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Thursday, April 28, 2016

तिरुक्कुरळ- काम- भाग--अफवाहें फैलना. ११४१ से ११५०

 अफवाहें  फैलना --तिरुक्कुरळ-११४१ से११५०

१.अफवाह फैलाने में ही मेरे प्रेम की सफलता  निश्चित हो जाने  की  संभावना  है. इसी  आशा  में मैं  जिंदा  हूँ. अफवाहें फैलानेवाले  यह. बात. नहीं जानते.


२. वह फूल नयनवाली से मेरे संबंध की  जो अफवाहें  हैं, वही  हमारे प्रेम की मदद कर रही  है.

३. हमारे प्रेम की अफवाहें फैलेगी नहीं? वह. किंवदंतियाँ जो  प्रेम न मिलेगी वह  मिलने के संकेत है.

४. अफवाहों  के  कारण. ही  मेरे प्रेम का विकास हो रहा  है.नहीं तो वह. प्रेम लता सूख जाएगी. 

५.  प्रेम की अफवाहों का बढना प्रेम के संबंध को मधुर  बनाता  है जैसे 
मद्यपान के आदी हो  जाते  हैं.

६. प्रेमियों के मिलन सिर्फ एक. ही  दिन है; पर अफवाहें चंद्र को राघु निगालने की कालपनिक कहानी के समान फैलने लगी.

७. प्रेम. को अफवाहें खाद देकर पानी  सींचकर  विकसित करती  है

८. किंवदंतियाँ  फैलाकर  प्रेम भंग. करने  का प्रयत्न  आग बुझाने घी उंडेलने  के  समान. है .

९. जिन्होंने  कसम खाया कि मैं  तुम से  बिछुडूँगा नहीं , वही मुँह फेर लिया तो अफवाहें मझे क्या कर सकती. मुझे तो लज्जा का पात्र बना दिया.मैं तो इन अफवाहों  से शरम नहीं  खाऊँगा.

१०.
लोगों ने ऐसी अफवाहें फैलाई. जिस के प्रति मन में प्रेम है. अब प्रेमी चाहें  तो मेरी मानसिक. इच्छा पूरी होगी. वे मुझसे  विवाह  कर लेंगे.


तिरुक्कुरल - काम शास्त्र भाग-संन्यास की बात करना- १०३१ से १०४० तक


तिरुक्कुरल -काम -- संन्यास. की   बात  करना--११३१ से ११४०

१. प्रेम के कारण दुखी  युवक. को  संन्यास के सिवा और. कोई. मार्ग नहीं  है.

२.
प्रेमी अपनी विरह वेदना सह. नहीं  सकता ; वह. कहता  है  कि मेरे  शरीर. और प्राण तडपने के  कारण  गृह -त्याग   कर दूँगा .इसमें शरम की बात नहीं है.

 ३.  प्रेमी  कहता  है  कि  मुझमें  अति  पौरुष और लज्जाशील. होने  पर. भी  प्रेम के  कारण

प्रेयसी  से   अलग  रहने  से संन्यास ग्रहण करने  तैयार हो गया.

४. प्रेम के बाढ. में  इतनी शक्ति  है  कि  वह  पौरुष 'लज्जा  के  पोत. को बहाकर ले चलता  है.


५. महीन साडियाँ पहनी  मेरी  प्रेयसी  प्रेम. के  साथ  संन्यास के विचार भी दे चली  है.

६. प्रेयसी  के  कारण  मुझे नींद नहीं आती ; अतः अर्द्ध रात्री  में  भी  संन्यास ग्रहण के बारे में सोच रहा  हूँ.

७. बहुत अनंत. काम. रोग. में  तडपकर भी  स्त्री गृह -त्याग. की  बात सोचती  नहीं है. यही नारी जन्म का  बडप्पन. है.

८. नारी दयनीय है, असंयमी है  आदि  बातों  पर ध्यान  न  देकर.
  बिना छिपे प्रकट होना  ही  काम और प्यार है.

९.  मेरे प्रेम. की  बात और किसी को मालूम  न होना चाहिए. इस के डर. से प्ेम गली  में घूम रहा है.

१०.  प्रेम के रोग. से  जो  पीडित. नहीं  है वे ही प्रेमी  को  देखकर  खिल्ली उडाएँगे.

तिरुक्कुरल - काम शास्त्र भाग- प्रेम की विशेषता- १०२१ से १०३०.

 तिरुक्कुरल -काम शास्त्र भाग - प्रेम  का  महत्व - ११२१. . से११३०

१. मधुर  बोली  बोलनेवाली मेरी प्रेयसी के दाँतें  के बीच टपकनेवाला लार  दूध. और  शहद के मिश्रण -सा स्वादिष्ट लगता  है.

२. मेरी  प्रेयसी  और मेरा  संबंध तन और जान  सम है. अलग-अलग  नहीं  रह. सकता.

