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Tuesday, January 27, 2026

 आत्मकथा हिंदी सेवा का मूल्य । 

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।

 

आपके भाव, अनुभव और गर्व को केंद्र में रखकर—सरल, स्पष्ट और सच्चे स्वर में:

मैंने हिंदी को कभी आजीविका का साधन नहीं बनाया, फिर भी हिंदी ने मुझे जीवन में गौरव दिया। धन की दौड़ में जब चारों ओर लोग अंग्रेज़ी को सफलता की कुंजी मान बैठे, तब भी मैंने भारतीय भाषाओं का साथ नहीं छोड़ा। हिंदी के प्रचार के लिए मुझे विरोध सहना पड़ा, अपमान झेलना पड़ा, यहाँ तक कि अपने ही प्रदेश में “द्रोही” कहे जाने का कष्ट भी उठा। परंतु इन सबके बीच मेरा आत्मसम्मान कभी डगमगाया नहीं, क्योंकि मुझे यह विश्वास रहा कि मैं गलत नहीं, अपने दायरे में सही कर रहा हूँ। साहित्य से मिलने वाला पारिश्रमिक भले ही कम रहा हो, पर हिंदी के कारण जो आत्मिक संतोष और पहचान मुझे मिली, वह किसी धनराशि से बड़ी है। आज भी मैं यही मानता हूँ कि हिंदी की सेवा करना मेरे लिए घाटे का सौदा नहीं, बल्कि जीवन का सौभाग्य है—और यही मेरा गर्व है।

[27/01, 9:18 pm] sanantha.50@gmail.com: आप तो गलत समझा रहे हैं।

आपने पहले ही कह दिया 3500/रूपये दूँगी।


मैं तो मान लिया और लिख दिया।

 आपने पैसे भी भेज दिये।

धन्यवाद जी 

++++++++++++

 मुझे मालूम है कि प्रकाशन करना  

 मुश्किल है।

 मैंने लेखकों की बुरी    दशा लिखा है।

 बस इतना ही।

 आप प्रकाशित करेंगे तो

 दो तीन प्रतियाँ भेजिए।

 आपने कहा मेरा नाम भी लिखा जाएगा।

धन्यवाद।

संक्षिप्त रामायण लिखी अनुवाद किया।

 रामायण प्रचार परिशोधन प्रतिष्ठान ने प्रकाशित किया।

 उसमें मूल लेखक डा.विशाल भरद्वाज ट

का नाम 

 और अनुवादक मेरा नाम लिखा है।

 अंतिम पृष्ठ में मेरा परिचय भी।

 वह आध्यात्मिक सेवा बिल्कुल मुफ़्त।

 भगवान देगा तो छप्पर तोड़कर देगा। लेगा तो छप्पर उड़ाकर लेगा।

जय श्रीराम।

 हिंदी विरोध प्रांत में 

 सर्वत्र हिंदी विरोध।

 तमिलनाडु सरकारी स्कूल में स्नातकोत्तर अध्यापक।

 ईश्वरीय देन।

[मैं पंद्रह  हजार की प्रतीक्षा में था।

 कम से कम दस हजार।

 एक मज़दूर  भी दो घंटे काम के लिए ढाई हज़ार माँगता है।  

 एक भिखारी भी अधिक कमाता है।

 3500/तो अधिक कम है।

 

पर साहित्यकार सब की स्थिति है ऐसी ही है।

 दिमाग से लड़ते हैं,

 प्रकाशन खर्च अलग।

 रामशंकर  झांसा के प्रसिद्ध कवि, 

वे अपनी पुस्तकों  की ताँता लगाकर  अपनी राम कहानी लिखते हैं।

 हिंदी किताबें किलो 

 15रूपये।

 अतः पता चलता है कि भारतीय भाषाओं का महत्व धीरे धीरे  युवकों के मन से मिट रहा है।

 इसलिए मैं धन को प्रधानता न देकर  हिंदी की सेवा  कर रहा हूँ।

 भारतीय भाषाएँ  देवभाषा  संस्कृत भी मृत्यु दशा में।

 125 वर्ष की खड़ी बोली

 व्रज माधुरी , मैथिली, अवधि आदि से नौ दो ग्यारह हो रहे हैं।

 हिंदी के विकास को रोकने तमिलनाडु कटिबद्ध है।

 अर्थ को छोड़कर 

 भारतीय भाषाओं की रक्षा करने हिंदी विरोध आंदोलन के समय मैं मार खाकर अपमान सहकर 

 तमिल द्रोही की उपाधि पाकर देश की एकता के लिए हिंदी का प्रचार कर रहा हूँ। सब ने कहा, हिंदी छोड़ो, गणित सीखो। मालामाल बन जाओगे।पर सच्चे सेवकों के साथ भगवान रहता है।

