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Tuesday, March 3, 2026

भाव की श्रेष्ठता

 भाव की श्रैष्ठता

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

4-3-25.


पुनरुक्त, 

शब्द युग्म द्विरुक्त

ध्वनि अनुकरण शब्द 

  भावार्थ देने पर अधिक महत्व।

 कल कल, चल चल, सरसर टण टण ये ध्वनि अनुकरण,

 पर भाव नहीं इसमें।

 भाव नहीं तो,

  महत्व नहीं,

टण टण घंटी बजती है

 भक भक रेल चलती हैं

सर सर हवा बहती है

 ये हैं  ध्वनि अनुकरण।

 ध्वनि के लिए अर्थ नहीं 

आहिस्ते आहिस्ते , धीरे-धीरे,घर- घर ,

दिन दिन, ।

सार्थक निरर्थक शब्दों में 

 भाव नहीं तो

 कोई प्रयोजन नहीं।

 रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब शून।

पानी गये न उभरे 

 मोती मानुष चूना।

 पानी के श्लेषार्थ के कारण भाव गंभीर होता है।

 

 सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर"

 सुवर्ण के तीन अर्थ के कारण भाव गंभीर होता है।

 भाव प्रधान कहानियाँ

 अपना अपना भाग्य,

 प्रेरणा देनेवाले नारे

 स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार।

वंदेमातरम 

 जय जवान जय किसान।

 हम दो हमारे दो।

 अहर्निशम् सेवा में

  ये कितने भाव प्रधान होते हैं,

 भाव प्रधान न हो तो 

 वह अस्थाई हो जाते हैं।


"पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन।

 कितने भाव भरा वाक्य है।

 अतः  भाव  की श्रेष्ठता 

 न तो  न जनकल्याण,

न लोक हित।

 वसुधैव कुटुंबकम्,

  सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

 जय जगत।

कितने  प्रेरणाप्रद

 जगत शांति का मार्ग।

 अहिंसा परमो धर्मः।

 ये ही श्रेष्ठ भाव

 दुनिया के लिए 

 भाई चारा , एकता, शांति देने के भाव।


 

 

 



 


 

 

 

 

 

  

 


 


 

 


  

 


 

 

 

 

 



 

 

 




 


 



 


 


 


 


 



Monday, March 2, 2026

प्रह्लाद

 प्रह्लाद।

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 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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3-3-26

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 कबीर ने कहा है,

जाको राखे साइयाँ,

 माली न सकै कोई।

 बाल न बांका करि सकै,

 जो जग वैरी होय।।

 इसके प्रमाण में है

 भक्त प्रह्लाद की कहानी।।

 हिरण्यकश्यप असुरों का रिजा,

 ब्रह्म से वर पाया कि

 उसकी मृत्यु न किसी 

 मानव से, जानवर से

अग्नि से पानी से, 

 प्रचंड हवा से,  

किसी भी 

हालत में न हो।

ऐसी स्थिति में नारद ने 

 जब प्रह्लाद गर्भ में था,

 तब विष्णु का महामंत्र,

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः का उपदेश दिया।

वर प्राप्त  असुर राजा,

 अहंकार के कारण 

 अपने को ही   ईश्वर समझा।

 विष्णु का विरोधी बना।

 उसने आदेश दिया 

सबको हिरण्याक्ष नमः 

 कहकर ही जप करना है।

 न विष्णु का नाम।

 असुर राजा के डर है

 देश भर में हिरण्याक्ष नमः का जप गूँजता ।

पर पुत्र प्रह्लाद 

हिरण्यकश्यप की आराधना करने 

तैयार नहीं था।

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।

 पिता के डराने से भी

 न डरा वह।

तब अपने पुत्र को

 मारने के लिए,

 विष पिलाया।

 हाथी द्वारा हत्या करने की कोशिश की।

 समुद्र में  पत्थर बाँधकर फेंका सब से बचकर निकला।

 अंत में अपनी बहन होलिका ,

 जो आग में जलकर मरती  नहीं,

 उसकी गोद में 

बिठाकर जलाया।

 ईश्वर की रक्षा का पात्र

 प्रह्लाद मुस्कुराते जीवित निकला।

 जाको राखे साइयाँ 

 मारी न  सकै कोय।।

 प्रह्लाद और पिता के तर्क  में पिताजी ने पूछा 

 भगवान कहाँ है?

