Thursday, June 30, 2016

चरित्र बल

मनुष्य   पशुओं  से  श्रैष्ठ  कयों ?
मान - अपमान की करता  है चिंता।
मित्रता निभाता है, मितव्ययी होता है,
  मार्ग भ्रष्ट होने पर भी,
मर्यादा की रक्षा   ही  चाहता  है।
मनुष्यता  कुचलके जीना दुश्वार है।
   धन - बल,  चरित्र बल दोनों में
केवल धन बल को ही प्रधान मानना
चरित्र बल को  अवहेलना ,
मनुष्यता खो  दैना, पशुत्व जीवन।
    एक लुटेरा गुरु नानक सत्संग में आया,
  उनसे कहा,  मैं अपने कर्मों से हूँ दुखी,
मैं  तो निर्दयी, लूट मार कभी छोड नहीं सकता।
ऐसा उपाय बताना, मैं अपना धंधा  भी करूँ,
मानसिक शांति भी पाऊँ।
गुरु ने प्रसन्न मन से सलाह दी--
न छोडो,अपना  कर्म ,पर एक काम करना।
दिन भर के तेरे कर्मों  की सूची बनाना,
कल सत्संग में आकर सूची पढना।
वह तो चला गया , फिर वापस नहीं आया।
चंद दिनों के बाद सत्संग में भाग लेने आया,
आया  तो वह रहा अति विनम्र, सज्जनता का प्रतीक।
गुरु चरणों पर गिर पडा।
कहा- आप की सलाह अक्षरसः मानी।
मेरे कुकर्मों  की सूची बढी।
खुद  पढ - सोच अति  शर्मिंदा हूँ।
कैसे भरी सभा में पढूँ ,सुनाऊँ।
छोड| दिया अपना सारा बुरा कर्म।
मिल गई मानसिक शांति। संतोष।
मान -मर्यादा  चरित्र बल में,
धन बल में तो  भ्रष्ट धनमें तो
केवल बचता अपमान , बेचैनी, असंतुष्ट।
  चरित्र निज गढना,   मानसिक शांति।
तुलसी का यह  दोहा हमेशा याद रखना--

गो धन, गज धन , बाजी धनल,रतन धन खान।
जब तक न आवे संतोष धन सब धन धूरी  समान ।।

Wednesday, June 29, 2016

राम नचावत

ईश्वर का  नाम रटकर  घने वन में
पद्मासन लगाकर बैठ गया  मानव।
आधी  रात एक डाकू  गया  , अंधरे में
टकराया, तपस्वी मानव संभल गया--
बोला-- वन दुरगा ।अच्छा  रखो।
डाकू  शकुन माना , लूटने  गया मिला बडा  मैं  माल।
सोचा,  साधु  का  प्रभाव।
यों ही  रोज| मिलता  धीरे - धीरे बन गया रईश।
कई|  महीने  बाद| साधु बोला,
आगे  से  लूटना  छोड, मेरा एक आश्रम बनवाना
शुरु  करो, तुमको जाना  नहीं, केवल मेरे पास
खडा  रहना, ढेर सारा  माल अपने आप आएँगे।
जो  आते  हैं , उन्हें  अनुशासन| से बिठा देना।
पेट भर अन्नदान करना। भीड जमैगी तो
व्यापार  शुरु  करना, चित्र , चाबी  का गुच्छा,
प्रसाद की मिठाइयाँ,  रंगबिरंगे चित्र , मूर्तियाँ
विशिष्ट चाँदी - और सोने का तावीज।
मेरा  स्वरणासन, सोने  का  मुकुठ, फिर धीरे कहना
स्वामी  की इच्छा  स्वर्ण रथ, हीरै जडित मुकुठ।
बडे - बडे  विद्वान, कवि , गायक आयेंगे,
कीर्तन करेंगे, गाएँगे,नाचेंगे, उन का बडे राशी से
गुप्त सम्मान| देना। मंत्री, अधिकारी, पुलिस का
ऐसा  सम्मान, ऐसे वजन प्रसाद  ,वे आएँगे तो आएँगे दल - सेवक,   उनका केवल भोजन- ठहराव पडाव।
प्रचारकों को  सुनो, रसीद पुस्तक छापो, आय कर अदा कर दो।
सब हीं नचावत राम गोसाई।

