Search This Blog

Sunday, June 7, 2026

विश्वासघात

 विश्वासघात 

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।8-626

++++++++++

 मानव जीवन में 

उत्थान पतन के मूल में 

विश्वासघात ।

 भारतीय विदेशी शासन और पराधीनता के मूल में 

 भाई भाई  में ईर्ष्या।

 क्रोध, बदला , विदेशियों का साथ देना।

रामायण काल में 

 विभीषण, कैकेई , मंथरा।

महाभारत में तो

 सूची लंबी।

 कुंती,

 कृष्ण का दान माँगना

 कर्ण कवच कुंडल दान में पाना, कुंती द्वारा पांडवों को जिंदा छोडने का कसम कर्ण से लेना।

  सिकंदर के आक्रमण में 

 इन्हीं का द्रोह।

 स्वतंत्रता संग्राम में 

 अंग्रेज़ी वेतन के लिए 

 उनका साथ दिये द्विभाषी।

 अंग्रेज़ी सीखकर भारतीय भाषाओं को

‌अवहेलना किये

 प्रतिभाशाली उच्चवर्ण।

 देश से बढ़कर राव बहादुर सर उपाधी।

 अंग्रेज़ों के अधीन भारतिय सत्याग्रहियों को मारे भारतीय वेतन भोगी सिपाही।

 रीतिकालीन की विलासिता।

 इन घटनाओं की सीख से सबक,

 विश्वासघातियों को कठोर दंइ।

 तमिलनाडु के चुनाव में

डी.एम. के साथ उनके चुनाव चिन्ह से जीते

 उनके समर्थन से जीते

 कांग्रेस, मुस्लिम लीक, कम्युनिस्ट का द्रोह।

‌इन नमकहराम स्वार्थी, पद धन प्रेमी ठगों से

 देशोन्नति में अड़चनें।

 बाधाएँ, रुकावटें।

 यही भारत के   इतिहास की सीख।

 फिर भी भारत की उन्नति 

 देश भक्त, देश प्रमी, निस्वार्थ नेता, अधिकारी,

 सरकारी कर्मचारी,

 कर्त्तव्यपरायण शहीदों के कारण।

 अतः शिक्षा संस्थाओं के पाठ्यक्रम में  देश भक्ति,

 राणा प्रताप सिंह, छत्रपति शिवाजी 

 लाल,बाल,पाल,

 सुभाष चंद्र बोस आदि

 नेताओं की जीवनी,

राष्ट्रीय कवियों की 

 देशप्रेम जगानेवाली कविताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।

 आजकल अनुशासन की शिक्षा की कमी है,

 केवल जीविकोपार्जन की शिक्षा।

 शिक्षित ईमानदारी लोगों को पद पर रहने न देना ,

ईमानदारी अफसरों को 

अकर्मण्य इलाका देना

 तबादला और इस्तीफा करने, कराने करवाने का जोर देना।

 देश प्रधान, 

 अति कठिनाइयों से

 प्राप्त देश की आज़ादी और एकता और अखंड भारत की रक्षा,

 राष्ट्रीय शिक्षा के विरुद्ध 

 रहनेवाले प्रांतों के मन में 

 प्रांतीय मोह के साथ राष्ट्रीय विचारधारा उत्पन्न करना।

 जागना, जगाना राष्ट्रप्रेम बढ़ाना,

 समय की सदस्य माँग।

 जय भारत। वंदेमातरम।


 





 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय अनंत कृष्णन जी।

आपकी रचना में राष्ट्रप्रेम, इतिहास से सीख लेने की प्रेरणा और नैतिक मूल्यों के प्रति चिंता स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्वासघात

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

8-6-2026

मानव जीवन के उत्थान और पतन के मूल में

विश्वास और विश्वासघात दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत की पराधीनता के इतिहास में भी

आपसी ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और प्रतिशोध ने

कई बार विदेशियों को अवसर प्रदान किया।

रामायण में कैकेयी, मंथरा और विभीषण के प्रसंग हों,

या महाभारत के जटिल घटनाक्रम—

इतिहास और पुराण हमें यह शिक्षा देते हैं कि

स्वार्थ जब कर्तव्य पर भारी पड़ता है,

तो समाज और राष्ट्र दोनों को हानि पहुँचती है।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में भी

