Saturday, April 30, 2016

प्रतिबंध टूटना --काम -- तिरुक्कुरळ -१२५१ से १२६०

प्रतिबंध टूटना--काम-   तिरुक्कुरल -१२५१ से १२६०

१. लज्जा की सुरक्षित कुंडी को  कामेच्छा का आरा तोड. देता  है.

२. सब के सब आराम की  नींद सो रहे  हैं, तब. बेरहमी बनकर कामेच्छा मेरी नींद को भंग करती  है.


३. जैसे  छींकने को हम रोक नहीं  सकते  वैसे ही कामेचछे को रोकना  हमारे  वश. में  नहीं है. प्रकट ही होती  है.

४. मैं सोच रही थी मन मेरे काबू  में है, पर कामेच्छा मेरे दृढ विश्वास को तोडकर प्रकट हो ही  जाती  है.

५. निर्दयी  प्रेमी के छोड. जाने  के  बाद. भी  मन को निमंत्रण में  रखने  की शक्ति प्रेमियों में नहीं  है. मन प्रेमी को भूलती नहीं  है.

६. प्रेमी मुझसे  घृणा करके  चले  गये. फिर भी  दिल  उनके पीछे चलता  है तो  मन. की  स्थिति के बारे  में क्या कह सकते  हैं.

७. प्रेमी  की इच्छाओं  को पूरी  करते  समय  लज्जा  नामक  एक  गुण   नदारद  हो  जाता  है.

८. स्त्रीत्व के आरक्षण को चोर प्रेमी के माया भरी वचन  तोड देते  हैं.

९. रूठकर  वापस. आने  प्रेमी  से मिलने  गई  पर कामाधिक्य  के कारण  संभोग. करना ही पडा.

१० चर्बी  को आग में डालने  पर  पिघल जाना  उसका गुण  है ,वैसे  ही संभोग के आनंदानुभव  के बाद रूठना असंभव. है.

स्वगतभाषण ---काम--तिरुक्कुरल ---१२४१ से १२५०

स्वगत भाषण -- काम -- तिरुक्कुरळ - १२४१से १२५०

१. हे दिल!   मेरे प्रेम रोग असाध्य. है.  उसे चंगा  करने एक दवा का पता लगाकर देना .

२. अपने  दिल  को संबोधित करती  हुई. प्रेयसी  कहती  है
 कि  प्रेमी तो भूल गये ,पर हम उनकी याद. में  है. सचमुच. दिल! तू बडा  है.


३. विरह वेदना  में तडापाते वे छोडकर. चले  गये. हे दिल ! उनको  सोचने  से  क्या लाभ. उन्हीं के कारण यह रोग आ गया  है.

४. हे  दिल! जब तू प्रेमी की याद. में  चलता  है, तब आँखों को  भी  साथ. ले  चल. नहीं तो उनको देखने के  लोभ के  कारण वह मुझे  ही खा  लेंगी.

५. दिल ! वे मुझसे  प्रेम नहीं करते   !नफरत. करते  हैं  यों सोचकर  क्या हम. उसको  भूल. सकते हैं? कभी नहीं.

६. हे दिल ! उनसे  मिलते समय बहुत खुश होता था,कभी तूने  नाराज न होता  था. अब का  नाराज. तो झूठा ही है  न!.

७.मेरे  दिल!  एक तो  कामेच्छा  छोड दो या   लज्जा  छोड  दो. इच्छा  और. लज्जा दोनों  सह नहीं सकता.

८.  बेरहमी  से प्रेमी छोडकर. चले गये . उनके  पीछे  ही  जानेवाला  मेरा मन बुद्धू  ही  है.

९. हे दिल ! प्रेमी  तो तुममें ही  है , उनकी  तलाश में कहाँ बाहर ढूँढ रहे  हो.

१०. प्रेमी तो न चाहकर चले  गये  फिर भी  मन  उनकी   ही  याद. में  दुखी  है और. तन  दुबला  पतला  हो  रहा  है.





तिरक्कुरळ -काम- अंग थकना\ शिथिल -१२३१ से १२४०

  तिरुक्कुरल - काम-अंग का थकान - १२३१ से १२४०.

१. प्रेमी  के बहुत दिन के  न आने  से  विरह वेदना  में मेरी  आँखों    शोभा  खोकर

फूलों के  आगे  लज्जित हो  गईं .


२. आँखें  पीली  पडकर दूसरों  से  कह रही  हैं  कि मैं विरह. वेदना  से  पीडित. हूँ.

३. जो बाँहें  मेरे पति के संग में फूली थीं,  वे आज  विरह वेदना  के  कारण फीकी  पड गयी. मेरी विरह. वेदना प्रकट कर . रही  है.

४. विरह वेदना  में हाथ  इतने दुबले हो गये  कि चूडियाँ गिर रही  हैं.  ऐसा  लगता  है  कि  मेरी  विरह वेदना को
दूसरे लोगों को दिखा  रहे  हैं.

५. मेरी  सुंदरता पीली पड गई. हाथों . के  दुबले होने  से  चूडियाँ गिर गई . मेरी अपनी विरह वेदना दूसरों को बता  रही  हैं.

६. मेरे दुबले -पतले शरीर और हाथ. देखकर. दूसरे  बता  रहे  हैं  कि मेरे  प्रेमी निर्दयी हैं.
दूसरों  के  मुख. से  मेरे प्रेमी  क़ा  बेरहम. कहना मेरे  दुख बढा रहा  है.

७. मेरे दिल! उन. से मेरी दीनावस्था  प्रकट करके बताओ. कि लोग तुम. को क्रूर  कह. रहे  हैं. मैं अति दुखी  हूँ.

८. प्रेयसी  से आलिंगन के हाथ ढील होते ही उसके चौडी माथा  पीली पड गया. वह जरा  सी अलग  होना भी सह . नहीं  सकती.

९. कसकर गले  लगाते  समय. बीच. में  हवा  के  प्रवेश के कारण अलग होने के  विचार. से उसकी  आँखें  फीकी  पड गयी. लंबा  बिछुडन वह. कैसे  सहेगी


१०. सुंदर माथे के फीका  पडते  देख. प्रेयसी  की  आँखें  भी पीली पडकर शोभा  को चुक. वह कैसे  दीर्घ. कालीन. विरह सहेगी.

१०.

Friday, April 29, 2016

तिरुक्कुरळ --संध्या का विलाप-काम भाग-१२२१से१२३०

 तिरुक्कुरळ --संध्या  का  विलाप-काम भाग-१२२१से१२३०

१. प्रेमी  से बिछुडकर रहने से  संध्या! तू  महिलाओं केप्राण लेने  के  लिए. आते  हो.

२. अंधकार लानेवालेी संध्या! कया तेरे प्रेमी  भी मेरे प्रेमी  की  तरह निर्दयी है ?

३.मेरे  प्रेमी  के रहते  संध्या !तू डरती हुई  पीला  पडकर आई थी. अब मैं  विरह. वेदना  से दुखी हूँ, तेरा  आगमन. मेरा दुख बढा रहा  है.

४. प्रेमी के न होने से  संध्या  मेरी  हत्या करने आ रही  है.

५. शाम को प्रेमियों का दुख. बढ रहा  है. हमने दिन के हित में क्या किया  है? संध्या  के अहित मं क्या किया  है ,पता  नहीं  है.

६.  मेरे  प्रेमी  के बिछुडकर जाने  के  पहले अनुभव. नहीं किया कि संध्या बहुत दुखप्रद. है.

७. काम का  रोग. दिन. में कली  के रूप. में है और शाम को विकसित होकर फूल बन  जाती  है.

८. पहले  ग्वाले  के बाँसुरी की ध्वनी मधुर. लगती थी. अब. प्रेमी  के बिछुड. जाने  से  गवीले की  मुरली आग बनकर मेरी हत्या करने आनेवाली सेना  की  तरह कष्ट दे  रहा  है.

९. बुद्धि भ्रषट करनेवाली  संध्या  मुझे ऐसा  लगता  है  कि सारे शहर. को  दुख दे रही  है.

२०.
मेरे प्रेमी के बिछुडते  ही  संध्या  की माया मुझे  दुख देकर. मार. रही  है.

स्वप्न दशा - तिरुक्कुरल- काम -१२११_-१२२०



१. जब मैं विरह वेदना  में  तडपकर सो गई , तब पति के दूत बनकर  स्वप्न आया .उस स्वप्न की कृतग्ञ था कैसे पूरी करूँ?

२. मेरे  काजल. लगे  मीन लोचन  सो गये तो स्वप्न में आनेवाले  अपने  पति  से  कहूँगा  कि मैं अब. तक जिंदा हूँ.

३. याद में तो प्रेमी  नहीं  आते. यादें दिन में सताती है. याद से स्वप्न बढिया है, स्वप्न में प्रेमी प्रत्यक्ष आता है. प्रेयसी स्वप्न दशा  में  ही रहना चाहती है.

४. प्रेमी  तो प्रत्यक्ष नहीं आते  हैं. प्रेम दिखाते नहीं है, पर स्वप्न में आते  हैं  तो स्वप्न में ही  दांपत्य सुख मिल जाता  है.

५. प्रेमी  को प्रत्यक्ष देखने  में जो खुशी मिली , वही खुशी स्वप्न में देखते समय मिलती है.

६.  यादें न. आती  तो स्वप्न में देखे प्रेमी को स्वप्न न टूटा  तो  देखती सुखानुभव करता रहता.

७. याद में प्रत्यक्ष न. आकर स्वप्न  में आकर क्यों सताता रहता है ?

८.  नींद में स्वप्न में प्रत्यक्ष आकर प्रेमी ने सुख देकर. कहीं नहीं गये. नींद. के  टूटते  ही  मेरे हृदय. में बस गये. 

यादों के विलाप --तिरुक्कुरळ -काम भाग -१२०१ से १२१०

यादों के विलाप - तिरुक्कुरळ - काम भाग - १२०१ से१२१०


१. मधु  तो पीने के बाद ही नशा चढाता  है.सोचते  ही आनंदोल्लास देनेवाला   काम  मधु  से  अधिक  सुखप्रद. है.

२.मुझसे प्रेम करनेवाले प्रेमी के बिछुडने  से भी काम. की इच्छा   यादों की लहरों में  आनंद ही दे रहा  है. 

३. छींक  का  आना  रुक गया है, अर्थात प्रेमी  याद करके भूल गया  होगा. 

४. मेरे  दिल में जैसे प्रेम. की  यादें हैं , वैसे ही उनके  मन. में  मेरी यादें होंगी ही.

५. प्रेमी  उनके  दिल. में  मुझे स्थान नहीं दिया. पर. मेरे दिल में रहने का संकोच उनको  नहीं है क्या ?

६. चंद. दिन. मैं अपने  प्रेमी के साथ मिलजुलकर रह चुकी हूँ. उन दिनों  की  याद. करके  जिंदा  हूँ ,नहीं तो कैसे  जी सकती हूँ .

७. हमेशा याद रखने से  भी  विरह वेदना  बढ. रही  है. भूल जाती तो मेरी  दशा क्या  होगी.
८. मेरे प्रेमी  की याद में रहने  से  वे मुझपर क्रोध नहीं  होंगे.वही मेरे लिए उनकी  मदद. होगी.

९. प्रेमा कहा करते थे  कि दोनों शरीर. से  भिन्न है, पर जान तो दोनों  की  एक. है. पर वे  अब भूल गये,यह. बात मुझे बहुत. दुख. दे  रहा है.


      १०.  प्रेयसी  चंद्रमा से कहती  हैं  कि  मैं अपने बिछुडे प्रेमी  की  तलाश में  हूँ , अतः उनको  देखने  के  लिए ओझल न होना ,प्रकाश देते रहना.


तिरक्कुरळ- काम भाग- एक पक्षीय प्रेम --११९१ से १२००

 तिरुक्कुरळ -काम भाग- एक. पक्षीय  प्रेम-११९१ _--१२००

१. जिससे  प्नेम  हो गया ,  उसका प्रेम मिल गया  तो मतलब है , बीज रहित फल मिल गया.     निर्विघ्न प्रेम  मिल गया.

