आज की चुनौती
ज्ञान का पावन समंदर
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
ज्ञान से रहित कोई जीव नहीं,
पर मानव का ज्ञान
सत्य-असत्य,
नश्वर-अनश्वर,
स्थायी-अस्थायी को पहचानकर
अपने जीवन को
सभ्य, सुसंस्कृत और सुरक्षित
बनाने में समर्थ है।
फिर भी यह समझना
पूरी तरह सही नहीं कि
मनुष्य सर्वज्ञानी है।
यदि मनुष्य इतना ज्ञानी है,
तो प्राकृतिक प्रकोपों का
पूरी तरह सामना करने में
असमर्थ क्यों है?
अतः ज्ञान का सागर
अत्यंत गहरा है।
ज्ञानी में भी
काम है, क्रोध है,
ईर्ष्या है, लोभ है,
अहंकार है।
वह जानता है
कि एक दिन उसे मरना है,
फिर भी जीवन भर
मोह-माया में उलझा रहता है।
स्नातक और स्नातकोत्तर बनकर
ऑडिटर, डॉक्टर बनकर
सच्ची मानव-सेवा करनी है।
वकील बनकर
न्याय के पक्ष में लड़ना है।
फिर भी समाज में
भ्रष्टाचार और रिश्वत का
बोलबाला क्यों है?
शासक हैं,
पर उनमें स्वार्थ है।
ठेकेदार हैं,
पर कहीं-कहीं कच्ची सड़कें
बनाकर भी काम पूरा मान लेते हैं।
आत्मज्ञानी भी हैं,
समाज-सुधारक भी हैं।
नायक हैं,
खलनायक हैं,
विदूषक हैं।
बलवान हैं,
निर्बल हैं।
रोगी हैं,
असाध्य रोगी भी हैं।
कोई जन्म से अमीर है,
कोई जन्म से गरीब।
मछलियों में
विविध प्रकार हैं।
हाथियों में, कुत्तों में,
हिरनों में,
मच्छरों और मक्खियों में,
भ्रमरों और साँपों में—
प्रकृति की विविधता
असीम है।
पानी के स्वाद में,
हवा के प्रकार में,
ज्ञान का सागर
अत्यंत विस्तृत है।
ज्ञान में भी
सद्ज्ञान है और दुर्ज्ञान।
ईश्वर की सृष्टि में
अति सूक्ष्म से अति विशाल तक
असंख्य रहस्य छिपे हैं।
एक सूक्ष्म बीज से
विशाल वृक्ष का बनना,
एक छोटे से अंडे से
तितली का बनना—
प्रकृति के अद्भुत रहस्य हैं।
हर पल दुर्घटनाएँ होती हैं,
नए-नए संक्रामक रोग आते हैं।
विज्ञान बढ़ता जाता है,
फिर भी अज्ञात का क्षेत्र
और भी विशाल दिखाई देता है।
ज्ञान के सागर में
मोती हैं, हीरे हैं,
चाँदी है, पन्ना है।
पर हीरे की परख
जौहरी ही जानता है।
ज्ञान के समंदर में
जितना गहरा गोता लगाओ,
उतना ही अनुभव होता है
कि अज्ञात बातें
अभी अनगिनत हैं।
भूगोल, खगोल, ग्रह-नक्षत्र,
लाभ-हानि, भाग्य-दुर्भाग्य—
मानव जन्म और मृत्यु के बीच
मिले सीमित जीवनकाल में
ज्ञान के इस अथाह सागर को
पूरी तरह पार कर पाना
अत्यंत दुर्लभ है।
ज्ञान-सागर
अत्यंत विशाल होते हुए भी
मानव-बुद्धि के सामने
अति सूक्ष्म-सा प्रतीत होता है।
ज्ञान का सागर
समुद्र की लहरों के समान है—
कभी ज्वार, कभी भाटा,
कहीं ज्वालामुखी,
कहीं शांत जल।
इसके रहस्यों को
समझना अत्यंत कठिन है।
अंततः मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो,
सृष्टि के विराट रहस्य के सामने
उसका ज्ञान सीमित ही है।
“सब ही नचावत राम गोसाईं।”
आज की चुनौती
ज्ञान का पावन समंदर
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
ज्ञान से रहित कोई जीव नहीं,
पर मानव का ज्ञान
सत्य-असत्य,
नश्वर-अनश्वर,
स्थायी-अस्थायी को पहचानकर
अपने जीवन को
सभ्य, सुसंस्कृत और सुरक्षित
बनाने में समर्थ है।
फिर भी यह समझना
पूरी तरह सही नहीं कि
मनुष्य सर्वज्ञानी है।
यदि मनुष्य इतना ज्ञानी है,
तो प्राकृतिक प्रकोपों का
पूरी तरह सामना करने में
असमर्थ क्यों है?