कुछ लोगों ने स्वार्थवश विदेशी शासन का साथ दिया,

जबकि असंख्य देशभक्तों ने

अपने प्राणों की आहुति देकर

स्वतंत्रता का दीप जलाए रखा।

इतिहास की यही सीख है कि

राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए।

स्वार्थ, पद और धन के मोह में

राष्ट्रीय एकता को क्षति नहीं पहुँचनी चाहिए।

भारत की उन्नति उन देशभक्तों के कारण हुई है

जिन्होंने निस्वार्थ भाव से

देश, समाज और मानवता की सेवा की।

कर्तव्यनिष्ठ नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों

और अमर शहीदों का योगदान

सदैव स्मरणीय रहेगा।

अतः शिक्षा के पाठ्यक्रम में

देशभक्ति, चरित्र निर्माण और अनुशासन को

विशेष स्थान मिलना चाहिए।

राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी,

लाल-बाल-पाल, सुभाषचंद्र बोस तथा

अन्य महान राष्ट्रनायकों की जीवनगाथाएँ

नई पीढ़ी को प्रेरणा देती रहें।

आज आवश्यकता है कि

केवल जीविकोपार्जन ही नहीं,

अपितु राष्ट्रनिर्माण की शिक्षा भी दी जाए।

राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सद्भाव को सुदृढ़ बनाते हुए

जन-जन में राष्ट्रप्रेम का भाव जागृत किया जाए।

जागें, जगाएँ और राष्ट्रप्रेम बढ़ाएँ—

यही समय की पुकार है।

जय भारत! वंदे मातरम्! 🇮🇳

आपकी भावनाएँ अत्यंत प्रखर हैं। मैंने भाषा को अधिक साहित्यिक और संतुलित रूप देने का प्रयास किया है, जबकि मूल संदेश को यथासंभव सुरक्षित रखा है।


 







++++++++++++

Saturday, June 6, 2026

अन्याय की ईंट

 आपकी रचना समसामयिक सामाजिक यथार्थ को तीखे और स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करती है। इसे थोड़ा परिष्कृत और काव्यात्मक रूप देकर भावों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

अन्याय की ईंटें

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

7-6-2026

ईंटें तो होती हैं

घर और इमारतें बनाने के लिए,

पर आज कहीं-कहीं

अन्याय की ईंटों पर ही

सत्ता के महल खड़े किए जाते हैं।

वोट पाने और दिलाने में

रिश्वत का खेल,

पदोन्नति और नियुक्ति में

सिफारिश और धन का मेल।

सांसद, विधायक, मंत्री तक

जब भ्रष्टाचार की नींव पर चुन लिए जाएँ,

तो प्रशासन की इमारत में

न्याय के दीप कैसे जगमगाएँ?

जन्म प्रमाण-पत्र हो या

मृत्यु का प्रमाण,

संपत्ति का क्रय-विक्रय हो या

कार्यालय का कोई काम,

हर ओर दलाली का जाल

और घूस का बढ़ता नाम।

न्यायालयों में भी कभी-कभी

धन का पलड़ा भारी दिखता है,

न्याय की ईंटों से अधिक

चतुर वकीलों का कौशल बिकता है।

आयकर की भूलभुलैया में

छिपाने और बचाने की कला,

ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली, पानी,

हर सेवा में फैला गला-सड़ा सिलसिला।

यों ही यदि अन्याय की ईंटों से

व्यवस्था का निर्माण होगा,

तो जनविश्वास का सुंदर भवन

धीरे-धीरे वीरान होगा।

संदेश:

अन्याय की ईंटों से बनी इमारतें भले ऊँची दिखाई दें, पर वे टिकाऊ नहीं होतीं। सच्चा समाज न्याय, ईमानदारी और नैतिकता की मजबूत नींव पर ही खड़ा रह सकता है।

बहुत सार्थक और विचारोत्तेजक रचना। आपने समाज की एक गंभीर समस्या को निर्भीकता से व्यक्त किया है।