३.  आँख. की  पुतली!  मेरी प्रेयसी  को  आँखों  में  स्थान देकर तू चली जा.

४.  सद्गुण संपन्न मेरी प्रेयसी से मिलने पर प्राण आ जाता  है,  बिछुडने  पर प्राण  चले जाते  हैं.

५. मेरी प्रेयसी के सद्गुणों को मैं  सोचता  ही  नहीं कयोंकि  भूला  ही  नहीं  तो सोचने की जरूरत नहीं  है.

६ .  मेरे  प्रेमी   मेरी  आँखों में है; कहीं नहीं  जाएँगे.
आँखों को बंद करके खोलने पर भी दुखी नहीं  होंगे. कयोंकि वे अत्यंत सूक्ष्म हैं. 

७. मेरे प्रेमी मेरी आँखों  में  होने  से  मैं काजल. भी  नहीं लगाता क्योंकि काजल लगाने  पर छिप जाएँगे.

८. दिल. में  जो प्रेमी  है, उनको  गर्मी  लगेगी इसलिए मैं गरम  पेय नहीं पीती.ऐसे डरनेवाले  ही सच्चे  प्रेमी  है.

९.  आँखें मारने  से  मेरे प्रेमी छिप. जाएँगे; इसलिए पलक मारती ही नहीं, इसे जो  नहीं  समझते 
कहते  हैं कि वे प्रेमी  नहीं  है.

१०. प्रेम की दंपति   दिल. में ही  जी  रहे हैं ; पर अलग अलग रहते  देख.  लोग कहते  हैं कि दोनों  में प्रेम नहीं  है.


तिरुक्कुरल -- काम शास्त्र भाग -सुंदरता की अतिशयोक्ति प्रशंसा -११११से११२०

तिरुक्कुरळ -काम शास्त्र -सुंदरता की अतिशयोक्ति प्रशंसा 
                                  -११११से ११२० 

१. अनिच्चम नामक फूल तो अत्यंत कोमल. है. मेरी प्रियतमा  उस फूल की तुल्ना में अत्यंत कोमल है.

२. सब कई फूलों की सुंदरता देख चकित होते  हैं. पर मैं अपनी प्रेयसी की नयन फूल को ही सुंदरतम मानकर देखता  हूँ.

३. मेरी प्रियतमा की बाँहें बाँस जैसे हैं, दाँत मोती  जैसे, प्राकृतिक सुगंध, कजरारी  आँखें अति सुंदर. है.

४.मेरी प्रेयसी की आँखों  को कमल  देखेगा तो लज्जित होगा  कि मैं तो उतना सुंदर नहीं हूँ.

५.  अनिच्चम नामक मृदुतम फूल से अति कोमल मेरी प्रेयसी फूल के डंठल  को तोडे बिना  रखने से शरीर दुखने लगा इसी  कारण से उसको सुंदर मंगल वाद्य भी रुचता नहीं है.

 ६.तारे   मेरी प्रेयसी के  चेहरे और  चंद्रमा   में  फरक  न. जानकर

भटक. रहे  हैं. 

७. घट-बढकर दीखनेवाला  शशी तो कलंकित. है  पर मेरी प्रेयसी के मुख -चंद्र  निष्कलंक और उज्ज्वल  है. 

८. शशी !   तुझे मेरी प्रेयसी  बनना  हो तो  मेरी प्रेयसी  के  मुख के  समान  उज्ज्वल होना  है.

९. चंद्रमा! पुष्प  जैसे मेरी प्रेयसी  के  समान तुझको  बनना है  तो  सब को देखने के समान न उदय होना  है. उदय. होने पर कलंकित ही दीखोगे.

१०. अनिच्चम नामक फूल कोमल  है, हंस पक्षी  के पंख कोमल है पर मेरी  प्रेयसी  के पैर. इतना  कोमल. है  कि  मृदुतम फूल -पंख भी चुभने लगेगा.



Wednesday, April 27, 2016

संभोग सुख -गृह -शास्त्र -तिरुक्कुरळ -११०१ से १११०

संभोग आनंद - गृह -शास्त्र -११०१  से१११०


१. इस  चूडियाँ पहननेवाली   रूपवती  में  पाँ च प्रकार के पंचेंद्रिय  सुख 

(स्पर्श ,देख, सूंघ, सुन, जीभ -स्वाद आदि ) मिल जाती  है.

२. रोग चंगा करने कई दवाएँ  होती  हैं; पर प्रेम रोग के इलाज. की एक. मात्र  दवा उसकी प्रेमिका ही है.

  ३.  क्या अपनी प्रेमिका  के कंधों पर सोने  के सुख से कमल नयन के जग का सुख बडा  है ?

४. हटने से गर्मी निकट आने  से ठंड देने वाले तन को प्रेमिका कहाँ से  पाती  है?