२.  प्रेमी  का प्रेम   उचित. अवसर. पर.  मिलना,    मौसमी वर्षा के  समान है जो जीने के लिए  अत्यंत आवश्यक. है.


३. प्रेमी सदा साथ रहने  के निश्चित बंधन में  ही  जीवन का बडप्पन है.

४. प्रेमी द्वारा घृणित नायिका  सुकर्म का पात्र नहीं  है.

५. जिससे हम प्रेम करते  हैं ,  वे प्यार. न. करें तो कोई सुख नहीं मिलेगा.

६. एक पक्षीय  प्रेम से कोई सुख न मिलेगा. काबडी के भार के समान दोनों पलडे एक ही होना जरूरी  है.

७. एक पक्षीय प्रेम में काम की पीडा को प्रेमी महसूस नहीं करेगा. प्रेमी का विवर्ण होना समझेगा नहीं'

८. अपने बिछुडे प्रेमी  से प्यार का मधुर शब्द  न प्राप्त नायिका के समान असहनीय दुख झेलनेवाली और कोई नहीं हो  सकती.

९. प्रेमी का प्यार. न. मिलने  पर. भी प्रेमी की प्रसिद्धी और प्रशंसा  के शब्द प्रेमिका को सुखप्रद ही रहेगी .

तिरुक्कुरळ --काम भाग- मुख विवर्ण -११८१ से ११९०

तिरुक्कुरळ --काम--मुख विवर्ण होना- ११८१ -११९०

१. प्रेयसी  कहती  है  कि मैंने अपने प्रेमी को  बिछुडकर. जाने  की अनुमति  दे  दी. उनके जाने  के  बाद. मेरे  विवर्ण. दशा की हालत को किससे  कैसे कहूँ?

२. प्रेयसी  कहती  है  कि मे शरीर. का  पीला पडना प्रेमी का देन. है; इसे मेरे तन गर्व से कह रहा है.

३.मेरे  प्रेमी  मेरी सुंदरता और  लज्जाशीलता  लेकर. काम रोग और विवर्ण देकर चले  गए.

४. मैं अपने प्रेमी के  सद्गुणों के बारे में  ही  सोचता  हूँ और. कहता  फिरता  हूँ.  फिर भी विवर्ण होना ठग है या और  अन्य दुख ?

५. प्रेमिका  कहती  है  कि देखो! मेरे प्रेमी बिछुडकर. चले गये, मेरे रंग पीला पड. गया.

६. जैसे  दीप के बुझते  ही अंधकार आ. जाता  है ,वैसे  ही मेरे प्रेमी के आलिंगन जरा ढीला पडते  ही तन में विवर्णता आ जाती  है.

७. प्रेमी के आलिंगन   से  जरा हटी तो तन में विवर्णता छा गई.

८. लोग तो प्रेयसी के तन  की विवर्णता  के  बारे  में  ही  कहते हैं. कोई नहीं  कहता कि  प्रेमी अकेले छोडकर. चला  गया  है.

९. बिछुडकर गये प्रेमी अच्छी हालत में  ही  है   तो  मेरे तन विवर्ण  ही रहें.  उनका सुख. ही  प्रधान. है.

१०. प्रेमी के ऐसे  अकेले छोड जाने  की निंदा कोई  न. करें तो  ऐसे विवर्ण और. रोगिन होने  की चिंता  मुझे  नहीं है.


Thursday, April 28, 2016

tirukkural - काम - शिकायत -- ११६१से ११८०

तिरुक्कुरळ -- काम --शिकायत-११६१. से ११७०. तक

 १.  जैसे स्त्रोत का पानी निकालते -निकालते  बढता रहता  है ,वैसे  ही जितना काम की इच्छा  रोग   छिपाते है, उतना  बढता ही  रहेगा.


२.  प्यार के  रोग छिपा भी न सका; उसके  कारक  प्रेमी से लज्जा के कारण कह भी न सका.

३. काम के रोग सह न सकी. मेरी जान काबडी बनकर  एक ओर लज्जा और दूसरी  ओर. काम रोग. लटक रहा  है.

४. काम रोग समुद्र के समान गहरा और विस्तार है  , उसे  पार   करने  जल- पोत नहीं मिल रहा  है.

५. मित्रता  में ही  विरह वेदना देनेवाले  प्रेमी ,पता नहीं दुश्मनी  में  कितना दुख. देंगे.

६. प्यार का सुख समुद्र  के  समान. बडा  है.उसका दुख समुद्र से  बडा  है.

६. इश्क के दुख. सागर में तैरकर  भी  उसके  किनारे  देख  न सकी. अर्द्ध रात्री  में  भी अकेली रहती  हूँ.

७. रात का समय दयनीय  है. सब. को सुलाकर अकेला  है  विरह से दुखी मैं  ही  उसका  साथ  दे रही  हूँ.

८. पति  के  बिछुडने  के दुख  से विरह वेदना    के   कारण रात   लंबी  -सी  दीखती  है,  वह विरह. का दुख असहनीय. है.

९. जहाँ प्रेमी रहते  हैं ,वहाँ  मन. तो  जाती  है , पर आँखें  न जा सकती, इसलिए अस्रु बहाती रहती  है.

तिरुक्कुरल - काम भाग -पतिव्रता धर्म - विरह -वेदना.

तिरुक्कुरळ --काम भाग - पतिव्रता धरम - विरह वेदना-११५१ से ११६० तक


१.  पत्नी  पति  से  कहती  है  कि  बिछुडने  की  स्थिति  नहीं  हो तो  मुझसे   कहो.  जाना  ही आवश्यक. है  तो उससे  कहो
और. आग्ञा  लो जो तुम्हारे  वापस. आने  तक जिंदा  रह. सकती  है.

२. पहले पति  के देखने  मात्र. से आनंद. होता था,अब आलिंगन के समय भी डर और दुख  होता  है  कि  उनसे  बिछुडना न पडे.


३. चतुर प्रेमी  के न  बिछुडने  की  बात भी  अविश्वसनीय. है  क्योंकि  बिछुडना तो शाश्वत. सत्य है.

४.  पति  ने  कहा कि  कभी  तुम. को  छोडकर. नहीं  जाऊँगा. पर वचन. तोडकर चले  गये तो  इसमें  मेरी  गल्ती क्या  है?

५. प्रेमी  के बिछुडने  पर. फिर वापस आने क़ी उम्मीद  नहीं  है  तो पहले  ही  सतर्क. रहना  चाहिए. कि वह छोडकर न चलें.

६. प्रेमी  जो पाषाण. दिलवाला  है ,वही  कहेगा कि छोडकर.  चला   जाऊँगा. ऐसे  प्रेमी  से वापस आने का विश्वास  रखना व्यर्थ. है.
७. प्रेमी  के बिछुड. जाने  की  खबर  लोगों को चूडियों की शिथिलता  से मालूम होजाएगी.  अर्थात विरह वेदना  से शरीर दबली हो जाएगा.

८. नाते-रिश्ते रहित शहर में जीना  दुखप्रद है. उससे अति दुखप्रद. बात  है ,
प्रियतम से  बिछुडकर. रहना.

९. आग तो छूने  से   जलाएगा,पर विरह वेदना  बिछुडने  पर अधिक जलाएगी

१०. .पति  के  बिछुडकर   जाने  के  बाद. भी  विरह. वेदना  सहकर जीनेवाले  जग. में
अधिक. होती  हैं. (कमाने या पेशे के  कारण) 

तिरुक्कुरळ- काम- भाग--अफवाहें फैलना. ११४१ से ११५०

 अफवाहें  फैलना --तिरुक्कुरळ-११४१ से११५०

१.अफवाह फैलाने में ही मेरे प्रेम की सफलता  निश्चित हो जाने  की  संभावना  है. इसी  आशा  में मैं  जिंदा  हूँ. अफवाहें फैलानेवाले  यह. बात. नहीं जानते.


२. वह फूल नयनवाली से मेरे संबंध की  जो अफवाहें  हैं, वही  हमारे प्रेम की मदद कर रही  है.

३. हमारे प्रेम की अफवाहें फैलेगी नहीं? वह. किंवदंतियाँ जो  प्रेम न मिलेगी वह  मिलने के संकेत है.

४. अफवाहों  के  कारण. ही  मेरे प्रेम का विकास हो रहा  है.नहीं तो वह. प्रेम लता सूख जाएगी. 

५.  प्रेम की अफवाहों का बढना प्रेम के संबंध को मधुर  बनाता  है जैसे 
मद्यपान के आदी हो  जाते  हैं.

६. प्रेमियों के मिलन सिर्फ एक. ही  दिन है; पर अफवाहें चंद्र को राघु निगालने की कालपनिक कहानी के समान फैलने लगी.

७. प्रेम. को अफवाहें खाद देकर पानी  सींचकर  विकसित करती  है

८. किंवदंतियाँ  फैलाकर  प्रेम भंग. करने  का प्रयत्न  आग बुझाने घी उंडेलने  के  समान. है .

९. जिन्होंने  कसम खाया कि मैं  तुम से  बिछुडूँगा नहीं , वही मुँह फेर लिया तो अफवाहें मझे क्या कर सकती. मुझे तो लज्जा का पात्र बना दिया.मैं तो इन अफवाहों  से शरम नहीं  खाऊँगा.

१०.
लोगों ने ऐसी अफवाहें फैलाई. जिस के प्रति मन में प्रेम है. अब प्रेमी चाहें  तो मेरी मानसिक. इच्छा पूरी होगी. वे मुझसे  विवाह  कर लेंगे.


तिरुक्कुरल - काम शास्त्र भाग-संन्यास की बात करना- १०३१ से १०४० तक


तिरुक्कुरल -काम -- संन्यास. की   बात  करना--११३१ से ११४०

१. प्रेम के कारण दुखी  युवक. को  संन्यास के सिवा और. कोई. मार्ग नहीं  है.

२.
प्रेमी अपनी विरह वेदना सह. नहीं  सकता ; वह. कहता  है  कि मेरे  शरीर. और प्राण तडपने के  कारण  गृह -त्याग   कर दूँगा .इसमें शरम की बात नहीं है.

 ३.  प्रेमी  कहता  है  कि  मुझमें  अति  पौरुष और लज्जाशील. होने  पर. भी  प्रेम के  कारण

प्रेयसी  से   अलग  रहने  से संन्यास ग्रहण करने  तैयार हो गया.

४. प्रेम के बाढ. में  इतनी शक्ति  है  कि  वह  पौरुष 'लज्जा  के  पोत. को बहाकर ले चलता  है.


५. महीन साडियाँ पहनी  मेरी  प्रेयसी  प्रेम. के  साथ  संन्यास के विचार भी दे चली  है.

६. प्रेयसी  के  कारण  मुझे नींद नहीं आती ; अतः अर्द्ध रात्री  में  भी  संन्यास ग्रहण के बारे में सोच रहा  हूँ.

७. बहुत अनंत. काम. रोग. में  तडपकर भी  स्त्री गृह -त्याग. की  बात सोचती  नहीं है. यही नारी जन्म का  बडप्पन. है.

८. नारी दयनीय है, असंयमी है  आदि  बातों  पर ध्यान  न  देकर.
  बिना छिपे प्रकट होना  ही  काम और प्यार है.

९.  मेरे प्रेम. की  बात और किसी को मालूम  न होना चाहिए. इस के डर. से प्ेम गली  में घूम रहा है.

१०.  प्रेम के रोग. से  जो  पीडित. नहीं  है वे ही प्रेमी  को  देखकर  खिल्ली उडाएँगे.

तिरुक्कुरल - काम शास्त्र भाग- प्रेम की विशेषता- १०२१ से १०३०.

 तिरुक्कुरल -काम शास्त्र भाग - प्रेम  का  महत्व - ११२१. . से११३०

१. मधुर  बोली  बोलनेवाली मेरी प्रेयसी के दाँतें  के बीच टपकनेवाला लार  दूध. और  शहद के मिश्रण -सा स्वादिष्ट लगता  है.