Friday, June 5, 2026

विश्व विश्व पर्यावरण दिवसएस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडुहिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति6-6-2026 मानव आज विज्ञान के युग मेंनित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है,किन्तु प्रकृति के नियमों से दूर होकरकृत्रिम सुखों में खो रहा है। बिजली के पंखे, वातानुकूलित कक्ष,फ्रिज में रखा बासी भोजन,जंगलों का अंधाधुंध विनाश,पहाड़ों का चूर्णीकरण,कारखानों का धुआँ और अपशिष्ट,धरती और जल का निरंतर दोहन। वाहनों का बढ़ता शोर,ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार,गौरैया का शहरों से विलुप्त होना,खेतों का सिकुड़ना,रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग,झीलों और तालाबों का लुप्त होना—ये सब प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। परिणामस्वरूपवायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण,यहाँ तक कि विचार प्रदूषण भीमानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।धरती का तापमान बढ़ रहा हैऔर पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है। इसी चेतना को जगाने हेतुविश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।यह हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—प्लास्टिक का उपयोग कम करें,अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ,जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें— "पेड़ लगाओ, हरियाली लाओ,धरती को फिर से स्वर्ग बनाओ।" "प्रदूषण मिटाओ, पर्यावरण बचाओ,धरती को रहने योग्य बनाओ।" "जल है तो कल है,धरती का संरक्षण ही हमारा बल है।" "एक पेड़, एक जीवन;धरती बचाना हमारा सच्चा संकल्प है।" "कचरा फैलाना बंद करो,धरती को संवारना शुरू करो।" "पृथ्वी बचाओ, भविष्य बचाओ;पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।" आज का हर पौधाकल की सुरक्षित साँस है।आइए, हम सभी मिलकरप्रकृति की रक्षा का संकल्प लेंऔर आने वाली पीढ़ियों कोस्वच्छ, सुंदर और हरित धरती सौंपें। विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 


विश्व पर्यावरण दिवस

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति
6-6-2026

मानव आज विज्ञान के युग में
नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है,
किन्तु प्रकृति के नियमों से दूर होकर
कृत्रिम सुखों में खो रहा है।

बिजली के पंखे, वातानुकूलित कक्ष,
फ्रिज में रखा बासी भोजन,
जंगलों का अंधाधुंध विनाश,
पहाड़ों का चूर्णीकरण,
कारखानों का धुआँ और अपशिष्ट,
धरती और जल का निरंतर दोहन।

वाहनों का बढ़ता शोर,
ऊँची-ऊँची इमारतों का विस्तार,
गौरैया का शहरों से विलुप्त होना,
खेतों का सिकुड़ना,
रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रयोग,
झीलों और तालाबों का लुप्त होना—
ये सब प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।

परिणामस्वरूप
वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण,
ध्वनि प्रदूषण, भूमि प्रदूषण,
यहाँ तक कि विचार प्रदूषण भी
मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।
धरती का तापमान बढ़ रहा है
और पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है।

इसी चेतना को जगाने हेतु
विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
यह हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है—
प्लास्टिक का उपयोग कम करें,
अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ,
जल, जंगल और जमीन की रक्षा करें।

आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें—

"पेड़ लगाओ, हरियाली लाओ,
धरती को फिर से स्वर्ग बनाओ।"

"प्रदूषण मिटाओ, पर्यावरण बचाओ,
धरती को रहने योग्य बनाओ।"

"जल है तो कल है,
धरती का संरक्षण ही हमारा बल है।"

"एक पेड़, एक जीवन;
धरती बचाना हमारा सच्चा संकल्प है।"

"कचरा फैलाना बंद करो,
धरती को संवारना शुरू करो।"

"पृथ्वी बचाओ, भविष्य बचाओ;
पर्यावरण संरक्षण ही जीवन का आधार है।"

आज का हर पौधा
कल की सुरक्षित साँस है।
आइए, हम सभी मिलकर
प्रकृति की रक्षा का संकल्प लें
और आने वाली पीढ़ियों को
स्वच्छ, सुंदर और हरित धरती सौंपें।

विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Thursday, June 4, 2026

गाँव और शहरी जीवन

 आदरणीय अनंतकृष्णन जी,

आपकी रचना में गाँव और शहर के जीवन का यथार्थपूर्ण चित्रण है। भावों को बनाए रखते हुए इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ:

गाँव से शहर का सफ़र

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

5-6-2026

मेरा गाँव था अति छोटा,

न आवागमन की सुविधा थी,

नदी तो थी, पर पुल नहीं था।

वर्षाकाल आते ही

चारों ओर जल ही जल दिखाई देता।

वहीं से मैं चेन्नई आया,

एक बार वर्षा ऋतु में मुंबई भी गया।

तब मन में विचार आया—

मेरा गाँव ही कितना अच्छा था।

शहर में कूड़ों के ढेर,

फुटपाथों पर जीवन बिताते लोग,

थोड़ी-सी वर्षा होते ही

नालों की दुर्गंध फैल जाती है।

न गाँव जैसी शांति,

न वैसा आत्मीय वातावरण।

मैं जिस गेटेड कम्यूनिटी में रहता हूँ,

वहाँ पाँच सौ से अधिक घर हैं,

पर गाँव की तरह खुले दरवाज़े नहीं,

सब अपने-अपने संसार में बंद हैं।

गाँव में मिलते ही

लोग कुशल-क्षेम पूछते हैं,

एक-दूसरे को पहचानते हैं।

शहर में यह अपनापन दुर्लभ है।

ऑटो वालों की मनमानी,

यंत्रीकृत जीवन की भाग-दौड़,

लंगोटीधारी से लेकर करोड़पति तक—

सब इसी दौड़ में शामिल हैं।

हाँ, शहर की एक विशेषता है—

यहाँ किसी न किसी प्रकार का काम मिल जाता है।

आय के अनुसार

आवास और भोजन की व्यवस्था भी हो जाती है।

इसीलिए लोग शहर के

कोलाहल और दुर्गंध को सहते हुए भी

जीवन बिताते हैं।

किन्तु सरकार, उद्योगपति और नगरवासी

यह बात कभी न भूलें कि

धन, कारखाने, कारें और ऊँची इमारतें

तभी सार्थक हैं,

जब गाँव का किसान अपने परिश्रम से

अन्न उपजाता रहे।

यदि किसान न हो,

तो भूख मिटाने वाला कोई नहीं।

अतः गाँवों में सशक्त ग्राम-स्वराज स्थापित हो,

किसानों को प्राथमिकता मिले,

उनका सम्मान और जीवन स्तर बढ़े।

सच ही कहा गया है—

"भूखे भजन न होय गोपाला।"

🌾 गाँव भारत की आत्मा है, और किसान भारत का अन्नदाता। 🌾

आपकी रचना में सामाजिक चेतना, ग्रामीण जीवन का अपनापन और किसान के प्रति सम्मान का सुंदर संदेश निहित है।

Wednesday, June 3, 2026

पैर गाडी दिवस

 आपकी रचना में स्मृतियाँ, सामाजिक परिवर्तन और साइकिल के इतिहास का सुंदर समन्वय है। इसे थोड़ा परिष्कृत एवं काव्यमय रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है:

विश्व साइकिल दिवस

(पैरगाड़ी का महत्त्व)

