मन कहता है कुछ लिखूँ?
मन की बात। मानकी बात।
दे श की बात । ग्ञान की बात।
पर मेरी बुद्धी तो कच्ची।
शब्द नहीं निकलते अच्छी।
बातें पुरानी ही निकलती सच्ची।
सत्य ईमानदारी परोपकार धर्म कर्म।
पूर्वजों की बात सै बढकर
जन्म - मरण के बीच कुछ नहीं।
जिओ- जीने दो।
प्राण जाए पर वचन न जाए।
राम नाम जपो, रम्य जीवन बिताओ।
प्रेम मार्ग बदले ,भक्ति में।
नर हो न निराश करो मन को।
इन से बढकर कुछ नहीं।
कुछ करके दिखाओ।
करने कराने करवाने चाहिए कृपा
जगदीश्वर की।
सब ही नचावत राम गोसाई।
Search This Blog
Thursday, June 23, 2016
सब को नचावत राम गोसाई।
Wednesday, June 22, 2016
जागो
जागो ! जागो!
जगदीश्वर पर मन लगाओ !
जितना लगाओगे,
जीतना जग भार आसान.
जपो, नाम जगदीश्वर को
जनम को बनाओ सार्थक।
जान लो जीना आसान।
जुटाओ पुण्य फल।
जमाना आशीषें दीनों के दान में ।
जागो। जागो।
जगदीश्वर पर मन लगाओ।।
Tuesday, June 21, 2016
श्री गणेश
श्रीगणेश श्री देगा ,श्रेयश देगा,
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
श्री गणेश
श्रीगणेश श्री देगा ,श्रेयश देगा,
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
श्री गणेश
श्रीगणेश श्री देगा ,श्रेयश देगा,
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
श्री गणेश
श्रीगणेश श्री देगा ,श्रेयश देगा,
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
विघ्न हरेगा, विनाश से बचायेगा।
सनातन धर्म की पूजा के अग्रगणय देवता,
अचानक दैखा समुद्र तट पर
उनके विच्छिन्न अंग बिखेर बिखेर।
कितना अपमान विघ्नहर का
सिर अलग, पैर अलग ,हाथ अलग।
ईश्वर तो श्रद्धा की मूर्ती,
पर लहरे उनको तोड मरोडती।
ईश्वर पर ही इतना अन्याय
,
चिल्लाते हैं मुगल तोडते मूर्तियाँ,
पर फेंकी मूर्तियों को लहरें तोडती।
न जरा भी पश्चाताप , न भक्ति न श्रद्धा।
न दया, साल पर साल संख्या बढाने में तुले हैं
कितना अनयाय ,कितना बडा पाप
।
जरा सोचो विचारो। रोको यह अन्याय।
तभी होगी सनातन धर्म की आवाज एक।।
सोचो निम्न देव के छिन्न भिन्न रूप।।
Sunday, June 19, 2016
वंदना
विष्णुप्रिय| हूँ। विष्णु दास हूँ।
विधि की विडंबना से बचना चाहतै हो
विख्यात विष्णु की पूजा में लग जाओ।
विनाश| काले विपरीत बुद्धी से बचना हो तो
विघ्नेश्वर के चरण पकडकर आगे बढो।
नचाने वाले हैं भगवान।
नाचनेवाले हैं हम।
सूत्रधारी हैं वे सुख- दुख उनके हाथ।
कामना करो पूरी होगी मनोनुकूल कामनाएँ
अग जग में नाम मिलेगा, दाम मिलेगा।
विट्टल का नाम जपो , सकल ऐश्वर्य पाओ।
Subscribe to:
Comments (Atom)