२. मेरी  प्रेयसी  और मेरा  संबंध तन और जान  सम है. अलग-अलग  नहीं  रह. सकता.

३.  आँख. की  पुतली!  मेरी प्रेयसी  को  आँखों  में  स्थान देकर तू चली जा.

४.  सद्गुण संपन्न मेरी प्रेयसी से मिलने पर प्राण आ जाता  है,  बिछुडने  पर प्राण  चले जाते  हैं.

५. मेरी प्रेयसी के सद्गुणों को मैं  सोचता  ही  नहीं कयोंकि  भूला  ही  नहीं  तो सोचने की जरूरत नहीं  है.

६ .  मेरे  प्रेमी   मेरी  आँखों में है; कहीं नहीं  जाएँगे.
आँखों को बंद करके खोलने पर भी दुखी नहीं  होंगे. कयोंकि वे अत्यंत सूक्ष्म हैं. 

७. मेरे प्रेमी मेरी आँखों  में  होने  से  मैं काजल. भी  नहीं लगाता क्योंकि काजल लगाने  पर छिप जाएँगे.

८. दिल. में  जो प्रेमी  है, उनको  गर्मी  लगेगी इसलिए मैं गरम  पेय नहीं पीती.ऐसे डरनेवाले  ही सच्चे  प्रेमी  है.

९.  आँखें मारने  से  मेरे प्रेमी छिप. जाएँगे; इसलिए पलक मारती ही नहीं, इसे जो  नहीं  समझते 
कहते  हैं कि वे प्रेमी  नहीं  है.

१०. प्रेम की दंपति   दिल. में ही  जी  रहे हैं ; पर अलग अलग रहते  देख.  लोग कहते  हैं कि दोनों  में प्रेम नहीं  है.


तिरुक्कुरल -- काम शास्त्र भाग -सुंदरता की अतिशयोक्ति प्रशंसा -११११से११२०

तिरुक्कुरळ -काम शास्त्र -सुंदरता की अतिशयोक्ति प्रशंसा 
                                  -११११से ११२० 

१. अनिच्चम नामक फूल तो अत्यंत कोमल. है. मेरी प्रियतमा  उस फूल की तुल्ना में अत्यंत कोमल है.

२. सब कई फूलों की सुंदरता देख चकित होते  हैं. पर मैं अपनी प्रेयसी की नयन फूल को ही सुंदरतम मानकर देखता  हूँ.

३. मेरी प्रियतमा की बाँहें बाँस जैसे हैं, दाँत मोती  जैसे, प्राकृतिक सुगंध, कजरारी  आँखें अति सुंदर. है.

४.मेरी प्रेयसी की आँखों  को कमल  देखेगा तो लज्जित होगा  कि मैं तो उतना सुंदर नहीं हूँ.

५.  अनिच्चम नामक मृदुतम फूल से अति कोमल मेरी प्रेयसी फूल के डंठल  को तोडे बिना  रखने से शरीर दुखने लगा इसी  कारण से उसको सुंदर मंगल वाद्य भी रुचता नहीं है.

 ६.तारे   मेरी प्रेयसी के  चेहरे और  चंद्रमा   में  फरक  न. जानकर

भटक. रहे  हैं. 

७. घट-बढकर दीखनेवाला  शशी तो कलंकित. है  पर मेरी प्रेयसी के मुख -चंद्र  निष्कलंक और उज्ज्वल  है. 

८. शशी !   तुझे मेरी प्रेयसी  बनना  हो तो  मेरी प्रेयसी  के  मुख के  समान  उज्ज्वल होना  है.

९. चंद्रमा! पुष्प  जैसे मेरी प्रेयसी  के  समान तुझको  बनना है  तो  सब को देखने के समान न उदय होना  है. उदय. होने पर कलंकित ही दीखोगे.

१०. अनिच्चम नामक फूल कोमल  है, हंस पक्षी  के पंख कोमल है पर मेरी  प्रेयसी  के पैर. इतना  कोमल. है  कि  मृदुतम फूल -पंख भी चुभने लगेगा.



Wednesday, April 27, 2016

संभोग सुख -गृह -शास्त्र -तिरुक्कुरळ -११०१ से १११०

संभोग आनंद - गृह -शास्त्र -११०१  से१११०


१. इस  चूडियाँ पहननेवाली   रूपवती  में  पाँ च प्रकार के पंचेंद्रिय  सुख 

(स्पर्श ,देख, सूंघ, सुन, जीभ -स्वाद आदि ) मिल जाती  है.

२. रोग चंगा करने कई दवाएँ  होती  हैं; पर प्रेम रोग के इलाज. की एक. मात्र  दवा उसकी प्रेमिका ही है.

  ३.  क्या अपनी प्रेमिका  के कंधों पर सोने  के सुख से कमल नयन के जग का सुख बडा  है ?

४. हटने से गर्मी निकट आने  से ठंड देने वाले तन को प्रेमिका कहाँ से  पाती  है?

५. केसों में फूलों से अलंकृत स्त्री की बाहें जैसे इच्छुक चीजें मिलने पर आनंद होता  है, वैसे ही आनंद प्रदान करता है.ै,अतः 

६. 
प्रेयसी के बाहों के स्पर्श से अत्यंत आनंद मिलता है  प्राणों में उत्कर्ष होता हैै अतः उसकी बाँहें अमृत. से बनायी होगी.

७. सुंदर गोरे शरीर की स्त्री से आलिंगन करने के सुख अपने मेहनत से कमाये धन को बाँटकर खाने के सुख के बराबर होता  है.

८. प्रेमियों के सुख की चरम सीमा तब  होती हैं,जब दोनों के आलिंगन केबीच हवा  भी प्रवेश नहीं कर  सकती.

९. रूठना रूठने के बाद संभोग करना  प्रेम मय जीवन का आनंद होता  है.

१०. आम के रंगवाली  रूपवती के संभोग के हर. बार. ऐसा लगता है   जैसे ग्रंथों को पढने के बाद भी पूर्ण ग्ञान न मिल रहा  है. 




काम भाग --हृदय का संकेत -- तिरुक्कुरळ --१०९१ से ११००

  काम भाग- -हृदय का संकेत-तिरुक्कुरळ- १०९१ से ११०० 

१. प्रेमिका  की  दृष्टियों  में   दो तरह  के  संकेत  है    १.प्रेम रोग  उत्पन्न करना २. प्रेम रोग. की दवा  .


२. प्रेमिका  की अध- खुली आँखों  की दृष्टी     पूर्ण  दृष्टी  से बहुत. बडी  है.

३. लज्जाशील आँखों  की अधखुली दृष्टी  मुझ. पर  पडी  तो  तो वही मेरे प्यार बढने की सिंचाई  हो  गई.

४. जब. मैं जमीन. को  देखता हूँ तब मुझे  देखना , जब. उसे मैं देखता  हूँ ,तब लज्जा  से मुँह. मोड लेना 

उसको मेरे प्रति के प्यार. के  संकेत ही है न ?

५ . उसकी मजर. मुझपर  सीधे नहीं  पडी, आँखें सिकुडकर मुझे  देखकर. खुश. होना  प्रेम के संकेत. ही है. 

६. प्रेम छिपाकर  बाहर  अनयें  के  समान. कठोर. बातें बोलने   पर. भी उस  के मन का आंतरिक. 
प्रेम चंद. दिनों में प्रकट  होगा  ही.

७. सच्चे  प्रेम. के  संकेत है , कठोर शब्द प्रकट,पर दुश्मनी अप्रकट ,दृष्टी परायों  जैसे , परायों का सा व्यवहार आदि. 

८. वह बोलती तो परायों  से बोलने  के  समान पर  जब देखती हूँ  तो मंदहास करती  है,यह. एक प्रेम का  संकेत है. 

९. प्रेमियों का एक विशेष गुण  है  कि सार्वजनिक स्थानों  में उनका व्यवहार. आपस. में  अन्यों  के  समान लगेगा. 

१०. प्रेम की नजरों  से आँखो से आँखें मिलने  पर बोलने की जरूरत नहीं पडती. 

सुंदरता का बर्छा -- अर्थ भाग - तिरुक्कुरळ-१०८१ से १०९०

  सुंदरता का  बरछा - अर्थ भाग- तिरुक्कुरळ -१०८० से १०९०.

१.
मेरे मन मोहक महिला! तू देवी है; तू  मोर है! मुझे सताने और तपानेवाली है.

२.
मेरी  आँखों   से जब सुंदर महिला  की आँखें आमने -सामने  मिलती  है तब ऐसा  लगता  है 'एक शूल का आक्रमण ही नहीं , एक. बडी  सेना  का आक्रमण हो.

३. यम भगवान. के  बारे  में मैंने  ग्रंथों में ही पढा  है. प्रतयक्ष नहीं देखा  है. अब जान गया  कि महिला की आँखों  की बरछी ही यम भगवान. है.

४. नारीत्व के  कोमल गुणों के विपरीत है चुभनेवाली  नारी की आँखें.

५. नारी कीआँखें  तीन. सवाल उठाती  है : १. क्या वह यम है ? २. क्या  वह दलारने का नाता  है ? क्या वह कातर दृष्टियों से  देखनेवाली हरिणी है?

६. नारी टेढी  भौंहें  सीधी  हो जाएँगी तो मुझे कँपानेवाला भय न. लगेगा.

७.   नारी  के कुचों  के ढके रेशमी   वस्त्र   मदमस्त हाथी के आँख पटी  के समान. है.

८. बढी बडी   सेना  के सामने भी न झुके मेरे बलवान  शरीर  नारी के नयनों के आगे विनम्र  हो जाता  है.

९. कातर नयनों की नारी और  लज्जा शील  नारी  को  इनके सिवा और. कोई आभूषण की  जरूरत नहीं  है.

१०.  मद्यपान करने  से  ही  नशा चढती  है' , लेकिन. नारी  को  देखते  ही नशा  चढ जाती  है.



'अधमता -अर्थभाग - तिरुक्कुरळ-१०७१ से१०८०

अधमता -तिरुक्कुरळ -१०७१ से १०८०अर्थ भाग - गृह शास्त्र

१.
अधम भी अच्छेआदमी -सा लगेगा; ऐसी समानता  केवल मनुष्य जाति में ही  है.

२.
समाज  के कल्याण चाहक हमेशा दुखी रहेंगे; अधमों को किसी प्रकार की चिंता नहीं;  वे मान -अपमानकी  परवाह. नहीं   करेंगे.   अधम एक तरह. से भाग्यवान. होते  हैं.

३. अधम देवों के जैसे मनमाना करने  से देव और अधमों को एक समान मान सकते  हैं.

४. नीच लोग अपने से नीचों को देखकर अपने को बडे मानकर घमंडी बन जाएँगे.

५. अधम लोग कुछ. पाने के लिए. अपने को शिष्ट दिखाएँगे; कार्य होने  के  बाद अपनी अधमता प्रकट कर देंगे !

६. गोपनीय बात को अधम लोग दूसरों से कह. देंगे; अत:उनको  ढोल मानना ठीक. ही  है .

७. अधम लोग उन्हींको  देंगे जो उसके  गाल. पर. थप्पड मारते  हैं. वे  बढे कंजूसी होते  हैं.

८. महान लोगों  से माँगते ही हमारी  माँग. पूरी  होगी.  अधम लोगों से ईख की  तरह  कसकर ही कुछ  पा  सकते  है..

९. अधम लोग दूसरों के भोजन और. पोषाक देखकर  जलकर उन पर आरोप लगाएँगे.

१०.  अधम अपने  लाभ और. नष्ट के लिए  दूसरों का गुलाम बनेंगे.  और किसी धंधे  के  लायक नहीं  है. 

Tuesday, April 26, 2016

भीख माँगना अच्छा नही -१०६१ से १०७०



१. उदार,दयालु और. दानियों  से  भी  भीख न  माँगना करोडों गुणाश्रेष्ठ गुण है.