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

4-6-2026

पैरगाड़ी एक अनोखा वाहन,

सादा जीवन, उच्च विधान।

जब मैं आठ वर्ष का बालक था,

हमारे गाँव में साइकिल का मालिक

बहुत बड़ा अमीर माना जाता था।

किराये पर मिलती थी साइकिल,

एक घंटे का अधन्नी भाड़ा।

पर वह अधन्नी जुटाना भी

हम बच्चों के लिए था बड़ा कठिन।

उस समय वही सबसे तेज़ सवारी,

फिर भी नियमों की थी जिम्मेदारी।

सरकार को कर देना पड़ता था,

डबल सवारी अपराध कहलाती थी।

रात्रि में दीप जलाकर चलना,

अनिवार्य नियम माना जाता।

डायनमो की चमकती रोशनी

साइकिल की शान बढ़ाती जाती।

आज साइकिलों की संख्या घटी,

मोटर वाहनों की भीड़ बढ़ी।

किन्तु साइकिल का महत्त्व आज भी,

कहीं कम नहीं हुआ है।

न पेट्रोल चाहिए, न डीज़ल,

बस पैडलों का सतत प्रयास।

चलाने से व्यायाम भी होता,

स्वास्थ्य का मिलता है उपहार।

पेट्रोल के बढ़ते दामों पर,

कभी-कभी नेता और मंत्री भी

साइकिल चलाकर संदेश देते हैं

सादगी और बचत का।

सन् 1817 में जर्मनी के

Karl Drais ने

लकड़ी की, बिना पैडल और बिना चेन वाली

प्रारम्भिक पैरगाड़ी का निर्माण किया।

फिर सन् 1839 में

Kirkpatrick Macmillan ने

पैडल युक्त साइकिल का विकास किया।

यही क्रम आगे बढ़ता गया,

और आज गियर वाली आधुनिक साइकिलों तक पहुँच गया।

साइकिल केवल वाहन नहीं,

स्वास्थ्य, पर्यावरण और सादगी की पहचान है।

विश्व साइकिल दिवस पर

आइए इसका महत्त्व समझें और अपनाएँ।

साइकिल चलाना स्वास्थ्यप्रद है,

और प्रकृति के प्रति हमारा सुंदर योगदान भी। 🚲🌿

संदेश:

"पैडल घुमाइए, स्वास्थ्य पाइए;

प्रदूषण घटाइए, पर्यावरण बचाइए।"

Tuesday, June 2, 2026

अनमोल वचन

 


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।

++++++++++++++

++++++++++++++++

अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।


अनमोल सीख।

 एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

3-6-26

+++++++++++

भारतीय सनातन धर्म में ही अनमोल सीख।

 क्योंकि आदि

 सभ्यता का केंद्र।

आदि धर्म ज्ञान की सीख।

यही देखिए,

 ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या।

पाप कर्म का दंड।

 आत्मज्ञान के बिना 

 जीना मुश्किल।

 आत्मचिंतन का महत्व।

 संसार माया से भरा है,

 काम, क्रोध, मद,लोभ

 मानव  के नाश के कारण।

 स्वर्ग अलग कहीं  नहीं,

 भूलोक में ही नरक है

वही ग़रीबी,  रोग, असाध्य रोग, अंगहीनता,

 पागलपन ,बहरा,गूँगा अंधा, अनाथ, भिखारी,

 न जाने कितने   दुख,

 कारावास, अपमान,

  सब का दंड जरूर।

  बुढ़ापा मृत्यु ईश्वर का कानून,

‌पद, धन अधिकार,   सब बेकार।

भक्ति ,दया,दान, धर्म से मानव श्रेष्ठ।

 लौकिक सुख, सद्यःफल,

 नशीली वस्तुएँ,

 मानव पतन के कारण।

 अनमोल सीख अनेक।

 सुबह से लेकर रात तक के

अपने कर्मों को लिखो।

 सोने के पहले पढ़ो।

 कबीर ने कहा है

 बुरा जो देखन मैं गया,

बुरा न तिलिया कोई।

 जो दिल खोजा आपना,

 मुझसे बुरा न कोय।

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती,मानुष, चून।।

तिरुवल्लुवर ने कहा है

 संपत्तियों में बड़ी संपत्ति 

श्रवण संपत्ति।।

 वही सभी संपत्तियों में 

 सरताज।।

समय पर की गयी मदद,

लघु होने पर  भी,

वह मदद ब्रह्माण्ड से अति बड़ा।








 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹






 

 



 

 






 

 

 



 



 






 


 





 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


 

 


 

 

 



 


 



 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹


नमस्ते वणक्कम् आदरणीय।

आपकी रचना में जीवन-दर्शन, आत्मचिंतन, भक्ति, नैतिकता और संतों की वाणी का सुंदर समावेश है। इसे थोड़ा परिष्कृत रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अनमोल सीख