 आगे अंग्रेज़ी मोह से भारतीय युवक युवती सांसद विधायक सरकारी अधिकारी जिला देश,शिक्षा विभाग  के अधिकारी एंटी कंपनियां, निजी उद्योग जीविकोपार्जन के साधन के इस जमाने में 

 भारतीय भाषाओं की रक्षा सिवा  मानवेत्तर शक्ति ही कर सकती है।

 अनेक प्रांत  महाराष्ट्र   तक हिंदी   के विरोध में 

 कर्नाटक भी।

 भारत भर में  अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल  बढ़ रहे हैं। वहाँ नाम मात्र के लिए भारतीय भाषाएँ

 दसवीं कक्षा तक।

 उसके बाद अंग्रेज़ी माध्यम  अंग्रेज़ी मिश्रित 

संवाद में कितने गौरव 

 युवक युवतियाँ

 अनुभव करती हैं,

 भारतीय भाषाओं के पतन युवकों की अंग्रेज़ी प्रियता विज्ञापनों में 

 मोटे अक्षरों में अंग्रेज़ी 

  भारतीय भाषाएँ

 सिगरेट बाक्स में 

 धूम्रपान  फेफड़ों के लिए बरा है लिखने के समान है।

 शराब बोतल में 

शराब पीना घर और देश के लिए खराब लिखने के समान है।

 केंद्र सरकार और प्रांतीय सरकार दोनों दिल से अंग्रेज़ी स्कूल खोलने की अनुमति ।

 अनुमति लेने अब पचास लाख तक भ्रष्टाचार  ।

जय हिन्दी बाहर

व्यवहार में जीविकोपार्जन की भाषा 

धन कमाने की भाषा

उच्च शिक्षा की भाषा 

सर्वव्यापी अंग्रेज़ी राज।।

 एक पृष्ठ टंकण के लिए 

 सौ रूपये।

डाक्टर दस मिनट कंसल्ट के लिए हज़ार रूपये।

सद्यःफल जनता देने तैयार।

 एक कविता के अनुवाद 

  यों ही नाड़ी देख कर नहीं,

 चिंतन चिंतन उचित शब्द का प्रयोग फिर टंकण।

 हृदय से साहित्यकार को 

 पैसे दे नहीं सकते।

 क्योंकि एक किताब को प्रकाशित करके जन जन तक पहुंचाना आसान नहीं।

हो सकता है हिंदी प्रांत की सरकार पैसे दे सकती है।

पर उनके अपने नियम हैं।

मेरे दोस्त एक लाख तक खर्च करके बिक्री के अभाव में रो रहा है।

 संस्कृत के महान ब्राह्मण 

धन या संस्कृत के सामने धन को अपना लिया।

 विदेश में भारतीय वेद उपनिषद  अंग्रेज़ी माध्यम के कारण नित्यानंद जो भारतीय  अधिकारियों के सामने  अपराधी है,

वह अरबपति एक अलग देश के निर्माण।

 भारतीय भाषाओं के कारण नहीं अंग्रेज़ी के कारण।

 कोई भी राजभाषा अधिकारी,

 हिंदी प्राध्यापक 

 सांसद विधायक 

 अपनी संतानों को भारतीय भाषा माध्यम के द्वारा शिक्षा देना अमर्यादित अपमानित मानता है।

संस्कृत के प्रकांड विद्वान अंग्रेज़ी शासन काल में 

तुरंत अंग्रेज़ी के सिलवर  टंक  नाम पाने,

अंग्रेज गुमास्ता बनने,

 उनके खुशामद करने में अपनी दिव्य भाषा

 यहाँ तक गायत्री मंत्र भी भूल गये।

 अर्थ प्रधान ब्रह्मांड में 

 चांदी सोने के सिंहासन हीरे के मुकुट के आश्रम आचार्यो को मालामाल बनाने में लोग तैयार।

 अपनी भाषा की बरबादी पर विचार देने न तैयार।

  अंग्रेज़ी के डाकमेट के टंकण में एक दिन हजारों की आमदनी।

 अनुवादक अपने 

समय  को  एक मजदूर में लगने पर हजार रुपए।

 सोचिए उपन्यास सम्राट भी ग़रीबी में।

  अतःआज की परिस्थिति में आम विद्वत जनता हिंदी के लिए खर्च करने तैयार नहीं।

हर गाँव में अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल।

 हर गाँव में विदेश में नौकरी।

 मेरे शहर पवनी में 

 हर घर मे विदेशी नौकरी।

 उनके लिए रूपये हाथ का मैल।

अड़ोस पड़ोस देखने पर कर्जा लेकर अंग्रेज़ी माध्यम पढ़ाने तैयार।

आ सेतु हिमाचल में यही स्थिति है।

 मातृभाषा के पंडितों के घर में पैसों की तंगी।

 मनःसाक्षी से बोलिए 

 दिव्य भाषा संस्कृत से अधोगति की हालत में 

 भारतीय भाषाएँ।


एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

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