२.सृजनकर्ता  भीख माँगने  की हालत. में पैदा किया  है तो वह भी भिखमँगों की तरह  भटकता रहें.

३. भीख  माँगकर  जीने  की स्थिति  के  समान अत्याचार. या क्रूरता और कोई  नहीं  है.

४. गरीबी  की हालत में भी दूसरों से न माँगकर जीने  के श्रेष्ठ. गुण  के समान  संसार में और कोई गुण नहीं  है.

५. रूखी सूखी रोटी भी अंपने परिश्रम से जीना ही सुखप्रद और. संतोषप्रद है,

६. गाय के प्यास बुझाने  पानी की माँग. करना  भी  अपमान और हीनता है.

७. जो  भीख देने तैयार नहीं है, कवि माँगनेवालों  से निवेदन करते हैं  कि उनसे भीख न माँगें.



जिसका दिल दयालू  नहीं  है ,पाषाण -सा  कठोर है, उनसे भीख  माँगने  पर असुरक्षित भिखारी  का  नाव. टूट. जाएगी.

९. भीख माँगनेवालों  को देखकर दिल पिघलेगा;जो  सब कुछ  होने पर भी  नहीं देता उनको देखकर दिल टूट जाएगा.

१०. .भीख. माँगकर न देने पर भिखारी की जान चली जाती है.  रखकर भी जो  नहीं  देता, उसकी जान कहाँ छिप जाती  है.

भीख --अर्थ भाग-१०५१ से १०६० तक - तिरुक्कुरल

भीख -अर्थ भाग -तिरुक्कुरळ -१०५१ से १०६०

१. जिसके  पास सब कुछ है,  उससे   कोई माँगकर.

 वह इनकार  करें  तो  उसका  पाप  न देनेवाले को  ही

लगेगा ; माँगने वाले  को नहीं.

२. भीख माँगने  पर. कोई. चीज. आसान  से मिल जाएगी  तो   भीख  माँगना   भी  सुख ही  है.

३. खुले  दिलवाले  और   कर्तव्यपरायण लोगों  से  भीख माँगना  भी  सुंदर. ही  है.

४. खुले दिलवालों  से  भीख माँगना भी  भीख देने की विशेषता  रखता है.

५. अपने  पास  जो कुछ है ,उसे बिना  छिपाये उदारता से देनेवालों के कारण ही  भीख माँगने का धंधा चलता  है.

६. उदार अमीरों को जो खुलकर दान देता  है ,उसको   देखने मात्र से  ही गरीबी का दयनीय दुख दूर हो जाएगा.

७. हँसी न उडानेवाले और अपमानित. न. करनेवाले  दानियों  को  देखकर  भीख माँगनेवालों का मन अधिक खुश होगा.

८. गरीबी  के कारण  माँगनेवालों  को  जो  पास आने  नहीं  देता, उसका और कठपुतली का  कोई भेद नहीं है.

९. माँगनेवाला ही नहीं  है  तो  देनेवाले का नाम नहीं होगा.

१०. भीख माँगनेवाले   को  नाराज न  होना    चाहिए.  वह  खुद  गरीबी का अनुभव करने से

दूसरों की गरीबी देखने  से नाराज  नहीं  होगा.


गरीबी--अर्थ भाग - तिरुक्कुरल- १०१०४२ से १०५०

गरीबी --अर्थ भाग -तिरुक्कुरळ -१०४१ से १०५०

१. कोई. पूछें  कि  गरीबी सम  दुखप्रद क्या है ?   जवाब यही है  कि गरीबी सम दुखदायक गरीबी ही  है.

२. पापी दरिद्र का संताप वर्तमान और भविष्य में भी कष्टदायक. है. गरीबी को कभी संतोष नहीं होगा.गरीबी को इहलोक. में भी सुख नहीं, परलोक में भी सुख नहीं  मिलेगा.

३. कोई गरीबी  में  लालची  होगा  तो वह अपमान का  पात्र बनेगा. उसका और उसके खानदान का यश  भी  धूल में मिल जाएगा.

४. गरीबी उच्च कुल में जन्मे व्यक्ति के मुख से भी अपशब्द अभिव्यक्त करने   का विवश कर देगा.

५. गरीबी के आने  पर  कई प्रकार के दुख  उगने लगेंगे.


६. सदुपदेश और सुवचन  गरीब सुनाएगा  तो कोई नहीं सुनेगा. वे  लाभप्रद नहीं होंगे.

७. जो गरीबी  के  कारण  अपना धर्म पथ छोड. देता  है ,उसको उसकी माँ  भी  नहीं चाहेगी.

८.
गरीब यही  चाहेगा   और.  तरसेगा कि हत्यारे जैसे की गरीबी    मिट. जाना  चाहिए.

९. एक मनुष्य आग की  गर्मी  सहकर  सो  सकता  है, पर. गरीबी अग्नी सहकर    सोना  संभव  है.

१०.  बगैर खाद्य  सामग्री  के जीनेवालों की गरीबी सहकर जीनेवालों अपने को तजकर जीनेवालों से भोजन का बरबाद  ही  होगा ; उनका जीना धरती का बेकार बोझ. है.


तिरुक्कुरल --१०३१ से१०४० तक -खेती -अर्थ भाग

खेती -अर्थ भाग - तिरुक्कुरल -१०३१से१०४०  तक

१.  संसार के पेशों में प्रधान खेतीबारी  है. कई पेशों के दौरान  फिर घूम. फिरकर एक पेशे पर ध्यान  आता  है  तो वह. है खेती.

२. कई प्रकार के धंधे करनेवालों की भूख मिटाने का पेशा खेती करना  है;  अत:खेती   ही  सर्व श्रेष्ठ धंधा है.वही संसार का भार ढोने  का धुरी  है.

३. खेती  करके जीनेवाले  ही  श्रेष्ठ. जीवन जीनेवाला है:     बाकी धंधे  करनेवाले किसानों  की प्रार्थना  करके जीनेवाले हैं.

४.
कई. राज शासन   के  छत्र-छाया  को  अपने   शासन. के  छत्र-छाया के  अधीन  लाने की  शक्ति   क़िसानों    में   है.


५.
५. खुद खेती  करके खानेवाले  आत्म निर्भर हैं;  वे   खुद. खाएँगे  और बिना छिपाये  दूसरों  को खिलाने  में समर्थ होंगे.

६. सभी  इच्छाओं को  तजकर  तपस्या करनेवाले तपस्वी भी खेती नहीं छोड सकता'

७.  लगभग  पैंतीस ग्राम की मिट्टी  को ८.७५ ग्राम सखी मिट्टी बनाएँगे तो बगैर खाद के अनाज  उत्पन्न होंगे.

८.खेत जोतने  से  बढिया  काम. है   खाद देना, सिंचाई करना और निराना.

९. किसान को   हर. दिन अपने खेत देखने जाना  है, नहीं तो उसकी पत्नी  जैसे  खेत रूठेगा.

१०. धन नहीं है कहनेवाले  आलसी  रंक को देखकर खेत  हँसेगा.अर्थात खेती करने  पर कोई  भी  गरीब नहीं है.

Monday, April 25, 2016

गृह कल्याण - गृह-शास्त्र- तिरुक्कुरळ-१०२१ से१०३०

गृह शास्त्र -गृह कल्याण-तिरुक्कुरल-१०२१ से १०३०

१. अपने  कर्तव्य  करने  में  बिना आलसी के जो लगातार प्रयत्न  करता रहता  है , उस बडप्पन से बढकर  कोई और बडप्पन नहीं  है.
२.
२. गहरा ग्ञान ,लगातार कोशिश , अथक परिश्रम  जो करता रहता  है, उनके घरवाले, नाते -रिश्ते सब के सब उन्नति  हो जाएँगे.

३. अपने परिवार और अपने आश्रित रहनेवालों की तरक्की के  लिए. जो  मेहनत. करता  है,
उसको भाग्य और ईश्वरीय शक्ति खुद मदद करने आ जाएगी.

४. जो अपने आशंरितों की प्रगति के लिए. कठोर मेहनत करता  है, बिना विलंब कोशिश करता  है' उसको सफलता अपने आप आ मिल जाएगी.

५.  जो नागरिकों के कलयाणमें कठोर. मेहनत. करता  है, निर्दोषी है, उसको संसार के  लोग रिश्ता  मानकर घेर लेंगे.


६.  एक  पौरुष आदमी  के लक्षण. है , अपनेघर  और देश के सत्ता अपनाने  का व्यक्तित्व .


७. रण क्षेत्र में  जै से वीर निडर  हाोकर   वीरता से लडने  का  दायित्व अपना  बना  लेता  है, वैसे अपने परिवारऔर नानागरि की  प्रगति का भार  है.


८. नागरिकों की प्रगति में लगनेवालों के लिए कोई निश्चित समय. नहीं  है, सदा  काम में लगना  है. आलसी सही नहीं है और देरी भी-

९.  अपने आश्रित लोगों की सुरक्षा और तरक्की के  लिए जो कठोर मेहनत करता  है ,उसके  बारे में लोग कहेंगे  कि  उनका  जन्म दुख झेलने के लिए हुआ है.

१०.जिस परिवार में दुखावस्था  में  जिम्मेदारी उठाने  के चतुर आदमी नहीं  है, वे ऐसे गिरेंगे जैसे  आरे से काटे पेड गिर पडेंगे.





तिरुक्कुरल -१०१० से १०२० तक लज्जा शीलता

लज्जाशीलता--अर्थ भाग-गृह शास्त्र-१०११से १०२०


१. जो  नालायक काम है , 'उसे  करना  लज्जाशीलता  है.   स्त्रियों का शरम होना दूसरे किस्म का  है .


२. रोटी,कपडा, मकान  आदि सब केलिए आम भावना है.  लोगों को विशेषता   देनेवाला संकोच ही  है.


३. सभी जीव आहार करके   बल पर जीते हैं.सर्वमान्य है.  मनुष्य. की महानता  उसकी  संकोचशीलता  है.

४. महानों का बडप्पन उनकी महानशीलता है.  वही उनका भूषण है.  वह संकोच भूणण नहीं है तो बडों का महत्व नहीं  है.

   ५.
अपने और पराये अपयश  और निंदा  के  लिए  दुखी होनेवाले  संकोची

  संकोचशीलता  के  निवासी होंगे.

६.  विस्तृत इस संसार में  सुरक्षा के लिए  लज्जा को ही  महान  लोग  अपनाचहारदीवारी मानेंगे.


७.संकोची  अपने प्राण  की रक्षा  के लिए. भी शरमनाक काम  न. करेंगे.मान की रक्षा  के  लिए  जान देंगे.

८.लज्जा का काम करके लज्जित लोग  लज्जा  का  अनुभव. न. करेंगे तो  उनसे  धर्म देवता भाग जाएगा.

९.   एक अपने सिद्धांत  से हटेगा   तो उसके  कुल का अपमान. होगा.  निर्लजज होनेपर सर्वफल बिगड
जाएगा.

१०.   निरलज्ज. आदमी  और कठपतली  दोनों में कोई फर्क नहींहै.