मन माना

मेरे लिखित विषय के चाहकों  को मेरे  हार्दिक बधाइयाँ। ।

जी  न तौडना, जी जान  से प्यार करना,
जी से प्रकटे सुविचारों   का जीवन्त परिणाम!
जी ,हमारे गरु जी  की आशीषें।
जी ठीक नहीं तो कर्म  भी सही नहीं।
कर्म  ठीक नहीं तो सहा  नहीं जाएगा।
पवित्र जीवन  के लिए पवित्र  सद्विचार।
प्यार प्यार प्यार , इश्क , मुहब्बत
बिगाड देता युवा वस्था।
मंडन मिश्र का तोता  बोलता वेद मंतंर ।
चित्रपट  देख जवानी बोलती -- इश्क ,इश्क ।
बलातकार, सार्वजनिक चुंबन।
सोचो विचारो दूर रहो अश्लीली नजारों से ।
जी ,मन| रखो  पवित्र, मनमाना करने से बचो।।

विस्तृत   हिन्दु धर्म,
वट वृक्ष , कई  ठगों को जीने का आधार।
अपराध करो, दाडी रखो, भजन करो।
मंदिर बनाओ। बनवाओ।
मंदिर के बाहर मनमाना दूकान खोलो।
दूकानों की भीड, ठगे जाने पर भक्ति भंग।
त्रिगंबेश्वर   गया, रुद्राक्ष नकली।
स्थानीय पुलिस ,अधिकारी सब| को मालूम।
कोई| रोकता नहीं,कितना अन्याय।
हर मंदिर में दर्शन पाँच मिनट से कम।
खूब चलता व्यापार अनेक।
भक्ति के नाम दीक्षा का व्यापार।
  आश्रम  हजारों करोडों की संपत्ति।
राजनीति के आड में बेनामी काला धनी।
स्वर्णासन हीरे जाडित स्वर्ण मुकुट।

बाह्याडंबर  की चरम सीमा।
भिखारियों की भीड, चराए बच्चों को
अंधा - लूला- लंगडा बनाकर
जान बूझकर  भीख| देना कितना पाप।
बद्माश  जबर्दस्त वसूल,
विघ्नेशवर की मूर्ति बनाकर
करते मूर्ति का अपमान।
करोडों के रुपये , भगवान का अपमान।
उन रुपयों को गरीबों  में खर्चकरें तो
स्लम रहित , झोंपडी रहित भारतीय नगर ।
सोचो, समझो, आगे  रचनातमक काम करो। ॒

Tuesday, June 28, 2016

सोचो

विस्तृत   हिन्दु धर्म,
वट वृक्ष , कई  ठगों को जीने का आधार।
अपराध करो, दाडी रखो, भजन करो।
मंदिर बनाओ। बनवाओ।
मंदिर के बाहर मनमाना दूकान खोलो।
दूकानों की भीड, ठगे जाने पर भक्ति भंग।
त्रिगंबेश्वर   गया, रुद्राक्ष नकली।
स्थानीय पुलिस ,अधिकारी सब| को मालूम।
कोई| रोकता नहीं,कितना अन्याय।
हर मंदिर में दर्शन पाँच मिनट से कम।
खूब चलता व्यापार अनेक।
भक्ति के नाम दीक्षा का व्यापार।
  आश्रम  हजारों करोडों की संपत्ति।
राजनीति के आड में बेनामी काला धनी।
स्वर्णासन हीरे जाडित स्वर्ण मुकुट।

बाह्याडंबर  की चरम सीमा।
भिखारियों की भीड, चराए बच्चों को
अंधा - लूला- लंगडा बनाकर
जान बूझकर  भीख| देना कितना पाप।
बद्माश  जबर्दस्त वसूल,
विघ्नेशवर की मूर्ति बनाकर
करते मूर्ति का अपमान।
करोडों के रुपये , भगवान का अपमान।
उन रुपयों को गरीबों  में खर्चकरें तो
स्लम रहित , झोंपडी रहित भारतीय नगर ।
सोचो, समझो, आगे  रचनातमक काम करो। ॒

Monday, June 27, 2016

शिव शिव बोल ।

शूल  शिष्य सुरेंद्र 'जीतू' माँगी मित्रता मानी।
शुक्रिया शूल 'शूल' शिष्य सुरेन्द्र 'जीतू'।

