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Thursday, January 22, 2026

मधुर स्मृति

 मधुर स्मृति

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

22-1-25

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मानव जीवन में,

 बचपन से बुढ़ापे तक की

 मधुर स्मृतियाँ अनेक।

 मेरे जीवन की मधुर स्मृतियाँ उनमें  एक है

 तमिलनाडु के हिंदी विरोध आंदोलन।

1967की बात।

 तभी मैं और मेरी माँ

श्रीमती गोमती जी 

हिंदी विश्वविद्यालय 

आरंभ करके 

 हिंदी के प्रचार में लगे।

 मेरी माँ 1957से अंतिम साँस तक हिंदी वर्ग चलिती रही। 

मेरी हिंदी अभिमन्यु समान माँ के गर्भ से मिली।

 माँ के सामने बैठकर

 न सीखी हिंदी।

कितने दोहे पद याद है

 मैं बैठकर न रटा।


तब हिंदी  विरोध का बड़ी जुलूस निकला।

 वे मेरे घर के सामने 

 खड़े होकर 

नारा लगाने लगे।

मूडु मूडु हिंदी विश्वविद्यालय नटत्ताते।

अर्थात 

बंद करो,बंद करो,

 हिंदी विद्यालय बंद करो।

 मत चलाओ, मत चलाओ हिंदी विश्वविद्यालय मत चलाओ।

 जुलूस से कुछ लोग 

 पत्थर भी फेंकने लगे।

 तब मैं बाहर गया तो

 उन से कहा विदेशी भाषा गुलाम बनाती भाषा,

 अंग्रेज़ी सीखने से ही

 तमिल का नाश होगा।

 क्रिया आगे कर्म पीछे।

 हमारी भाषाएँ

 कर्म आगे, क्रिया पीछे।

पढ़ता हूँ पुस्तक नहीं,

 बोलता हूँ हिंदी नहीं,

पुस्तक पढ़ता हूँ,

 करने का पता आगे

 अंग्रेज़ी में पता नहीं,

 क्रिया आगे पता नहीं 

 कर्म क्या है।

जीविकोपार्जन करने

 अंग्रेज़ी सीखना सही है तो

 हिंदी सीखने बहुत गुना सही है।

 पुलिस के आने से सब चले गये।

 देखता हूँ हिंदी विरोध 

 पुरुषों के घर की महिलाएँ  हिंदी सीखने आयीं।

 आजकल जैसे मंदिर विरोध मुख्यमंत्री स्टालिन की पत्नी  दुर्गा स्टालिन 

 मंदिर मंदिर जाती हैं।

 हिंदी वर्ग में छोड़ने

 ले जाने हिंदी विरोध पुरुष बाहर खड़े रहते।

 वह मधुर स्मृति 

भूल नहीं सकता।

 आज भी तमिलनाडु में 

 महिला   प्रचारिका 

 और छात्राएंँ अधिक।

 सत्रह साल के वह हिंदी प्रचार, 76 साल की उम्र 

 हरी भरी से।

 दुरंगी राजनीति 

 भक्ति में

 और हिंदी प्रचार में 

स्वार्थ की चरम सीमा पर

 तमिलनाडु में।

 दोनों में भीड़ अधिक।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

 


 


  





 

 

 

 

 




 


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