आज की चुनौती
अहंकार की राख
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
07-08-2026
अहंकार मानव की प्रगति का सबसे बड़ा बाधक है।
मनुष्य अपने धन,
अपनी वीरता,
अपनी सुंदरता,
अपने वंश और प्रतिष्ठा पर
अहंकार करने लगता है।
ऐसे अहंकारी व्यक्ति का
अंततः कोई सच्चा समर्थक नहीं होता।
वह हठी और जिद्दी बन जाता है।
उसकी विजय भी अंततः पराजय में बदल जाती है।
अहंकारी अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करता है।
वह परिवार और समाज के रिश्तों से दूर हो जाता है।
दूसरों की सलाह, अनुभव और उपदेश को अनसुना कर देता है।
धीरे-धीरे उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है
और उसका मन अशांत एवं बेचैन रहने लगता है।
रावण का पतन भी उसके अहंकार का ही परिणाम था।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—
काम, क्रोध, मद, लोभ जब, मन में बसें निदान।
तुलसी पंडित मूर्ख सम, हर ले विवेक-ज्ञान॥
संत कबीरदास जी ने कहा है—
मैं-मैं बड़ी बलाई है, सके तो निकसो भाग।
कहै कबीर कब लग रहो, रुई लपेटी आग॥
वास्तव में अहंकार अग्नि के समान ज्वलनशील है।
यह पहले विवेक को जलाता है,
फिर संबंधों को,
और अंत में स्वयं मनुष्य को राख बना देता है।
संदेश:
विनम्रता उन्नति का द्वार है, जबकि अहंकार विनाश का आधार।