त्रीशूल , कटी  बाघ वस्त्र, हाथ में डमरु , हिरण।
सर्पाभूषण वह देव , भक्तवत्सल  वह जान।
शिव ,शिव बोल, शिखर पर पहुँच।
चिंता छोड, चित्त में जप , शिव ,शिव ।
वर मिलेगा मन चाहा, तरंगें संतोश , शांति की
उठेंगी जान।  बोल ओम नमः शिवाय ।शिवाय नमः ।।

इश्क

इश्क की शायरी गाते हैे सब।
राजनीती  में प्रमख  की कहानियाँ
राजा की कहानियाँ सब के सब इश्क भरी।
अब मंच तक चूमने की कला आ गयी।
मुख्य मंत्री को खुली जगह में चूमना
आज ताजी खबर हो  गई।
चुंबन , आलिंगन ,प्यार भारत| में
आधी रात का  खेल।
अंग्रेजी इतनी शिक्षा दे रही  है,
खुली जगह| में पशु - सा
चूमने की क्रांति शुरु हो गयी।
मुख्य मंत्री  को चूमना , मंत्री  का मंद हास ,
लोकप्रिय हो गई।
पढे - लिखे  स्नातक, स्नातकोत्तर,
तकनिकी   कोमल अभियंता,
इतनेी शिष्टता सीखकर आ गये,
सुद्रतट पर, सार्वजनिक बाग ,
जहाँ जरा  उनके मन में एकांत सूझती,
भीड  की नजरों की किरणों पर  न पडती
पशु -  सा , गली  के  कुत्तों  सा व्यवहार।
धोबी की बात न सहा  गया राम।
पर    चार की पतनी   मंत्री की पत्नी
मर गई पता  नहीं  आत्म हत्या  या  हत्या।
पशु - सा  इश्क व्यवहार गाँवों में नहीं खुलता ,
शहरों में तो मुखंय मंत्री  के  मंच तक आ गया।
  साहित्य में   आगे  इश्क का संयम सिखाना।
रोज खबरे यवतियों की हत्या - बलात्कार।
आ| सेतु हिमाचल  विश्व विद्यालय तो बढ गये।
स्नातक , स्नातकोत्तर बढ  गये पर
बद् चलन  बद्मासी भी  बढ गई।
शिक्षा संस्थानों में जेएनयू सा 
अनुशासन भगाया  गया।
राष्ट्रीयता हो रही  है भंग।
असंयमी कर रही तंग।

व्यर्थ व्यर्खव

हाथ जोड आँखें बंद  प्रार्थना ।
    पद्मासन बैठ  हस्त मुद्रा रख प्रार्थना।
घुटने टेक आँखें मूंद इबादत।  वंदनन।।
मनुष्य  अपने वैवाहिक, सामाजिक, राष्ट्रीय
बंधन  में   नाम पाने,नोकरी पाने , धन पाने,
योग्य वर,वधु  पाने, संतान पाने,
प्रार्थना ही प्रार्थना। यह तो स्वार्थ।
ऐसी प्रार्थना चाहिए ,जिससे
भ्रष्ट  , निर्दयी , बलातकारी, रिश्वतखोरियों को
मिले दंड।
क्या  ईश्वर सुनेंगे ? सुनेंगे नहीं। कभी नहीं।
ये भ्रष्टाचारी नहीं तो  मंदिर वातानुकूल नहीं बनता।
हुंडी नहीं भरता। रेशमी साडियाँ डाल ,
घी  के घडे उंडेलकर  बाह्याडंबर का यग्ञ -हवन नहीं।
लक्षारचन  - कोटियार्चन नहीं चलता।
हीरे जडित स्वर्ण मुकुट नहीं  मिलता।
   जेल से बचने करता है  यग्ञ।
चुनाव जीतने यग्ञ।
खुद  आश्वर   भ्रष्ट बन गये।
प्रेम के चक्र  में  खुद लडे युद्ध।
   अतः भ्रष्टाचार दूर करने
     ईश्वर  प्रार्थना व्यर्थ। व्यर्थ।।

Saturday, June 25, 2016

निष्काम कर्म फल.

