी है या नहीं  पता नहीं ,
पर तमिलनाडु सरकार ने  का दिया  

हर  गोली  के शिकार  हुए लोगों  को 

तीन लाख सरकार देगी.

छे  ही अपराधी नहीं ,लेकिन सब को तीन  लाख.

आत्महत्या करने वालों को कई लाख ,

यह तो आत्म हत्याके लिए प्रोत्साहन.
अपराधियों के लिए प्रोत्साहन ,

दिल्ली  में तो बलात्कारियों को साक्षात्कार और रूपये.

भारत  की न्याय व्यवस्था  मर रहीं है.


Tuesday, April 7, 2015

भगवान है या नहीं.भगवान खुद नाराज.

आज  भी चर्चा है  --भगवान  है या  नहीं.

है तो  अपराध क्यों ?

है तो भ्रष्टाचार क्यों ?

हैं तो भगवान के दर्शन में धनी-निर्धनी का भेद  क्यों ?

क्यों  मनुष्य गुण में फरक?

भेद /अंतर /फरक /डिफरेंट इतने शब्द   क्यों ?एक ही 


अर्थ के लिए.

बैल गाडी से जेट  तक वाहन.

गोरे /काले .सुन्दर -भद्दे लम्बे -नाटे 


काँटे-फूल  इतने फरक .


सूर्य -चन्द्र तारे  पानी हवा  सब जीने का आधार एक.


भगवान  एक . उनकी सृष्टि  में अंतर.


दस हज़ार देने पर   दस लोगों को 




एक घंटे में खर्च करता है एक,

एक तो  दस को बीस हज़ार बनाने में चतुर.


एक तो दान -धर्म ,फिर खाली हाथ.


दस हज़ार तो बराबर बांटे गए.



एक बन  गया करोडपति 

,
एक पीकर अर्द्ध नग्न फुट पात पर,


इसमें  दाता का दोष क्या?

यों ही मनुष्य की  सृष्टि तो बराबर ;

पर  उनके कर्म फल  को ईश्वर नहीं बनेगा जिम्मेदार.



देखो मनुष्य का करतूत ;


वह खुद भगवान बनाकर  कर दिया छिन्न-भिन्न 


.
पैसे का सदुपयोग करके अपने धर्म का विकास न करके ,
कुकर्म से करना चाहता एकता

.
भगवान खुद हो जाता नाराज .


भगवान सोचता ,मेरी ही हालत ऐसी तो




कितना  अधर्मी -पापी मनुष्य

 ;
जुलुस निकलता उस दिन छा जाता आतंक -भय भीत.

मेरे नाम पर कलंक ; करोड़ों का  बर्बादी 

.

नहीं हुआ कोई विकास;




आजाद भारत में  मेरी स्तिथि 

कई लोग गरीबी में ,


बोलता है पैसे लेकर बन जाता  हिन्दू विधर्मी .


हिन्दू तो  क्या करता गरीबों के विकास में.


धन आश्रमों में मंदिरों में 

,
दान दिए खेत हदापते अधिकारी या राजनीतिज्ञ ;


सोना -चाँदी लूटते 

,
भगवान के दर्शन के लिए टिकट.


तहखानों में जो सोना -चाँदी  धीरे धीरे नदारद.


अपराधी की प्रार्थना उसके काले धन से 


करूंगा क्या इनकी भलाई ;



भगवान खुद नाराज.