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Wednesday, September 2, 2026

खुशियों का खजाना।


आज की चुनौती

खुशियों का खज़ाना

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

2-9-26

खुशियों का खज़ाना

हर मानव के लिए

अलग-अलग होता है।

वह अस्थायी है,

वह परिवर्तनशील है।

नश्वर जगत की तरह

नश्वर है

खुशियों का खज़ाना।

रत्नाकर के लिए

जो खुशी का खज़ाना था,

वाल्मीकि बनने के बाद

वह नहीं रहा।

तुलसी के जीवन में

जोरू से चिपके रहने का सुख

भक्त कवि तुलसीदास बनने के बाद

नहीं रहा।

बचपन,

जवानी,

प्रौढ़ावस्था

और बुढ़ापे के साथ

बदलता रहता है

खुशियों का खज़ाना।

भोग में सुखी मनुष्य,

अंगों की शिथिलता आने पर

योग में खुशी खोजता है।

राजा भर्तृहरि की

राजमहल की खुशी

पत्नी के व्यवहार के बाद

संन्यास के मार्ग पर

बदल गई।

युद्धप्रिय

सम्राट अशोक की खुशी

कलिंग युद्ध के बाद

बदल गई।

बुद्ध के धर्म को अपनाकर

अहिंसा और जनकल्याण के कार्यों में

उन्हें आनंद मिला।

खुशियों का खज़ाना

प्राणप्रिया के संग में था;

निधन के बाद

वह खुशी नदारद हो गई।

खुशियों का खज़ाना

स्थायी नहीं है।

तन का सुख,

धन का सुख,

मन का सुख—

तीनों का अपना-अपना संसार है।

परम सुख तो वही है

जो परिवर्तनशील संसार से ऊपर उठकर

आत्मचिंतन में मिले।

खुशियों का सच्चा खज़ाना

बाहर नहीं,

मन के भीतर है।।

Sunday, August 30, 2026

आईने का सच

 आज की चुनौती

आईने का सच

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
31-8-26

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आईना
ज्यों का त्यों
सामने वाले का रूप
दिखाता है—
सुंदर हो या कुरूप,
सच को छिपाता नहीं।

आजकल
जो आँखों के सामने
स्पष्ट दिखाई देता है,
उसे भी
आईने का सच कहते हैं।

चेहरा
मन का आईना है।
मनुष्य का सुख-दुःख
चेहरे पर
दिखाई पड़ता है।

मन की बातें
चेहरे से प्रकट हो जाती हैं।
चेहरे से पता चलता है—
वह सत्यवादी है
या असत्यवादी,
अमीर है
या गरीब।

बोली से पता चलता है
वह शिक्षित है
या अशिक्षित।

कदम रखने के ढंग से
पता चल जाता है
कि वह नशे में है
या नहीं।

हँसी से भी
कभी-कभी पता चलता है
कि सामने वाला
सरल है
या छली-कपटी।

चेहरे के भावों से
रोगी और निरोगी का
भी अनुमान लगाया जा सकता है।

आईना केवल चेहरा दिखाता है,
पर चेहरा
कभी-कभी मनुष्य का
पूरा सच दिखा देता है।

Saturday, August 29, 2026

राष्ट्रीय खेल दिवस

नमस्ते वणक्कम्।

आज की चुनौती

राष्ट्रीय खेल दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

30-8-26

“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”

शरीर ही

धर्म और कर्म करने का

मुख्य साधन है।

स्वस्थ शरीर से

स्वास्थ्य और शक्ति मिलती है,

हार सहने की शक्ति मिलती है,

अपने ज्ञान का प्रसार करने की

क्षमता मिलती है।

अपने कर्तव्यों का पालन करने,

अपनों से प्रेम निभाने,

अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने,

पतन से उत्थान की ओर बढ़ने के लिए

मनोबल के साथ-साथ

शारीरिक बल भी

अत्यंत आवश्यक है।

कमजोर शरीर,

शिथिल हाथ-पाँव—

जीवन में बहुत कुछ

नहीं कर सकते।

शारीरिक बल के लिए

स्वस्थ शरीर चाहिए;

