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Monday, February 1, 2016

कृपा कटाक्ष ---तिरुक्कुरल --२५१ से २६० तक.

कृपा कटाक्ष ---तिरुक्कुरल --२४१ से २५० तक.
१. क्रूर अत्याचारियों के यहाँ भी धन -दौलत भरा रहेगा.

 पर  वह कृपा कटाक्ष  की संपत्ति के बराबर नहीं हो सकता. 

२. कई प्राकार के अनुसंधान के बाद  यही निष्कर्ष निकला कि  जीवन का साथी कृपा कटाक्ष ही है.

३. कृपा प्राप्त लोग दुःख के अँधेरे में घेरकर न रहेंगे. 

४. दूसरों को और अन्य जीवराशियों पर दया दिखानेवाले  और रक्षा करनेवाले सज्जन अपने प्राण को अति तुच्छ मानेंगे. 

५. कृपा कटाक्ष प्राप्तकर जीनेवाले को कभी किसी हालत में दुःख नहीं होगा. इस उक्ति का प्रमाण वायु है.वायु के चलने से ही संसार अति बलवान है.

६. जो कृपा प्राप्त करके जीते हैं वे निर्धनी होंगे और कर्तव्य विमुख होंगे. 

७. अर्थविहीन गृहस्थ जीवन इस संसार में दुखी रहेगा. उसी प्रकार करूण बिन  उस लोक में दुखी रहेंगे; 
अर्थात इस संसार में अर्थ ही प्रधान है और उस संसार में अर्थात देव लोक में कृपा ही प्रधान है.

८ . धन खोकर पुनः प्राप्त कर सकते हैं;पर कृपा खोकर प्राप्त करना असंभव है. 

९. ईश्वर की कृपा अप्राप्त व्यक्ति का धर्म- कार्य ,
अज्ञानी के ग्रन्थ पढने के सामान ही होगा. 
 अज्ञानी ग्रन्थ समझ नहीं पायेगा; 
कृपा अप्राप्त धर्म कर्म सही मूलसे कर न पायेगा.

१० .कृपा अप्राप्त बलवान दुर्बलों को सताते वक्त 
यह सोचना चाहिए कि उससे बलवान इस संसार में है. उसके सामने भयभीत रहना पड़ेगा .

कीर्ति = यश =प्रसिद्धि --तिरुक्कुरल --२३१ से २४०

कीर्ति = यश =प्रसिद्धि --तिरुक्कुरल --२३१ से २४० 

१. दीन -दुखियों  को  दान देना और यश भरे जीवन जीना  
 इससे  बढ़कर   और दूसरी बड़ी  कोई संपत्ति नहीं  है.

२. दींन -दुखियों के दाताओं की प्रशंसा ही सब से ऊंची कीर्ति है.

३. इस संसार में कोई चीज  अतुलनीय  और शाश्वत है तो 
वह  कीर्ति या यश  ही है.

४. आनेवाले युग में भी नामियों की ही प्रशंसा होगी ,
न विद्वानों की न शिक्षितों की .

५. जीते जी कीर्ति और मृत्यु की दशा में भी कीर्ति  पाना 
 सब के वश में नहीं हैं .
ऐसी प्रसिद्धि उनको मिलेगी ,जिनको  सहज रूप में वह शक्ति मिली हो.

६. संसार में जन्म लेने पर यश प्राप्त करना चाहिए; 
अर्थात जो भी काम करने को मिलता है ,
उसे ऐसा करना है ,
जिससे नाम मिले. 
 ऐसा  न  हो तो जन्म न  लेना ही  उचित है. 

७. जो अपने यश के लिए उचित कर्म न कर सकते ,
वे अपने आप दुखी होना  पडेगा. 
 ऐसा न करके  वे क्यों अपनी निंदकों
 और  अपने अपामान करने वालों की निंदा  करते है .
यह तो सही नहीं  है. 

८. अपने कर्म से  यश  प्राप्त न करनेवालों पर,
उसके निदन के बाद  लोग निंदा  ही  करेंगे .

९. बिना नाम के अर्थात कीर्ति के शारीर को भूमि ढोता है तो 
 मतलब है भूमि ऊसर है.

१० . बिन अपयश के जीना ही जीवन है,
 बिन कीर्ति के जीना और न जीना दोनों बराबर ही है. 