कहते हैं---निष्काम सेवा करो; फल की प्रतीक्षा भगवान पर छोड दो.

वास्तव में सोचो , कितने निष्काम सेवकों को मिला है सम्मान.

नेता को कितना सम्मान ,सेवकों के कारण .

मंदिर के गर्भ-गृह के देव-देवी के सम्मान पुजारी के कारण.

सच्चे सेवक निष्काम कर्मक पर न किसी काध्यान.

खुशामद करो, साथ चलो, हाँ में हाँ मिलाओ ,

धन जोड़ो, दान करो,दानी का सम्मान एक दिन.

ज्ञानी का सम्मान उसके स्वर्गवास के बाद.

निष्काम सेवा कर, कर्मफल जरूर आपके वंशज भोगेंगे.

पेड़ लगा रहा था , बूढा!

राहगीर ने पुछा---फल देने दस साल लगेंगे.

क्यों करते हो यह काम; तुम तो भोगोगे नहीं.

बूढ़े का अंग तो अति शिथिल,

कमान सा बन गया शरीर वह बोला--

मेरे कर्मफल न मिलेगा तो मुझे,

मेरे वंशज तो फल भोगेंगे ;

और किसी को फल मिलेगा ही;

यही है निष्काम कर्म फल,परोपकार.

सोचो, करो, निष्काम कर्म. फल तो मिलेगा ही.


पोशाक

पोशाक हमारेपूर्वजों ने हर जगह जलवायु के अनुसार ही बनायी है.

ऊनी ,सूती. ढीले कपडे. हवादार. आज कपडे अंग प्रदर्शन चिपकी पोशाक.

कहते हैं नियंत्रण-संयम की बात. अश्लीली फ़िल्म.अंतर्जाल की माया


एकअर्द्ध या पूरे नग्न दर्शक लाख; माया से बचना कितना संभव.


रूपवती शत्रु , अतिरूपवती सीता पति राम के दुःखके कारण;


अंगप्रदर्शनी पोशाक युवकों का आकर्षण


जानती बहनें आजकल बेचारे युवकों को छेड़ने लगती. 


प्यार महल ताजमहल, मुमताज के असली पति की हत्या;


शाहजहाँ कितना क्रूर ,वह तोअपनी बेटी प्रेयसी कोजिन्दा उबालते पानी में दाल


मार डाला. महल तो सुन्दर, वह तो प्रेमकी निशानी नहीं, 


हत्या कामहल; असलियत छिपा बोल रहे हैं प्रेम की निशानी.


जितना अन्याय सबको छिपाना--कबीर ने कहा--माया महा ठगनी.


पोशाक सही नहीं तो वैसी लड़कियों को समाज अति कुदृष्टि से देखेगी भारत में.


ईश्वर ने ऐसेही बनाया है; इंद्राको बद नाम ,चन्द्रको बदनाम. रावण को बदनाम;


सोचो; समझो ,


आगे पोशाक शरीर ढकने ,

 न चिपक दर्शन.

जरा सोचो . अपने को भद्र बनालो.

Friday, June 24, 2016

मजहब -- मतलबी

खुदा  नजर  करता है  अपनी ताकत ;
उसी की ,
तालीम .
मनुष्य    ठगाने, डराने
बनाता   है   खुदा रूप.
बीमारी,    गरीबी, अमीरी
ईश्वर की  देंन.
इसी  बहाने  चालाकी
कमाता है  झाड़ू-मन्त्र के नाम.
न किसी को   अल्ला पर  भरोसा.

दलालों के पीछे पड़,

इंसान-इंसान  से लडवाकर,

समझता    है ,समझाता  है  मजहबी.
यकीनन   वह  है मतलबी.

अर्थ विहीन शिक्षा

लिखता हूँ मन के विचारों को

कितना लिखता हूँ,

उतने विचार ,उतनीअभिव्यक्तियाँ

फिर पढता हूँ तो ऐसी ही लगती,

उन बातों को किसी महानों ने कही है कभी.

मैं सोंचता हूँ मैंने लिखा है अभी.

प्यार की बातें हैं पुरानी.
ह्त्या की बाते हैं पुरानी.

पत्नी अपहरण की बातें हैं पुरानी.
छद्म वेश में बलात्कार

पत्थर बनी अहल्या.

