Search This Blog

Friday, November 29, 2019

करुण रस

प्रणाम। नमस्कार। वणक्कम।
 करुण  रस।
 ईश्वर  को कहते हैं
करुणा मूर्ति। करुणा सागर।
करुण भाव न तो
मानव जीवन पशु तुल्य।
ईश्वर  की करुणा  से
ईश्वरेत्तर  मनुष्य  जीवन।
दयालु और करुणामूर्ति में
मनुष्यता और ईश्वरत्व का अंतर।
किसी तत्काल प्रभाव से दया।
करुणा  मनोभाव।
एक उत्पन्न  एक सहज।
अनजान के दुख
देख,
दया।
ऐसा होगा सोचना  तो
 सहज करुण।
दया बाहरी।
करुणा  अंतःस्थापित।
दया मनुष्यत्व।
करुणा ईश्वरत्व।
 घायल शत्रु  देख
दया नहीं।
 घायल मित्र देख दया।
अतः मनुष्यत्व।
बगैर भेद  के करुणा।
महावीर,बुद्ध,महादेव करुणामूर्ति।
स्वरचित स्वचिंतक यस अनंतकृष्णन।
(मतिनंत)

Thursday, November 28, 2019

मुक्ति

वणक्कम। प्रणाम।
 मुक्ति   शीर्षक।
प्रेरक है कुछ लिखने  का।
कुछ प्रशंसा पाने का।
कुछ नये आकर्षक
नये विषय प्रस्तुत  करने का
कैसे सांसारिक  बंधन से मुक्ति।
न प्यास से मुक्ति,न भूख से मुक्ति।
न रक्त संचार  से मुक्ति।
मुक्ति  के लिए करते हैं  प्रार्थना।
समाज  की भलाई  के लिए  सोचते हैं।
राष्ट्र  के भ्रष्टाचार  के बारे में,
शिक्षा की महँगा पर,प्याज के दाम पर।
कितना सोचते हैं?
मुक्ति  कहाँ?
मन की ज्वार भाटा।
मन का पंख फैलाकर आकाश तक
उड़ना,आकाश  पाताल तक
जानने का जिज्ञासा।
वेंटिलेटर में  डाक्टर  भेजने के बाद भी
एक महीने  तक तड़पनेवाला बूढ़ा  बूढी।
कैसी मुक्ति?
जब तक आशतब तक साँस।
हम न विवेकानंद हम न आदी शंकर।
न गणितज्ञ  रामानुजम।
ईश्वर के हिसाब  की जिंदगी।
पाँच  मिनट मन निश्चल  तो
तभी मुक्ति।
स्वरचित स्वचिंतक यस अनंतकृष्णन। (मतिनंत  )
29-11-19।
मुक्ति शब्द  पारिवारिक दल तो
चाहें बढती हैं, कैसे  मुक्ति।

Wednesday, November 27, 2019

घर परिवार

प्रणाम। वणक्कम।
 सब परिवार को नहीं जानते।
सम्मिलित परिवार  नहीं जानते।
परिवार  की सहनशीलता नहीं समझते।
बात बात  पर झगडा।
तलाक।
माता पिता के रहते
कितने ही बच्चे अनाथ।
घर हीन फुटपाथ के परिवार  अच्छे।
 खुली हँसी ,
 मीठी नींद।
पर  बडे घर,
निस्संतान दंपति।
तलाक  की बातें।
एक दुखी खामोशी।
संतानों  की शिक्षा की परेशानी।
तीन साल का बच्चा।
यल।के।जी दो  लाख।
घर एक करोड़,
 पर न जमीन
उनके अपनी ।
 न दीवार
 अपना।
त्रिशंकु  घर।
कमाते  अधिक।
पर  खर्च  कर्जा चुकाने काफ़ी नहीं।
घर का मैनटनन्स चार्ज
 स्कोयर फुट दस रुपये ।
 जिम स्विमिंग पुल,
विभिन्न मैदानी
 खेल के मैदान।
पर न समय
वहाँ  जाने का।
घर परिवार
 मिलकर खाना।
मिलकर जाना।
एकसाथ मंदिर  जाने,
परिवार  एक नहीं।
स्वरचित स्वचिंतक यस अनंतकृष्णन