और स्वस्थ शरीर के लिए

नियमित व्यायाम तथा

खेलकूद आवश्यक हैं।

दौड़ना,

दंड-बैठक करना,

पैदल चलना,

योगाभ्यास करना—

ये सभी शरीर को

स्वस्थ और मजबूत बनाते हैं।

मैदानी खेलों में

कबड्डी, हॉकी, क्रिकेट,

फुटबॉल, टेनिस आदि हैं।

दिमागी खेलों में

शतरंज और

बकरी-बाघ जैसे खेल

बुद्धि को तीक्ष्ण बनाते हैं।

खेल केवल मनोरंजन नहीं,

बल्कि अनुशासन,

एकाग्रता,

सहनशीलता,

आत्मविश्वास और

खेल भावना भी सिखाते हैं।

विश्व स्तर पर

ओलंपिक खेलों के माध्यम से

खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा

दिखाने का अवसर मिलता है।

दक्षिण एशियाई खेलों तथा

अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के द्वारा

खेलों को प्रोत्साहन मिलता है।

भारत में

खेलों के प्रति जागरूकता बढ़ाने,

युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करने

और उत्कृष्ट खिलाड़ियों तथा प्रशिक्षकों को

सम्मानित करने के उद्देश्य से

राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

भारत के महान हॉकी खिलाड़ी

मेजर ध्यानचंद को

“हॉकी का जादूगर” कहा जाता है।

उनके जन्मदिवस

29 अगस्त को

राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

ध्यानचंद ने

1928, 1932 और 1936 के

ओलंपिक खेलों में

भारत को लगातार तीन

स्वर्ण पदक दिलाने में

महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस अवसर पर

देश के उत्कृष्ट खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को

मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार,

अर्जुन पुरस्कार और

द्रोणाचार्य पुरस्कार जैसे

प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जाता है।

राष्ट्रीय खेल दिवस का संदेश है—

खेलो, स्वस्थ रहो,

अनुशासन से जियो;

हार से मत घबराओ,

प्रयास करते रहो।

शारीरिक शक्ति से

मनोबल बढ़ता है,

मनोबल से आत्मविश्वास बढ़ता है,

और आत्मविश्वास से

सफलता का मार्ग खुलता है।

खेल भावना से

जीवन में विजय ही नहीं,

हार को स्वीकार करने की

परिपक्वता भी आती है।

खेल स्वस्थ जीवन का आधार,

खेल युवाओं की शक्ति;

खेल राष्ट्र की प्रतिष्ठा,

खेल ही जीवन की स्फूर्ति।

धन्य हैं मेजर ध्यानचंद!

धन्य है खेल भावना!

जय हिंद!


Friday, August 28, 2026

जीवन का दृष्टिकोण

 आज की चुनौती


जीवन का दृष्टिकोण


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना

29-8-26


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जीवन क्या है?