अतः ज्ञान का सागर
अत्यंत गहरा है।
ज्ञानी में भी
काम है, क्रोध है,
ईर्ष्या है, लोभ है,
अहंकार है।
वह जानता है
कि एक दिन उसे मरना है,
फिर भी जीवन भर
मोह-माया में उलझा रहता है।
स्नातक और स्नातकोत्तर बनकर
ऑडिटर, डॉक्टर बनकर
सच्ची मानव-सेवा करनी है।
वकील बनकर
न्याय के पक्ष में लड़ना है।
फिर भी समाज में
भ्रष्टाचार और रिश्वत का
बोलबाला क्यों है?
शासक हैं,
पर उनमें स्वार्थ है।
ठेकेदार हैं,
पर कहीं-कहीं कच्ची सड़कें
बनाकर भी काम पूरा मान लेते हैं।
आत्मज्ञानी भी हैं,
समाज-सुधारक भी हैं।
नायक हैं,
खलनायक हैं,
विदूषक हैं।
बलवान हैं,
निर्बल हैं।
रोगी हैं,
असाध्य रोगी भी हैं।
कोई जन्म से अमीर है,
कोई जन्म से गरीब।
मछलियों में
विविध प्रकार हैं।
हाथियों में, कुत्तों में,
हिरनों में,
मच्छरों और मक्खियों में,
भ्रमरों और साँपों में—
प्रकृति की विविधता
असीम है।
पानी के स्वाद में,
हवा के प्रकार में,
ज्ञान का सागर
अत्यंत विस्तृत है।
ज्ञान में भी
सद्ज्ञान है और दुर्ज्ञान।
ईश्वर की सृष्टि में
अति सूक्ष्म से अति विशाल तक
असंख्य रहस्य छिपे हैं।
एक सूक्ष्म बीज से
विशाल वृक्ष का बनना,
एक छोटे से अंडे से
तितली का बनना—
प्रकृति के अद्भुत रहस्य हैं।
हर पल दुर्घटनाएँ होती हैं,
नए-नए संक्रामक रोग आते हैं।
विज्ञान बढ़ता जाता है,
फिर भी अज्ञात का क्षेत्र
और भी विशाल दिखाई देता है।
ज्ञान के सागर में
मोती हैं, हीरे हैं,
चाँदी है, पन्ना है।
पर हीरे की परख
जौहरी ही जानता है।
ज्ञान के समंदर में
जितना गहरा गोता लगाओ,
उतना ही अनुभव होता है
कि अज्ञात बातें
अभी अनगिनत हैं।
भूगोल, खगोल, ग्रह-नक्षत्र,
लाभ-हानि, भाग्य-दुर्भाग्य—
मानव जन्म और मृत्यु के बीच
मिले सीमित जीवनकाल में
ज्ञान के इस अथाह सागर को
पूरी तरह पार कर पाना
अत्यंत दुर्लभ है।
ज्ञान-सागर
अत्यंत विशाल होते हुए भी
मानव-बुद्धि के सामने
अति सूक्ष्म-सा प्रतीत होता है।
ज्ञान का सागर
समुद्र की लहरों के समान है—
कभी ज्वार, कभी भाटा,
कहीं ज्वालामुखी,
कहीं शांत जल।
इसके रहस्यों को
समझना अत्यंत कठिन है।
अंततः मनुष्य कितना ही ज्ञानी क्यों न हो,
सृष्टि के विराट रहस्य के सामने
उसका ज्ञान सीमित ही है।
“सब ही नचावत राम गोसाईं।”