पिता से प्रह्लाद ने कहाँ 

 भगवान इस स्तंभ में है।

 दिखाओ, 

 डाँटते ही ,

 स्तंभ तोड़कर 

 नर्सिंह के रूप में 

 विष्णु प्रकट हुए।

 हिरण्यकश्यप के पेट चीरकर  वध किया।

 प्रह्लाद का चरित्र 

अटल भक्ति,

 समर्पण भाव, 

शरणागति तत्व।

 ठीक है

जाको राखे साइयाँ 

मारी न  सकै कोई।

बाल न बाँकै करि सकै

जो जग वैरी होय।।

वाणी के डिक्टेटर कबीर वाणी।


 



 

 

 

 





 

 

 



 

 



 

 



 

 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 


 

 




 

 


 









होली

 होली

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-3-26.

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होली 

क्यों?

रंगीला होली क्यों?

 आनंदोल्लास होली क्यों?

 अपने को ही ईश्वर ऐलान किये,

हिरण्यकश्यप 

अपने ही पुत्र के वध के 

 प्रयत्न में हारते हारते 

 अपनी निर्दयी बहन की याद आती।

 होलिका ने वर पाया है 

वह आग में न जलेगी,

अपने विष्णु भक्त पुत्र

 हिरण्याय नमः  जप  करने इन्कार किया तो

अपने ही पुत्र को मारने

 होलिका के गोद में 

प्रह्लाद भक्त को बिठाकर आग जलाया तो

 भक्त प्रह्लाद तो 

 मुस्कुराते हुए जिंदा निकला।

होलिका जलकर भस्म हो गई।

आम जनता की खुशी का ठिकाना न रहा।

इस दिन वह की याद में,

 आनंदोल्लास होली पर्व।

 आश्चर्य की बात है आदि होली दक्षिण के  विजयनगर में यह पहले पहल होली मनाया गया।

 अन्याय के नाश में 

यह त्योहार भ्रष्टाचारी रिश्वतखोरों यह के लिए एक ख़तरनाक घंटी।

 दूसरी भी कहानी राधा कृष्ण प्रेम मे।

 उनके लिए यह आनंद उल्हास भी।

 दुष्टो़ का वध।

सत्यं वद ।

याद रख ।

ईश्वरीय दंड पुरस्कार निश्चित।

 आदर्श भक्त जीवन को


 ईश्वरीय शक्ति और बाकी निश्चित ।

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 व्

Saturday, February 28, 2026

माँ

 माँ की ममता 

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई 

 स्वरचित रचना 

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बंधन रहित स्नेह,

माँ रूपी कवच।


मेरे रूप होने के पहले

मेरे चेहरे देखने के पहले,

मेरे स्वर सुनने के पहले,

माँ के हृदय प्रेम तो

 माँ की तुलना में और कोई नहीं।

 जन्म लेने के बाद,

रोग रहित , अहर्निशम्

जागकर पालनेवाली है माँ।

पालने में, कंधों पर ढोकर 

 रक्षा करनेवाली है माँ।

प्यार का जन्मस्थान,

त्याग का प्रतिबिंब,

गहरे प्रेम की देवी,

बंधन रहित स्नेह, माँ रूपी कवच।

मां से रूठो

माँ से लड़ो,

फिर भी ढूँढकर

 अपने प्यार जताने वाली है माँ।

 हमारे कष्ट के समय,

हमारे रोते समय,

 दिलासा देने वाली है माँ।

माँ के मन में  द्रोह नहीं, धोखा नहीं, प्रेम ही प्रेम में इंगित माँ।

 सर्वस्व विस्मरण करके,

माँ के गोद में सोते

 बचपन ही स्वर्णकाल व

स्वर्गकाल  मेरे।

माँ अपने बारे में चिंतित नहीं,

सदा-सर्वदा चिंतित हैं

 अपने संतान के बारे में।

जान लेने हजारों,

 जान देने एक ही नाता माँ।

ढाई अक्षर मंत्र माँ ही

 मेरे जन्मदात्री।

मेरे प्रथम आराधना देवी माँ ही।

प्यार बताने हजारों होने पर भी 

 प्यार जताने माँ के बराबर माँ ही।

हजारों छुट्टियाँ आने पर भी,माँ के कार्यालय रसोई की छुट्टी नहीं।

उम्र के अंतर न देखती माँ,

माँ के दुलार में 

पचास वर्ष के  बेटे भी शिशु समान।

वर्षा के भीगी मुझे,

 अपने आँचल से पोँछी,

 माँ देखकर 

वर्षा को भी  होगी ईर्ष्या।

माँ प्यार का खान।

 माँ प्यार का कोष।

प्रेमचंद उपन्यास सम्राट की कहानी मेँ,

 माँ का जिक्र देखिए,

 माँ को जलाओ,तो