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

3-6-2026

भारतीय सनातन संस्कृति में

अनमोल सीखों का अथाह भंडार है,

क्योंकि यही आदि सभ्यता,

आदि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन का केंद्र है।

वेद, उपनिषद और ऋषियों की वाणी

मानव को सत्य का मार्ग दिखाती है।

"ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या" —

यह आत्मबोध का अमर संदेश है।

पापकर्म का दंड अवश्य मिलता है,

आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।

आत्मचिंतन ही वह दीपक है,

जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।

यह संसार माया से परिपूर्ण है।

काम, क्रोध, मद और लोभ

मानव पतन के प्रमुख कारण हैं।

स्वर्ग कहीं दूर नहीं,

और नरक भी किसी अन्य लोक में नहीं।

यहीं पृथ्वी पर

गरीबी, रोग, असाध्य पीड़ा,

अंगहीनता, अंधत्व, बहरापन,

अनाथ जीवन, भिक्षावृत्ति, अपमान और कारावास—

दुःखों के अनेक रूप दिखाई देते हैं।

बुढ़ापा और मृत्यु

ईश्वर के अटल नियम हैं।

पद, प्रतिष्ठा, धन और अधिकार

एक दिन यहीं रह जाते हैं।

भक्ति, दया, दान और धर्म ही

मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।

नशीली वस्तुएँ और क्षणिक भोग

मानव पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

अनमोल सीखें असंख्य हैं।

प्रतिदिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा लिखिए,

और सोने से पूर्व उनका अवलोकन कीजिए।

संत कबीर कहते हैं—

बुरा जो देखन मैं चला,

बुरा न मिलिया कोय।

जो मन खोजा आपना,

मुझसे बुरा न कोय॥

रहीम का संदेश है—

रहिमन पानी राखिए,

बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरै,

मोती, मानुष, चून॥

Tiruvalluvar ने कहा है—

सभी संपत्तियों में श्रेष्ठ संपत्ति

सुनने और सीखने की संपत्ति है;

वही समस्त संपत्तियों की सरताज है।

समय पर की गई सहायता,

चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो,

उसका मूल्य ब्रह्माण्ड से भी बड़ा होता है।

यही हैं जीवन की अनमोल सीखें,

जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करती हैं।

सादर। 🙏

தமிழில் ஒரு வரி: "அறம், கருணை, சுயசிந்தனை, இறைபக்தி — இவையே மனித வாழ்வின் உண்மையான அனமோலப் பாடங்கள்."

(அறம், கருணை, தன்னாய்வு, இறைபக்தி ஆகியவையே மனித வாழ்க்கையின் உண்மையான விலைமதிப்பற்ற பாடங்களாகும்.) 🙏🌹

विश्व माता-पिता दिवस

 

विश्व माता-पिता दिवस।

एस ‌. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

2-6-26

माता-पिता गुरु ईश्वर

भारतीय धर्म की नसीहतों में श्रेष्ठ।

 हर रोज़ माता पिता की आशीषें लेना।

नमस्कार करना भारतीय धर्म।

 तब माता-पिता के लिए विश्व दिवस क्यों?