दान --तिरुक्कुरल --२२० से २३०

दान --तिरुक्कुरल --२२० से २३०  

 १. दान --तिरुक्कुरल --२२० से २३० दीन- दुखियों को      देना ही दान  है ; बाकी सब दान किसी फल की प्रतीक्षा में दिया हुआ दान सम है.
२.   भलाई  के लिए दूसरों के आग्रह से 
दूसरों से कुछ लेने में बड़प्पन नहीं हैं ;छुटपन ही है. 
३. अपनी गरीबी का दुखड़ा न रोकर  दान  देना कुलीन कर्म है.
४. दाता को तभी सुख होगा , तब तक उससे दान देनेवाले के चेहरे से उदासी दूर होगी और प्रसन्नता दीख पड़ेगी. 
५. अनशन रखकर तप करने के फल -पुण्य से ,दूसरों की भूख  मिटाने से अधिक फल और पुण्य मिलेगा. 
६. अपने यहाँ आये भूखे का पेट भरना  ही अमीरी का भविष्य निधि है.
७. अपने पास जो कुछ है ,उसे बांटकर खानेवाले को कभी भूख का महसूस करेंगे.
८. अपनी संपत्ति को दान पुण्य न करके sampatti  खोनेवाले दान कर्म के आनंद और महत्त्व को न जानते.
९. दान देने से जो अपनी संपत्ति के घटने की बात सोचेगा ,अपनी ढेर संपत्ति को खुद भोगना चाहेगा ,वह भीख मांगने से निम्न कार्य है.
१०.मृत्यु के  दुःख से अधिक दुःख प्रद है दूसरों को दान  न देने की दयनीय दशा . 

परोपकार २११ से २२० तक --तिरुक्कुरल

परोपकार   २११ से २२० तक --तिरुक्कुरल 

     १.    वर्षा  प्रत्युपकार  की चाह के बिना ही होती है;
वैसे   ही संसार में परोपकार करनेवाले होते हैं.

२. परोपकारी कठोर मेहनत  करके जो  कुछ जमा करता है ,वे सब दूसरों की मदद करने के लिए ही है. 
३.परोपकार जैसे सत्कार्य के सामान और कोई श्रेष्ठ कार्य इस लोक में भी नहीं और परलोक में भी नहीं.
४. परोपकार के लिए ही जीनेवाला ही ज़िंदा आदमी है; बाकी सब मरे हुए माने जायेंगे .
५. सार्वजनिक भलाई के लिए जीनेवाले की संपत्ति 
सार्वजनिक तालाब जैसा है.जिसमें पानी का स्त्रोत भरता रहता है.
६. दयालु और परोपकारी की संपत्ति शहर के बीच पले
फलों के वृक्ष सामान हैं ,जिसमें जो चाहे फल तोड़ सकते हैं.
७.दयालु और परोपकार की संपत्ति  एक ऐसे पेड़ के सामान हैं ,जिसके सारे अंग दूसरों के लिए ही काम आयेगा,
८. जो परोपकार को ही श्रेष्ठ मानते हैं ,वे अपनी दीनावस्था में भी परोपकार कर्म पर दृढ़ रहेंगे ; ज़रा भी विचलित नहीं  होंगे. 
९.जो परोपकार करता हैं ,वह तभी पछतायेगा ,जब वह दूसरों  को दे नहीं सकता .
१० .परोपकार से बुराई होगी तो वह उसे अपने को बेचकर भी प्राप्त कर सकता है.