व्यर्थ है संपत्ती -- तिरुक्कुरल १००१ से १०१० तक।

व्यर्थ है  धन -दौलत -तिरुक्कुरळ - १००१ से १०१० तक ।
१. अति चाह और लोभ  से धन दैलत जोडकर बिना खाए ,बिना  भोगे पिए मर जाने से  उस धन दौलत से कोई लाभ नहीं है।।
२. अपने धन के घमंड से   ,दान -धरम न करनेवालों का जन्म
संसार में भार रूप है और हीन और तुच्छ है।
३.   बिना यश    की चाह के   धन जोडने  में ही जीनेवाले आदमी  संसार का भार रूप है । उससे कोई लाभ नहीं है।
४.  दूसरों की मदद न करके जीनेवाले के जीवन में क्या बचेगा? वह सोचता है या न हीं कि कुछ न बचेगा।
५.  जो दूसरों की मदद के लिए देने में आनंद का अनुभव नहीं करता ,उसके पास करोडों रुपये  होने पर भी कोई लाभ नहीं है।
६. वह धन रोगी है जो धन को खुद नहीं भोगता और जरूरतमंद लोगों को भी नहीं देता।    
७.  दीन -दुखियों को न देनेवाले की  संपत्ती    उस सुंदर  औरत के समान है, जो बिना विवाह  किये ही बूढी हो गयी है।
अर्थात  वह संपत्ती बेकार है।
८. धनी ,  जो दूसरों की  मदद नहीं करता और दूसरों के घृणित  पात्र बन जाता, उस की संपत्ती नगर के बीच में बढे विष वृक्ष के समान है।
९. जिसमें   प्रेम नहीं  है, दान _धर्म न करके धन जमा करता  है ,उसकी  संपत्ती  को  दूसरे लोग भोगेंगे।
१०.   जो दान- धर्म  के कारण प्रसिद्ध है , उस की जरा सी गरीबी संसार को भला करनैवाले उस मेघ के समान है जो वर्षा नहीं करता।  
  

Sunday, April 24, 2016

शालीनता - तिरुक्कुरल - ९९१से १००० तक - अर्थ भाग -

शालीनता ९९१ से १०००  तिरुक्कुरल।
१.   जो भी हो उनसे  सरल व्यवहार करने लगेंगे तो  शालीनता के गुण पाना अासान हो जाएगा।
२. प्यार और   ऊँचे कुल के गुणों का पालना ही शालीनता है।
३. बाह्य रूप  सौंदर्य में शालीनता नहीं है, अच्छे गुणों में ही शालीनता प्रकट होगी।
४.जो   न्याय पर दृढ रहते हैं और  दूसरों की भलाई  में  लगते हैं ,उनकी शालीनता की प्रशंसा  संसार करेगा।
५.  हँसी-खेल में भी दूसरों को अपमानित करना दुखदायक है। दूसरों के स्वभाव जानकर  सद्- व्यवहार  करनेवालों  को शत्रु भी  हँसी नहीं उडाएँगे।
६.  सांसारिक व्यवहार शालीन  लोगों के पक्ष में  होना चाहिए। नहीं तो शालीनता मिट्टी में मिल जाएगी।
७. आरे के समान तेज बुद्धी  होने पर भी  मनुष्यता के गुण न होने पर मनुष्य जड ही माना जाएगा।
८.  दोस्ती के नालायक बुरे लोगों के साथ शालीन व्यवहार न करना   शालीनता परवकलंक है।
९.दूसरों से मिलजुलकर  रहने में जो आनंद का महसूस न करेंगे, वे दिन के प्रकाश में भी अंधेरे का महसूस करेंगै।
१०. जैसे बर्तन लकी सफाई ठीकलनहीं तो दूध बिगड जाता है, वैसे ही जिस में  गुण और शालीनता नहीं है,  उसकी संपत्ती नष्ट हो जाएगी।

तिरुक्कुरल - नागरिक शास्त्र-गौरव -९८१ से सौ तक

गौरव  -तिरुक्कुरल -९८१से९८० तक
१. कर्तव्य निभानेवाले यही कहेंगे कि जो कुछ  भलाई केलिए करना है वे सब गौरव की बाते  हैं।
२.  अच्छे गुण ही गौरव की भलाई है।और किसी में भलाई नहीं है।
३. प्यार,लज्जा,दान-धर्म,दया,सत्य वचन आदि पाँच गुण ही  गौरव महल के चार स्तंभ है।
४. किसी का वध न करना धर्म कर्म की सुंदरता है गौरव  दूसरों की बुराई का बाहर प्रकट न करनै में है।
५.  एक काम को  कौशल के रूप में करने का सामार्थ्य उनमें रहेगा जिनमें अपने अधीन काम करनेवालों से  विनम्र व्यवहार से काम कराने की क्षमता हो।वही अपने दुश्मन को भी मित्र बनाने का अस्त्र- शस्त्र है।
६. गौरव  की कसौटी  है,अपने से निम्न लोगों से भी अपना हार मान लेना।
७. अपने को बुरा करनेवालों को भी भला करना ही गौरव का लाभ है।और क्या हो सकता  है।
८. गौरवको  अपनी संपत्ती जो मान लेते हैं, उनके पास धन न रहना  गरीबी नहीं है।
९. गौरव के सागर के किनारे रूपी बडे लोग , काल या भाग्य के परिवर्तन होने पर भी खुद न बदलेंगे।


Saturday, April 23, 2016

बडप्पन- नागररिक शास्त्र - अर्थ भाग- ९७१ से९८०.

 बडप्पन- नागरिकशास्त्र- अर्थ भाग - तिरुक्कुरल _-तिरुवल्लुवर ।
१.  किसी एक व्यक्ति के जीवन चमकने केलिए साहस और उत्साह  आवश्यक है।  साहस हीन जीवन अपमानित है।
२. सभी जीवों का जन्म एक ही तरह से होता है।  लेकिन जो काम करते हैं, वह ऊँच नीच के भेद उत्पन्न करता है।  अतः विशेषता एक समान नहीं रहती।
३.  जिसमें अच्छे गुण नहीं है, वह उच्च पद पर रहने पर भी बडा नहीं है। छोटे पद पर रहकर भी  अच्छे गुण  है तो बडे हैं। 
४.  जैसे पतिव्रता नारी का विशेष महत्व है, वैसे ही महत्व अच्छे गुणवालों को होगा।
५.  जिसमें बडप्पन है,वह असाध्य अपूर्व काम कर चुकने में समर्थ होता है।
६.बडों की विशेषता जान -समझकर सराहने के गुण 
उनकी विशेषता  छोटे गुणवालों को नहीं होगा।
७. निम्न लोगों को   पद मिलने पर वे अहंकारी  रहेंगे ।
८.  बडे लोग गुणी और नम्र  व्यवहार के होंगे। गुण हीन छोटे  लोग अात्म प्रशंसा करके अहंकारी बनेंगे।
९.  अहंकार रहित जीने के गुण  ही जीना है,  निम्न गुणी अहंकार की सीमा में उन्नतिहीन रह जाएँगे।
१०. दूसरों की कमियों को छिपाना बडप्पन है। दूसरों की कमियों को बताते रहना  छुटपन है।



तिरुक्कुरल अर्थ भाग ९६१ से ९७० तक - नागरिकता- मान _-मर्यादा।

तिरुक्कुरल इज्जत -मान-मर्यादा -९६१ से ९७०. नागरिक शास्त्र -अर्थ भाग

  1. १.अनिवार्य आवश्यक  काम  होने पर भी  अपनी इज्जत की हानी या मान पर कलंक  लगेगा तो वह काम नहीं करना चाहिए। अर्थात मान पर धब्बा  लगने के काम को कभी  नहीं करना चाहिए। 
  2. २.जो यश और पौरुष चाहते  हैं , वे नाम पाने के लिए कभी कुल परंपरा पर कलंक लगनेवाला  काम न करेंगे
३. अपनी प्रगति में विनम्र स्वभाव , अपनी हालत बदलने की परिस्थितियों में  गुलामी न करने का मान  चाहिए।
४.  जब लोग अपने उच्च पद से गिरते  हैं ,तब लोग उन को अति तुच्छ मानेंगे। (सिर से गिरे बाल के समान)
५. पहाड -सा  गंभीर  खडे रहनेवाले भी   मान पर कलंक लगेगा तो गुंची बीज सम हो जाएँगे। अर्थात नाम बिगड जाएगा।

६ .  जग जीवन के लिए अपमान सहकर , मान-मर्यादा की बिना परवाह किये  विनम्र रहनेवालों को अपयश होगा। क्या उनको यश या स्वर्ग मिलेगा? कभनहीं।
७.  बेइज्जतियों के पिछलग्गू बनकर जीने से मरना बेहतर है।
८.बदनाम पाकर मान खोकर जीने  का जीवन  क्या अमर जीवन की दवा बन सकता है? कभी नहीं।
९.जैसे जंगली बैल अपने बाल गिरने पर मर जाएगा  वैसे  ही आदर्श आदमी अपने पर कलंक लगने पर प्राण तज देगा।
१०.अपने मान के लिए जो अपने प्राण तज देगा।,उसको संसार  तारीफ करके देव तुल्य मानेगा।।





Friday, April 22, 2016

तिरुक्कुरल -सुनागरिक - ९५१ से९६० अर्थ भाग -राजनीति

तिरुक्कुरल  सुनागरिक  -९५१ से ९६० तक 
१.तटस्थता और लज्जा उच्चकुल में जन्म लेनेवालों  में ही  सहज में पाया जाएगा।दूसरों में नहीं ।
२. भद्र कुल में जो जन्म लेते हैं, वे कभी अनुशासन,सत्य,मान मर्यादा आदि में दृढ रहेंगे।
विचलित न होंगे।
३. सच्चे उच्च कुल में जन्म लेनेवाले  के चेहरे में खुशी,
दानशीलता,मधुर वचन,पर-निंदा आदि गुण   स्थाई रहेंगे।
४.उच्च कुल में जो जन्म लेते हैं,वे करोडों रुपये देने पर भी अपने कुल कलंक के काम में नहीं लगेंगे।
५.परंपरागत दानी कुल में जो जन्म लेते हैं,काल के फेर से गरीब होने पर भी अपनी दानशीलता न छोडेंगे।
६.जो निर्दोष जीवन बिताना चाहते हैं, वे दगाने के काम में न लगेंगे।
७.उच्चकुल में जन्मे लोग कलंकित काम करेंगे तो चाँद के  कलंक के समान प्रकट हो जाएँगे।
८.किसी एक व्यक्ति के अच्छे गुणों के बीच प्यार न होने पर लोग उसके कुल पर संदेह प्रकट करेंगे।
९.जैसै पैदावर को देखकर खेत की समृद्धी का पता चलेगा ,वैसे ही  किसी व्यकति की वाणी सुनकर उसके जनम के कुल का पता लग जाएगा  कि वह उच्च कुल का है या निम्न गुण का है।
१०. किसी एक व्यक्ति  अपने कल्याण चाहता है तो उसको नम्र व्यवहार करना चाहिए। 

तिरुक्कुरल -अर्थ भाग --दवा -९४१ से९५०

तिरुक्कुरल --अर्थ भाग -दवा -९४१  से  ९५० 

१. वाद ,पित्त ,शिलेत्तुम  इन  तीनों  में 
एक की कमी से   या  बढ़ने  से  रोग  होगा. 
२. खाने  के  बाद पाचन  क्रिया  के  लिए  
समय देकर खानेवालों को रोग  नहीं  होगा. 
३. जो खाते  हैं ,वह  जीर्ण होने  के  बाद ,
खुराक को परिमाण के अनुसार संतुलन करके  खाना 
लम्बी आयु जीने का मार्ग  है. 
४. जो  खा चुके  हैं ,वह पचकर  ,
खूब  भूख  लगने  पर 
खाद्य-पदार्थ को पहचानकर 
शारीर के अनुकूल खाना चाहिए. 

५. शरीर   के अनुसार उचित भोजन  सुनकर 
 मित भोजन खाने  से  रोग  से  बच  सकते  हैं। 
६. मित  भोजन  करने वाले अधिक काल  जीना 
अधिक भोजन करने वाले  जल्दी चल बसना  संसार में देख सकते  हैं 

७.  पेट  भरने  के  लिए खाना हैं ; अधिक मात्रा में  खाने  से शरीर बीमारी  के  केंद्र  बन जायेगा. 
८. रोग  क्या  हैं ?रोग  आने  के कारण  क्या  हैं ? 
उचित दवा  या  इलाज  क्या  है ? 
आदि निदान  करके  शारीर स्वस्थ होने  की दवा लेनी चाहिए. 

९. रोगी  की उम्र ,रोग  के गुण , इलाज  के समय  आदि जानकार  ही  
चिकित्सकों  को  इलाज  करना  चाहिए. 
१०.  इलाज चार  तरह    से  करते  हैं --१.रोगी  २. चिकित्सक ३, दवा ४. दवा देनेवाले. इन चारों को आपसी सम्बन्ध  है.  