Tuesday, November 26, 2019

बदनाम

प्रणाम।
न जाने दोस्तों।
आज लिख रहा हूँ
कई दिनों  के बाद
लिख रहा हूँ।
हम हुए  बदनाम
 आखिर किसलिए?
सच बोले।
ईमानदार  से रहे।
कमाते किसी को
धोखा नहीं  किया।
फिर भी बदनाम।
किसलिए?
भ्रष्टाचारियों  के
मुखौटे  खोले।
दोस्त  न देखा,
रिश्ते  न देखा।
तटस्थ  रहा।
हमारे नेता  कामराज हार गए।
उनके बाद के नेता ,
लाखों  करोड़ों  के अधिपति।
हर वोट दो हज़ार।
 करोड़  पति जिताने
मतदाता तैयार।
सांसद बन
दल बदलने तैयार।
वोट के लिए  पैसा देना।
रीटैल व्यापार।
साँसद  बनकर ,
करोडों   के लिए
दल बदलना,
थोक व्यापार।
हम बदनाम  हुए।
आखिर  किसलिए?
राजनीति लिखना मना।
लोगों  को जगाना मना।
लिखो  तो प्रेम  पत्र लिखो।
नीलपरिधान बीच,
अधखुला अंग।
विरह वेदना,
प्रेम  मिलन
चुंबन  लिखना।
धड़कन तडप लिखना
कविता।
 गरीबों  की दशा।
भिखारी  की हालत
लिखना कविता।
हम हुए  बदनाम ।
आखिर  किसलिए?
स्वरचित स्वचिंतक यस अनंतकृष्णन।

प्रणाम।
न जाने दोस्तों।
आज लिख रहा हूँ
कई दिनों  के बाद
लिख रहा हूँ।
हम हुए  बदनाम
 आखिर किसलिए?
सच बोले।
ईमानदार  से रहे।
कमाते किसी को
धोखा नहीं  किया।
फिर भी बदनाम।
किसलिए?
भ्रष्टाचारियों  के
मुखौटे  खोले।
दोस्त  न देखा,
रिश्ते  न देखा।
तटस्थ  रहा।
हमारे नेता  कामराज हार गए।
उनके बाद के नेता ,
लाखों  करोड़ों  के अधिपति।
हर वोट दो हज़ार।
 करोड़  पति जिताने
मतदाता तैयार।
सांसद बन
दल बदलने तैयार।
वोट के लिए  पैसा देना।
रीटैल व्यापार।
साँसद  बनकर ,
करोडों   के लिए
दल बदलना,
थोक व्यापार।
हम बदनाम  हुए।
आखिर  किसलिए?
राजनीति लिखना मना।
लोगों  को जगाना मना।
लिखो  तो प्रेम  पत्र लिखो।
नीलपरिधान बीच,
अधखुला अंग।
विरह वेदना,
प्रेम  मिलन
चुंबन  लिखना।
धड़कन तडप लिखना
कविता।
 गरीबों  की दशा।
भिखारी  की हालत
लिखना कविता।
हम हुए  बदनाम ।
आखिर  किसलिए?
स्वरचित स्वचिंतक यस अनंतकृष्णन।


मन

वणक्कम।
एल्लोरुक्कुम्।
प्रणाम।
सबको।
 शीर्षक  =मन।
मन चंचला।
रहीम ने कहा-
बूढे के पति लक्ष्मी
चंचला।
मन तो लक्ष्मी के विपरीत
जवानी में  अधिक  च॔चला।
दादी  माँ  ने कहा ,
दुर्गा  शक्ति शालिनी।
तब मामा ने कहा ---
हनुमान  महान बलवान।
नाना ने कहा - शिव।
गली में  गया तो
ईसा मसीह
आप के पाप मिटाने
रक्त बहाते हैं।
पापियों  आइए।
भक्ति  क्षेत्र में   मन डाँवाडोल।
पाठशाला  समाप्त
पिता  ने उच्च  शिक्षा  के लिए
एक विषय कहा तो
अध्यापक  ने दूसरा विषय।
दोस्तों  ने एक विषय।
विषय ज्ञान
 रहित नानी ने कहा
पडोसी को तुरंत
 नौकरी मिली
वही पढना।