 दया का सुगंध निकलेगा।

 पीसो तो दया का रस निकलेगा।

 थोड़े में कहें तो

 मातृत्व   वर्णनातीत 

 प्रेम और दया के प्रतिबिंब है।

























Thursday, February 26, 2026

खोटा व्यापक

 खोटा सिक्का 

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

27-2-26

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खोटा शब्द आजकल 

 व्यापक अर्थ में।

मिलावटी चावल,

 मिलावटी कानून 

 नकली वेषधारी

 खोटा आदमी

 नकली संन्यासी,

 नकली ज्योतिष 

 भ्रष्टाचारी राजनीतिज्ञ,

नकली तेल,

 नकली कार पार्ट्स

बनावटी श्रृंगार 

 न जाने यूट्यूब में 

 फेसबुक में 

 कदम कदम पर 

 खोटा ही खोटा।

 खोटा पुलिस अधिकारी 

 बीस साल के बाद 

 पकड़ा नकली पुलिस।

 खोटा प्रमाण पत्र

 आजकल की खबरें 

 अफ़वाहें खोटा खोटा

 नकली बैंक संदेश।

 नकली मुखपुस्तिका दोस्त।

 मोबयिल  में खोटा लघु संदेश।

जवाब देते  ही लूट।

 खोटा डाक्टर।

 फूँकफूँककर कदम रखना है,

न तो ठगनवाले,

 सन्नद्ध तैयार।

Wednesday, February 25, 2026

प्रकृति

 प्रकृति का न्याय 

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एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

26=2=26.

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प्रकृति का न्याय 

 अति उत्तम।

 वह तटस्थ न्याय 

  उसका प्रदूषित करने पर विपरीत न्याय।

 ऋतुओं का चक्र 

 नियमानुसार।

 सूर्योदय सूर्यास्त नियमानुसार।

 मौसमी फल, सब्जियाँ

 नियमानुसार।

 समय पर वर्षा।

स्त्री-पुरुष  आकर्षण,

शिशु का जन्म,

 बचपन, जवानी, बुढापा 

नियमानुसार  मृत्यु।

 कर्मफल का पुरस्कार दंड।

पंचतत्व हवा,पानी, अग्नी , भूमि,आकाश 

 आदि की करुणा,

समान।

 न उनमें जाति, मजहब,

संप्रदाय के भेद भाव।

 न राग-द्वेष।

 प्रकृति के कोप में भी 

 न राग-द्वेष।

प्रकृति सदा तटस्थ।

लेकिन प्रकृति रचना के गुण,

अलग-अलग।

 फूल सा कोमल,

 काँटों सा चुभना।

विषैला साँप,

खूँख्वार जानवर,

 माँसपक्षिणी,

 आदमखोर।

 बल, दुर्बल 

 दयालू निर्दयी

 द्रोही ठगी

 प्रेमी त्यागी 

 कंजूसी 

दानी लोभी

 यह प्रकृति का न्याय।

अति सूक्ष्म मानव ज्ञान के अपार।

 बीज अति छोटा

 वटवृक्ष अति बड़ा।

 कटहल भी है, ब्लू बेरी

 आम शैशव में एक स्वाद

 कच्चा आम खट्टा,

पका आम मीठा।

 इमली खट्टा।

 तितली की उत्पत्ति।

 यह प्रकृति न्याय 

 मानव ज्ञान के अपार का

 न्याय।

तभी ईश्वर की अद्भुत माया।

 मानवेतर शक्ति का प्रमाण 

प्रकृति न्याय।।













Tuesday, February 24, 2026

पतझड़

 पतझड़

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-2-26

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भूलोक जीवन में 

  अस्थाई सबकुछ।

 पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।

 इसके प्रकृति दर्शन प्रमाण है

 ऋतुओं के चक्कर।

उसमें पतझड़,

 सर्वस्व खोकर 

 ठूंठ  बने वृक्ष,

 वैसी दशा मानव को भी

 सुख दुख दुख सुख

तब पतझड़ के जैसे 

 धीरज धरना,

 जड में पानी का बचत रखना,

 मानव भी   बाह्याडंबर खर्च रहित  बचत करना चाहिए,

 तभी वृक्ष के समान 

 धीरज धरकर पुनः पनप सकते हैं।

हरे पत्ते,लाल रंग में 

फिर ताम्र रंग में 

धरती पर गिर कर

  पैरों के पड़ते ही

 सर सर आवाज़,

 हवा में उड़ना,

पेड़ वयोवृद्ध 

वृद्ध के समान खड़ा रहना,

मानव के जीवन का प्रतीक।

 भावी जीवन के कष्टों 

में धीरज से रहने का संदेश।

 मानव जीवन में पनपना असंभव।

 शक्ति के रहते कुछ करके  परोपकार करना है, 

वृक्ष के समान।