Thursday, April 21, 2016

तिरुक्कुरल --९३१ से ९४० तक अर्थ भाग - जुआ .

तिरुक्कुरल --९३१  से  ९४०  तक अर्थ भाग - जुआ .

१.   जरूर  सफलता  मिलने  पर  भी जुआ खेलना  नहीं चाहिए;
जैसे   कांटे  के आहार  पकड़कर  मछली
जैसे अपने प्राणों  को  खो देती है ,
वैसे ही दुर्गति  हो  जायेगी.

२.  जुआ खेलने वाले  एक  बार  जीतने के  बाद  सौ   गुना  हारने  के बाद  भी  जुआ  खेलना नहीं  छोड़ेंगे.
 ऐसे जुआ खेलनेवालों   के  जीवन  में  सुख  कहाँ ?

३. लगातार  जुआ जो खेला करता है ,वह अपनी  सारी संपत्ति खो देगा
 और  आगे कमाने के तरीकों को भी भूल  जाएगा.  

४.  कई प्रकार  के कष्ट घेरने ,सारी संपत्ति और प्रसिद्धी  को नष्ट करने  , गरीबी  के  गद्दे में डालने
 जुआ   काफी  है. जुआरी  को अपयश  और  गरीबी घेर  लेगी.

५. जो जुआ  खेलने के यंत्र  , स्थान  और  उसके  प्रयत्न  को  नहीं  छोड़ता, वह  अत्यंत  गरीब हो  जाएगा.एक  पैसे  भी नहीं  रहेगा.

६. जो जुआ   ज्येष्ठा देवी  के प्यार करने लगता  है, वह  भूखा प्यासा  रहकर गरीबी का  दुःख  भोगेगा ही.

७. जुआ घर में कोई समय  बिताएगा  तो  वह  अपनी परंपरागत संपत्ति खो देगा  साथ ही साद गुण भी.

८.  जुआ  एक व्यक्ति  के  सद्गुण ,सम्पाती मात्र बरबाद  नहीं करेगा  और उसको झूठा बना  देगा.  बेरहमी   बनाएगा  न जाने कई प्रकार कष्टों क्व  घेरे में  बाँध  देगा.

९. जुआ  के गुलामी को  छोड़कर  उसकी  संपत्ति ,यश ,शिक्षा  ,कीर्ति ,खाना  ,वस्त्र  आदि सब  बहुत  दूर  चला  जाएगा.
१० . जैसे  मनुष्य को अपने शरीर पर दुःख के अनुभव   करते  समय  प्यार बढेगा ,वैसे  ही धन को खोते खोते  जुआ  खलने  की इच्छा  बढ़ती  जायेगी.

मद्यपान न करना --अर्थ -भाग -तिरुक्कुरल --मित्र शास्त्र--९२१ से ९३० तक

मद्यपान  न  करना --अर्थ -भाग -तिरुक्कुरल --मित्र शास्त्र--९२१ से ९३०  तक

१.  जो  नशीली शराब  पीते  हैं ,वे किसीका  आदर  नहीं   पा सकते ; कोई भी उसे देखकर न  डरेगा.वे  अपयश  का  पात्र  बनेंगे।

२. नशीली चीजें नहीं  लेना  चाहिए।   जो सज्जनों  से बदनाम  पाना  चाहते  हैं ,वे  शराब  पी सकते  हैं.

३.पियक्कड़  बेटे को खुद उसकी माँ नहीं चाहेगी और उसके अपराधों को माफ  न  करेगी तो दूसरे कैसे चाहेंगे।
सब के घृणा का पात्र बनेगा
५.पियक्कड़  के  अपराधी    निर्लाजा  होंगे ; शर्म  नामक  भद्र   स्त्री   भाग  जायेगी .
६.  एक  बेहोश की हालत  में रहने नशीली चीज़ें  लेना अत्यधिक  मूर्खता  है.
७. आड़ में मद्यपान  करने  पर  भी उसकी आँखे
 उसे दिखा  देगी . उसने  पिया  है.
 बेहोशी आँखों  के  घूमने  से वे निंदा  के  पात्र  बनेंगे.  

८. कोई  भी   छिपा  नहीं  सकता  कि उसने पिया  नहीं  है; नशे में  कह देगा कि  उसने  पिया  है.

९.  पियक्कड़ों  को सुधारने उपदेश  देना  और मशाला  लेकर
 पानी में डूबे मनुष्य की तलाश  करना  दोनों बराबर  है ; अर्थात बेकार है.
१० . एक  पियक्कड़  ने  जब  मधु  नहीं  पिया  है ,तब  पीनेवाले  के  बद -व्यवहार  देखकर  भी सुधरता  नहीं .
 यह  क्यों  पता  नहीं  है. 

Tuesday, April 19, 2016

अर्थ भाग --मित्रता -शास्त्र --वेश्या के लक्षण --९११ से ९२०

अर्थ भाग --मित्रता -शास्त्र --वेश्या के लक्षण --९११ से ९२०

१. बिना  प्रेम  के केवल अर्थ कमाने को  ही अपने उद्देश्य बनानेवाली

 वेश्या  के  मधुर  शब्द  पुरुष को सिर्फ  दुःख  ही पहुंचाएगा .

२. अपने को मिलने वाले  अर्थ लाभ  के अनुसार  मधुर वचन  बोलनेवाली  रंडी  से  दूर रहना ही सुकर्म होगा.

३. वेश्याएं केवल  धन  के लिए आलिंगन  करते हैं ,
उनका आलिंगन अँधेरे कमरे में लाश को आलिंगन करने  के  सामान  है.

४.   आर्थिक सुख को  ही श्रेष्ठ  माननेवाले  वेश्याओं  को,जो  ईश्वरीय  कृपा के  चाहक   हैं  ,वे   कभी  नहीं  चाहेगा.

५.   सहज  ज्ञानी  और   सहज धनी   जिनके  पास  हैं ,वे  सब को सुखदेनेवाली  रंडियों  को  कभी नहीं चाहेगा.

६. जो  सांसारिक  यश  चाहते  हैं  ,वे कभी  सुख देनेवाली वेश्यागमन  न  करेंगे.


७ . अर्थ  लाभ  के लिए शारीरिक दुःख दूसरों को देनेवाली  Aस्थिर  प्रेम रखनेवाली
 वेश्याओं   गमन   करनेवाले    कमज़ोर  और असंयमी  ही होंगे.

८. ठगनेवाली आम महिला  वेश्या   के मोह  में जो  रहते हैं
 उनको   लोग  ऐसे  ही  कहेंगे  कि  उसको  मोहिनी पिशाच पकड़   लिया  है.

९. वेश्यागमन और नरक के गड्डे  में   गिरना  दोनों में  कोई फरक  नहीं  हैं.

१० . वेश्यागमन ,मद्यपान  और जुआ खेलना  आदि दिनों  कर्म करनेवालों  से  लक्ष्मी दूर  होगी ; ज्येष्ठा देवी  आजयेगी.  अर्थात  दरिद्र  बन  जाएगा.

९०१ से ९१० तक ... तिरुक्कुरल --अर्थ भाग --काम शास्त्र भाग -पति के पत्नी के प्रति का व्यवहार

९०१  से ९१०  तक ... तिरुक्कुरल  --अर्थ भाग  --काम  शास्त्र  भाग

१. गृहस्थ   जीवन  को  अधिक  चाहनेवाले ,
कर्तव्य  निभाने  पर  भी नाम नहीं पायेंगे .
 प्रशंसा  का  पात्र भी  नहीं  करेंगे.

२. अपने कर्तव्य  की  चाह  न  करके ,स्त्री के पीछे जानेवाले  लोगों  के शर्मिन्दा होना पड़ेगा.

३. बद- गुणवाले पत्नी को  सुधारने  के  प्रयत्न न  करके  पत्नी से विनम्र व्यवहार करने वाले  अच्छे लोगों के सामने लज्जित  होकर  खड़े  रहेंगे.

४. पत्नी   के  डर  से  गृहस्थ  जीवन  करने जो  डरता हैं ,उसकी  तारीफ कोई नहीं  करेंगे.

५. पत्नी से  डरनेवाले  दूसरों की भलाई नहीं  करेगा  और  कर्तव्य करने को  भी डरेगा.

६. देवों  के  जैसे  लोग  भी पत्नी  के सुन्दर बाँहों के  मोह में रहने वाले  पौरुष  के बड़प्पन  खो  जायेंगे.

७. पत्नी  की आज्ञा   मानने पौरुष  से  अति प्रशंसनीय  हैं लज्जालू स्त्री .

८. पत्नी  के   इच्छानुसार   चलनेवाले  अपने  दोस्तों  के कष्ट दूर नहीं  करेंगे   और कोई भले काम  में  नहीं  लगेंगे.
९.  पत्नी की बात मानने वाले  धर्म  -कर्म में आर्थिक  सहायता  न   करेंगे ;
अर्थ कमाने  के प्रयत्न में  भी नहीं  लगेंगे.
१०. अच्छे विचारवाले  और शुभ चिन्तक  पत्नी की बात  मानने  की गलत व्यवहार  न  करेंगे.
***************************************************************************




Saturday, April 16, 2016

मित्रता --अर्थ -भाग -मित्रता -शोध , ७९१ से ८००

मित्रता  --अर्थ -भाग -मित्रता -शोध ,  ७९१  से ८०० 
१.बिना सोचे -समझे -जाने -विचारे  मित्रता
 अपनाने से  असाध्य कष्ट  होगा .
फिर मित्र से छूटना  मुश्किल  है . 

२. बिना  सोचे -समझे -विचारे  मित्र बनाने  से  
जान का  भी खतरा हो सकता है. 

३. किसी को  मित्र बनाने  के  पहले  जान  लेना चाहिए  कि 
उसका कुल कैसा है ?उसका  परिवार  कैसा है ?उसके अपराध  क्या है ?
उसके साद-गुण  क्या है  ? आदि .

४. उच्च कुल में  जन्म  लेकर  अपयश  और अपमान से डरनेवाले और शर्मिंदा होनेवाले को  मोल लेकर  मित्र बना लेना चाहिए. 
५. ऐसे मित्र को चुन लेना  चाहिए 
 जो गलती करने से सुधारने कठोर व्यवहार  करता  है, सांसारिक 
व्यवहार जानकार चलता  है. 
६. हमें दुःख  से एक लाभ होता है. तभी हम सच्चे मित्रों का पता लगेगा. 
७. बुरे   और  बेवकूफ  मित्र को पहचानकर  मित्रता तजने  में  ही भलाई है .८. हमें  हतोत्साहित बातों  को सोचना नहीं  चाहिए.
दुःख में साथ   न  देनेवाले दोस्त को छोड़  देना  चाहिए. 

९.  जिसने हमें  बुराई की ,उसको मरते वक्त सोचने  पर भी 
अधिक  पीड़ा होगी .

१०. दोष रहित मनवालों  से  ही मित्रता बनानी चाहिए.
दोषित मित्रों को पैसे खर्च  करके  या देकर छोड़ने  में ही भला है. 


मित्रता ---मित्र -शास्त्र --७८१ से ७९० तक .

मित्रता  ---मित्र -शास्त्र --७८१ से  ७९०  तक . 
१.   मित्रता  बनाना   दुर्लभ  है; दोस्ती  बनाने  के  समान  
और  कोई  काम  नहीं  है. 

२.  ज्ञानियों   की दोस्ती अमावास्या के बाद के शशि कला के  सामान बढ़कर  पूर्णिमा  चाँद  जैसे  बढ़ता रहेगा.    
मूर्खों   की   दोस्ती पूर्णिमा के बाद के चाँद के सामन 
 घटकर ओझल हो जाएगा. 

३. अच्छे  ग्रंथों  के  पढ़ते -पढ़ते  सुख देगा ;
 वैसे  ही अच्छे दोस्तों  के मिलते -जुलते रहने  से सुख  बढेगा. 