 भारतीय धर्म में 

 वैवाहिक बंधन बीच में नहीं छूटता।

 पसंद हो या न पसंद

‌जीवन पर्यंत अलग नहीं होते।

 भारतीय धर्म तलाक शब्द नहीं जानता।

पति की मृत्यु होते ही

 पत्नी का जिंदा जलाया करते।

वह सती प्रथा सुधारवादी 

 राजा राममोहन राय के द्वारा बंद हुई।

 विधवा पुनर्विवाह का शुभारंभ हुआ।

 फिर भी माता पिता तो वंदनीय,

 जो भगवान के प्रतिनिधि बनकर  प्रत्यक्ष देवी देवता बनकर शिशु का जन्म देकर,

 शिक्षा दीक्षा तक साथ देकर विवाह तक जिम्मेदारी लेते।

 पर विदेशी भारत में आये,

 तलाक शब्द आया।

 पहली शादी के बच्चे के रहते,

 तलाक हो जाने पर

 वह बच्चा माँ के साथ या

 पिता के साथ।

 पाश्चात्य देशों में 

 तलाक, पुनर्विवाह मामूली बात।

 अतः माता पिता से बिछुड़ी संतानें,

 माता हीन,पिता हीन हो जाते।

 माता या पिता से मिलना कभी कभी,

 या वह भी संभव नहीं।

अतः माता-पिता दिवस 

 पाश्चात्य अनुकरण।

 भारतीय परंपरा में 

 माता या पिता दिवस

 दोनों  की मृत्यु के बाद ही।

मातृ-पितृ तर्पण।

 अब भारत भी पाश्चात्य 

 देश के जैसे 

  माता-पिता से साल में 

 एक बार मिलने आते।

कारण स्नातक स्नातकोत्तर  डाक्ट्रेट 

 नोकरी विदेश में 

 माता -पिता  , भाई बहन बहु का सम्मिलित परिवार कम होता जा रहा है।

वृद्धाश्रम बढ़ता जा रहा है।

 तलाक की संख्या बढ़ रही है।

 अंतर्जातीय,

 अंतर्मजहबी  विवाह।

 एकैल परिवार,

 दूर दूर 

की नौकरी ,

 माता-पिता दिवस मनाने

 मजबूर कर दिया।

 अतः हम भी पालन करने में विवश हैं।

 यकीनन भारत में 

 

रोज  माता पिता की आराधना करना  भारतीय धर्म हैं।

 राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र  भारतीय देन है।



नमस्ते वणक्कम्।

आपकी भावाभिव्यक्ति में भारतीय संस्कृति, माता-पिता के प्रति श्रद्धा और बदलते सामाजिक परिवेश की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। भाषा और प्रवाह को थोड़ा परिष्कृत करते हुए प्रस्तुत है—

विश्व माता-पिता दिवस

से. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति

2-6-2026

माता, पिता, गुरु और ईश्वर—

भारतीय संस्कृति में इनका स्थान सर्वोच्च माना गया है।

प्रतिदिन माता-पिता का आशीर्वाद लेना,

उन्हें प्रणाम करना,

हमारी सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि

माता-पिता के लिए अलग से "विश्व दिवस" की आवश्यकता क्यों पड़ी?

भारतीय जीवन-दर्शन में

वैवाहिक संबंध को एक पवित्र बंधन माना गया है,

जो जीवनपर्यंत निभाने का संकल्प देता है।

समय के साथ समाज में अनेक परिवर्तन आए।

सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का अंत हुआ,

विधवा पुनर्विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ,

और समाज सुधार की नई चेतना जागृत हुई।

किन्तु माता-पिता का महत्व कभी कम नहीं हुआ।

वे ही तो भगवान के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि हैं,

जो संतान को जन्म देते हैं,

उसका पालन-पोषण करते हैं,

शिक्षा, संस्कार और जीवन-निर्माण में

अपना सर्वस्व अर्पित कर देते हैं।

आधुनिक युग में परिस्थितियाँ बदल रही हैं।

उच्च शिक्षा, रोजगार और विदेश-प्रवास के कारण

संयुक्त परिवारों का स्वरूप सिमटता जा रहा है।

संतानें माता-पिता से दूर रहने को विवश हैं।

वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ रही है,

एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है,

और पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता

कई बार दूरी की भेंट चढ़ जाती है।

इन्हीं बदलती परिस्थितियों ने

माता-पिता दिवस जैसे अवसरों को जन्म दिया है,

ताकि संतानें कम-से-कम एक दिन ही सही,

अपने माता-पिता के प्रति

कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त कर सकें।

किन्तु भारतीय संस्कृति का संदेश इससे कहीं बड़ा है।

यह हमें सिखाती है कि

माता-पिता का सम्मान किसी एक दिन का नहीं,

जीवन के प्रत्येक दिन का कर्तव्य है।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

भारतीय संस्कृति के उस आदर्श पुत्र का प्रतीक हैं,

जिसने माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को

अपने जीवन का सर्वोच्च धर्म माना।

आइए, विश्व माता-पिता दिवस पर

यह संकल्प लें कि

हम केवल एक दिन नहीं,

प्रतिदिन माता-पिता की सेवा, सम्मान और आराधना करेंगे।

माता-पिता का प्रेम ही जीवन का प्रथम तीर्थ है,

और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा वरदान।

🙏 मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। 🙏