भाव की श्रैष्ठता
++++++++++++
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना
4-3-25.
पुनरुक्त,
शब्द युग्म द्विरुक्त
ध्वनि अनुकरण शब्द
भावार्थ देने पर अधिक महत्व।
कल कल, चल चल, सरसर टण टण ये ध्वनि अनुकरण,
पर भाव नहीं इसमें।
भाव नहीं तो,
महत्व नहीं,
टण टण घंटी बजती है
भक भक रेल चलती हैं
सर सर हवा बहती है
ये हैं ध्वनि अनुकरण।
ध्वनि के लिए अर्थ नहीं
आहिस्ते आहिस्ते , धीरे-धीरे,घर- घर ,
दिन दिन, ।
सार्थक निरर्थक शब्दों में
भाव नहीं तो
कोई प्रयोजन नहीं।
रहिमन पानी राखिए,
बिन पानी सब शून।
पानी गये न उभरे
मोती मानुष चूना।
पानी के श्लेषार्थ के कारण भाव गंभीर होता है।
सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर"
सुवर्ण के तीन अर्थ के कारण भाव गंभीर होता है।
भाव प्रधान कहानियाँ
अपना अपना भाग्य,
प्रेरणा देनेवाले नारे
स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार।
वंदेमातरम
जय जवान जय किसान।
हम दो हमारे दो।
अहर्निशम् सेवा में
ये कितने भाव प्रधान होते हैं,
भाव प्रधान न हो तो
वह अस्थाई हो जाते हैं।
"पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन।
कितने भाव भरा वाक्य है।
अतः भाव की श्रेष्ठता
न तो न जनकल्याण,
न लोक हित।
वसुधैव कुटुंबकम्,
सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।
जय जगत।
कितने प्रेरणाप्रद
जगत शांति का मार्ग।
अहिंसा परमो धर्मः।
ये ही श्रेष्ठ भाव
दुनिया के लिए
भाई चारा , एकता, शांति देने के भाव।