४. दोस्ती हँसकर खुशी मनाने  के लिए  नहीं , 
दोस्त बुरे मार्ग पर चलने पर  चिढ़कर   
सुमार्ग पर ले जाने  के लिए  भी है. 

५. दोस्ती  के  लिए संपर्क और मिलने -जुलने  से 
बढ़कर समान  भावों का होना काफी  है. 
६. चेहरे  में  हँसी  दिखाना  दोस्ती  नहीं   है,
ह्रदय   से प्रेम करना ही दोस्ती है. 

७.दोस्त को बद्मार्ग पर  जाने से  रोककर  सद्मार्ग  पर  लाना  .
और दुःख के समय  साथ  देना  ही सच्ची  दोस्ती  है. 
८.  कमर से धोती गिरने  पर जैसे तुरंत  हाथ पकड़कर बाँध लेता   है .
वैसे  ही दोस्त के दुःख  देखकर मदद  करना  ही  सच्ची  दोस्ती  है. 
९. दोस्ती सच्ची स्तिथि है ,कभी मतभेद  न  होना ,जितना  हो सके उतनी मदद करना. 
१०. वे  मेरे लिए इतने प्यारे  हैं ,मैं  उसकेलिए  इतना प्यारा हूँ 
ऐसी   कृत्रिम  झूठी प्रशंसा  करने  से  उस दोस्ती में  कमी आजायेगी. 

Friday, April 15, 2016

सेना में सैनिक -गर्व --अर्थ -भाग -तिरुक्कुरल ---७७१ से ७८०

सेना  में सैनिक -गर्व --अर्थ -भाग -तिरुक्कुरल ---७७१ से  ७८० 

१.  एक  वीर  शत्रुओं  को  देखकर ललकारता है कि  
 शत्रुओं  सावधान ! मेरे सेनापति  के विरुद्ध लड़नेवाले  स्मारक स्तम्भ बन गए हैं .
 आपको भी स्मारक पत्थर बनना पड़ेगा. 


२.   एक  दौडनेवाले     खरगोश  पर  तीर चालाकर  मारने  से    बढ़कर  विशेषता    है  
 खुले मैदान  में तीर चलाकर तीर का व्यर्थ  होना .


३. दुश्मनों  से   निर्भय  होकर   वीरता से  लड़ने   का    पौरुष    सराहनीय  है ,
    उससे   बढ़कर     प्रशंसनीय  बात  है , शत्रुओं  को    संकट  में  
मदद करना ;  वही   पौरुष   के शिखर     है. 

४.    सच्चा  वीर  हाथी  पर  बर्छी  फेंककर ,  खाली हाथ  के समय
 अपने शारीर  में घुसी बर्छी  देखकर  खुश  होगा .

५.   रणक्षेत्र  में शत्रुओं  की बर्छी  घुसने पर आँख   का पलक मारना  भी  कायरता है. 

६. एक  वीर  अपने बीते समय में
 रणक्षेत्र  के घावों  को गिनकर 
 सोचेगा  कि किस दिन  में चोट  नहीं पहुंची  वह दिन  बेकार  है. 

७.  चारों  ओर घिरे यश को ध्यान  में रखकर 
 प्राण देने के लिए तैयार  वीर 
अपने पैरों पर वीर कंकण  धारण करने योग्य   वीर   है. 

८. राजा के क्रोध  की परवाह बिना किये लडनेवाला  वीर ही आदर्श  वीर माना जाएगा. 

९.  वीर   शपथ   लेकर   लड़नेवाले   वीरों पर कोई भी   आरोप  लगा  नहीं  सकता.

१०. अपने नेता के आँखों  से आंसू बहाने की वीरता दिखाकर  मरना   श्रेष्ठ  हैं ; 
ऐसी मृत्यु को ललकार मरना श्रेष्ठ  है. 
***********************************************************8

Wednesday, April 13, 2016

सेना --सेना का महत्त्व ---राजनीती --अर्थ भाग --तिरुक्कुरल --तिरुवल्लुवर. --७५१ से ७६० तक.

सेना --सेना  का  महत्त्व ---राजनीती --अर्थ भाग --तिरुक्कुरल --तिरुवल्लुवर. --७५१  से  ७६० तक. 

१.  राजाओं  की सभी दौलतों में श्रेष्ठ  दौलत   शक्तिशाली विजय दिलानेवाली सेना  है.  सभी तरह  की सेनाओं ( स्थल ,वायु ,जल )से होनी चाहिए  और बाधाओं  को देखकर  निडर रहना चाहिए. 

२. युद्ध  में  हार  की संभावना होने  पर  भी ,
सैनिक बल  कम  होने  पर  भी ,
  बाधाओं से न डरने  की शक्ति परम्परागत देशवासी सेना में ही होगी. 

३. चूहे मिलकर ध्वनियाँ निकलने  पर ,
नाग सर्प के फुफकार  के  सामने टिक नहीं सकते.
वैसे  ही  वीरों की ललकार  के सामने कायर भाग जायेंगे.

४.    सेना  वही  है ,जो शत्रु के सामने निर्भय हो,
शत्रुओं के षड्यंत्र और ठग से परिचित हो ,नाश न होने देता हो ,
कभी आतंकित न होता हो. 

५. यम भगवान  खुद लड़ने  आये ,तब  भी निडर रहने की शक्ति जिसमें  है ,वही आदर्श सेना है.

६.  एक  सेना  के बढ़िया  चार   गुण  हैं --१. वीरता ,२. माँ  मर्यादा,३.पूर्वजों  का  अनुकरण ४, नेता पर विश्वास और विश्वसनीय  सैनिक .

७.  रणक्षेत्र  में पहले सामना  करने  वाली  शत्रू   सेना  को  हराना ही वीर सेना के प्रमुख लक्षण है.

८. युद्ध कौशल  और शक्ति  से बढ़कर सेना का पंक्तिबद्ध   शृंगार  अति प्रधान  है.

९.  सेना  में जरा भी नुकसान  न  होकर , नेता से नफरत  और गरीबी रहित  सेना ही बढ़िया है. श्रेष्ठ सेना है.

१० . अतुलनीय वीरता के  वीर  और सेना  होने  पर  भी  योग्य सेनापति  रहित  सेना  बेकार  है. 

Monday, April 11, 2016

धन कमाने के तरीके ---धन ---अर्थ भाग --तिरुक्कुरल ---७५० से ७६० तक.

धन  कमाने के तरीके ---धन ---अर्थ भाग  --तिरुक्कुरल ---७५० से ७६० तक. 

१. समाज   में  अनादर तुच्छ व्यक्ति भी  धनी होने  पर  आदर  पाता  है. 
( संसार रईसों को बुद्धू होने  पर  भी आदर  देगा. )

२.  धनियों की प्रशंसा और निर्धनियों  की निंदा ही संसार के व्यवहार  में चालू है. 

३. धन -दीप सभी स्थानों में पहुंचकर बाधाओं  के अन्धकार  मिटा  देगा. 

४. बुरे मार्ग पर धन  न कमाकर   सुमार्ग पर धन कमाने से ही धर्म के सुख प्रदान  करेगा. 

५.  धर्म या प्यार के बिना जो धन मिलता है ,भले ही वह बहुत हो ,ठुकराना ही धर्म है. 

६.  राजा  की संपत्ति वे ही है  जो लावारिश ,कर और हारे शत्रुवों के लगान  आदि. 

७. प्यार   रुपी  माँ जो कृपा रुपी बच्चा पैदा करता है ,उसे पालन -पोषण करनेवाली ताई  धन ही है. 

८. अपनी संपत्ति से कोई महान  काम  करना ऐसा है  कि 
पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर हाथियों  की   लड़ाई निर्भय  होकर  देखना. 
९.  धन  ही शत्रुवों  के अहंकार को काटनेवाली तलवार  है. अतः  धन कमाना आवश्यक  है. 

१०. जो सुमार्ग और धर्म पथ  पर अधिक  धन कमाते हैं ,उनको  धर्म  और  सुख  आसानी से  मिलेगा. 
***********

Sunday, April 10, 2016

दुर्ग -शास्त्र ---दुर्ग --राजनीती . अर्थ -भाग --तिरुक्कुरल --७४१ से ७५० तक.

दुर्ग -शास्त्र ---दुर्ग --राजनीती . अर्थ -भाग --तिरुक्कुरल --७४१ से ७५० तक. 


१. दुर्ग दोनों को लाभ प्रद  और अत्यंत ज़रूरी है ---१. आक्रमण करनेवाले  २. बिना आक्रमण करके  भयभीत   रक्षा चाहनेवाले. 

२. दुर्ग  के  उचित स्थान   हैं -- स्वच्छ  पानी ,  खुले मैदान ,घने जंगल ,पहाड़  आदि से   घिरे हुए  स्थान . खाई  .

३. सुरक्षित दुर्ग   के लक्षण चार  हैं , १. ऊंचाई , २. चौड़ी ,३. पक्की
 ४. और शत्रुओं से आसान से न पहुँचने की योज़ना, 

४. सुरक्षित स्थान संकीर्ण , बाकी भीतरी  स्थान विस्तृत , शत्रुओं  के साहस को 
नष्ट करनेवाला आदि ही किले  के लक्षण  हैं .

५.     कई  दिन  शत्रुओं  के घिरे रहने पर भी   सुरक्षित ,
अन्दर रहनेवाले लोगों को कई दिनों तक भोजन  सामग्रियों  से  सुरक्षित ,
अन्दर रहनेवाले स्थायी रूप में रहने  की सुविधायुक्त  व्यवस्था  आदि 
दुर्ग के लिए अत्यंत  आवश्यक  है.

६. युद्ध की आवश्यक सभी सामग्रियों  से  भरे, 
बाहरी शत्रुओं को नाश करनेवाले  वीरों से भरे दुर्ग ही 
शक्तिशाली  और विशेष दुर्ग  है.

७. किसी भी हालत  में शत्रुओं के वश में न जाना एक दुर्ग की विशेषता है. 
भले  ही दुश्मन  से  घेरे या न घेरे या  जो भी षड्यंत्र शत्रु   करें ,तब  भी सुरक्षित जो  है वही किला  है.

८. घिरे हुए  अति शक्तिशाली  शत्रुओं  को ,
 किले के अंदर से ही सामना  करके  हराने  की   हिम्मत 
 रखनेवाला  ही किला  है. 
९. किले मज़बूत  होने  पर भी
 भीतर रहनेवालों  में साहस और  चतुराई  न  होने पर 
बेकार ही होगा. किला से कोई लाभ  नहीं  है.

Friday, April 8, 2016

अर्थ भाग --राजनीती --देश --७३१ से ७४० ---दुर्ग -शास्त्र . तिरुक्कुरल --तिरुवल्लुवर .

अर्थ  भाग --राजनीती --देश --७३१  से ७४० ---दुर्ग -शास्त्र . तिरुक्कुरल --तिरुवल्लुवर .

१.  अति  समृद्धि ,अनाज -धन धान्य से भरे देश , बड़े सज्जन ,अनावश्यक बाह्याडम्बर  न करनेवाली जनता ,

बुरे  मार्ग पर खर्च न करनेवाले नागरिक ---  ये ही आदर्श देश के लक्षण  है.

२. वही देश  है ,जहां अधिक धन संपत्ति  हो  और भूमि उर्वरा हो  ,
जनता के मन पसंद  धान ,अनाज सब्जियाँ  आदि  अधिक  पैदा  हो .

३.विदेशी  शरणार्थी   के आने पर जो नया बोझ   खर्च करने बढ़ता  है ,
उसको  संभालने  की संपत्ति  जिस  देश  में  हो ,वही देश  है.

४. वही देश  है,  जहाँ लोग भूखे न हो ,असाध्य  रोग  न हो , और नाशक शत्रु  न  हो.

५. वही देश  है जहाँ  के लोग छोटे-छोटे दल में न विभाजित  हो ,
सत्ता के अधिकार लेकर  हत्यारे न हो ,छोटे छोटे नरेश  न  हो.