५. केसों में फूलों से अलंकृत स्त्री की बाहें जैसे इच्छुक चीजें मिलने पर आनंद होता  है, वैसे ही आनंद प्रदान करता है.ै,अतः 

६. 
प्रेयसी के बाहों के स्पर्श से अत्यंत आनंद मिलता है  प्राणों में उत्कर्ष होता हैै अतः उसकी बाँहें अमृत. से बनायी होगी.

७. सुंदर गोरे शरीर की स्त्री से आलिंगन करने के सुख अपने मेहनत से कमाये धन को बाँटकर खाने के सुख के बराबर होता  है.

८. प्रेमियों के सुख की चरम सीमा तब  होती हैं,जब दोनों के आलिंगन केबीच हवा  भी प्रवेश नहीं कर  सकती.

९. रूठना रूठने के बाद संभोग करना  प्रेम मय जीवन का आनंद होता  है.

१०. आम के रंगवाली  रूपवती के संभोग के हर. बार. ऐसा लगता है   जैसे ग्रंथों को पढने के बाद भी पूर्ण ग्ञान न मिल रहा  है. 




काम भाग --हृदय का संकेत -- तिरुक्कुरळ --१०९१ से ११००

  काम भाग- -हृदय का संकेत-तिरुक्कुरळ- १०९१ से ११०० 

१. प्रेमिका  की  दृष्टियों  में   दो तरह  के  संकेत  है    १.प्रेम रोग  उत्पन्न करना २. प्रेम रोग. की दवा  .


२. प्रेमिका  की अध- खुली आँखों  की दृष्टी     पूर्ण  दृष्टी  से बहुत. बडी  है.

३. लज्जाशील आँखों  की अधखुली दृष्टी  मुझ. पर  पडी  तो  तो वही मेरे प्यार बढने की सिंचाई  हो  गई.

४. जब. मैं जमीन. को  देखता हूँ तब मुझे  देखना , जब. उसे मैं देखता  हूँ ,तब लज्जा  से मुँह. मोड लेना 

उसको मेरे प्रति के प्यार. के  संकेत ही है न ?

५ . उसकी मजर. मुझपर  सीधे नहीं  पडी, आँखें सिकुडकर मुझे  देखकर. खुश. होना  प्रेम के संकेत. ही है. 

६. प्रेम छिपाकर  बाहर  अनयें  के  समान. कठोर. बातें बोलने   पर. भी उस  के मन का आंतरिक. 
प्रेम चंद. दिनों में प्रकट  होगा  ही.

७. सच्चे  प्रेम. के  संकेत है , कठोर शब्द प्रकट,पर दुश्मनी अप्रकट ,दृष्टी परायों  जैसे , परायों का सा व्यवहार आदि. 

८. वह बोलती तो परायों  से बोलने  के  समान पर  जब देखती हूँ  तो मंदहास करती  है,यह. एक प्रेम का  संकेत है. 

९. प्रेमियों का एक विशेष गुण  है  कि सार्वजनिक स्थानों  में उनका व्यवहार. आपस. में  अन्यों  के  समान लगेगा. 

१०. प्रेम की नजरों  से आँखो से आँखें मिलने  पर बोलने की जरूरत नहीं पडती. 

सुंदरता का बर्छा -- अर्थ भाग - तिरुक्कुरळ-१०८१ से १०९०

  सुंदरता का  बरछा - अर्थ भाग- तिरुक्कुरळ -१०८० से १०९०.

१.
मेरे मन मोहक महिला! तू देवी है; तू  मोर है! मुझे सताने और तपानेवाली है.

२.
मेरी  आँखों   से जब सुंदर महिला  की आँखें आमने -सामने  मिलती  है तब ऐसा  लगता  है 'एक शूल का आक्रमण ही नहीं , एक. बडी  सेना  का आक्रमण हो.

३. यम भगवान. के  बारे  में मैंने  ग्रंथों में ही पढा  है. प्रतयक्ष नहीं देखा  है. अब जान गया  कि महिला की आँखों  की बरछी ही यम भगवान. है.

४. नारीत्व के  कोमल गुणों के विपरीत है चुभनेवाली  नारी की आँखें.

५. नारी कीआँखें  तीन. सवाल उठाती  है : १. क्या वह यम है ? २. क्या  वह दलारने का नाता  है ? क्या वह कातर दृष्टियों से  देखनेवाली हरिणी है?

६. नारी टेढी  भौंहें  सीधी  हो जाएँगी तो मुझे कँपानेवाला भय न. लगेगा.

७.   नारी  के कुचों  के ढके रेशमी   वस्त्र   मदमस्त हाथी के आँख पटी  के समान. है.

८. बढी बडी   सेना  के सामने भी न झुके मेरे बलवान  शरीर  नारी के नयनों के आगे विनम्र  हो जाता  है.

९. कातर नयनों की नारी और  लज्जा शील  नारी  को  इनके सिवा और. कोई आभूषण की  जरूरत नहीं  है.

१०.  मद्यपान करने  से  ही  नशा चढती  है' , लेकिन. नारी  को  देखते  ही नशा  चढ जाती  है.