जन्म और मृत्यु के बीच

मिला हुआ समय—

नश्वर जगत में

जीवन का एक अवसर।


जब तक जिएँ,

परोपकार के लिए जिएँ।

त्यागी और हितचिंतक का

यही दृष्टिकोण होना चाहिए।


परमार्थ के लिए

साधु भी शरीर धारण करते हैं।

स्वार्थी भी जीता है,

लोभी भी जीता है,

ईर्ष्यालु भी जीता है,

कामांध भी जीता है,

चोर-डाकू भी जीते हैं।


परंतु

हर व्यक्ति के जीवन का

दृष्टिकोण

भिन्न-भिन्न होता है।


देश के लिए

अपना सिर न्योछावर करना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


चुनाव जीतकर

जनसेवा करना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


पर मालामाल बनने के लिए

चुनाव लड़ना—

यह भी एक दृष्टिकोण है।


सेवा-भाव से

संसार चलता है।

निःस्वार्थता,

सत्यवादिता,

निष्काम कर्म

और ईमानदारी का दृष्टिकोण

सदैव स्तुत्य है।


जीवन का उद्देश्य

सकारात्मक होना चाहिए।

मानवता और परोपकार को

अपनाना चाहिए।


आदर्श दृष्टिकोण ही

जीवन को सार्थक बनाता है

और वही

स्थायी स्मृति बनकर रहता है।

भारत आध्यात्मिक भूमि

 नमस्ते वणक्कम्।

राम नाम जपना 

 राग-द्वेष भूलना 

 भेदभाव रहित 

 चंचल मन को

 आत्मा में विलीन करना

 आत्म चिंतन करना

 अनेक विचारों का समन्वय 

 राम नाम जपने का परिणाम।।

 राम नाम 

 शिवनाम 

 आध्यात्मिक भूमि में 

 आसुरी शक्तियों का षडयंत्र,

फिर भी भारत 

 जगत मार्ग दर्शक।

 कारण भारत है 

 त्याग की भूमि,

समरस सन्मार्ग की भूमि,

 सनातन धर्म सागर।

 सभ्यता का शिरमौर।

  सनातन धर्म  ही

 सर्व जन कल्याणकारी।

 वसुधैव कुटुंबकम्,

वैश्वमैत्री का बुनियाद।

 शिवराम आसेतुहिमाचल  के

 विचारों की एकता।

 जय भारत।

 जय राम। राम राम।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक


आज की चुनौती

राम नाम जपना

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
हिंदी-प्रेमी प्रचारक

राम-नाम जपना,
राग-द्वेष भूलना,
भेदभाव मिटाना,
चंचल मन को
आत्मा में विलीन करना,
आत्मचिंतन करना।

अनेक विचारों का
समन्वय करना—
यही है
राम-नाम जपने का परिणाम।

राम-नाम हो या शिव-नाम,
आध्यात्मिक भूमि भारत में
आसुरी शक्तियों का षड्यंत्र
चाहे कितना भी हो,
फिर भी भारत
जगत का मार्गदर्शक है।

कारण—भारत है
त्याग की भूमि,
समरसता और सन्मार्ग की भूमि,
सनातन धर्म का सागर।

सनातन संस्कृति
सभ्यता की शिरमौर है।
सनातन धर्म ही
सर्वजन-कल्याणकारी है।

“वसुधैव कुटुम्बकम्”
विश्व-मैत्री की बुनियाद है।

शिव और राम—
आसेतु-हिमाचल तक
विचारों की एकता के प्रतीक हैं।

जय भारत!
जय राम!
राम राम!

Thursday, August 27, 2026

रक्षाबंधन

 

आज की चुनौती

रक्षाबंधन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

बहन के हाथों भाई की कलाई पर
राखी बाँधना—
यही है रक्षाबंधन।

यह त्योहार
परंपरागत रूप से उत्तर भारत में
विशेष रूप से मनाया जाता रहा है।
पर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते
और प्रेम का यह पर्व
अब उत्तर-दक्षिण का भेद मिटाकर
दक्षिण भारत में भी
उत्साह से मनाया जाने लगा है।

आज राखी के पर्व में
मजहब और जाति का भेद नहीं।
यह प्रेम, भाईचारे और एकता का
सुंदर संदेश देता है।

प्रचलित ऐतिहासिक कथा के अनुसार,
मेवाड़ की रानी कर्णावती ने
हुमायूँ को राखी भेजकर
भाई का रिश्ता बनाया था।
हुमायूँ ने भी
रानी को अपनी बहन मानकर
उनकी सहायता करने का प्रयास किया।

पौराणिक कथा में कहा जाता है कि
जब श्रीकृष्ण की उँगली से रक्त निकला,
तब द्रौपदी ने
अपने आँचल का कपड़ा फाड़कर
उनकी उँगली पर बाँध दिया।
कृष्ण ने द्रौपदी को
अपनी बहन के समान माना।

बाद में जब भरी सभा में
दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया,
तब श्रीकृष्ण ने
उनकी लाज की रक्षा की।
इसी कथा को भी
रक्षाबंधन के पवित्र भाव से जोड़ा जाता है।