६. देशों  में श्रेष्ठ  देश  वही  है ,जो शत्रुओं  से विनाश न हुआ हो  और विनाश  होने पर भी फिर उत्थान की संपत्ति  हो.
७. श्रेष्ठ देश  के लक्षण हैं  जीव नदियाँ ,ऊँचे  पहाड़ ,उससे निकलनेवाली नदियाँ ,वर्षा के पानी और
 सुरक्षित  दुर्ग   आदि.

८. सुन्दर देश  के आभूषण पाँच हैं --१.  रोग रहित जनता २. पैदावार ३. संपत्ति ४. सुखी जीवन ५. सुरक्षा   की अच्छी  व्यवस्था.

९.  अपने परिश्रम  और लगातार कोशिश   से  बढ़नेवाले देशों  से  वही देश देश है जहाँ प्राकृतिक उन्नति स्वाभावि हो.

१० .सभी प्रकार की संपत्ति  होने पर भी अच्छी  शासन  व्यवस्था न हो तो उस देश की समृद्धि नष्ट हो  जायेगी.

******************************************************************************************

Thursday, April 7, 2016

श्रोताओं और दरबार /सभा पहचानकर बोलना. ७११ से ७२० . तिरुक्कुरल -अर्थ भाग --राजनीती

श्रोताओं और दरबार /सभा  पहचानकर  बोलना. ७११  से ७२० . तिरुक्कुरल -अर्थ भाग --राजनीती


१.   चतुर लोग  श्रोताओं और सभा  के लोगों के गुण -ज्ञान पहचानकर  अपने विचार उनके  अनुकूल प्रकट करेंगे.

२. ज्ञानी अपने भाषण को समय और स्थान  के अनुकूल करेंगे.

३. सभा  और श्रोताओं  के गुण और योग्यता के विपरीत भाषण देनेवाले  कुशल वक्ता नहीं बन सकते .

४. बुद्धिमान  हो तो बुद्धिहीन लोगों के बीच अपने को भी बुद्धि  हीन   दिखाना ही उचित  है.  दूध सम  ज्ञान होने  पर भी चूने के सम  ही व्यवहार करना उचित  है.

५. ज्ञानियों  के बीच चुप रहना  सब से अच्छा गुण  है.

६. बहु ज्ञानियों के बीच भाषण देने में गलती करना  ऊंचाई से नीचे गिरने के सामान  है; सावधानी से शब्दों का प्रयोग  करना  चाहिए.

७.  बिना कसर के शब्द प्रयोग ही  शिक्षित लोगों को प्रसिद्धि दिलायेगी.

८. अपने  भाषण को  समझने की शक्ति   जिसमें हैं ,उनके सामने बोलना ऐसा है कि पौधे को बढ़ने पानी सींचना.
९.  बड़े ज्ञानियों की सभा में  बोलनेवाले बुद्धिमानों  को अज्ञानियों  की सभा  में भूलकर भी बोलना  नहीं चाहिए.

१० . ज्ञानियों का अज्ञानियों  की सभा में बोलना अमृत को मोरे में  डालने के समान  है. 

ताड़ने / भांपने की दिव्यशक्ति -- ---७०१ से ७१० ---राजनीती --तिरुक्कुरल -अर्थ भाग

ताड़ना / भांपना ---७०१ से ७१० ---राजनीती --तिरुक्कुरल -अर्थ भाग 

१. जब  एक व्यक्ति चुप रहता  है ,तब उसके मन की बात को उसके चेहरे से ही भाँपने वाला 

भविष्य ज्ञाता  सच्चमुच  संसार  का  भूषण होगा. 

२.  एक  मनुष्य के मन की बात ताड़ने  की शक्ति ईश्वर  को है  तो
 वैसी ही शक्तिवाला मनुष्य भी ईश्वर तुल्य ही होगा. 

३. एक  के चेहरे से ही उसके मन की बात ताड़नेवाले  को  अपना सहायक बना लेना चाहिए. 

४. आकार में एक  दीखनेवाले  दो व्यक्तियों के   चुप  रहने  पर  भी   ,उनके मन की बात  भाँपकर
जाननेवाले ,न जाननेवाले दोनों  अलग -अलग होते हैं. 

५.  एक व्यक्ति की आँखें और चेहरे से उनके मन की बात  न ताड़ सकते हैं तो  
न   भांपने  वाली  उन  आँखों  से क्या लाभ.?

६.  जैसे दर्पण चहरे को दिखाता हैं  वैसे  ही एक मनुष्य का चेहरा उसके  मन  की बात प्रकट  कर  देगा.



७. मन की बुरी ,अच्छे और घृणा प्रद बात को    पहले  ही  प्रकट करने की शक्ति
चेहरे जैसे और किसी को नहीं    है.


८. मन की  बात को ताड़ने की शक्ति जिसमें  हैं ,उसके सामने खड़ा होना काफी है. बोलने की ज़रुरत नहीं है.

९. आँखों को देखते  ही भाँप  जायेंगे कि  किसी के मन में बुरे विचार  है या अच्छे .
दृष्टी ताड़ने की शक्ति  का महत्त्व है. 

१०.  सूक्ष्म  बुद्धिवाले   दूसरों के मन की बात जानने के लिए   उनकी  आँखों  को ही मापक बना लेंगे.
*****

राजाश्रय --६९१ से ७०० अर्थ भाग --तिरुक्कुरल -राजनीती

राजाश्रय --६९१ से ७००  अर्थ भाग --तिरुक्कुरल -राजनीती 

१. जो राजाश्रित है ,उनको राजा के साथ ऐसा रहना है 
 राजा के निकट और राजा  से दूर. जैसे से आग से सर्दी बचाते  हैं.

२. राजाश्रित लोगों को राजा  के पसंद लोगों को ही पसंद करना चाहिए. तभी स्थायी  पद और संपत्ति मिलेगी. 

३. राजाश्रित लोगों को अति सावधानी से रहना चाहिए .
छोटी-सी गलती  भी  शक भी   संकट में दाल  देगा.
फिर राजा से सफाई देना अत्यंत  असंभव  और मुश्किल हो  जाएगा.
४. 
राजाश्रित लोगों  को राजा  के सामने  दूसरों के कान  में बोलना और हँसना भी सही नहीं है. वह संकट  प्रदान करेगा. 
५. राजाश्रित लोगों को राजा की गोपनीय बातों के बारे में पूछना ,
ध्यान  से सुनना मना है. 
राजा खुद कहेगा तो ठीक है,नहीं तो यों ही छोड़ना  बेहतर  है. 

६. राजा  का  संकेत जानकर उनके जवाब अनुकूल समय पर ही घृणित बातों  को और पसंद बातों को कहना चाहिए .
७.  राजाश्रित को केवल राजा के मन -पसंद बातों को ही बोलना चाहिए.
जो बात राजा को पसंद नहीं ,उन्हें राजा के पूछने  पर भी बोलना नहीं चाहिए. 
८. राजाश्रित लोगों का व्यवहार राजा के प्रति आदरणीय होना चाहिए ,
यद्यपि राजा उम्र में छोटा हो या निकट रिश्ते का भी हो.
९.   राजाश्रित राजा द्वारा निर्मित  चतुर  और ज्ञानी  लोग  
राजा के नापसंद कामों को करने का साहस नहीं करेंगे.
१०. 
राजाश्रित लोगों  को अपनी वरिष्ठता का लाभ उठाकर 
अनुचित कार्यों को करने पर बुराई ही होगी. 
*********

कार्य प्रणाली ---अर्थ भाग -राजनीती -- तिरुक्कुरल ६७१ से ६८० तक

          कार्य प्रणाली ---अर्थ भाग -राजनीती -- तिरुक्कुरल ६७१  से ६८० तक 

१. सोच-विचार करके  एक काम करने तैयार होने के बाद  
जरा भी देरी करना  नहीं चाहिए.
 देरी करना नुकसान उठाना है. 

२.   जो  काम धीरे धीरे करना है ,उसको आराम से कर सकते हैं ; पर 

जो काम तेज़ी  से  करना  है ,उसे तुरंत करना चाहिए.  उसमें विलम्ब ठीक नहीं है .

३.  जहाँ  काम कर सकते है , वहाँ तुरन्त  काम कर चुकना चाहिए .
नहीं  कर सकते है तो जहाँ उचित स्थान मिलेगा ,वहाँ करना चाहिए . नहीं तो उचित उपाय ढूँढ लेना चाहिए. 

४. जो भी काम हो ,शुरू करने के  बाद आधा -अधूरा न छोड़कर पूरा करना चाहिए; 

वैसे  ही दुश्मनी को भी ख़तम करना चाहिए; 
अधूरा  काम  और अधूरी दुश्मनी  अध्-बुझे आग के समान है .
  बाद में  सर्वनाश कर देगा.

५. कार्यप्रणाली  पाँच बातों से सफल होगी ;
वे  है --१.कार्य करने की  उचित सामग्री, २. औजार, ३.समय  ज्ञान , ४. स्थान , ५  उचित  पेशा   आदि.

६. काम  करने की तरीका ,आनेवाली बाधाएं  और मिलनेवाले लाभ  आदि को
सोच -समझकर कार्य करना चाहिए.

७. जो काम करना है ,उससे पूर्व परिचित अनुभवी
कार्य कर्ताओं से भी जानकारी लेनी चाहिए.
 यह भी एक कार्यप्रणाली का एक सोपान  है.

८.  एक काम करते समय ,दूसरे  काम  को भी कर चूकना,
 एक हाथी की सहायता  से दूसरे हाथी को पकड़ने के सामान है.

९. दुश्मनों को भी अपने अनुकूल बनाकर  काम करना ,
दोस्तों से बढ़कर काम को जल्दी पूरा करने में सहायता सिद्धी है .

१० . जो कमजोर हैं ,वे बलवानों के पक्ष में जाकर कार्य करने में समर्थ हो जायेगे ,
जब उनके साथी  भी  बलवानों  से डरने लगेंगे .



राजदूत ---अर्थ्भाग -राजनीती -तिरुक्कुरल --६७१से ६८०

राजदूत  ---अर्थ्भाग -राजनीती -तिरुक्कुरल --६७१से ६८० 


१. एक राज दूत  के श्रेष्ठ गुण हैं ---प्यार भरा व्यवहार ,  प्रसिद्द उच्च कुल ,
सरकार द्वारा सराहनीय संकृति आदि. 

२. राजदूत  बनने  के लिए  तीन  मुख्य गुण  हैं --१.प्यार २. ज्ञान ३, सोच-समझ बोलने की शब्द -शक्ति.

३. देश की विजय -वार्ता के दूत को अधिक ग्रंथों के ज्ञान 
और ज्ञानियों में श्रेष्ठ होना  और छानबीन कर तथ्य कहने का कौशल  आदि गुण  आवश्यक  है. 

४. राजदूत   के पद के लिए विशेष व्यक्तित्व ,शोध  करने के गुण  अधिक ज्ञान  आदि आवश्यक है. 

५. राजदूत  को ऐसे मधुर वचन बोलने की शक्ति आवश्यक है ,
जिससे सुननेवाले को क्रोध  न हो.
 अनावश्यक बातें छोड़कर आवश्यक बातें बोलने की शक्ति चाहिए. वही राजदूत का लक्षण  है. 
६. दूतों में श्रेष्ठ वही है   जो अति ज्ञानी हो ,दुश्मन की दृष्टी से निर्भय हो,
 समयानुकूल बोलनेवाले हो  ऐसा बोलना कि सुननेवाले के मन छू  सके.

७. वही दूत है जो अपने कर्तव्य को खूब समझकर   ,समय और स्थान को सही चुनकर  सोच -समझकर कहने में समर्थ हो.


८. साहसी  ,सहायक ,अच्छी चाल-चलन  आदि सच्चे आदर्श दूत के लक्षण होते  है. 

९. अपराध भरे शब्द  न  बोलना भी राज दूत के योग्य गुण है. 

१०. अपने प्राण के खतरे के समय  में  भी  निडर होकर अपने राजा के कल्याण कार्य करनेवाला  ही  राज दूत है. 

८.