भक्ति  में  चंचल।
पढाई  में चंचल।
पढने के माध्यम  में धंचल।
 जवान को लडकियों को
 देखकर चंचल।
जवान युवतियों  को
दूसरों  की साड़ियां।
आभूषण  देखकर चंचल।

 मन में  विचारों  की लहरें।
ज्वार  भाटा।
काबू में लाने
 योगा वर्ग गया तो
पतंजलि योग,
दत्त क्रिया योग।
और अनेक  योगा।
मन  सलाहें
  सुन सुन चंचल।
इतने बुढापा।
मन चंचल
 तन में  न शक्ति।
मन में  राम नाम।
मन शांत।
 तन शांत।
 सीता  ले जाकर
रावण चंचल।
सीता खोकर
पाकर राम चंचल।
 तब  मामूली मनुष्य
मन की चंचलता का
कैसे कर सकते बखान।

  स्वरचित स्वचिंतक
 यस अनंतकृष्णन।
(मतिनंत)

Sunday, November 24, 2019

सुख किसमें

प्रणाम।  वणक्कम।
परम सुख परमानंद ब्रह्मानंद
त्याग  में  या भोग में।
माया तजनेवाले ज्ञानी
परम सुख परमानंद ब्रह्मानंद की खोज में
आध्यात्मिक मार्ग अपनाता है।
शैतान के चंगुल  में
अस्थायी  आनंद  में  लौकिक भोगी।
आरंभ  से अंत तक ब्रह्मानंद  प्राप्त ज्ञानी
जीत लेता मन की चंचलता।
मन निश्चल  निश्छल तो
परमानंद।
अलौकिक  काया,
अति स्वस्थ
तन ,मन से ।
धन की तो उन्हें चिंता नहीं।
न शारीरिक भूख,
न  लौकिक  चाह।
न लोभ, न काम।
 माया / शैतान उन से अति दूर।
 नाम जपना  पर्याप्त।
 तुलसी , वाल्मीकि, भर्तृहरि
लौकिक  काम , क्रोध, लोभ तज
आज ईश्वर तुल्य  आराधनीय।
बार- बार याद  दिलाते हैं।
आगे अनुसरण आप पर निर्भर।
स्वरचित स्वचिंतक
यस।अनंतकृष्णन।

Saturday, November 23, 2019

साहित्य

वणक्कम। प्रणाम।
  समाज  में  साहित्य
   संयम सिखाता नहीं,
जितेन्द्र  बनाता नहीं।
प्रेम एक लडके के प्रति।
प्रेम  एक लडकी के प्रति
इश्क के  लिए  कविता।
इश्क  न तो कविता  नहीं।
 नख सिक्ख वर्णन कविता।
तब तो नीति के दोहे
रचना , रटना  मुश्किल।
वही लड़का सिनेमा गीत
बगैर एक शब्द  राग ताल के दोष के
गाता और तालियाँ  पाता।
वही एक दोहे न रट सका
गाली और मार खाता।
भला से बुरा आसानी  से।
मच्छर  अधिक, मेंढक अधिक।
पर एक कोयल की आवाज़ सुन
मनुष्य  अपने सुध बुध खो जाता।
हानियाँ  संक्रामक  रोग।
हित तो स्थाई चंद  लोगों  का साधन।
 साहित्य  समाज  कल्याण  के लिए ।
कबीर  के दोहे  सुनिए।तो
उसका सही उपयोग  उसका पालन
हर कोई  करेगा तो समाज  कल्याण।
 जाति न पूछो साधु  की, पूछ लीजिए  ज्ञान।
सोचने पर जातिवाद  का समूल नष्ट।
बुरा जो देख न मैं  गया,तोबुरा न मिलिया कोय।
  तुम खुद  अपने कोपहचान लो।
ऐसा हर कोई  सोचकर अपने को सुधार लेगा तो
विश्व में  न रहेगा  कोई  बुरा।
साहित्य  संसार  की भलाई।
स्वरचित स्वचिंतक
यस।अनंतकृष्णन। (मतिनंत)