Sunday, January 31, 2016

உலகியலும் உலகநாதனும்

அறிவியல்  வளர்ச்சி
ஆன்மீகத்தில் வளர்ச்சி.
வலைதளம் யூட்யூப் அனைத்திலும்
ஆன்மீக இறைவழிபாடு.
இந்த வளரச்சி இருந்தாலும்
உலகியலுக்கென கவர்ச்சி
உலகியல் கவர்ச்சியில்
உலகநாதனின் கவர்ச்சி
ஆடம்பரமான நிலை.
தெய்வீக பக்தி என்பது
தெய்வீகப்பணிகளுக்கு நன்கொடை என்பதிலேயே
ஆத்ம திருப்தி
  அரிய படைப்புகள் அதிசயப்படைப்புகள்
ஆண்டவனின் படைப்புகள்.
அதை மறக்கச்செய்யும்
அறிவியல் படைப்புகள்
உலகியல் இன்பமே முந்துவது
பணம் பணம் ஆடம்பரம் .
இந்த ஆடம்பரம்  உண்மை
நிலை மறக்காமல்
உலகநாதனை நினைக்கவே
இயற்கை மாற்றங்கள் சீற்றங்கள்
சந்திரனில் காலடி வைத்தாலும்
சங்கடமில்லா பயண வெற்றிக்கு
அவனைத் தொழும் நிலை.
உலகியல் இன்பங்கள்  தற்காலிகமானவை என்பதற்கே
அறிவியல்  ஆற்றல் மீறிய நிகழ்ச்சிகள்
மனிதனுக்கு புலப்படாத விசித்திரங்கள் .
உலகநாதனைத் தொழவைக்கும் .
அங்குதான் ஆண்டவனின் அளப்பறிய ஆற்றல்.
ஒவ்வொரு முன்னேற்றத்திற்குப் பின்னும்  இறைவனின் சக்தி.
அன்பு அடக்கம் உண்மைகடமைநேர்மை
இதைவையகத்தில்  நிலைக்கச்செய்கிறது.

अनुपयोगी बातें न करना १९१ से २०० तक.

अनुपयोगी  बातें न   करना  १९१ से २०० तक. 
  1. घृणित शब्द  बोलनेवाले अपयश  का पात्र बन जाते. 
  2. सब के सामने  बेकार बातें  करना दोस्ती के वृद्ध बोलने से  बढ़कर हानीकारक है। 
  3. बेकार बातें जो बोलता रहता है ,वही उसे बेकार कर देगा। 
  4. अनुपयोगी ,गुणहीन  बातें सब के सामने करें तो बुराई और अप्रसन्नता ही बचेगी। 
  5. गुणी भी अनुपयोगी बातें  करें तो उनका आदर घट जाएगा.मिट भी जाएगा।
  6. बेकार बातें  करनेवाले को मनुष्य नहीं कहकर उसे मनुष्यों में नालायक मनुष्य कहना ही बेहतर  है. 
  7. गुणी  का  कटुवचन  बोलना स्वीकार्य है ,पर अनुपयोगी  न  बोलने में  ही भला है. 
  8. सुफल  खोजकर्ता ज्ञानी कभी अनुपयोगी बात नहीं  करता.
  9. निर्दोष  गुणी सज्जन कभी बेकार बातें नहीं करेगा.
  10. अनुपयोगी बातें करना तजकर उपयोगी लाभप्रद  बातों को ही  बोलना चाहिए. 



पीछे से बोलना --तिरुक्कुरल --१८१ से १९०

पीछे से बोलना --तिरुक्कुरल --१८१  से १९० 
  1. धर्म पथ पर न जानेवाले ,धर्म की प्रशंसा  न करनेवाले   , दूसरों  के बारे में पीछे से बोलना छोड़ दें  तो भला होगा. 
  2. प्रत्यक्ष  एक व्यक्ति की प्रशंसा और पीछे से निंदा करना अति पाप  और बुराई बर्ताव है ;अधर्म करने से बढ़कर पाप कार्य है. 
  3. आमने -सामने प्रशंसा और पीछे से उसकी निंदा करके  जीने से मरना भला है.
  4. एक आदमी के सामने प्रत्यक्ष रूप निंदा करन सही व्यवहार हैं ; पीछे से गाली देने  पर बुरा प्रभाव पडेगा,वह व्यवहार निंदनीय है. 
  5. दूसरों की निंदा पीछे से करनेवालों को देखते ही पता चल जाएगा कि वह अधर्मी है.
  6. पीछे से बुराई कहनेवाले की बातों की याद करके बोलनेवालों  पर कठोर शब्द उसके शब्दों से बढ़कर बोलेंगे। 
  7. जो मधुर बोली से मित्रता निभा नहीं सकते ,वे पीछे से बोलकर  सभी मित्रों को खो बैठेंगे।
  8. निकट संपर्क के दोस्तों  के बारे में पीछे से बोलनेवाले  अन्य अपरिचोतों के बारे में बहुत बोलेंगे. 
  9. दूसरों  के बारे में पीछे से  बोलनेवाले के शरीर को धरती इसलिए धोती है  कि  धर्म देवता उसके कर्म को सहती है. 
  10. दूसरों के दोषों के बारे में सोचनेवाले अपने दोषों पर ध्यान देंगे तो पीछे से निंदा नहीं करेंगे.