आज भी लोग सुधारें नहीं,


शिक्षा बढ़गयी;


विश्वविद्यालयों की संख्या बढी

.
स्नातक, स्नातकोत्तर, अनुसंधानकर्ताओं कीसंख्याहै बढी,

जितनीशिक्षा बढ़ती हैं,

उससे तेज भ्रष्टाचार है बढ़ती.

उससे तेज़ रिश्वतखोर बढ़ती.


उससेअधिक पियक्कड़ बढ़ते.


उससे अधिक आत्महत्याएं बढ़ती.


उससेअधिक शोषण बढ़ता;


उन सब से अधिक महंगाईबढ़ती

.
बीए की बढ़ाई मैंनेखर्च किया ६००/-


एम्.ये. केवल रूपये सौ.


बी.एड., हज़ार.


एम्.एड., छे सौ.

अब शिशु पाठ शाला ,
तीन साल के बच्चे के शुल्क

न्यूनतम पाठशाला--२५०००/-


अधिकतम सात लाख.


ऐसी शिक्षा जिससे लगे मातृभाषा सीखना


गौरी शंकर की चोटी पहुंचना.


नौकरी तो अमावास्या में चाँद देखना.


सांसद बनना सौ करोड़.


भ्रष्टाचार तो लाखों करोड़.


शिक्षा का विकास साथ ही


तलाक के मुकद्दमा की संख्या बढ़ती रहती है

.
अपाराध जब बढ़ रहे हैं,


शिक्षा का मूल्य कोई नहीं.


अनुशासन, चरित्र विहीन शिक्षा


अर्थ- प्रधान शिक्षा क्या प्रयोज़न .?


दशरत के तीन रानियाँ तो गलत रीति,


आजकल रखैल अधिक बड़े लोगों की.


अर्थकी कमीनहीं, करोड़ोंरूपये हैं


गोलमाल के.


पर जीवन ही बन गया अर्थ विहीन.

Thursday, June 23, 2016

विशवास


आकार में बौना,
दान की माँग
देने तैयार तो विराट रूप ।
ईश्वरीय अवतार में भी ठग।
बली का कोई दोष नहीं।
पर इंद्र के पद की रक्षा।
बलवान वाली का सामना
आगे खडे होकर नहीं ,
ईश्वरीय शक्ति ने भी
छिपकर वार किया ।
धर्म की विजय धर्म पथ पर नहीं
भगवान ने भी जोर से बोलने
और धीमा कहने दिखाते हैं मार्ग।
इतना जानकर भी हमें विश्वास है
सत्य धर्म की विजय होगी जरूर।

स्वर्ग नरक भूलोक में

स्वरग  नरक अलग नहीं    सब इस लोक में।
राम   भी अधिक रोये।  कृष्ण भी कष्ट झेले।
निराला की कहानी  नरक तुल्य ।
प्रेम चंद  व्यक्तिगत कष्ट जो भोगते
मानसिक दुख जो भोगते
नींद नहीं अाती खाना पचता नहीं।
रोग पीडित बुढापे में अनाथ
दरिद्रता दुख अमीरी आतंक
  नामी अ भिनेता आराम से बाजार नहीं घूम सकता।
अमीरी बीमारी ।विधुर विधवा
सोचो समझो नरक नहीं और कहीं
नरक - स्वर्ग तो भूलोक में ही

सब को नचावत राम गोसाई।

मन कहता है कुछ लिखूँ?
मन की बात। मानकी बात।
दे श की बात । ग्ञान की बात।
पर मेरी बुद्धी  तो कच्ची।
शब्द नहीं निकलते अच्छी।
  बातें पुरानी ही निकलती सच्ची।
सत्य ईमानदारी परोपकार धर्म कर्म।
पूर्वजों की बात सै बढकर
जन्म - मरण के  बीच कुछ नहीं।
जिओ- जीने दो।
प्राण जाए पर वचन न जाए।
राम नाम जपो, रम्य जीवन बिताओ।
प्रेम मार्ग  बदले ,भक्ति में।
नर हो न निराश करो मन को।
इन से बढकर कुछ नहीं।
कुछ करके दिखाओ।
करने कराने करवाने चाहिए कृपा
जगदीश्वर की।
सब ही नचावत राम गोसाई।