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Wednesday, April 6, 2016
कर्म -शुद्धता ---अर्थ भाग --राजनीती --तिरुक्कुरल ६५१ से ६६० तक
शब्द =शक्ति ---अर्थ भाग --६41 से ६5० तक --तिरुक्कुरल --तिरुवल्लुवर
ऐसे शब्द बोलना है ,जिसे दूसरे शब्द नहीं जीत सकते.
६. दूसरों के लिए लाभप्रद शब्द बोलना ,
दूसरों के लाभप्रद शब्दों से फायदा उठाना ,
ज्ञानियों की विशेषता है.
७. ऐसे ज्ञानियों को हराना असंभव है
जिनमे अपने विचारों को उचित शब्दों में अभिव्यक्ति करने की क्षमता ,
दूसरों को मनाने -मनवाने का सामार्थ्य , निडर और चुस्त आदि गुण हो.
८. अपने सिद्धांतों को सिलसिलेवार, सुन्दर और प्यार भरे शब्दों में
प्रकट करनेवाले निपुण लोगों की आज्ञाओं को
संसार मानेगा.और कार्य में लग जाएगा।
९. निर्दोष चन्द शब्दों से जो अपने विचार प्रकट करने की और समाझाने की
क्षमता नहीं रखते ,
वे ही कई शब्दों को दोहराते रहेंगे.
१०. अपने सीखे ग्रंथों को दूसरों को समझाने में जो असमर्थ होते हैं ,
वे ऐसे फूलों के गुच्छे जैसे हैं ,जिनमे सुगंध न हो.
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Monday, April 4, 2016
मंत्री --सामंत --अर्थ भाग --राजनीती --६३० --६४०
Friday, April 1, 2016
संकट मोचन --तिरुक्कुरल -- अर्थ भाग --६२१ से ६३० तक
Sunday, March 27, 2016
आलसी --सुस्ती ---अर्थ -भाग --तिरुक्कुरल --६०१ से ६१०
Friday, March 25, 2016
साहसी /बल ---अर्थ भाग -५९१ से ६०० तिरुक्कुरल
Wednesday, March 23, 2016
मगर मचछ आँसू
मित्रता मान ली। धन्यवाद।
भारत अखंड।
भारत खंडीत।
जुुडा भारत आध्यात्मिकता से।
दिल तोडा भारत आध्यातमिक्ता से।
राम के काल में ,कृष्ण के काल में
भक्ति की एकता बनी बिगडी।
कबीर नै तो समझाया।
पर उनके जन्म और पालन भिन्न।
कहा वेद पढते हैं कुरान पढते हैं पर
न पहचाना खुदा कहाँ है ?
अलौकिक प्रेम का ग्रंथ ।
लौकिकता का मोह
धार्मिक भैद।मनुष्य मनुष्य में भेद।
तपस्या का सत्य कहाँ।
चुनाव आया तो न किसी का ध्यान
मनुष्य एकता का।
स्वार्थ कुर्सी के मोह| में
हिंदु मत पर न ध्यान ।
आरक्षण नीति।
आजाद के सत्तर साल
धरम निरपेक्ष ता की बात।
हिन्दु बहुसंख्यक पर
गाँधी बने खान अ्ति चतुर ।
सूचित अनुसूचित जातियों क़ो
सहूलियत सुविधाएँ।
साल पर साल पिछडे दलित
वर्गो की सूची बढाते ।
अब जाट ,राजपूत बिना सोचे विचारै
बेशरम सूचित जातियों में नाम जोडने
सत्तर साल की तरक्की जाति के नाम लडाइयाँ।
खून खौलता है।पर अधिकार हिन्दु के खाल पहने
खान दिलियों के हाथ।
खेद आजादी के सत्तर साल के बाद
कौशल के आधार पर नहीं।
जाति के आधार पर पदोननति।
पिछडे वर्ग आदि वासी वरग अपमानित
सरकारी सुविधा के नाम से कलंकित
फिर भी छंद सुविधा के कारण
न उच्च कहते निम्न कहने कहलाने लडतै।
सर ऊँचा उठने में स्वार्थ राजनीति
उन्हें सोचने न दिया।
सत्तर साल ,पर माँगे
पिछडे वर्ग की सूची में जुडने की।
सोचिए आजादी के सत्तर साल
कैसे छल राजनैतिक दलों की चाल।
कह दिया जागें तो जागना।
आरक्षण तो भक्षण ।
हिन्दु एकता तोडने का
मगर मच्छ आँसू।