एक अन्य प्रचलित कथा
राजा महाबली और माता लक्ष्मी से जुड़ी है।

वामन अवतार में
भगवान विष्णु ने महाबली से
तीन पग भूमि माँगी।
महाबली की दानशीलता से प्रसन्न होकर
विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया
और स्वयं उनके द्वारपाल बनकर
वहीं रहने लगे।

भगवान विष्णु के वापस न लौटने पर
माता लक्ष्मी पाताल लोक पहुँचीं।
उन्होंने महाबली की कलाई पर
रक्षा-सूत्र बाँधकर
उन्हें अपना भाई बनाया।

महाबली ने बहन लक्ष्मी की इच्छा का सम्मान करते हुए
भगवान विष्णु को
उनके साथ जाने की अनुमति दी।

रक्षाबंधन केवल
कलाई पर धागा बाँधने का पर्व नहीं है।
यह भाई-बहन के बीच
पवित्र प्रेम, विश्वास, स्नेह
और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है।

आज बहनें केवल अपने सगे भाई की ही नहीं,
बल्कि अनेक लोगों की कलाई पर
राखी बाँधकर
भाईचारे का संदेश देती हैं।

प्रधानमंत्री सहित अनेक सार्वजनिक व्यक्तियों को भी
राखी बाँधने की परंपरा दिखाई देती है।

रक्षाबंधन—
भाई-बहन के पवित्र प्रेम,
अटूट विश्वास
और परस्पर सुरक्षा के संकल्प का
एक सुंदर भारतीय पर्व है।

भारतीय भक्ति साहित्य।

 प्राचीन भारत ज्ञान परंपरा ही

 विश्व को सही मार्ग पर ले चलेगा।

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एस . अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

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जितनी बातें आजकल 

 हो रही है, उनकेहै कारण तुलसी के दोहों में है,

 कबीर के दोहों में हैं।

 काम क्रोध मद लोभ

 जब मन में लगे खान,

 पंडित मूर्खो एक समान,तुलसी कहत विवेक।

 कबीर आत्म चिंतन करने की सीख देते हैं --

बुरा जो देखन मैं गया,बुरा न तिलिया कोय।

 जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।।

 जाति भेद के खंडण 

 में  

जाति न पूछो साधु की पूंछ लीजिए ज्ञान।

 मोल करो तलवार का,

पड़ा रहने दो म्यान।।

 पानी के अर्थ है -जल, इज्ज़त,चमक।

 पानी की रक्षा कीजिए।

 पानी बचाइए ।

रहीम का दोहा --

 रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।

 पानी गये न ऊभरे,

 मोती मानुष सून।

 शिक्षा का महत्व-

स्वदेशे पूज्यंते राजा,

विद्वान सर्वत्र पूज्यंते।।

विश्व में शांति के लिए 

वसुधैव कुटुंबकम्।

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।।

ईश्वर महिमा--

 कबीर --

जाको राखे साइयां,मारी न सकै कोय।

 बाल न बांका करि सकै,जो जग वैरी होय।

 गुरु महिमा-

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताया।।

  संत तिरुवल्लुवर 

 संपत्तियों में बड़ी सौपत्ति सुनना।

 श्रवण संपत्ति।

वही सभी संपत्तियों का सिरमौर।।

 दो हजार की किताबें लेना आसान है।

पर उस महान ग्रंथ ज्ञान को प्रवचन में सुनने से 

ज्ञान जल्दी मिल जाता है।

  ईश्वर ध्यान 

 माला तो कर में फिरै जीभ फिरै मुख माहीं।

मनुवा तो दस दिशै फिरै यह तो सुमिरन नाहीं। दल

  सत्यं वद।

 जय जगत।

 स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार।

 ये सब प्राचीन ज्ञान परंपरा की देन है।

अपने दोष निवारण के लिए -

निंदक नियारे राखिये, आंगन कुटी समाय।।

 जय भारत की ज्ञान परंपरा।

त्यागमय जीवन भारतीय परंपरा।

पाश्चात्य परंपरा भोग मय।

जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यं।।

नश्वर जगत।